पिछले दिनों जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का ऑनलाइन आयोजन किया गया. इस समारोह में पाकिस्तान के युवा निर्देशक उमर रियाज की एक डॉक्यूमेंट्री- ‘कोई आशिक किसी महबूब से’, भी दिखाई गई. जहाँ फीचर फिल्मों के प्रदर्शन के लिए कई माध्यम हैं वहीं आज भी वृत्तचित्रों का प्रदर्शन फिल्मकारों के लिए मुश्किल पैदा करता है.
Sunday, January 24, 2021
नाउम्मीदी के बीच बेहतरीन की तमन्ना
पिछले दिनों जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का ऑनलाइन आयोजन किया गया. इस समारोह में पाकिस्तान के युवा निर्देशक उमर रियाज की एक डॉक्यूमेंट्री- ‘कोई आशिक किसी महबूब से’, भी दिखाई गई. जहाँ फीचर फिल्मों के प्रदर्शन के लिए कई माध्यम हैं वहीं आज भी वृत्तचित्रों का प्रदर्शन फिल्मकारों के लिए मुश्किल पैदा करता है.
Sunday, January 10, 2021
जीवन में सही सुर की तलाश
नए साल की शुरुआत ‘तेरहवीं’ से करना अटपटा लगता है, पर मौत का कोई कैलेंडर नहीं होता. सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म ‘रामप्रसाद की तेरहवीं’ के केंद्र में मौत का सवाल है, पर साथ ही यह सवाल भी लिपटा हुआ है कि जीवन की तरह मौत भी क्या उत्सव है?
Thursday, December 24, 2020
Glad did I live and gladly die: Obituary
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| (14.10.1942-15.12.2020) |
बड़े भाई (Navin Das) कहते हैं कि एक
बार पापा ने उनसे पूछा था कि तुम बड़े होकर घूस कमाओगे? बचपने में बड़े भाई ने कहा था-हां. पापा का जवाब था कि 'फिर मैं तुम्हारे यहाँ पानी भी नहीं पीऊंगा'.
साहित्य वगैरह नहीं लिखा, पर वे हमेशा
रचनात्मक रहे. वे अपनी आत्मकथा लिखना चाहते थे. बचपन में मैं बेहद recalcitrant
(हठी और जिद्दी) था. वे माँ से कहते थे कि-इसमें
जो destructive urge है उसे constructive
urge की तरफ मोड़ दीजिए.
वे अति संवेदनशील और आदर्शवादी थे. इतने कि मनोविज्ञान जिसे मनोविकार कहता है.
हमारे लिए वे 'स्पेशल फादर'
थे. 23 नवंबर को जब वे अस्पताल में भर्ती थे, तब खाना नहीं खा रहे थे. लाख कोशिश के बावजूद उन्होंने नहीं
खाया. रात के तीन बजे मुझे आवाज़ देते हुए पूछा- बेटा, तू खेलैं (तुमने खाया)? मैं रो पड़ा था.
काफी संघर्ष में वे पले-बढ़े थे. बचपन में खाने-पीने की भी दिक्कत रही थी
उन्हें. वे कहते थे-खाए-खर्चे जो बचे, सो धन रखिए जोड़.
वे दिल्ली में मेरे खर्च से परेशान रहते थे. मुझे और मेरे मित्रों से बार-बार
कहते थे कि इसे बोलिए एक मकान ख़रीदेगा. मैं उन्हें टीज करता था कि स्कॉलर के पास
पैसा नहीं रहता मकान के लिए. उन्होंने मुझे जाते-जाते एक मकान खरीद दिया. पर वे उस
मकान में रहे नहीं.
वे आध्यात्मिक व्यक्ति थे. ऋत्विक थे. सबसे प्रेम करते थे, पर उनमें मोह नहीं था.
उन्हें विनय पत्रिका का यह पद-मन पछितैहै अवसर बीते, काफी पसंद था, जो उन्होंने अपने पिता से सुना-सीखा था. वे अक्सर गाते थे-सुत-बनितादि जानि
स्वारथरत न करु नेह सबहीते/ अंतहु तोहिं तजेंगे पामर! तू न तजै अबहीते.
.............
Monday, December 21, 2020
नए साल में डिजिटल प्लेटफॉर्म से उम्मीदें
बॉलीवुड के लिए यह साल चतुर्दिक निराशा का रहा. बॉक्स ऑफिस पर मंदी छाई रही. अनेक कलाकारों की असामयिक मौत का सदमा रहा. ड्रग्स लेने के आरोपों की वजह से कई सितारे सुर्खियों में रहे. चारों तरफ फैली मायूसी के बीच जाहिर है नए साल से काफी उम्मीदें हैं.
केपीएमजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा वित्त वर्ष
में मीडिया और मनोरंजन उद्योग के कुल राजस्व में करीब बीस प्रतिशत की गिरावट की
संभावना है. हालांकि 1.8 ट्रिलियन रुपए के इस उद्योग में प्रिंट, टेलीविजन और
फिल्म उद्योग के मुकाबले डिजिटल और ऑन लाइन प्लेटफार्म में वृद्धि देखी गई है. टीकाकरण
की वजह से कोरोना महामारी का भय भले ही नए साल में कम होगा, पर
लोगों की कुछ आदतें जारी रहेंगी. इनमें डिजिटल मीडिया का उपभोग भी शामिल है.
नए साल में एक बड़ा दर्शक वर्ग सिनेमा हॉल के बरक्स
डिजिटल प्लेटफार्म पर रिलीज होने वाली फिल्मों और वेब सीरिज की ओर नजरे टिकाए हुए
मिलेंगे. उम्मीद की जानी चाहिए कि विविध विषयों की ओर निर्माता-निर्देशकों का
ध्यान जाएगा. हालांकि वेब सीरिज से जुड़े कलाकारों और निर्माताओं-निर्देशकों की
चिंता के केंद्र में केंद्र सरकार की वह अधिसूचना रहेगी जिसके तहत ऑनलाइन न्यूज़
पोर्टल और ऑनलाइन कंटेंट प्रोग्राम को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत लाया गया
है. देश में प्रिंट मीडिया के नियमन के लिए ‘प्रेस आयोग’ और समाचार
चैनलों के लिए ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ और विज्ञापन के नियमन के लिए ‘एडवर्टाइजिंग
स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया’ है. इसी तरह
फिल्मों के लिए ‘सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म
सर्टिफिकेशन’ है, पर डिजिटल
प्लेटफॉर्म के नियमन के लिए देश में कोई कानून या स्वायत्त संस्था नहीं है. इस अधिसूचना की जद में
नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार, अमेजन प्राइम आदि आएँगे. नियमन का स्वरूप
क्या होगा इस बारे में अभी स्पष्टता नहीं है.
पिछले दशक में ऑनलाइन मीडिया का अप्रत्याशित विस्तार
देखा गया है. यह सच है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिखाए गए कुछ वेब सीरीज में जिस
तरह हिंसा का चित्रण या गाली गलौज का इस्तेमाल हुआ उसे लेकर नागरिक समाज और
सामान्य दर्शकों में रोष है. सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में ऑनलाइन माध्यमों के
नियमन की जरूरत पर जोर दिया था. पर रचनात्मक स्वतंत्रता के लिए नियंत्रण या नियमन
की कार्रवाई अवरोध ही साबित होंगे. पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से मीडिया और
मनोरंजन उद्योग पर हमले हुए हैं इससे बहस-मुबाहिसा और रचनात्मकता का दायरा सिकुड़ा
है. ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े लोग इसे सेंसरशिप की ओर
बढ़ते कदम के रूप में देख रहे हैं.
पिछले महीने इन सबके बीच वर्ष 2019 में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई रिची मेहता की वेब सीरीज ‘दिल्ली क्राइम’ को ‘बेस्ट ड्रामा सीरिज’ में प्रतिष्ठित एमी पुरस्कार से नवाजा गया. दिल्ली में वर्ष 2012 में चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार की घटना पर यह वेब सीरीज आधारित है. जघन्य अपराध के बाद संवेदनशीलता के साथ पुलिस की कार्रवाई को यह हमारे सामने लाती है. इस अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से वेब सीरिज निर्माताओं-निर्देशकों की हौसला अफजाई हुई है. उम्मीद है कि नियमन/नियंत्रण की कोई कार्रवाई करने से पहले सरकार डिजिटल प्लेटफार्म की संभावना और सफलता को भी ध्यान में रखेगी.
(प्रभात खबर 20.12.2020)
Saturday, December 05, 2020
Maithili Cinema: In search of a home
Maithili cinema had to wait
until the 1960s to begin its journey in Indian cinema. Kanyadan from 1965
is credited as the first movie in Maithili. Phani Mazumdar’s film is based on
Harimohan Jha’s novel of the same name. The theme of a mismatched married
couple is depicted through a difference in language – the characters speak
Maithili and Hindi, respectively. Noted Hindi writer Phanishwar Nath “Renu”
wrote the dialogue for Kanyadan.
Naihar Bhel
Mor Sasur, directed by C Parmanand, might have been released earlier
than Kanyadan had it not faced production obstacles.
Ultimately released in the mid-1980s under the title Mamta Gabay Geet,
the movie is still remembered for its dialogue and songs, by such leading
playback singers as Geeta Dutt, Mahendra Kapoor and Suman Kalyanpur.
The list of Maithili-language
movies is sparse. It includes Jai Baba Vaidyanath (Madhusravani), Sasta
Jingi Mahg Senur, Kakhan Harb Dukh Mor and Ghogh
Me Chand. These productions revolved around social themes and used the
narrative idioms of mainstream Hindi cinema.
Maithili was included in the
Eighth Schedule of the Indian Constitution in 2004. The Mithila region, which
encompasses parts of present-day Bihar and Nepal, is known for its language,
literature and culture. And yet, it is Bhojpuri, the language spoken in Uttar
Pradesh, Bihar and Jharkhand, that has produced a more vibrant and sustainable
cinema. Any discussion of the cinema of Bihar begins and ends with Bhojpuri
films.
The 1966 Hindi-language
film Teesri Kasam, directed by Basu Bhattacharya and produced by
the lyricist Shailendra, was based on the short story Mare
Gaye Gulfam by Phanishwar Nath ‘Renu’. Could Teesri Kasam have
been made in Maithili? The movie, starring Waheeda Rehman and Raj Kapoor,
depicts Mithila’s culture and has scenes containing Maithili dialogue.
Kedarnath Chaudhary said, “If Teesri Kasam had been made in
Maithili, the trajectory of Maithili films would have been very different.”
A strong culture ofmovie-watching existed in Bihar right from the earliest years of cinema. Patna
still has Elphinstone Theatre, which came up in 1919 and started off by
screening silent films. And yet, not only have there been relatively fewer
films in the local languages, but also the existing productions are poorly
preserved. Prints of the first Maithili film Kanyadan are
unavailable today – even the National Film Archive of India in Pune doesn’t
have a copy.
Regional cinema has managed to
conquer new territories in the past two decades. Films made in Marathi, Punjabi
and Malayalam films have been popular beyond their language markets. There is a
glimmer of hope for Maithili films, represented by Nitin Chandra’s Mithila
Makhan (2015), Roopak Sharar’s Premak Basat (2018)
and Achal Mishra’s Gamak Ghar (2019).
Mithila
Makhan is the only film to have won a National Award for
Best Film in the Maithili language. Gamak Ghar has received
widespread critical acclaim and has travelled to several film festivals. Yet,
distributors have been largely unenthusiastic about backing Maithili films.
Director Nitin Chandra said, “Distributors do not even know that there is a
language called Maithili in which films are made.” After streaming services
rejected Mithila Makhan, he released the film this
year on his own online platform, Bejod.in. Clearly, the story hasn’t changed
too much since Mamta Gabay Geet. It appears that all these
years later, Maithili cinema is wandering in search of a home.
(All these years later, Maithili cinema is still in search of a home)
Sunday, November 29, 2020
छोटे मुंह बड़ी बात करती फिल्में
छोटी फिल्में ‘छोटे मुंह बड़ी बात’ करती है. फीचर फिल्मों की तरह इनके पास दो-ढाई घंटे का समय नहीं होता. बमुश्किल पच्चीस-तीस मिनट में लेखक-निर्देशक को अपनी बात कहनी होती है, अभिनेता को अपनी कला का प्रदर्शन करना होता है. जाहिर है, शार्ट फिल्म फिल्मकारों के लिए एक चुनौती है. आम तौर पर फिल्म स्कूल के छात्र ‘डिप्लोमा फिल्मों’ में इस विधा का इस्तेमाल करते रहे हैं. विधु विनोद चोपड़ा, श्रीराम राघवन जैसे चर्चित फिल्म निर्देशकों की शार्ट डिप्लोमा फिल्मों को लोग आज भी याद करते हैं. पिछले दशक में इंटरनेट और यू- ट्यूब जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के उभार ने शार्ट फिल्म को एक अलग मंच दिया है, जहाँ कई पुराने और नए फिल्मकार अपनी फिल्मों को प्रदर्शित कर रहे हैं. कई प्रयोगशील फिल्मकारों की फिल्में भी यहाँ दिख जाती है.
Sunday, November 15, 2020
'देस' की तलाश में मैथिली सिनेमा
जहाँ बोलती हिंदी फिल्मों के साथ-साथ ही बांग्ला और असमिया सिनेमा विकसित होनी शुरू हुई, वहीं मैथिली में सिनेमा का इतिहास आजादी के बाद 60 के दशक में शुरु होता है. ‘नैहर भेल मोर सासुर’ नाम से पहली मैथिली फिल्म वर्ष 1963-64 में बननी शुरु हुई, जिसके निर्देशक सी परमानंद थे. बाद में यह फिल्म काफी कठिनाइयों को झेलती हुई ‘ममता गाबय गीत’ नाम से 80 के दशक के मध्य में रिलीज हुई थी, जिसे लोग गीत-संगीत और मैथिली संवाद के लिए आज भी याद करते हैं. इस फ़िल्म में महेंद्र कपूर, गीता दत्त और सुमन कल्याणपुर जैसे हिंदी फ़िल्म के शीर्ष गायकों ने आवाज़ दी थी और मैथिली के रचनाकार रविंद्र ने गीत लिखे थे. ‘अर्र बकरी घास खो, छोड़ गठुल्ला बाहर जो’, ‘भरि नगरी मे शोर, बौआ मामी तोहर गोर’ के अलावे विद्यापति का लिखा-‘माधव तोहे जनु जाह विदेस’ भी इस फिल्म भी शामिल था.
मैथिली में पहली फिल्म होने का श्रेय ‘कन्यादान’ फिल्म को है. वर्ष 1965 में फणी मजूमदार ने इस फिल्म का निर्देशन किया था. हरिमोहन झा के चर्चित उपन्यास ‘कन्यादान’, जिस पर यह फिल्म आधारित है, का रचनाकाल वर्ष 1933 का है. इस फिल्म में बेमेल विवाह की समस्या को भाषा समस्या के माध्यम से चित्रित किया गया है. चर्चित लेखक फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ इस फिल्म से संवाद लेखक के रूप में जुड़े थे. फिल्म में मैथिली के साथ हिंदी का भी प्रयोग था. इस फिल्म के गीत-संगीत में प्रसिद्ध लोक गायिका विंध्यवासिनी देवी का भी योगदान था. इसके बाद ‘जय बाबा वैद्यनाथ (मधुश्रावणी)’ फिल्म 70 के दशक के आखिर में प्रदर्शित हुई लेकिन इस फिल्म में भी मैथिली के साथ हिंदी का प्रयोग मिलता है.
इन दो फिल्मों के अलावे ‘सस्ता जिनगी महग सेनूर’, 'कहन हरब दुख मोर' ‘घोघ में चाँद’ आदि इक्का-दुक्का फिल्में प्रदर्शित हुई, जिसकी छिटपुट चर्चा की जाती रही है. हालांकि इनमें कोई आलाोचनात्मक दृष्टि या सिनेमाई भाषा नहीं मिलती है, जो मिथिला के समाज, संस्कृति को संपूर्णता में कलात्मक रूप से रच सके. इनमें से ज्यादातर फिल्में सामाजिक विषयों के इर्द-गिर्द ही रही, एक-दो फिल्में धार्मिक-पौराणिक महत्व के रहे.
जब भी बिहार के फिल्मों की बात होती है, भोजपुरी सिनेमा का ही जिक्र किया जाता है. मैथिली फिल्मों की चलते-चलते चर्चा कर दी जाती है. जबकि पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पिअरी चढैबो’ और ‘ममता गाबए गीत’ का रजिस्ट्रेशन ‘बाम्बे लैब’ में वर्ष 1963 में ही हुआ और फिल्म का निर्माण कार्य भी आस-पास ही शुरू किया गया था. इस फिल्म में निर्माताओं में शामिल रहे केदारनाथ चौधरी बातचीत के दौरान हताश स्वर में कहते हैं-‘भोजपुरी फिल्में कहां से कहां पहुँच गई और मैथिली फिल्में कहां रह गई!’ लेकिन, यहां इस बात का उल्लेख जरूरी है कि भोजपुरी और मैथिली फिल्मों के अतिरिक्त साठ के दशक में फणी मजूमदार के निर्देशन में ही ‘भईया’ नाम से एक मगही फिल्म का भी निर्माण किया गया था. पचास-साठ साल के बाद भी मैथिली और मगही फिल्में विशिष्ट सिनेमाई भाषा और देस की तलाश में भटक रही है.
केदार नाथ चौधरी ‘ममता गाबय गीत’ फ़िल्म के मुहूर्त से जुड़े एक प्रंसग का उल्लेख करते हुए अपनी किताब ‘आबारा नहितन’ में लिखते हैं कि जब वे फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ से मिले (1964) तो उन्होंने मैथिली फ़िल्म के निर्माण की बात सुन कर भाव विह्वल होकर कहा था-‘अइ फिल्म केँ बन दिऔ. जे अहाँ मैथिली भाषाक दोसर फिल्म बनेबाक योजना बनायब त’ हमरा लग अबस्से आयब. राजकपूरक फिल्मक गीतकार शैलेंद्र हमर मित्र छथि (इस फ़िल्म को बनने दीजिए. यदि आप मैथिली भाषा में दूसरी फ़िल्म बनाने की योजना बनाए तो मेरे पास जरूर आइएगा. राजकपूर की फ़िल्मों के गीतकार शैलेंद्र मेरे मित्र हैं)’.
इस फ़िल्म के निर्माण के आस-पास ही रेणु की चर्चित कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ‘तीसरी कसम’ नाम से फ़िल्म बनी. इस फ़िल्म में मिथिला का लोक प्रमुखता से चित्रित है और फ़िल्म में एक जगह तो संवाद भी मैथिली में सुनाई पड़ता है. क्या ‘तीसरी कसम’ मैथिली में बन सकती थी? केदारनाथ चौधरी कहते हैं कि ‘निश्चित रूप से. यदि ‘तीसरी कसम’ फिल्म मैथिली में बनी होती तो मैथिली फिल्म का स्वरूप बहुत अलग होता.’ यह सवाल भी सहज रूप से मन में उठता है कि यदि ‘विद्यापति’ फिल्म मैथिली में बनी होती तो मैथिली फिल्मों का इतिहास कैसा होता?
फिल्म नगरी बंबई में शुरुआती दौर से बिहार के कलाकार मौजूद रहे हैं और विभिन्न रूपों में अपना योगदान देते रहे हैं. प्रसंगवश, ‘ममता गाबय गीत’ के निर्देशक सी परमानंद की एक छोटी सी भूमिका ‘तीसरी कसम’ फिल्म में थी. साथ ही बिहार में भी सिनेमा देखने की संस्कृति शुरुआती दौर से रही है. भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में जब भी पुरोधाओं का जिक्र किया जाता है, तब दादा साहब फाल्के के साथ हीरा लाल सेन, एसएन पाटनकर और मदन थिएटर्स की चर्चा होती है. मदन थिएटर्स के मालिक थे जेएफ मदन. एल्फिंस्टन बायस्कोप कंपनी इन्हीं की थी. पटना स्थित एल्फिंस्टन थिएटर (1919), जो बाद में एल्फिंस्टन सिनेमा हॉल के नाम से मशहूर हुआ, में पिछली सदी के दूसरे-तीसरे दशक में मूक फिल्में दिखायी जाती थीं. आज भी यह सिनेमा हॉल नये रूप में मौजूद है.
पर जहां तक सिनेमा के सरंक्षण और पोषण का सवाल है, बिहार का वृहद समाज और सरकार उदासीन ही रहा है. एक उदाहरण यहाँ पर देना प्रासंगिक होगा. पहली फिल्म ‘कन्यादान’ के प्रिंट आज अनुपलब्ध हैं. इस सिलसिले में जब मैंने पुणे स्थित ‘नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया’ से संपर्क साधा तो उनका कहना था कि उनके डेटा बैंक में ऐसी कोई फिल्म नहीं है. मनोरंजन के साथ-साथ फिल्म का सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व होता है. सिनेमा समाज की स्मृतियों को सुरक्षित रखने का भी एक माध्यम है. फिल्मों के खोने से आने वाली पीढ़ियाँ उन संचित स्मृतियों से वंचित हो जाती है.
पिछले दो दशकों में भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय फ़िल्मों की धमक बढ़ी है. भूमंडलीकरण के साथ आई नई तकनीकी, मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर और कला से जुड़े नवतुरिया लेखक-निर्देशकों ने सिनेमा निर्माण-वितरण को पुनर्परिभाषित किया है. जहाँ कम लागत, अपने कथ्य और सिनेमाई भाषा की विशिष्टता की वजह से मराठी, पंजाबी, मलयालम फ़िल्में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल रही है, वहीं भारतीय सिनेमा के इतिहास में फुटनोट में भी मैथिली फ़िल्मों की चर्चा नहीं मिलती. यहाँ तक कि पापुलर फ़िल्मों में भी भोजपुरी फ़िल्मों की ही चर्चा होती है.
हाल के वर्षों में नितिन चंद्रा निर्देशित ‘मिथिला मखान’ (2015), रूपक शरर निर्देशित ‘प्रेमक बसात’ (2018), और अचल मिश्र निर्देशित ‘गामक घर’ (2019) की मीडिया में चर्चा हुई है. ‘मिथिला मखान’ मैथिली में बनी एक मात्र ऐसी फ़िल्म है जिसे मैथिली भाषा में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है. साथ ही ‘गामक घर’ फिल्म को भी फिल्म समारोहों में सराहा गया और यह भी पुरस्कृत हुई. ‘गामक घर’ एक आत्म-कथात्मक फिल्म है, जिसके केंद्र में दरभंगा जिले में स्थित निर्देशक का पैतृक घर है. यह फिल्म एक लंबी उदास कविता की तरह है. मैथिली सिनेमा में ‘गामक घर’ जैसी फिल्मों की परंपरा नहीं मिलती. निर्देशक ने घर के कोनों को इतने अलग-अलग ढंग से अंकित किया है कि वह महज ईंट और खपरैल से बना मकान नहीं रह जाता. वह हमारे सामने सजीव हो उठता है. डॉक्यूमेंट्री और फीचर फिल्म की शैली एक साथ यहां मिलती है. इस तरह की फिल्में मैथिली सिनेमा को कला प्रेमियों और देश-विदेश के समीक्षकों की नजर में लाने में कामयाब है.हालांकि इन फिल्मों को लेकर वितरकों में कोई उत्साह नहीं है. नितिन चंद्रा कहते हैं कि ‘वितरक यह भी नहीं जानते कि मैथिली नाम से कोई भाषा है जिसमें फिल्में बनती हैं. हमने इस भाषा में अब तक कुछ खास बनाया ही नहीं!’ वे कहते हैं कि यहाँ तक कि ऑनलाइन प्लेटफार्म (हॉटस्टार, नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, जी 5 आदि) पर भी मिथिला मखान को कोई प्रदर्शित करने को राजी नहीं हुआ तब उन्होंने खुद इसे एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने का फैसला किया. नितिन चंद्रा इस फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए लोगों से चंदा (क्राउड फंडिंग) भी मांग रहे हैं, पर परिणाम उत्साहजनक नहीं रहा है. ‘ममता गाबय गीत’ को भी अपने जमाने में वितरक नहीं मिल पाया था. ऐसा लगता है मैथिली सिनेमा इन दशकों में एक बाजार विकसित करने में नाकाम रहा है. मिथिला में कोई माहौल नहीं दिखता.
दरभंगा-मधुबनी जैसी जगहों पर दो दशक पहले तक सिनेमा प्रदर्शन के लिए जो सिनेमाघर थे वे भी लगातार कम होते गए. जो भी सिनेमाघर बचे हैं वहाँ भोजपुरी फिल्मों का प्रदर्शन ही होता है. मिथिला से बाहर देश-विदेश में जो मैथिली भाषा-भाषी हैं वे अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर उत्साही नहीं हैं, भले ही वर्ष 2004 में संविधान की आठवीं अनुसूची में इसे शामिल कर लिया गया हो. हिंदी के वर्चस्व को लोगों ने बिना किसी दुविधा के स्वीकार कर लिया है. मनोरंजन के लिए ये बॉलीवुड की ओर ही देखते रहते हैं और इनमें मैथिली सिनेमा को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं दिखती हैं. साथ ही मैथिली भाषा पर एक जाति विशेष की भाषा होने का आरोप लगता रहा है. क्या मैथिली सिनेमा का विकास नहीं होने की एक वजह यह भी तो नहीं?
(प्रभात खबर, दीपावली विशेषांक 2020 में प्रकाशित)
Sunday, November 08, 2020
अदाकारों के लिए स्पेस रचता वेब सीरीज
Wednesday, October 28, 2020
सिनेमा हॉल खुले, पर दर्शक कहां हैं
करीब सात महीने के बाद देश में सिनेमाघर खुले हैं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर ‘वीरानी सी वीरानी’ है. बॉक्स ऑफिस के लिहाज से दो प्रमुख राज्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु में सिनेमाघर अभी भी नहीं खुले हैं.
Thursday, October 15, 2020
टीआरपी घोटाले से टीवी चैनलों पर संकट
मुंबई पुलिस और आर्थिक अपराध शाखा (EOW) टीवी चैनलों की TRP में हुए कथित घोटालों की जाँच कर रहे हैं। इस मामले में अभी तक मुंबई पुलिस Republic TV के CEO और COO से पूछताछ कर चुकी है। Republic TV के प्रधान संपादक Arnab Goswami को सोशल मीडिया पर ट्रॉल किया जा रहा है। मुंबई पुलिस ने अब तक इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार रिपब्लिक टीवी और दो अन्य चैनलों ने अपनी टीआरपी बेहतर करने के लिए हेरफेर की। TRP क्या है और इसमें घोटाला कर के किसी टीवी चैनल को क्या फायदा हो सकता है? इन्हीं सवालों के जवाब देने के लिए आज हमने बात की मीडिया विशेषज्ञ अरविंद दास से। (साभार, लोकमत हिंदी)
Sunday, October 11, 2020
उदारीकरण, राष्ट्रवाद और टीवी न्यूज़
भारत में उदारीकरण की नीतियों के फलस्वरूप निजी टेलीविजन समाचार चैनलों का अभूतपूर्व प्रसार हुआ. जनसंचार, विचार-विमर्श, छवियों के निर्माण और संसदीय चुनावों के दौरान राजनीतिक
लामबंदी में टेलीविजन समाचार चैनल एक प्रमुख माध्यम बनके उभरे हैं. इन्हीं दशकों
में पूरी दुनिया में बाजार और संचार
तकनीक के माफर्त भूमंडलीकरण के आने से राष्ट्र-राज्य के स्वरूप में परिवर्तन भी आया है. जहाँ कुछ राष्ट्र्-राज्य की शक्ति बढ़ी, वहीं कुछ राष्ट्र-राज्य की शक्ति में कमी आई. साथ ही दक्षिणपंथी ताकतों और उग्र-राष्ट्रवाद का उभार भी हुआ है. 21वीं सदी के दूसरे दशक के आखिर में यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने (ब्रेगिजट) को हम दक्षिणपंथी ताकतों की मजबूती और राष्ट्र-राज्य की कमजोर होती शक्ति को फिर से पाने के प्रयास में रूप में पाते हैं.
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप, इंग्लैंड में बोरिस जानसन, ब्राजील में जेयर बोलसोनारो, तुर्की में रेसेप तैयप एर्दोगान और भारत में नरेंद्र मोदी जैसे पापुलिस्ट नेताओं के उभार ने राष्ट्रवाद और मीडिया के आपसी संबंध को बहस के घेरे में ला दिया है. टेलीविजन समाचार माध्यम में राष्ट्रवादी विमर्श एक प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में उभरा है. हालांकि जैसा कि अरविंद राजगोपाल ने अपने चर्चित अध्ययन ‘पॉलिटिक्स आफ्टर टेलीविजन’ में विस्तार से दिखाया है कि भारत में उदारीकरण के बाद (80 के दशक के आखिरी और 90 के दशक के शुरुआती सालों में) उभरे नव मध्यवर्ग के बीच रामायण जैसे महाकाव्यों का सिरीयल के रूप में हफ्ते दर हफ्ते दूरदर्शन पर प्रसारण ने राम जन्मभूमि आंदोलन को मजबूती दिया और भारतीय जनता पार्टी के हिंदुत्व विचारधारा के प्रसार लिए जमीन तैयार किया था.[i] संक्षेप में, उदारीकरण एक विस्तृत संकल्पना है जिसमें निजीकरण और बाजारीकरण की अवधारणा भी शामिल है. भारतीय परिप्रेक्ष्य में, इसके तहत भारतीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने में राज्य की भूमिका को कम करने, निजीकरण को बल प्रदान करने तथा निवेश तथा निर्यात की नीति में आमूलचूल परिवर्तन कर भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों को लागू करना शामिल था. इसे वर्ष 1991 में नई आर्थिक नीति के माध्यम से लागू किया गया. हालांकि इसकी शुरुआत राजीव गांधी के नेतृत्व में (1985-86) राज्य प्रेरित आयात प्रतिस्थापन की नीति को बदल कर निर्यातोन्मुख विकास की नीति को लागू करने के साथ हो गया था.[ii] सवाल है कि उदारीकरण के बाद राष्ट्रवाद और टेलीविजन समाचार चैनलों के बीच उभरे संबंध को हम किस रूप में देखें? क्या यह उदारीकरण-भूमंडलीकरण के साथ ही सहज रुप से विकसित हुए हैं? या भारतीय संदर्भ में इसकी कोई ख़ास विशेषता है? इस लेख में सेटेलाइट, निजी हिंदी टेलीविजन समाचार चैनलों के हवाले से इन सवालों की पड़ताल की गई है.
(संवाद पथ, जनसंचार और पत्रकारिता केंद्रित पत्रिका, खंड-2, अंक-3, जुलाई-सितबंर 2019, पेज 38-46)











