Saturday, July 21, 2018

बच्चों का किताबी कोना

आधुनिक स्मार्ट फोन, लैपटॉप, टीवी और इंटरनेट के दौर में बीतता आज का बचपन हमारे बचपन से अलहदा है. हमारे बचपन में किताबें भले ही नहीं थी, लेकिन दादी-नानी की कहानियां थीं. तकनीक आज के बचपन पर हावी है. हालांकि तकनीक की मार्फत बच्चे कार्टून, वीडियो की शक्ल में किस्से-कहानियों से ही ज्यादा जुड़ते हैं, माध्यम का फर्क भले हो.
पर माध्यम के बदलने से हमारे वात्सल्य का स्वरूप, बच्चों के साथ रिश्ता भी बदल जाता है. सच तो यह है कि जब हम बच्चों को किस्से-कहानियाँ सुनाते हैं तब हम अपने बचपन में भी लौटते हैं. एक तरह से हमारे लिए यह विरेचन की अवस्था होती है. जैसे कि बच्चे बार-बार हमें याद दिलाते रहते हैं कि ‘वे अब बड़े हो गए है...!’ यह उनका ‘बड़प्पन’ है और साथ ही हमारे लिए ताकीद भी कि हम उनके बचपन के घरौंदे में घुसें तो इस बात खयाल रखें!
रोमानिया मूल की जर्मनी में रहने वाली मेरी एक दोस्त, अमेलिया बोनेआ, इन दिनों काफी उत्साहित हैं. साथ ही थोड़ी सी घबराई हुई भी हैं. उन्हें चिंता है कि वह बच्चों के बीच कैसे एक कहानी का पाठ कर पाएंगी. वे कहती हैं कि अपनी बेटी को पढ़ाना और बात है, पर बच्चों के बीच पाठ का उन्हें कोई अनुभव नहीं है. वे इतिहासकार हैं. हाल ही में उन्होंने बच्चों के लिए ‘टेलीग्राफ और जादुई आम’ के इर्द-गिर्द एक किताब लिखी हैं. वह अपने गृह प्रदेश सतु मारे में स्थित बच्चों के एक सार्वजनिक पुस्तकालय में इस किताब का पाठ करेंगी.
मुझे याद आया कि तीन साल पहले मैं अपनी नन्हीं-सी बेटी, कैथी, के लिए एक किताब, चूज डे, ख़रीद कर लाया था. कहानी में ‘चू पांडा’ अपने माँ-पिता के साथ पुस्तकालय, रेस्तरां और फिर सर्कस देखने जाता है और हर जगह उसे छींक आ जाती है. बेटी ने पूछा था कि पुस्तकालय क्या होता है! मैंने घर में रखी किताबों की रैक की ओर इशारा करके बताया कि पुस्तकालय में किताबें होती है पर सोचा कि उसे कोई पुस्तकालय घूमा लाऊं. मैंने आस-पास नज़र दौड़ाई पर मुझे बच्चों का कोई भी पुस्तकालय नजर नहीं आया. फिर मैं उसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पुस्तकालय में ले गया था.
दिल्ली में स्थित ‘चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट’ जैसी जगह देश में बेहद कम है, जहाँ के पुस्तकालय में केवल बच्चों के लिए किताबें मौजूद हों. इसे प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर ने 1957 में स्थापित किया था. कुछ व्यक्तिगत प्रयासों को छोड़ दें तो पूरे देश में बच्चों के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय का सर्वथा अभाव दिखता है. यहाँ तक कि बड़ों के लिए जो पुस्तकालय हैं, वहाँ भी बच्चों के लिए किताबों का कोई कोना ढूंढ़ने पर ही मिल पाता है.
हाल के वर्षो में एकलव्य, कथा, प्रथम जैसी प्रकाशन संस्थाएँ बच्चों के लिए काफी अच्छी और रचनात्मक किताबें छाप रही है. दिल्ली में होने वाले विश्व पुस्तक मेले में इन प्रकाशनों के स्टॉल पर माँ-पिता के संग बच्चों की भीड़ दिखाई देती है. बच्चों और स्कूल जाने वाले विद्यार्थियों के लिए यहाँ प्रवेश मुफ्त में होता है.
नेशनल बुक ट्र्स्ट (एनबीटी) भी बच्चों के लिए दशकों से कम कीमत में सचित्र किताबें छापता रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में गैर सरकारी संस्थानों से भी किताबें छप कर आ रही हैं. कुछ महीने पहले नेहरू बाल पुस्तकालय के तहत एनबीटी से छपी बच्चों की एक पारंपरिक कहानी- 'कछुआ और खरगोश', पर मेरी नजर पड़ी जिसे जाकिर हुसैन ने मूल उर्दू में लिखा था और अनुवाद खुशवंत सिंह ने किया था. इस किताब में चित्राकंन मकबूल फिदा हुसैन ने किए थे. तीन दिग्गजों का नाम एक साथ किताब के मुख्य पृष्ठ पर देखना मेरे लिए सुखद था. यह कहा जा सकता है कि बच्चों के लिए लिखी गई किताबें बड़ों को ध्यान में रख कर ही लिखी जाती हैं, क्योंकि पहला पाठक बच्चों के अभिभावक ही होते हैं. बहरहाल, एनबीटी के पास संसाधनों की कमी नहीं है. उसे बच्चों के मानस को प्रभावित करने वाली दृष्टि के साथ नए प्रयोग कर किताबें निकालनी चाहिए.
बच्चों के बीच काम करने वाली गैर स्वंयसेवी संगठन, प्रथम ने दो साल पहले बच्चों के लिए एक ऑनलाइन लाइब्रेरी- ‘स्टोरीवीवर’ शुरु की है. यहाँ कोई भी मुफ्त में विभिन्न भारतीय भाषाओं में बच्चों के लिए किताबें डाउनलोड कर सकता है, पढ़ सकता है. 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में अठारह साल से कम उम्र के करीब 47 करोड़ बच्चे हैं. सफदर हाशमी ने बच्चों की एक कविता में लिखा है-‘किताबें कुछ कहना चाहती हैं/ तुम्हारे पास रहना चाहती हैं.’ लेकिन सवाल है कि हमने क्या आसपड़ोस में इन बच्चों के लिए कोई ऐसी जगह बनाई है, जहाँ पर उनके लिए किताबें हो, उनका अपना एक कोना हो, जहाँ पर उनकी कल्पना उड़ान भर सके.
(दुनिया मेरे आगे कॉलम, जनसत्ता में 21 जुलाई 2018 को प्रकाशित)

Wednesday, July 04, 2018

गांव में पुस्तकालय


बिहार में पठन-पाठन की प्राचीन संस्कृति रही है. जहां मिथिला वैदिक सभ्यता का केंद्र था, वहीं मगध बौद्ध सभ्यता का. लेकिन गुणात्मक रूप से शिक्षा का प्रसार भले हुआ हो, यह इलाका शिक्षा के क्षेत्र में आजादी के बाद भी पिछड़ा रहा. आधुनिक काल में शिक्षा का लोकतंत्रीकरण हुआ. इस संबंध में सार्वजनिक पुस्तकालयों की क्या भूमिका रही, यह शोध का विषय है.
मिथिला के मधुबनी जिले में स्थित गांव, बेलारही, में एक पुस्तकालय है- मिथिला मातृ-मंदिर. पिछले दिनों जब गांव गया तो यह देखकर खुशी हुई कि पिछले चार साल में करीब डेढ़ लाख रुपये की किताब की आमद हुई है. यह सांसद-विधायक विकास निधि के योगदान से संभव हुआ. हालांकि, पुस्तकालय में किताबों के रख-रखाव की व्यवस्था नहीं थी. बैठने के लिए मेज-कुर्सियां भी नहीं थीं. अंधेरे कमरे में किताबों की गंध आकर्षित करने की बजाय उनसे दूरी बढ़ा रही थी.
नब्बे के दशक में जब बिहार के गांवों से मध्यवर्ग के बच्चे पढ़ने-लिखने के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करने लगे, तबसे पुस्तकालय की स्थिति बदहाल होने लगी. साथ ही सरकार और नागरिक समाज की बेरुखी का भी इसमें योगदान है.
बीसवीं सदी के शुरुआती दशक में, आजादी के आंदोलन के दौरान, मिथिला के गांवों में सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना हुई थी. मेरे गांव का पुस्तकालय 80 साल पुराना है. 
मां ने बताया कि प्रेमचंद, हरिमोहन झा, फणीश्वरनाथ रेणु की किताबें उन्होंने इसी पुस्तकालय से मंगवाकर पढ़ी थी. कई संग्रहणीय पुस्तकें वहां मौजूद थीं, पर किसी पेशेवर के हाथों में नहीं होने के कारण दुर्लभ किताबें गायब होती गयीं.
इस बीच किताबों की खरीद में कोई दृष्टि नहीं दिखती. सरकारी खरीद में पाठकों की रुचि का ख्याल नहीं दिखता. बच्चों के लिए कोई किताब नहीं है, जबकि गांव में प्राइमरी और माध्यमिक विद्यालय है. विचारधारा विशेष की किताबों को पुस्तकालय पहुंचाने पर जोर है. आश्चर्य नहीं कि ‘दीन दयाल उपाध्याय संपूर्ण वांग्मय’ के दर्शन हुए.
मिथिला मातृ मंदिर पुस्तकालय की एक किताब
एक जमाने में यह पुस्तकालय पूरे जिले में जाना जाता था. मैंने एक किताब इश्यू करवायी, जो 1942 में छपी थी. शिवपूजन सहाय और हरिमोहन झा जैसे साहित्यकारों की देख-रेख में रामलोचन शरण की स्वर्ण जयंती और चर्चित प्रकाशन संस्था ‘पुस्तक भंडार’ की रजत जयंती के बहाने इस किताब में बिहार की संस्कृति, साहित्य और इतिहास पर विद्वानों के लेख संग्रहित हैं.

चर्चित चित्रकार और कला मर्मज्ञ उपेंद्र महारथी के बनाये चित्र इस संग्रह की एक उपलब्धि है. प्रसंगवश रामलोचन शरण पुस्तक भंडार के संस्थापक थे. उन्होंने बच्चों के लिए चर्चित पत्रिका ‘बालक’ का संपादन किया था. उनकी पुस्तक मनोहर पोथी आज भी बच्चों के बीच लोकप्रिय है.

मोबाइल और तकनीक के दौर में किताबों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है. यदि इन पुस्तकालयों को नयी दृष्टि के साथ पेशेवर ढंग से चलाया जाये, तो सूरत बदल सकती है.
(प्रभात खबर के कुछ अलग कॉलम के तहत 4 जुलाई 2018 को प्रकाशित)

Saturday, June 30, 2018

एक कवि जो चौकीदार है

उमेश पासवान
यदि किसी कवि से बात करनी हो और आपके पास उनका नंबर नहीं हो तो आप क्या करेंगे? आप प्रकाशक को फोन करेंगे, अकादमी से नंबर मांगेंगे.

पर क्या आप मानेंगे कि मैंने थाने में फोन किया और एक कवि का नंबर मांगा.

सच तो यह है कि पहले मैंने साहित्य अकादमी को ही फोन किया था जिसने इस कवि को उसकी कविता पुस्तक ‘वर्णित रस’ के लिए मैथिली भाषा में इस वर्ष (2018) का साहित्य अकादमी 'युवा साहित्य पुरस्कार' के लिए चयन किया है. पर उनके पास नंबर नहीं था.

मधुबनी जिले के लौकही थाना प्रभारी ने ख़ुशी-ख़ुशी मुझसे उस कवि का नंबर शेयर किया. असल में पेशे से चौकीदार उमेश पासवान इस थाने में कार्यरत हैं. पर जब आप बात करेंगे तो ऐसा नहीं लगेगा कि आप किसी पुलिसवाले से बात कर रहे हैं. शुद्ध मैथिली में उनसे हुई बातचीत का सुख एक कवि से हुई बातचीत का ही सुख है. हालांकि वे कहते हैं कि उनके लिए कविता अपनी पीड़ा को कागज पर उतारने का जरिया है.

कबीर के बारे में प्रधानमंत्री मोदी बोल रहे थे कि कैसे उनके लिए कविता जीवन-यापन से जुड़ी हुई थी. ठीक यही बात युवा कवि उमेश पासवान कहते हैं. वे कहते हैं कि चौकीदार थाने के लिए आँख का काम करता है. उनका कहना है- “मैं गाँव-गाँव जाकर जानकारी इकट्ठा करता हूँ और इस क्रम में उनके सुख-दुख, आशा-अभिलाषा का भागीदार भी बनता हूँ. खेत-खलिहान, घर-समाज का दुख, कुरीति, भेदभाव, लोगों की पीड़ा मेरी कविता की भूमि है.”

उनकी एक कविता है- ‘गवहा संक्राति’. सितंबर-अक्टूबर महीने में मिथिला में किसान धान के कटने के बाद खेत में उपज बढ़ाने के निमित्त इस पर्व को मनाते हैं. पर भुतही, बिहुल और कमला-बलान नदी में आने वाली बाढ़ की त्रासदी में इस इलाके में पर्व-त्योहार की लालसा एक किसान के लिए हमेशा छलावा साबित होती है. वे इस कविता में लिखते है:

बड़ अनुचित भेल/गृहस्त सबहक संग ऐबेर/खेती मे लगाल खर्चा/ मेहनति-मजदुरी/ सभ बाढ़िंक चपेटि मे चलि गेल/ पावनि-तिहार में सेहन्ता लगले रहि गेल

(बड़ा अनुचित हुआ/ इस बार गृहस्थ सबके साथ/ खेती में लगा खर्च/ मेहनत-मजदूरी/ सब बाढ़ के चपेट में चला गया/ पर्व-त्योहार की अभिलाषा लगी ही रह गई)

आगे वे लिखते हैं कि ‘किस तरह किसान खेत में जाकर सेर के बराबर/ उखड़ि के जैसा ‘बीट’/ समाठ के जैसा ‘सिस’ की बात करेंगे?

साहित्य अकादमी के इतिहास में मेरी जानकारी में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी दलित को मैथिली भाषा में पुरस्कार मिला है.

यह पूछने पर कि क्या आपको इस बात की अपेक्षा थी कि कभी साहित्य अकादमी मिल सकता है? उमेश कहते हैं- ‘नहीं, मुझे आश्चर्य हुआ. मेरे घर-परिवार के लोग अकादमी को नहीं जानते. जब मैंने इस पुरस्कार के बारे में अपनी माँ से कहा तो पहला सवाल उन्होंने किया कि इसमें पैसा मिलता है या देना पड़ता है?’

उमेश ने पुरस्कार में मिलने वाली राशि को शहीदों के बच्चों के निमित्त जमा करने का निर्णय लिया है.

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2004 में मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर भाषा का दर्जा दिया गया, पर दुर्भाग्यवश मैथिली भाषा-साहित्य में ब्राह्मणों और कर्ण कायस्थों की उपस्थिति ही सब जगह नजर आती है जबकि पूरे मिथिला भू-भाग में यह बोली ओर समझी जाती रही है.

ऐसा नहीं कि मैथिली में अन्य जाति, समुदाय से आने वाले सक्षम कवि-लेखक नहीं हुए हैं. दुसाध समुदाय से ही आने वाले विलट पासवान ‘बिहंगम’ की कविता को लोग आज भी याद करते हैं. पर जब पुरस्कार देने की बात आती है तो इनके हिस्से ‘नील बट्टा सन्नाटा’ आता है.

उमेश कहते हैं इसके लिए आप पुरस्कार समिति या ज्यूरी से पूछिए और देखिए कि उसमें प्रतिनिधि किनका है? वे मैथिली के प्रचार-प्रसार की बात करते हैं और कहते हैं कि मैथिली को प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम बनाए जाने की आवश्यकता है.

उमेश कहते हैं कि ‘मेरे घर में पढ़ने-लिखने का माहौल नहीं था, पर पिताजी चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूँ… वर्ष 2008 में पिताजी की मृत्यु के बाद मुझे अनुकंपा के आधार पर थाने में चौकीदारी मिल गई. अब मैं अपने सपनों को कविता के माध्यम से जीता हूँ.” 


(लल्लन टॉप वेबसाइट पर प्रकाशित)

Monday, June 25, 2018

मानसून में कॉफी


पिछले दिनों मैं इतिहासकार प्रोफेसर एआर वेंकटचलापति की रोचक किताब ‘इन दोज डेज देयर वाज नो कॉफी’ पढ़ रहा था. इस नाम से ही लिखे चैप्टर में लेखक ने तमिल के चर्चित लेखक-फिल्मकार एके चेट्टियार को उद्धृत किया है- ‘कॉफी पे तो कोई पुराण लिख सकता है.’

दक्षिण में जैसा कॉफी पीने का रिवाज रहा है, वैसा उत्तर भारत में नहीं. वैसे तो 17वीं सदी में ही कॉफी अपने हमसफर चाय के साथ भारत में दस्तक दे चुका था, 19वीं सदी के आखिर में दक्षिण भारत में इसकी खपत बढ़नी शुरू हुई. इससे पहले यह यूरोपीय लोगों का ही पेय था. और 20वीं सदी के आते- आते यह दक्षिण भारतीय मध्यवर्ग का पसंदीदा पेय बन गया.

हालांकि, उदारीकरण के बादउत्तर भारत में भी कॉफी की खपत ने जोर पकड़ा है. खासकर महानगरों के युवाओं, कामकाजी लोगों में कॉफी पीना सांस्कृतिक दस्तूर में शामिल हो गया है. नब्बे के दशक में जब मैं दिल्ली आया, तो मेरे जैसे गंवई पृष्ठभूमि वालों को कॉफी पीना आधुनिक होने का भान देता रहा. मेरी समझ में यह भान शराब पीने में नहीं है. 

 कॉलेज के दिनों में मेरे एक मित्र शराब की बोतल, बड़े  भाई के लिहाज या डर से, मेरे कमरे में छिपाते फिरते थे. कॉफी के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है. पश्चिमी देशों में कॉफी पीने की संस्कृति आज भी कायम है और इसके ऐतिहासिक कारण है. अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं की तरह ही सार्वजनिक जीवन (पब्लिक स्फीयर) में इन कॉफी हाउस की महत्वपूर्ण भूमिका है. लोकतंत्र में ये राज्य और नागरिक समाज के बीच एक पुल की भूमिका निभाते रहे हैं.

 मुझे याद है कि कुछ वर्ष पहले अपनी वियना यात्रा के दौरान एक कॉफी हाउस में मैंने निर्मल वर्मा की याद में बीयर का एक छोटा मग लिया, पर मेरे दोस्तों ने कॉफी पी थी. उन्होंने कहा था- ‘कॉफी के प्यालों के साथ चीयर्स कहना अच्छा शगुन नहीं होता.’ उसी यात्रा में ऑस्ट्रिया के एक शहर लिंज में राह चलते एक युवा महिला को मैंने कॉफी पीने का न्यौता दिया और वह खुशी-खुशी साथ हो ली थी. सत्तर और अस्सी के दशक में पटना, इलाहाबाद, शिमला जैसे शहरों में स्थित टी-कॉफी हाउस साहित्यकारों, कलाकारों के बहस-मुबाहिसा का केंद्र थे. पर अब इनकी स्थिति बदहाल है. 

कॉलेज के ही दिनों में एक बार हम कुछ दोस्तों के साथ सिनेमा देखने गये. कॉफी का बिल मेरे एक दोस्त ने ही भरा था. उन दिनों को याद करता हुआ वह बिल का तगादा करता रहता है और मैं उसको कर्ज अदा करने के बदले साहिर लुधियानवी और जावेद अख्तर का किस्सा सुना देता हूं कि कैसे मरने के बाद भी लुधियानवी ने कर्ज वसूल लिया था. यदि आप थोड़े से भी रोमांटिक हैं, तो इस बात से शायद ही इनकार करें कि बारिश में किसी कैफे में बैठ कर कॉफी पीने का अपना सुख है, जो चाय में नहीं. यदि कोई साथी साथ हो तो फिर क्या कहने!

(प्रभात खबर, कुछ अलग कॉलम के तहत 19 जून 2018 को प्रकाशित) 

Sunday, June 10, 2018

शंघाई का समाजवाद


शंघाई
शंघाई ‘दैत्याकार’ है. आप मेट्रो से एक छोर से दूसरे को नाप जाइये, पर लगेगा कि शंघाई को देखा ही नहीं. जिलों, नगर, उपनगर में बंटा यह शहर महानगरों का महानगर है. आबादी करीब ढाई करोड़ है, पर शहर अराजक नहीं है. भीड़ और कोलाहल के बीच एक तरह का अनुशासन है जो मेट्रो में, सड़कों पर और विश्वविद्यालयों में नजर आता है. लोग विनम्र और सहज दिखते हैं. उनमें आक्रामकता नहीं दिखती है. जाहिर है, इस अनुशासन के पीछे चीन की समाजवादी राजनीतिक व्यवस्था है. 

एक सेमिनार में भाग लेने पिछले दिनों शंघाई गया तो चीन के आर्थिक विकास से साक्षात्कार हुआ. फुतोंग एयरपोर्ट से जब आप शहर में दाखिल होते हैं, तो सबसे पहले विश्वस्तरीय आधारभूत संरचनाएं व गगनचुंबी इमारतें आकर्षित करती हैं. शंघाई एक आधुनिक शहर है. इतिहास के जानकार बताते हैं कि भले ही लोग बंदरगाहों के इस शहर के इतिहास को सैकड़ों साल पीछे ले जाएं, पर यह है महज डेढ़ सौ साल पुराना.

ऐसा भी नहीं कि कभी नहीं सोनेवाले इस शहर ने पुरानी स्मृतियों को संजो कर नहीं रखा हो! सौ-सवा सौ साल पुरानी इमारतें इन स्मृतियों की धड़कन हैं, जो सैलानियों को लुभाती हैं. सैलानियों की पसंदीदा जगह ‘बंड’ इलाका दुनियाभर के कारोबारियों और वित्तीय बैकों का ठौर रहा है. ‘पीपुल्स स्काॅवयर’ से यदि आप रात में बंड की पैदल यात्रा करें, तो रंगीनियों में सजी सैकड़ों गगनचुंबी इमारतें, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ब्रांडेड दुकानें और सड़क पर लंबी कारें आपको एक स्वप्निल दुनिया में ले जायेंगी. वहां सैलानी समझकर ‘दलाल’ आपसे ये पूछेंगे- लेडीज, होटल सर्विस? 

पूंजीवाद के इस रूप से समाजवादी चीन के साथ तालमेल मिलाना मुश्किल हो जाता है. पर यह स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं कि लंबी गाड़ियों के साथ-साथ साइकिल पर चलनेवाले लोगों के लिए सड़कों पर बराबर जगह है. शंघाई में वर्ग भेद नहीं महसूस होता. स्त्री और पुरुषों को आप कदमताल मिलाते हुए देखते हैं. असमानता दिल्ली या मुंबई महानगरों जैसी नहीं खटकती. झुग्गी झोपड़ियां या सड़कों पर गंदगी नहीं दिखती.

इसी तरह ‘फ्रेंच कंसेसन’ (जहां 1849–1943 के दौरान औपनिवेशक सत्ता कायम थी) इलाके में अगर आप पेड़ों से आच्छादित फुटपाथ पर पैदल भटकें, तो लगेगा ही नहीं कि यह भी शंघाई ही है. गोथिक वास्तुशिल्प और भावबोध की वजह से यह मोहक है. और आश्चर्य नहीं कई यूरोपीय युवा जोड़े इन इलाकों से गुजरते, प्रेमालाप करते मिल जाते हैं.

शंघाई से एक-दो घंटे की यात्रा की दूरी पर नदियों-नहरों के इर्द-गिर्द कई पुराने नगर संरक्षित हैं, जो चीन के कृषक समाज और उनके रहन-सहन की झलक देता है. ऐसे ही एक इलाके में जब मैं गया, तो वहां अवस्थित म्यूजियम में चीनी कृषक और लोक संस्कृति की भारतीय संस्कृति से समानता से परिचित हुआ. हालांकि ये समानता खान-पान को लेकर नहीं है. यदि आप मेरे जैसे वेजिटेरियन हैं, तो शंघाई में आपको खाने की जगह ढूढ़ने पर ही मिलेगी. यदि आप नॉन-वेजिटेरियन हैं, तो फिर आप विभिन्न तरह के भोजन का लुत्फ उठा सकते हैं.

वाटर टाउन में
भले ही शंघाई में  दुनियाभर के लोगों की आवाजाही रही है, पर यहां अंग्रेजी अब भी सहमी हुई भाषा है. विश्वविद्यालय से लेकर किताब की दुकानों में चीनी का बोलबाला है. हालांकि विश्वविद्यालयों में बहस इस बात पर की जा रही है कि किस तरह गुणवत्ता में इसे ग्लोबल स्तर पर स्थापित किया जाये. सेमिनार में एक चीनी प्रतिभागी से माओ के ‘कल्ट’ के बारे में जब मैंने पूछा कि वह क्या सोचती है, तो उसने कहा- ‘मैं कुछ भी नहीं सोचती, मेरे माता-पिता की पीढ़ी जरूर सोचती है.’

चीनी युवाओं में भारत और ‘बॉलीवुड’ के प्रति दिलचस्पी हैं. छात्राएं मुझसे आमिर खान के दंगल (उनके शब्द रेसलर) की चर्चा कर रही थीं. पर दोनों देशों के बीच संबंध में जो विश्वास की कमी है, उसे दोनों देशों का मीडिया हवा देने में लगा रहता है. पिछले साल डोकलम में हुआ विवाद इसका उदाहरण है.

अपनी यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया कि भारतीयों के प्रति चीनी सहृदय हैं, पर सवाल है कि चीन के प्रति हमारा रवैया कैसा है? राजनीतिक और राजनयिक संबंधों के अलावे इस भूमंडलीकृत दुनिया में लोगों के बीच आपसी संबंध खुशहाल दुनिया के लिए बेहद जरूरी हैं. जरूरत है कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान हो, विश्वविद्यालयों के बीच करार हो, छात्रों की आवाजाही बढ़े, ताकि एक-दूसरे के प्रति लोगों में जो अविश्वास है वह कम हो. और यही आर्थिक रूप से ताकतवर दो पड़ोसी देशों के हित में भी है. ऐसा बार-बार सुनने को मिलता है कि 21वीं सदी एशिया की सदी है. शंघाई इस एशियाई विकास का रूपक है!



(प्रभात खबर,  10 जून 2018)

Wednesday, March 21, 2018

काग़ज़ी है पैरहन, हर पैकर-ए-तस्वीर का

(20 नवंबर 1934-19 मार्च 2018)

बड़े भाई नवीन उनके शिष्य थे और मैं भी उन्हें अपना गुरु मानता रहा, गोकि मेरे जेएनयू ज्वाइन करने से पहले वे सेंटर (भारतीय भाषा केंद्र) से रिटायर हो चुके थे. पर उनका सेंटर आना-जाना लगा रहता था. वे इमेरिटस प्रोफेसर थे.

इसी साल जनवरी महीने में प्रगति मैदान में हुए विश्व पुस्तक मेले में केदारनाथ सिंह राजकमल प्रकाशन के बुक स्टॉल पर बैठे दिखे.  मैंने पाँव ज़मीन पर जमा, उकड़ूँ बैठ अपने मोबाइल से ये तस्वीर ली थी. उनकी कवि नज़र मुझे परख रही थी.

मैंने नजदीक जा कर प्रणाम किया और फिर अपना परिचय दिया. कहा कि मैं तो आपसे नहीं पढ़ पाया पर बड़े भाई आपके शिष्य रहे हैं. हम आपको याद करते रहते हैं. फिर उन्हें बड़े भाई का यह कहा सुनाया -केदार जी कहते थे कि कविता बिटवीन द लाइंस होती है.'

बड़े बूढ़े की निश्छल हँसी, जो ममत्व से भरी उनकी आँखों में थी, मैंने देखी. उन्होंने मेरी पीठ ठोकी. हम उन्हें यह तस्वीर भेंट करना चाहते थे. पता चला कि वे बीमार हैं, अस्पताल में भर्ती हैं. फिर जब पता चला कि वे घर आ गए हैं तो उनके मोबाइल पर फ़ोन किया जो स्वीच ऑफ था...

वर्ष 2001-02 के दौरान जब मैं आईआईएमसी, जेएनयू कैंपस में छात्र था तब हम पुस्तक मेले घूमने गए थे. उस दौरान भी राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर बैठे दिखे थे, साथ में प्रोफेसर नामवर सिंह भी थे. मैं उनके पास गया और पूछा: आपने ऐसा क्यों लिखा है कि ‘यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा, मैं लिखना चाहता हूँ’. मेरे हाथों को छूते हुए उन्होंने कहा- ‘यहाँ इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाएगा, घर आओ’. लेकिन संकोचवश मैं उनके घर नहीं जा सका, हालांकि इन वर्षों में उनकी कविता से लगाव बढ़ता ही गया.

एक बार मुझे किसी को ‘प्रपोज’ करना था, काफ़ी उधेड़बुन में था. क्या पता क्या सोचे, बुरा मान गई तो. फिर केदारनाथ सिंह याद आए-

‘इन्तज़ार मत करो
जो कहना है कह डालो
क्योंकि हो सकता है
फिर कहने का कोई अर्थ न रह जाय’

वे दिन ‘कुछ इश्क किया, कुछ काम किया’ वाले थे.  हम सोचते थे ‘दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए’.

कवि उदय प्रकाश ने उनकी ‘ताल्सताय और साइकिल’ कविता के प्रसंग में टिप्पणी करते हुए लिखा है कि 'वे एक उदास गिरगिट से बात कर सकते थे'. मैंने सच में एक कवि को उदास गिरगिट से बात करते हुए देखा है जो उनके शिष्य भी थे. मैं बात रमाशंकर विद्रोही की कर रहा हूँ जो शाम को जेएनयू के गंगा ढाबा के कोने में अपनी मंत्र कविता को बुदबुदाते एक उदास गिरगिट से बात करते हुए मिला करते थे. वे केदार नाथ सिंह की कविता ‘नूर मियां’ को याद करते थे.

केदारनाथ सिंह की कविता एक साथ गाँव-शहर की यात्रा करती है. मेरे जैसे लोगों के लिए जो इन दो दुनियाओं के बीच कहीं टिका है, उनकी कविताओं से संबल, सांत्वना पाता रहा. इस मायने में वे एक विरल कवि थे, न सिर्फ हिंदी के बल्कि भारतीय भाषाओं के. उनकी एक कविता है ‘जाना’, जिसे उनके सुधी पाठक आज बहुत शिद्दत से याद कर रहे हैं-

‘मैं जा रही हूँ- उसने कहा
जाओ-मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए कि जाना
हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है.’

(द लल्लन टॉप वेबसाइट पर प्रकाशित)