Sunday, September 27, 2020

निगरानी पूंजीवाद के दौर में सोशल मीडिया

मास मीडिया के लिए इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक दुनिया भर में संभावनाओं और चुनौतियों से भरा रहा है. इसी दशक में सोशल मीडिया, मसलन- फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि, का अप्रत्याशित रूप से विस्तार हुआ है. पर, हाल के वर्षों में पश्चिमी देशों, खास कर अमेरिकी नागरिक समाज और अकादमिक दुनिया में, काफी चिंता जताई जा रही है कि डिजिटल मीडिया कंपनियों से लोकतंत्र को खतरा है. इन्हीं दुश्चिंताओं के मद्देनजर डिजिटल मीडिया पर नियंत्रण को लेकर भारत सरकार भी तत्पर दिख रही है. हालांकि नियंत्रण को लेकर विमर्शकारों के बीच दुविधा है.

यह दुविधा न सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र में दिखती है, बल्कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वालों में भी मौजूद है. हाल ही में ‘नेटफ्लिक्स’ वेबसाइट पर रिलीज हुई डाक्यूमेंट्री ‘द सोशल डिलेमा’ इन्हीं सवालों से रू-ब-रू है. इसमें सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों की चर्चा है. जेफ ओरलोवस्की निर्देशित इस डॉक्यूमेंट्री में एक अमेरिकी परिवार के माध्यम से ड्रामा के तत्वों का कुशलता से समावेश किया गया है.
इसमें गूगल, यूट्यूब और सोशल मीडिया से जुड़े रहे आला अधिकारियों के छोटे-छोटे इंटरव्यू शामिल हैं. साथ ही, चर्चित किताब ‘द एज ऑफ सर्विलांस कैपिटलिज्म’ की लेखिका शोशाना जुबॉफ जैसे विशेषज्ञों से बातचीत भी है. जुबॉफ ने अपनी किताब में नोट किया है कि किस तरह मुनाफे के लिए तकनीकी कंपनियाँ हमारे जीवन को अपने नियंत्रण में ले रही है. चाहे-अनचाहे हम इन कंपनियों से उन जानकारियों को साझा कर रहे हैं जो बेहद निजी हैं. ये सूचनाएँ कंपनियों के लिए ‘डेटा’ हैं, जिसकी ताक में विज्ञापनदाता लगे रहते हैं. डॉक्यूमेंट्री में एक जगह कहा गया है ‘यदि हम किसी उत्पाद के लिए मोल नहीं चुकाते हैं तो फिर हम खुद एक उत्पाद हैं.’ पूंजीवाद के इस नए रूप में निजता/गोपनीयता (प्राइवेसी) का कोई मतलब नहीं रह जाता है.
यह डॉक्यूमेंट्री ‘निगरानी पूंजीवाद’ के हवाले से दिखाती है कि किस तरह सोशल मीडिया हमारे आचार-व्यवहार को प्रभावित कर रहा है. किस तरह घर-परिवार के सदस्यों के आपसी रिश्ते, युवाओं के मनोभाव और प्रेम संबंध प्रभावित होने लगे हैं. किसी नशे की लत की तरह हम खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं. हालांकि डॉक्यूमेंट्री में सोशल मीडिया के पूर्व अधिकारी बताते हैं कि इसका ‘डिजाइन ही ऐसा है कि आप चाह कर भी इससे अलग नहीं रह पाते’. मिर्जा गालिब के शब्दों में कहें, तो ‘उसी को देख कर जीते हैं, जिस काफिर पर दम निकले.’
निस्संदेह, पारंपरिक मीडिया के बरक्स सोशल मीडिया ने सार्वजनिक दुनिया में बहस-मुबाहिसा को एक गति दी है और नेटवर्किंग के माध्यम से एक नए लोकतांत्रिक समाज का सपना भी बुना है. लेकिन सच यह भी है कि सोशल मीडिया के रास्ते ‘फेक न्यूज’ का तंत्र विस्तार पाता है. इन्हीं वर्षों में ‘फेक न्यूज’ और दुष्प्रचार का एक ऐसा तंत्र खड़ा हुआ है जिसकी चपेट में डिजिटल मीडिया के साथ-साथ पारंपरिक मीडिया भी आ गया. ट्विटर के सीईओ जैक डोरसे ने अपनी भारत यात्रा के दौरान कहा था कि ‘फेक न्यूज और दुष्प्रचार की समस्याओं से निपटने के लिए कोई भी समाधान समुचित नहीं है.’ फिर सवाल है कि रास्ता किधर है? यह डॉक्यूमेंट्री सोशल मीडिया के खतरों से आगाह करने के साथ ही सधे अंदाज में उन रास्तों के बारे में हमें बताती है, जिस पर चल कर हम सुरक्षित घेरे का विकास कर सकते हैं.

(प्रभात खबर, 27.09.2020)

Wednesday, September 16, 2020

हाशिए पर सरोकार: टीवी वायरस

करीब अठारह साल पहले जब मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था, तब कहा जा रहा था कि टेलीविजन मीडिया अभी शैशव अवस्था में है. यह संक्रमण काल है और कुछ वर्षों में ठीक हो जाएगा. लेकिन पिछले कई सालों की प्रवृत्ति पर गौर करें तो यही लगता है कि यह संक्रमण फैलता ही गया. पहले मुख्य रूप से हिंदी के समाचार चैनल इससे ग्रसित थे, अब अंग्रेजी के चैनलों में भी वायरस का प्रकोप बढ़ गया दिखता है. अंग्रेजी और हिंदी के चैनल एक खंडित लोकका निर्माण करते रहे हैं. उनके दर्शक वर्ग भी अलग रहे हैं. पर अब यह विभाजक रेखा तेजी से मिटती हुई दिख रही है.

लेकिन अखबारों की दुनिया में अब भी कई बार ऐसा कुछ दिख जाता है, जिससे सीमित  पैमाने पर ही सही कुछ बचे होने की उम्मीद हो जाती है.

पिछले दिनों एक अखबार ने अपने मुख्य पृष्ठ पर एक तस्वीर प्रकाशित किया और शीर्षक दिया- टीवायरस. यह तस्वीर टेलीविजन समाचार चैनलों के हाल के उस रवैये पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है, जिस पर काफी सवाल उठे है. इसके अलावा भी सरोकार के बचे होने के उदाहरण देखे गए और पत्रकारिता की दुनिया के भीतर से टीवी मीडिया के इस चेहरे,लोगों की निजता में जबरन घुसने की कोशिश पर चिंता जाहिर की गई. 

दरअसल, यह ‘वायरसजब से न्यूज चैनलों ने चौबीस घंटे का प्रसारण शुरु किया तब से मौजूद है और अभी तक इसका कोई इलाजउपलब्ध नहीं है. हालांकि दर्शकों में अब तक इसका सामना करने की सलाहियत विकसित हो जानी चाहिए थी (हर्ड इम्यूनिटी’)! गौरतलब है कि भारत में उदारीकरण की नीतियों के फलस्वरूप पिछले दो दशक में निजी टेलीविजन समाचार चैनलों का अभूतपूर्व प्रसार हुआ है, पर संवाद एकतरफा ही रहे. कह सकते हैं कि सोशल मीडिया या अखबार से इतर यह इस माध्यम की विशेषता है.  

असल में टेलीविजन मीडिया उद्योग में दर्शकों की उपस्थिति, उनकी केंद्रीय भूमिका को लेकर हमारे यहाँ कोई खास शोध नहीं है. कुछ छिटपुट शोध पत्र मौजूद हैं जो दर्शकों को केंद्र में रख टेलीविजन को परखने की कोशिश करता है. पर ये चौबीस घंटे समाचार चैनलों को अपनी जद में नहीं लेता, दूरदर्शन, सीरियलों के इर्द-गिर्द ही है. मीडिया शोध में इस बात का उल्लेख बार-बार होता है कि दर्शक किसी भी संदेश को अपने तयी देखता-परखता है, वह महज एक उपभोक्ता नहीं है. उनके पास संदेश और संवाद को नकारने की भी सहूलियत रहती है.  

मीडिया आलोचक रेमंड विलियम्स ने टेलीविजन माध्यम को तकनीक और विशिष्ट सांस्कृतिक रूप में परखा है.  चूँकि यह एक दृश्य माध्यम है इस लिहाज से टीवी पर प्रसारित होने वाली खबरों से दर्शकों के बीच सहभागिता, घटनास्थल पर होने का बोध होता है.  इन खबरों के साथ विज्ञापन भी लिपटा हुआ दर्शकों तक चला जाता है, जो इन कार्यक्रमों के लागत और चैनलों के मुनाफा का प्रमुख जरिया है. 

उदारीकरण के बाद खुली अर्थव्यस्था में मीडिया पूंजीवाद का प्रमुख उपक्रम है. उसकी एक स्वायत्त संस्कृति भले हो पर अब वह कारपोरेट जगत का हिस्सा है. जब भी हम मीडिया की कार्यशैली की विवेचना करेंगे तो हमें पूंजीवाद और मीडिया के रिश्तों की भी पड़ताल करनी होगी. निस्संदेह, हाल के वर्षों में बड़ी पूंजी के प्रवेश से मीडिया की सार्वजनिक दुनिया का विस्तार हुआ है, लेकिन पूंजीवाद के किसी अन्य उपक्रम की तरह ही टीवी मीडिया उद्योग का लक्ष्य और मूल उदेश्य टीआरपी बटोरना और मुनाफा कमाना है. ऐसे में लोक हित के विषय हाशिए पर ही रहते हैं.

भारत में चौबीसों घंटे चलने वाले इन समाचार चैनलों के प्रति मीडिया विमर्शकारों में दुचित्तापन है. खबरों की पहुँच गाँव-कस्बों तक हुई, एक नेटवर्क विकसित हुआ. इसने भारतीय लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत किया है. वहीं समाचार की एक ऐसी समझ इसने विकसित की जहाँ मनोरंजन पर जोर रहा है. 21वीं सदी का पहला दशक भारत में टेलीविजन समाचार चैनलों के विस्तार का दशक भले रहा है. पर इसके साथ ही इसी दशक में चैनलों की वैधता और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे थे. जैसा कि आज तक न्यूज चैनल के न्यूज डायरेक्टर क़मर वहीद नक़वी ने वर्ष 2007 में लिखा था लोग आलोचना बहुत करते हैं कि न्यूज़ चैनल दिन भर कचरा परोसते रहते हैं, लेकिन सच यह है कि लोग कचरा ही देखना चाहते हैं.' सवाल दर्शकों का भी है, जिस पर हम आम तौर पर चर्चा नहीं करते.

हिंदी समाचार चैनलों की एक प्रमुख प्रवृत्ति स्टूडियो में होने वाले बहस-मुबाहिसा है, जिसका एक सेट पैटर्न है. एंकर और प्रोड्यूसर का ध्यान ऐसे मुद्दों पर बहस करवाना होता है जिससे कि स्टूडियो में एक नाटकीयता का संचार हो. इनका उद्देश्य दर्शकों की सोच-विचार में इजाफा करना नहीं होता, बल्कि उनके चित-वृत्तियों के निम्नतम भावों को जागृत करना होता है. 

ऐसे में एंकरों-प्रोड्यूसरों की तलाश उन मुद्दों की तरफ ज्यादा रहती है जिसमें सनसनी का भाव हो. मीडिया आलोचक प्रोफेसर निल पोस्टमैन ने अमेरीकी टेलीविजन के प्रसंग में कहा था कि- सीरियस टेलीविजन अपने आप में विरोधाभास पद है और टेलीविजन सिर्फ एक जबान में लगातार बोलता है-मनोरंजन की जबान.’  यह शायद हमारे समाचार चैनलों के लिए भी सच है.  पोस्टमैन के मुताबिक एक न्यूज शो, सीधे शब्दों में, मनोरंजन का एक प्रारूप है न कि शिक्षा, गहन विवेचन या विरेचन का.

(जनसत्ता, 16.09.2020)

Sunday, September 13, 2020

एक एक्टिविस्ट एक्टर के सत्तर साल: शबाना आजमी


शबाना आजमी के 'अपरूप रूप' हैं. इस हफ्ते वे जीवन के 70 वर्ष पूरे कर रही हैं. पिछले चार दशकों में सिनेमा के परदे पर, रंगमंच पर, सड़कों पर या संसद में कहाँ उनका रूप सबसे ज्यादा उज्जवल रहा है, कहना बेहद मुश्किल है. एक किस्सा है कि वर्ष 1986 में मृणाल सेन की फिल्म 'जेनेसिस' को प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में दिखाया जा रहा था. इस समारोह में शबाना को भाग लेना था, पर वे कान नहीं जाकर बंबई में झुग्गी-झोपड़ी तोड़े जाने के विरोध में बीच सड़क पर भूख हड़ताल के लिए बैठ गईं. पाँच दिन बाद जमीन झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों को वापस दे दिया गया. 

असल में, शबाना आजमी फिल्मों को सामाजिक बदलाव का औजार मानती है. यह सीख उन्हें विरासत में मिली. जहाँ पिता कैफी आजमी एक प्रगतिशील शायर थे, वहीं माता शौकत आजमी खुद थिएटर की मशहूर अदाकार रही थीं. दोनों ही 'इप्टा' से जुड़े थे.

वर्ष 1974 में श्याम बेनेगल की फिल्म ‘अंकुर’ से जो फिल्मी यात्रा शबाना की शुरु हुई, वह आज भी जारी है. यूं तो सत्यजीत रे (शतरंज के खिलाड़ी), मृणाल सेन (खंडहर, एक दिन अचानक), गौतम घोष (पार) जैसे निर्देशकों के साथ शबाना ने फिल्में की पर सबसे ज्यादा मकबूलियत उन्हें फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल के साथ काम करके मिली. 70 के दशक में हिंदी फिल्मों में समांतर सिनेमा की जो धारा विकसित हुई उसमें बेनेगल और शबाना की जोड़ी अगल से रेखांकित करने योग्य है. सामाजिक-राजनीतिक सवालों को उठाती उनकी फिल्में- अंकुर, निशांत, जुनून, मंडी आदि, हिंदी सिनेमा की थाती हैं. ये फिल्में मध्यमार्गी थी जिसे मनोरंजन से परहेज नहीं था. उन्हें आम दर्शकों की सराहाना भी मिली और बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी भी. 

पहली ही फिल्म 'अंकुर' में शबाना को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से नवाजा गया. बाद में 'अर्थ', 'खंडहर', 'पार' और 'गॉडमदर' फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के चार और पुरस्कार उनके हिस्से आए. मुख्यधारा और समांतर दोनों तरह की फिल्मों के विभिन्न किरदारों को उन्होंने अपने सहज अभिनय से जीवंत बना दिया है. 

समलैंगिक संबंधों को उघेरती दीपा मेहता की फिल्म 'फायर' (1996) को कुछ राजनीतिक विरोध झेलना पड़ा, पर उन्होंने हार नहीं मानी. बाद में इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई पुरस्कारों से नवाजा गया. श्याम बेनेगल कहते हैं कि ‘शबाना किरदार को अंगीकार कर अपना बना लेती है. आत्मसात कर लेती है. यह उनकी विशिष्टता है.’ वे शबाना के ‘ट्रेंड एक्टर’ होने पर जोर देते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में वे सांप्रदायिकता के खिलाफ और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में मुखर रही है.

बहरहाल, शबाना आजमी का जो रूप मेरे मन में वर्षों से बैठा है वह उनका रंगमंचीय अवतार है. फिरोज अब्बास खान निर्देशित 'तुम्हारी अमृता' नाटक के माध्यम से बीस वर्षों से भी अधिक समय तक दर्शकों से वे रू-ब-रू रही हैं. इस नाटक में अमृता और जुल्फी के बीच प्रेम प्रसंग को खतों के माध्यम से संवेदनशील और मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है. 

कम लोग जानते हैं कि पुणे स्थित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान में अभिनय का कोर्स करने से पहले उन्होंने फारुख शेख के साथ सेंट जेवियर कॉलेज, मुंबई में हिंदी नाट्य मंच की स्थापना की थी. शबाना आजमी 'एक्टिविस्ट एक्टर' हैं. उनकी बहुमुखी प्रतिभा का मूल्यांकन अभी होना बाकी है.

(प्रभात खबर, 13.09.2020)

Monday, August 31, 2020

सहिष्णुता और स्वतंत्रता का सवाल: मी रक़्सम


इस महीने के आसिफ निर्देशित ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म ने अपने प्रदर्शन के साठ साल पूरे किए. ऐतिहासिकता के आवरण में ‘मुगल-ए-आजम’ सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता और अकबर की छवि में नेहरू युगीन धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को सामने लेकर आया. इस फिल्म में अनारकली अकबर के दरबार में जन्माष्टमी के अवसर पर कथक प्रस्तुत करती है-‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे’. हाल ही में जी5 ऑनलाइन वेबसाइट पर रिलीज हुई फिल्म ‘मी रक्सम’ देखते हुए इस फिल्म के दृश्य और नृत्य की छवियाँ मेरे मन में उमड़ती-घुमड़ती रही.

‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म को सिनेमा के अध्येताओं ने मुस्लिम संस्कृति के निरूपण के लिए भी अलग से रेखांकित किया है. मुस्लिम समाज और संस्कृति को प्रदर्शित करने वाली फिल्मों को सुविधा के लिए ‘मुस्लिम सोशल’ संज्ञा से नवाजा गया. जहाँ साठ-सत्तर के दशक में आई ‘मुगल-ए-आजम’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘मेरे महबूब’, ‘पाकीजा’ आदि फिल्मों में मुस्लिम प्रभुवर्गों की संस्कृति, राजा-नवाबों की जीवन शैली को परदे पर दिखाया गया, वहीं दूसरे छोर पर ‘गर्म हवा’, ‘बाजार’, ‘सलीम लंगड़े पर मत रो’, ‘नसीम’ आदि फिल्में हैं जिसमें मुस्लिम मध्यवर्ग की अस्मिता, समस्या, सांप्रदायिकता आदि का चित्रण है. उदारीकरण के बाद देश की बदलती सामाजिक परिस्थितियों और हिंदुत्ववादी राजनीति के उभार ने ‘मुस्लिम सोशल’ को बॉलीवुड में हाशिए पर धकेल दिया. मुस्लिम किरदार तो हिंदी फिल्मों में नज़र आते हैं, पर इन्हें ‘मुस्लिम सोशल’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
‘मी रक्सम’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें निम्नवर्गीय मुस्लिम परिवार के जीवन और संघर्ष का चित्रण है. इसे बाबा आजमी से निर्देशित किया है और शबाना आजमी ने प्रस्तुत किया है. बतौर निर्देशक यह उनकी पहली फिल्म है. इस फिल्म की कहानी स्कूल जाने वाली एक लड़की मरियम के अपने पिता के साथ रिश्ते और भरतनाट्यम नृत्य सीखने की जद्दोजहद के इर्द-गिर्द घूमती है. एक मुस्लिम लड़की के भरतनाट्यम सीखने को घर-परिवार और समाज के लोग ‘बुतपरस्ती’ और मजहब के खांचे में बांट कर देखते हैं. पर जैसा कि फिल्म में एक संवाद है- ‘सवाल डांस का नहीं है. सवाल जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने का है.’
इस फिल्म में भी ‘सलीम’ का किरदार है, पर वह एक दर्जी है. अपनी बेटी के ख्वाबों को पूरा करने के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ता और मजहब के नाम पर द्वेष फैलाने वालों के मंसूबे को सफल नहीं होने देता है. सलीम का किरदार गंगा-जमुनी तहजीब को मुखर रूप से व्यक्त करता है.
फिल्म आजमगढ़ जिले के मिजवां गाँव के आस-पास अवस्थित है. मिजवां के दृश्य मोहक हैं. यह कैफी आजमी की जन्मस्थली भी है. बकौल बाबा आजमी एक बार कैफी आजमी ने उनसे पूछा था कि ‘क्या तुम कोई फिल्म मिजवां में शूट कर सकते हो?’ एक तरह से यह फिल्म शबाना आजमी और बाबा आजमी का अपने पिता और मशहूर शायर के जीवन दर्शन के प्रति श्रद्धांजलि है.
धर्मनिरपेक्षता, इसके स्वरूप और राष्ट्र-राज्य के साथ संबंधो को लेकर इन दिनों विद्वानों के बीच काफी बहस हो रही है. इन बहसों के बीच यह फिल्म एक सार्थक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है. दानिश हुसैन और अदिति सुबेदी का अभिनय अत्यंत स्वाभाविक है. छोटी सी भूमिका में भी नसीरूद्दीन शाह प्रभावशाली हैं. खास कर पिता-पुत्री के आपसी संबंधों के दृश्य और संवाद मर्म को छूती है. हालांकि फिल्म कहीं-कहीं उसी स्टिरियोटाइप में उलझती हुई दिखती है, जिसकी फिल्म में आलोचना की गई है.

(प्रभात खबर, 30 अगस्त 2020)

Sunday, August 02, 2020

लोक कला की संघर्ष चेतना: मिथिला पेंटिंग

मिथिला या मधुबनी पेंटिंग एक बार फिर से चर्चा में है. पिछले दिनों सोशल मीडिया पर मधुबनी शैली में बने मास्क की तस्वीरें खूब साझा की गईं, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने ‘मन की बात’ प्रसारण में नोटिस लिया. उन्होंने कहा ‘ये मधुबनी मास्क एक तरह से अपनी परंपरा का प्रचार तो करते ही हैं, लोगों को स्वास्थ्य के साथ रोजगार भी दे रहे हैं.’ कोरोना महामारी के दौरान जिस तरह मिथिला पेंटिंग पुनर्नवा हुई है, वह इस पेंटिंग की जीवंतता का प्रमाण है.

सच तो यह है कि जब वर्ष 1934 में ब्रिटिश अधिकारी डब्लू जी आर्चर ने इस लोक कला को देखा-परखा, वह इस क्षेत्र में आए भीषण भूकंप की त्रासदी के बाद ही संभव हुआ. वे मधुबनी में अनुमंडल पदाधिकारी थे. राहत और बचाव कार्य के दौरान उनकी नज़र क्षतिग्रस्त मकानों की भीतों पर बनी रेल, कोहबर वगैरह पर पड़ी. मंत्रमुग्ध उन्होंने इन चित्रों को अपने कैमरे में कैद कर लिया. फिर जब उन्होंने ‘मैथिल पेंटिंग’ नाम से प्रतिष्ठित ‘मार्ग’ पत्रिका में लेख लिखा तब दुनिया की नज़र इस लोक कला पर पड़ी थी. हालांकि उन्होंने इस कला के लिए ‘फोक (लोक)’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था. बाहरी दुनिया में कागज पर लिखे मिथिला पेंटिंग का प्रचलन साठ के दशक में दिखाया गया है, पर वर्षों से इसे दीवारों के अलावे कागज पर भी चित्रित किया जाता रहा है. पहले इसे ‘बसहा पेपर’ पर लिखा जाता था.

बाद में अखिल भारतीय हस्त शिल्प बोर्ड, दिल्ली के चित्रकार भास्कर कुलकर्णी ने इस चित्रकला को परखा और प्रोत्साहित किया. उन्होंने साठ के दशक में मधुबनी जाकर निकट के गाँव रांटी, जितवारपुर आदि के पाँच स्त्री कलाकारों को पेंटिग के लिए चुना था. पद्म श्री से सम्मानित रांटी की महासुंदरी देवी ने वर्ष 2012 में मुझे बताया था कि “1961-62 में भास्कर कुलकर्णी ने मुझसे कोहबर, दशावतार, बांस और पूरइन के चित्रों को कागज पर बना देने के लिए कहा. कागज वे खुद लेकर आए थे. करीब एक वर्ष बाद वे इसे लेकर गए और मुझे 40 रुपए प्रोत्साहन के रूप में दे गए.” महासुंदरी देवी ने भास्कर कुलकर्णी के लिए आठ चित्र और बनाए थे. उन्होंने कहा था कि शुरुआत में घर वाले इन चित्रों के बदले मिलने वाले पैसे को अच्छी निगाह से नहीं देखते थे पर धीरे-धीरे स्थिति बदलती गई. सर्वविदित है कि इस कला में शुरुआती दिनों से परंपरा के रूप में ब्राह्मण और कायस्थ परिवार की स्त्रियों की सहभागिता रही. बाद में इस पेंटिंग में दलित महिलाओं का भी योगदान रहा और कचनी, भरनी शैली से इतर गोदना शैली की उपस्थिति दर्ज हुई.

वर्ष 1965-66 के दौरान बिहार में भीषण अकाल पड़ा था. भास्कर कुलकर्णी ने मिथिला क्षेत्र की महिलाओं को कागज पर चित्र बनाने के लिए प्रेरित किया ताकि आमदनी के स्रोत के रूप में यह कला विकसित हो सके. फिर जगदंबा देवी, गंगा देवी, सीता देवी, महासुंदरी देवी, बौआ देवी और गोदावरी दत्त जैसे सिद्धहस्त कलाकारों से देश और दुनिया का परिचय हुआ. कालांतर में पद्मश्री सहित इन्हें देश के अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया. मिथिला चित्रकला की लोक चेतना संघर्ष की चेतना है और यही वजह है कि जहाँ देश की अन्य लोक और जनजातीय कलाएँ सिमटती गई, मिथिला पेंटिंग अपनी रंगों की विशिष्टता और विषय-वस्तु में अभिनव प्रयोग से देश-दुनिया के कलाप्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रही है.


(प्रभात खबर, 2 अगस्त 2020)

Wednesday, July 08, 2020

अदूर का सिनेमा, सिनेमा के अदूर

फ्रेंच सिने समीक्षा में फिल्म निर्देशक के लिए ओतरयानी लेखक शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है. दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अदूर गोपालकृष्णन विश्व के ऐसे प्रमुख ओतरहैं, जो पिछले पचास वर्षों से फिल्म निर्माण-निर्देशन में सक्रिय हैं. इस महीने उन्होंने अस्सीवें वर्ष में प्रवेश किया है और एक बार फिर से उनकी फिल्मों की चर्चा हो रही है. सिनेमा के जानकार सत्यजीत रे के बाद अदूर गोपालकृष्णन को भारत के सर्वश्रेष्ठ फिल्मकार कहते रहे हैं, जिनकी प्रतिष्ठा दुनियाभर में है. खुद रे उनकी फिल्मों को खूब पसंद करते थे.

सिनेमा के प्रति अदूर में आज भी वैसा ही सम्मोहन है, जैसा पचास वर्ष पहले था. अब भी उनके अंदर प्रयोग करने की ललक है. पिछले वर्ष मैंने अदूर गोपालकृष्णन की एक नयी फिल्म सुखयांतमदेखी थी. यह फिल्म तीन छोटी कहानियों के इर्द-गिर्द बुनी गयी है, जिसके केंद्र में आत्महत्याहै, पर हर कहानी का अंत सुखद है. हास्य का इस्तेमाल कर निर्देशक ने समकालीन सामाजिक-पारिवारिक संबंधों को सहज ढंग से चित्रित किया है. यह एक मनोरंजक फिल्म है, जो बिना किसी ताम-झाम के प्रेम, संवेदना, जीवन और मौत के सवालों से जूझती है.

खास बात यह है कि सुखयांतमडिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए बनायी गयी है. इसकी अवधि महज तीस मिनट है. दिल्ली के छोटे सिनेमा-प्रेमी समूह के सामने फिल्म के प्रदर्शन के बाद अदूर गोपालकृष्णन ने कहा था कि कथ्य और शिल्प को लेकर उन्होंने उसी शिद्दत से काम किया है, जितना वे फीचर फिल्म को लेकर करते हैं. अपने पचास वर्ष के करियर में पहली बार अदूर ने डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए निर्देशन किया है.

गौतमन भास्करन की लिखी जीवनी ए लाइफ इन सिनेमामें अदूर एक जगह कहते है, ‘सिनेमा असल में फिल्ममेकर का अपना अनुभव होता है. उसकी जीवन के प्रति दृष्टि उसमें अभिव्यक्त होती है.अदूर की फिल्मों को देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि फिल्म को निर्देशक का माध्यम क्यों कहा गया है. फिल्म के हर पहलू पर उनकी छाप स्पष्ट दिखती है. हालांकि, सिनेमा अदूर का पहला प्रेम नहीं था. शुरुआत में उनका रुझान थिएटर की तरफ ज्यादा था.

करीब पंद्रह वर्ष पहले दिल्ली में एक फिल्म समारोह के दौरान हुई मुलाकात में उन्होंने कहा था, ‘काॅलेज के दिनों में मेरी अभिरुचि नाटकों में थी. मैंने फिल्म के बारे में कभी नहीं सोचा था. जब मैंने 1962 में पुणे फिल्म संस्थान में प्रवेश लिया, तो वहां देश-विदेश की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को देख पाया. मुझे लगा कि यही मेरा क्षेत्र है, जिसमें मैं खुद को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर सकता हूं.

वर्ष 1964 में फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक एफटीआइआइ, पुणे में बतौर शिक्षक नियुक्त हुए थे. वे शीघ्र ही छात्रों के चेहते बन गये. व्यावसायिक सिनेमा के बरक्स 70 और 80 के दशक में भारतीय सिनेमा में समांतर फिल्मों की जो धारा विकसित हुई, अदूर मलयालम फिल्मों में इसके प्रणेता रहे. उनकी पहली फिल्म स्वयंवरम’ (1972) को चार राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुए. अदूर घटक और सत्यजीत रे दोनों के प्रशंसक रहे हैं, पर उनकी फिल्में घटक के मेलोड्रामा और एपिक शैली से प्रभावित नहीं दिखती हैं.

यथार्थ चित्रण पर जोर व मानवीय दृष्टि के कारण समीक्षक उनकी फिल्मों को रे के नजदीक पाते हैं. हालांकि, उनकी फिल्म बनाने की शैली काफी अलहदा है. उनकी फिल्में जीवन के छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे अनुभवों को फंतासी के माध्यम से संपूर्णता में व्यक्त करती रही हैं. केरल का समाज, संस्कृति और देशकाल इसमें प्रमुखता से उभर कर आया है, पर भाव व्यंजना में वैश्विक है. यह विशेषता एलिप्पथाएम’, ‘अनंतरम’, ‘मुखामुखम’, ‘कथापुरुषनआदि फिल्मों में स्पष्ट दिखायी देती है. एलिप्पथाएमउनकी सबसे चर्चित फिल्म है.

सामंतवादी व्यवस्था के मकड़जाल में उलझे जीवन को चूहेदानी में कैद चूहेके रूपक के माध्यम से एलिप्पथाएम’ (1981) में व्यक्त किया गया है. फिल्म में संवाद बेहद कम है और भाषा आड़े नहीं आती. बिंबों, प्रकाश और ध्वनि के माध्यम से निर्देशक ने एक ऐसा सिने संसार रचा है, जो चालीस वर्ष बाद भी दर्शकों को एक नये अनुभव से भर देता है और नयी व्याख्या को उकसाता है. एक कुशल निर्देशक के हाथ में आकर सिनेमा कैसे मनोरंजन से आगे बढ़ कर उत्कृष्ट कला का रूप धारण कर लेती है, ‘एलिप्पथाएमइसका अन्यतम उदाहरण है. प्रसंगवश, सामंतवाद और उसके ढहते अवशेषों को रे ने भी जलसाघर’ (1958) में संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है, पर दोनों फिल्मों के विषय के निरूपण में कोई समानता नहीं दिखती.

कहानी कहने का ढंग अदूर का नितांत मौलिक है, पर उतना सहज नहीं है, जैसा कि पहली नजर में दिखता है. कहानी के निरूपण की शैली के दृष्टिकोण से अनंतरमसिने प्रेमियों के बीच विख्यात रही है. उनकी फिल्मों में स्त्री स्वतंत्रता का सवाल सहज रूप से जुड़ा हुआ आता है. साथ ही, राजनीतिक रूप से सचेत एक फिल्मकार के रूप में वे हमारे सामने आते हैं. इनमें आत्मकथात्मक स्वर भी सुनायी पड़ते हैं. हिंदी सिनेमा-प्रेमियों के लिए अभी भी अदूर की फिल्में पहुंच से दूर है. बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच के लिए अदूर की फिल्मों को ऑनलाइन सबटाइटल के साथ रिलीज की कोशिश होनी चाहिए.

(प्रभात खबर, 8 जुलाई 2020)

Friday, July 03, 2020

उत्तर पूर्व के कलाकारों को भी जगह दे बॉलिवुड

नस्लवाद जैसे मुद्दे पर फिल्म बनाने का विचार आपके मन में कैसे आया?
असल में नस्लवाद को मैं खुद झेल चुका हूँ. यह ऐसा विषय है जो हमेशा मेरे दिमाग में रहा है. मैं करीब 25 सालों से नार्थ-ईस्ट बाहर हूँ, जिसमें से लंबा समय दिल्ली में गुजारा है. मैं बाहर रह रहे उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ होने वाले भेद-भाव के बारे में फिल्म बनाना चाहता था.
कोई व्यक्तिगत अनुभव जो आप हमसे शेयर करना चाहें...
बहुत सारे अनुभव हैं, लेकिन अभी जो तुरंत मेरे दिमाग में आ रहा है वो आपसे शेयर करुंगा. मैं हूमायूंपुर इलाके में रहता था जो अखोनी फिल्म की जगह भी है. 90 के दशक के आखिरी वर्षों की बात है मैं डियर पार्क में रोज दौड़ा करता था. कुछ लोग मुझे देख कर दलाई लामा, जैकी चान कहकर हमेशा चिल्लाया करते थे. एक दिन मैंने उनसे पूछा कि जैकी चान तो मैं समझ सकता हूँ, मैंने खुद उनकी कई फिल्में देखी हैं, पर दलाई लामा क्यों? अभी दिल्ली के लोगों में उत्तर-पूर्वी राज्यों के प्रति जागरुकता बढ़ी है, पर बीस साल पहले ऐसा नहीं था. इसमें इंटरनेट जैसी सूचना प्राद्योगिकी की काफी भूमिका है.
फिल्म के बारे में बात करें तो ‘अखोनी’ (सोयाबीन को फर्मेंट करके बना खाद्य पदार्थ) की गंध के माध्यम से आप नस्लीय भेदभाव को दिखाते हैं. यह विचार कैसे आया?
आप उत्तर-पूर्वी राज्यों से बाहर निकलते हैं तो पहली समस्या खाना पकाने और उसकी गंध को लेकर आती है. इसे सभी अनुभव करते हैं. जब मैंने इस कहानी को लिखना शुरु किया तबसे ही यह मेरे मन में सहज रूप में उपस्थित था. गंध सापेक्षिक होती है. जैसे कढ़ी हमारे लिए सामान्य है, पर 60-70 के दशक में इसकी तीव्र गंध की वजह से गोरे लोग लंदन में दक्षिए एशिया के लोगों को किराए पर घर देना पसंद नहीं करते थे. इसी तरह अखोनी अन्य लोगों के लिए तीव्र गंध लिए होता है, पर हमारे लिए सामान्य है.
अखोनी पहली ऐसी पहली फिल्म है जो उत्तर-पूर्वी राज्यों की भाषा, संस्कृति और उनके साथ होने वाले भेदभाव को विषय के रूप में चित्रित करती है. बॉलिवुड से यह विषय अब तक गायब क्यों चला आ रहा है?
हां, यह समस्या तो है जिसके बारे में बॉलिवुड में सोच-विचार नहीं किया जाता और बॉलीवुड को यह आरोप झेलना पड़ेगा. एक उदाहरण से में बात करना चाहूँगा. हॉलिवुड के बारे में बात करें तो 20-30 साल पहले तक वहां गोरे और अश्वेत लोग ही सिनेमा में दिखते थे. लेकिन आज बहुत सारे चीनी मूल के अमेरीकी, वियतनामी दिख जाएँगे. कास्टिंग डायरेक्टर को इस बारे में सोचना चाहिए. यदि फिल्म की कहानी किसी गांव पर केंद्रित हो तो समझ आता है, पर शहरी कहानी में उत्तर-पूर्वी राज्यों का रिप्रजेंटेशन होना चाहिए.
क्या नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉट स्टार जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के आने से कुछ बदलाव की संभावना आपको दिखती है?
हां, विविध विषयों के तरफ निर्देशकों का ध्यान अब जाने लगा है लेकिन इसके लिए शिद्दत से कोशिश करनी होगी. ओटीटी प्लेटफॉर्म निस्संदेह अच्छा है, नए विषयों के लिए. न सिर्फ उत्तर-पूर्वी लोग, बल्कि जो भी अल्पसंख्यक हैं, शारीरिक रूप से अक्षम हैं उन विषयों को भी हमें अपनाना चाहिए.
अखोनी में ज्यादातार कलाकार उत्तर-पूर्वी राज्यों से हैं. क्या आपको कास्टिंग में दिक्कत आई?
हां, कास्टिंग एक बड़ी समस्या मेरे लिए थी. क्योंकि आपको उत्तर-पूर्व के बहुत कम कलाकार मिलेंगे. अभिनय उनके लिए कोई करियर ऑप्शन नहीं है. फिल्म में आपको लिन लैश्राम और लानुकुम एओ दिखेंगे जो काफी प्रतिभाशाली हैं. एओ एनएसडी से प्रशिक्षित हैं. उनके जैसे कई कलाकार उत्तर-पूर्वी राज्यों से हैं पर काम के अभाव में वे कोई और रास्ता चुन लेते हैं. वे कहते हैं, काम ही नहीं है क्या करुँ.
फिल्म का गीत-संगीत काफी भावपूर्ण है. इस बारे में कुछ बताइए?
गीत-संगीत का कुछ हिस्सा मेघालय से है और कुछ मणिपुर से. एक गीत असम से भी मैंने लिया है. मैंने फिल्म में उत्तर-पूर्वी राज्यों की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का ख्याल रखा है. आप देखेंगे कि एक दृश्य में कमरे में बैठे लोग एक-दूसरे की भाषा नहीं समझते जबकि वे सब उत्तर-पूर्वी राज्यों से आते हैं. 

(नवभारत टाइम्स, 3 जुलाई 2020)

Sunday, June 28, 2020

छोटी फिल्में, बातें बड़ी: अखोनी


बॉक्स ऑफिस के आंकड़ो का दबाव बॉलीवुड के फिल्मकारों को प्रयोग करने से हमेशा रोकता रहा है. अनुराग कश्यप जैसे निर्देशक अपवाद हैं. ऐसे में ‘ओवर द टॉप’ वेबसाइट (नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉट स्टार आदि) प्रयोगशील फिल्मकारों के लिए एक उम्मीद बन कर उभरे हैं. सबटाइटल के माध्यम से दुनिया भर के दर्शकों तक एकसाथ फिल्मों की पहुँच ने फिल्मकारों को नए विषय-वस्तु को टटोलने की ओर प्रवृत्त किया है. पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई लेखक-निर्देशक निकोलस खारकोंगोर की ‘अखोनी’ ऐसी ही फिल्म है, जिसमें नस्लवाद जैसे संवेदनशील विषय को मनोरंजक अंदाज में चित्रित किया गया है.


यह फिल्म उत्तर-पूर्वी राज्यों के युवाओं और उनकी खान पान की संस्कृति के इर्द-गर्द घूमती है. फिल्म के केंद्र में ‘अखोनी’ (एक प्रकार का फरमेंटेड सोयाबीन जो उत्तर-पूर्वी राज्यों में पाया जाता है और खाने में जिसका प्रयोग किया जाता है) का तीव्र गंध है. आस्कर पुरस्कार से सम्मानित बहुचर्चित दक्षिण कोरियाई फिल्म ‘पैरासाइट’ में गंध समाज में व्याप्त वर्ग विभेद को सामने लेकर आता है जबकि इस फिल्म में गंध के माध्यम से नस्लीय भेदभाव से हम रू-ब-रू होते हैं.

फिल्म दक्षिणी दिल्ली के हुमायूंपुर इलाके में अवस्थित है जहाँ रंग और रूप के आधार पर ‘आत्म’ और ‘अन्य’ का विभेद स्पष्ट है. एक दोस्त की शादी के अवसर पर ‘अखोनी पोर्क’ व्यंजन की तैयारी और उसे पकाने के लिए एक ‘सुरक्षित जगह’ की तलाश की जद्दोजहद असल में दिल्ली जैसे महानगर में युवा प्रवासियों के लिए सपनों के ठौर की तलाश भी है. ‘अखोनी’ के गंध के साथ घर से बिछुड़ने की पीड़ा और स्मृतियों का दंश भी लिपटा हुआ चला आता है.

हिंदी फिल्मों में उत्तर-पूर्वी राज्यों की संस्कृति का चित्रण गायब है. अगर कोई किरदार नजर आता है, तो वह अमूमन स्टीरियोटाइप होता है. शिलांग में पले-बढ़े निकोलस खारकोंगोर इन राज्यों की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को चित्रित करने में सफल रहे हैं. फिल्म में एक दृश्य है जहाँ मित्र अपने परिचितों-संबंधियों से फोन पर जिस भाषा में बात करते हैं वह कमरे में मौजूद एक-दूसरे के लिए अबूझ है. सयानी गुप्ता और डॉली अहलूवालिया जैसे कलाकारों के साथ इस फिल्म में ज्यादातर किरदार उत्तर-पूर्वी राज्यों से ही हैं.

कोरोना महामारी के बीच रंग और रूप के आधार पर भेदभाव की प्रवृत्ति और बढ़ गई है. यह जहाँ भारतीय समाज मे व्याप्त पाखंड और पूर्वाग्रहों को हमारे सामने लेकर आता है, वहीं राज्यसत्ता पर भी सवाल खड़े करता है. हुमायूंपुर जैसे शहरीकृत गाँव (अर्बन विलेज) का चयन फिल्म की विषय वस्तु के हिसाब से सटीक है. यह इलाका उत्तर-पूर्वी राज्यों और अफ्रीकी नागरिकों के लिए सस्ता रिहाइश है जहां विभिन्न भाषाओं-संस्कृतियों के बीच खान-पान के अड्डों के माध्यम से आदान-प्रदान होता रहता है.

दिल्ली में अवस्थित होने के बावजूद इस फिल्म में ना तो लाल किला है, ना ही इंडिया गेट. कैमरा हुमायूंपुर और आस-पास की गलियों तक ही सीमित है जो सामाजिक यथार्थ के बेहद करीब है.

(प्रभात खबर, 28 जून 2020)

Sunday, June 14, 2020

लेखक का सिनेमा 'गुलाबो सिताबो'

फिल्म भले ही निर्देशक का माध्यम हो, पर शूजित सरकार और जूही चतुर्वेदी की जोड़ी में लेखन अलग से उभर कर आता रहा है. ‘विक्की डोनर’, ‘पीकू’ और ‘अक्टूबर’ फिल्म में दर्शकों ने इसे खूब सराहा था. ‘गुलाबो सिताबो’ फिल्म में एक बार फिर से  शूजित सरकार-जूही चतुर्वेदी की जोड़ी दर्शकों से मुखातिब हैं. फिल्म की कहानी, पटकथा और संवाद जूही चतुर्वेदी ने लिखा है.
‘गुलाबो सिताबो’ देखते हुए यह ख्याल मन में आता रहा कि ‘स्लो रीडिंग’ की तरह ‘स्लो व्यूइंग’ की चर्चा समीक्षक क्यों नहीं करते हैं? दो साल पहले रिलीज हुई ‘अक्टूबर’ फिल्म भी बॉलीवुड के मानकों के हिसाब से काफी धीमी फिल्म थी. हालांकि जहाँ ‘अक्टूबर’ सुगम संगीत की तरह लय में सजी थी, वहीं ‘गुलाबो सिताबो’ में लय गायब है. फिल्म के नाम में जो कोमलता और धुन है वह उभर कर नहीं आ पाई है. उल्लेखनीय है कि फिल्म का नाम उत्तर प्रदेश की कठपुतली लोक कला से प्रेरित है. फिल्म के शुरुआत में गुलाबो सिताबो कठपुतली के खेल को दिखाया गया है- ‘गुलाबो खूब लड़े है, सिताबो खूब लड़े है.’
 इस लोक कला को आधार बना कर लखनऊ की एक हवेली के मालिक मिर्जा नवाब (अमिताभ बच्चन), किराएदार बांके रस्तोगी (आयुष्मान खुराना) और अन्य पात्रों के आपसी संबंधों, नोंक-झोंक के माध्यम से सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को सामने लाने की कोशिश की गई है. ‘घाघ’ और ‘शुतुरमुर्ग’ के बीच लखनवी बोली-बानी में होने वाले नोंक-झोंक का एक द्रष्टा हवेली भी है, जो फिल्म के केंद्र में है. ढहती-ढनमनाती हवेली अपनी चुप्पी में अपनी दास्तान कहती प्रतीत होती है. विसंस्कृतीकरण के इस दौर में क्या यह लखनऊ की संस्कृति का रूपक है? फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसे व्यक्त करने में सफल है. दूसरे स्तर पर यह फिल्म स्त्री-पुरुष के बदलते संबंधों पर भी रोशनी डालती है.
निर्देशक ने इस फिल्म को ‘हास्य-व्यंग्य’ कहा है. दर्शकों के अंदर हास्य का संचार करने के लिए काफी मेहनत भी की गई है, पर निर्देशक पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं. फिल्म में पुरातत्व का प्रसंग और नेहरू की चर्चा वर्तमान राजनीतिक बहस-मुबाहिस पर भी एक टिप्पणी करती प्रतीत होती है. अदाकार विजय राज एक जगह कहते भी हैं: हम सरकार हैं, हमें सब पता है.’
फिल्म लखनऊ शहर में अवस्थित है, जहाँ की जूही चतुर्वेदी हैं. लेकिन फिल्म इस शहर को उस रूप में छायांकित नहीं कर पाई है जिस रूप में कभी फिल्म निर्देशक बासु चटर्जी बंबई और उसकी रोजमर्रा के मिजाज को अपनी फिल्मों में चित्रित करते रहे. फिल्म अपने संवाद के लिए आने वाले वर्षों में अलग से रेखांकित की जाएगी. बेहद सहज अंदाज में कभी ‘चचा’ तो कभी ‘बुढ़उ’ या ‘बे’ का संबोधन हिंदुस्तानी भाषा की अपनी शब्द शक्ति को सामने लेकर आता है. इसी तरह ‘घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने’ जैसी लोकोक्ति बरबस ध्यान आकर्षित करती है. आयुष्मान खुराना और अमिताभ बच्चन जैसे सितारों के बीच विजय राज, बिजेंद्र काला, फारुख जफर और सृष्टि श्रीवास्तव जैसे कलाकार अपनी अदाकारी में सफल रहे हैं.
उल्लेखनीय है कि कोरोना महामारी के बीच बड़े बजट और सितारों से सजी यह पहली हिंदी फिल्म है जो बॉक्स ऑफिस पर रिलीज नहीं हुई. इसे अमेजन प्राइम पर रिलीज किया गया है. इस फिल्म को लेकर जहाँ सोशल मीडिया में काफी उत्सुकता थी, वहीं मल्टीप्लेक्स के मालिकों और वितरकों में काफी रोष था. क्या यह फिल्म आने वाले समय में हिंदी फिल्मों के प्रसारण का नया रास्ता दिखाएगी या महामारी के बाद फिर से बड़े परदे पर सितारों की महफिल सजेगी? 

(प्रभात खबर, 14.06.2020)

Tuesday, June 09, 2020

संघर्ष की छवियाँ


आधुनिक हिंदी साहित्य में शुरुआती दिनों से ही किसानों, कामगारों और मजदूरों की संघर्षमयी छवि दिखाई देती रही है. प्रेमचंद, निराला, नागार्जुन का साहित्य इसके दृष्टांत हैं. पर कुछ कहानियों के लिए साहित्य पर्याप्त नहीं होते. समकालीन समय में फोटोग्राफी इसके लिए माकूल है. तस्वीरें ना सिर्फ हमारे समय को ‘रिकार्ड’ कर रही होती हैं, बल्कि यह ऐतिहासिक साक्ष्य भी बन कर हमारे सामने आती है.


इसलिए मीडिया में इस बात का उल्लेख बार-बार होता है कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है. दक्षिण अफ्रीकी फोटो पत्रकार केविन कार्टर की वर्ष 1993 में सूडान में भूखमरी से जूझते एक बच्चे और गिद्ध की फोटो की चर्चा आज भी होती है. इस फोटो के लिए उन्हें बहुचर्चित पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. हाल ही में जब सुप्रीम कोर्ट में प्रवासी मजदूरों के मामले में सुनवाई हुई तो उस फोटो का गलत ढंग से जिक्र किया. हालांकि बाद में इसकी तीखी आलोचना भी हुई.

सच यह है कि कोरोना महामारी के दौरान पिछले कुछ महीने में प्रवासी मजदूरों की जो तस्वीरें मीडिया के माध्यम से आईं, वे महाकाव्यात्मक पीड़ा लिए हुए है. इन तस्वीरों ने देखने के हमारे नजरिए को बदल कर रख दिया है. ये आम छवियाँ नहीं है, जिसे चौबीस घंटे टीवी चैनल और सर्वव्यापी मोबाइल फोन के दौर में हम देखते रहते हैं. यह पीड़ा के साथ-साथ मानवीय जिजीविषा, करुणा और संघर्ष की तस्वीरें भी हैं. ये राष्ट्र-राज्य के निर्माण में हाशिए पर रहने वाले मजदूरों की भूमिका और राष्ट्र-राज्य की जिम्मेदारी को भी अपने जद में समेटे हुए है.

कुछ दृश्य राष्ट्र की सामूहिक चेतना में लंबे समय के लिए अंकित हो जाते हैं. देश विभाजन, महात्मा गाँधी की हत्या, भोपाल गैस कांड की तस्वीरें आदि इसी श्रेणी में आती हैं. पर हाल में महानगरों में रहने वाले प्रवासी मजदूरों के जिस हृदय विदारक दृश्य को दुनिया ने देखा है, उसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. रोजी-रोटी औऱ सिर छिपाने के ठौर छिन जाने के बाद माथे पर गठरी और गोद में बच्चों को लिए सड़कों पर भूखे-प्यासे पैदल चलते इन्हें दुनिया ने देखा. दिल्ली, मुंबई, सूरत से बिहार, उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, तेलंगाना में स्थित अपने गाँव-घरों को पहुँचने को बेसब्र, ट्रकों में लदे, साइकिल-ऑटो से हजारों मीलों की दूरी तय करते कामगारों या मजदूरों की तस्वीरें आने वाले समय में हमें उद्वेलित करती रहेंगी. पर क्या यह सच नहीं है कि शहरी समाज के हाशिए पर रहने वाले ये कामगार, मजदूर हमारे बीच रह कर भी हमारी आँखो से ओझल थे? यदा-कदा किसी हादसे की खबर के साथ ही वे हमसे रू-ब-रू होते थे.

देश के अर्थशास्त्री जहाँ मजदूरों के लिए शहरों में बेहतर सुविधा बहाल करने की बात कर रहे हैं, ताकि फिर से उन्हें वापस बुलाया जा सके, वहीं लोक कल्याणकारी राज्य की दुहाई देने वाले राजनेताओं के पास कोई मुकम्मल जवाब नहीं है. एक बात तय है कि विकास के दावे और जीडीपी के आँकड़ों के बीच बेबसी की ये यथार्थ तस्वीरें हमारी सामूहिक विफलता की इबारत लिख गया है. साथ ही उदारीकरण के बाद नई आर्थिक व्यवस्था पर भी यह सवाल खड़े कर गया है. अर्थशास्त्रियों ने इस बात को लगातार रेखांकित किया है कि उदारीकरण के साथ समाज में आर्थिक विषमता की खाई और भी गहरी हुई है.

किसी भी तरफ हम नज़र दौड़ा लें, यह खाई और ज्यादा साफ दिखने लगी है और सत्ता का व्यवहार भी समर्थ वर्गों के प्रति ज्यादा नरम दिखने लगा है. हालांकि यह कोई नई बात नहीं है कि सत्ता समर्थ तबकों के हित में बिना किसी संकोच के काम करती है. लेकिन सत्ता के शासन के दायरे में खुद को नागरिक मानने वाले लोगों के भीतर अपनी नजर डालने की उम्मीद हो आती है तो यह भी गलत नहीं है. लेकिन सत्ता का रुख और व्यवहार ही तय करता है कि किसी समाज में शासितों की स्थिति मानवीय होगी या नहीं!

कवि केदारनाथ अग्रवाल ने बंगाल में अकाल के दौरान लाखों लोगों की विवशता और लाचारी को देखते हुए लिखा था: 'बाप बेटा बेचता है, भूख से बेहाल होकर/ धर्म, धीरज प्राण खोकर/ हो रही अनरीति बर्बर, राष्ट्र सारा देखता है.' वह औपनिवेशिक भारत के दौर की बात थी, जिसमें भूख से और राजनैतिक अक्षमता की वजह से लाखों लोगों की मौत हुई थी. पर आजाद भारत में कामगारों, मजदूरों की छवियाँ राष्ट्र और दुनिया के सामने हमारी बेबसी और विषमता को दिखाती है. गुरुग्राम से साइकिल पर एक दुर्घटना में घायल अपने पिता को दरभंगा लाने वाली ज्योति की बात हो या सूरत से ट्रक पर अपने घर को लौट रहे बीमार अमृत को सहारा देने वाले याकूब की. उल्लेखनीय है कि अमृत की बीच रास्ते में मौत हो गई. अमृत की तरह ही इस दुस्साहसिक यात्रा को कई मजदूर पूरा नहीं कर पाए.

इन कामगार और मजदूरों की आँखों में व्यवस्था से विद्रोह के भाव नहीं थे, एक विवशता और लाचारी थी. वे वहीं लौट जाना चाहते थे जहाँ की मिट्टी ने उन्हें बनाया है. सोशल मीडिया में वायरल हुई एक तस्वीर में केरल के एर्नाकुलम से राँची स्पेशल ट्रेन से उतरे कुछ कामगार, मजदूरों ने सबसे पहले जमीन को माथे से लगाया. इस मर्मभेदी दृश्य की शब्दों में व्याख्या संभव नहीं है.

(जनसत्ता, 9 मई 2020)

Sunday, May 31, 2020

बेआवाज़ महफिल से गए गीतकार योगेश

हिंदी फिल्मों में  गीतों को एक अहम मुकाम हासिल है. पर क्या यही बात गीतकारों के बारे में कही जा सकती है? 70 के दशक के चर्चित गीतकार योगेश (1943-2020) भरी महफिल से चुपचाप उठ कर चले गए, बिना किसी आवाज के. सच तो यह है कि भले ही उनके गीत लोगों की जुबान पर रहेपर वे वर्षों पहले ही विस्मृति में धकेल दिए गए थे. उन्हें फिल्मी दुनिया में वह जगह हासिल नहीं हो सकीजिसके वे हकदार थे. 

'जिंदगी कैसे है पहेलीया 'कहीं दूर जब दिन ढल जाएजैसे गाने सुनते ही हमें सुपरहिट फिल्म 'आनंद' और सुपरस्टार राजेश खन्ना-अमिताभ बच्चन की याद आती है. जिंदगी के फलसफे को इन सीधे-सादे शब्दों में ढालने वाले योगेश ही थेजिनका पूरा नाम योगेश गौर था. सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में  तैयार हुए इन गीतों ने उन्हें संगीत प्रेमियों के बीच मकबूलियत दी थी. असल में गीतकार शैलेंद्र के गुजरने के बाद एक जो खालीपन था उसे योगेश के भावपूर्ण गीतों से  भरने की एक उम्मीद जगी थी. उनके गीतों में शैलेंद्र की तरह ही आस-पास के जीवन के अनुभव व्यक्त हुए.  इसी दौर में निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी की फिल्में  शहरी मध्यवर्गीय जिंदगी के इर्द-गिर्द बुनी गई, जिसे योगेश के गीतों का भरपूर सहयोग मिला था. बात मिली फिल्म की हो रजनीगंधा की या छोटी सी बात की. योगेश के शब्दों ने उसमें जादू भर दिया था, जो सुनने वालों के दिलों को बेधता रहा. 'आए तुम याद मुझे' जैसे गाने में रोमांस और नॉस्टेलजिया एक साथ मिलता है. इसी तरह 'रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके यूँ ही जीवन मेंया 'कई बार यूँ ही देखा है जैसे गाने उस दौर के युवा प्रेमियों के जीवन दर्शनकश्मकश को बिना किसी बनावट के हमारे सामने लेकर आया. ये गाने वही लिख सकता है जिसने जीवन और उसकी पेचीदगियों को देखा और जिया हो. 

उल्लेखनीय है कि कि 'कई बार यूँ ही देखा हैगाने के लिए मुकेश को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. लता मंगेशकर ने भी योगेश के लिखे कई गानों को स्वर दिया था. उन्होंने श्रद्धांजलि देते हुए याद किया कि 'योगश जी बहुत शांत और मधुर स्वभाव के इंसान थे.इसी स्वभाव के चलते 80 के दशक में जिस तरह की तड़क-भड़क हिंदी फिल्मों के गीत-संगीत के क्षेत्र में देखने को मिली वे खुद को अनफिट पाते रहे. हालांकि उस दौर में बॉलीवुड में जो गुटबाजी थी इसके भी वे शिकार हुए, पर उन्होंने कभी गिला-शिकवा व्यक्त नहीं किया. 

बाद के वर्षों में भी कुछ गाने उन्होंने लिखे थे लेकिन उसमें 70 के दशक के योगेश की छाप नहीं दिखी. वर्ष 2017 में हरीश व्यास की फिल्म 'अंग्रेजी में कहते हैंके भी कुछ गाने उन्होंने लिखे थेजो उनकी आखिरी फिल्म थी. उन्हें वर्ष 1962 में आई फिल्म सखी रॉबिन फिल्म के गाने- तुम जो आ जाओ तो प्यार आ जाएसे ब्रेक मिला थाजिसे मन्ना डे और सुमन कल्याणपुरे ने स्वर दिया.


पचपन साल के फिल्मी कैरियर में योगेश के लिखे गानों की फेहरिस्त भले ही उनके समकालीन गीतकारों जितनी लंबी नहीं होपर जो भी गीत उन्होंने लिखे वे धरोहर के रूप में हमारे पास हमेशा रहेंगे. जब भी सावन की फुहारें पडेंगी हम गुनगुना उठेंगे- रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन बिना यह महसूस किए कि इसे योगेश ने लिखा था


(प्रभात खबर, 31 मई 2020)