Thursday, June 18, 2015

‘युद्धिष्ठिर’ को लेकर एफटीआईआई में महाभारत

देश के प्रतिष्ठित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) के चेयरमैन की नियुक्ति को लेकर पिछले एक हफ्ते से मीडिया और कला जगत में घमासान मचा है. संस्थान के छात्रों ने इस नियुक्ति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और वे हड़ताल कर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने अपने एक कार्यकर्ता गजेंद्र चौहान को चेयरमैन बनाया है. चौहान ने टेलीविजन सीरियल ‘महाभारत’ में युद्धिष्ठिर की भूमिका निभाई थी और उनके नाम कुछ बेनाम सी फिल्में और सीरियल भी हैं!  ख़बरों के मुताबिक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, जिससे यह संस्थान संबद्ध है, के सामने श्याम बेनेगल, गुलजार और अडूर गोपालकृष्णन जैसे फिल्मकार के भी नाम थे पर उसने गजेंद्र चौहान पर अपनी मुहर लगाई. ज़ाहिर है नियुक्ति में राष्ट्रवादी विचारधारा को तरजीह दी गई. कला, सौंदर्य बोध और एफटीआईआई के इतिहास और भारतीय फिल्म के इतिहास में इसकी महती भूमिका को नज़रअंदाज किया गया.

भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के बाद देश में अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों पर बिठा रही है ताकि देश में हिंदूत्ववादी सांस्कृतिक प्रभुत्व स्थापित हो सके. भारत जैसे बहुलतावादी समाज और संस्कृति के लिए यह खतरे की घंटी है. गजेंद्र चौहान की नियुक्ति को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

गौरतलब है कि इससे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वाई सुदर्शन राव को इंडियन कौंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) का मुखिया नियुक्ति किया. एक अजाने से इतिहासकार की नियुक्ति पर देश के जाने माने इतिहासकार हतप्रभ थे. राव का मानना है कि भारतीय इतिहास की सारी समझ वेद और महाभारत में हैं! इसी तरह गुजरात के एक कारोबारी और प्रधानमंत्री के करीबी जफर सरेशवाला को मौलाना आजाद नेशनल यूनिवर्सिटी का कुलपति बनाया गया.  इन नियुक्तियों को लेकर अखबारों और सोशल मीडिया में भले ही छिटपुट विरोध दर्ज हुए हो, पर कोई व्यापक आंदोलन नहीं हुआ. इस बार एफटीआईआई में हुई इस नियुक्ति के विरोध की आवाज़ मुंबई से लेकर कोलकाता और दिल्ली तक सुनाई दे रही है.

पुणे स्थित फिल्म संस्थान की आबोहवा में रचनात्मकता और अराजकता साथ-साथ चलती रही है. यदि आप इस संस्थान में कदम रखें तो ‘सिनेमा ऑर नथिंग’, ‘सिनेमा इज ट्रुथ’ जैसे नारे (ग्रैफिटी) दीवारों में अंकित दिखेंगे. घटक, हिचकॉक और जॉन अब्राहम की तस्वीरें यहाँ-वहाँ उकेरी हुई मिलेगी. ‘विजडम ट्री ‘के आप-पास देर रात तक बहस करते छात्र और बीयर की टूटी बोतलें मिलेंगी. संस्थान के छात्रों-अध्यापकों के लिए सिनेमा एक जुनून से कम नहीं. और इसी जुनून की वजह से सरकार के इस फैसले के खिलाफ ‘फिल्म इज ए बैटलग्राउंड’, ‘स्ट्राइक डॉउन फासिज्म’ से नारों के साथ छात्र सड़क पर उतरे हैं.


एफटीआईआई
ऋत्विक घटक, अडूर गोपालकृष्णन, मणि कौल, कुमार साहनी, सईद मिर्जा, जानू बरुआ, गिरिश कसारावली, जॉन अब्राहम, कमल स्वरूप, प्रकाश झा, शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, संतोष शिवन, रेसुल पोकुट्टी, राजकुमार हिरानी....और युवा फिल्मकारों में अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह, उमेश कुलकर्णी जैसे नाम इस संस्थान से जुड़े रहे हैं. छात्रों का कहना है कि एफटीआईआई के चैयरमैन रह चुके श्याम बेनेगल, मृणाल  सेन, अडूर गोपालकृष्णन, यू आर अनंतमूर्ति, गिरिश कर्नाड, सईद मिर्जा जैसों की तुलना में गजेंद्र चौहान का फिल्मों से परिचय, अनुभव और सिनेमाई समझ संदिग्ध है. वे इसे केंद्र सरकार के एक गहरे साजिश के रूप में देखते हैं. उनका कहना है कि ‘सरकार अपनी सांस्कृतिक समझ हम पर थोपना चाहती हैं, जो कि फिल्म संस्थान की बनावट और बुनावट के विपरीत है.’


असल में पिछले कुछ वर्षों से एफटीआईआई के निजीकरण को लेकर सरकार योजना बनाती रही है पर छात्रों के विरोध के कारण इसे स्थगित करना पड़ा है. बॉलीवुड की मायावी चमक से दूर एफटीआईआई पिछले साठ वर्षों से सिनेमा के अर्थ और इसकी अर्थच्छवियों से छात्रों को रू-ब-रू करवाता रहा है. इसने देश-विदेश में भारतीय सिनेमा को एक नई पहचान दी है. आजाद भारत में ऐसे शैक्षणिक संस्थान गिनती के हैं जिनकी उत्कृष्ठता सर्वमान्य हो. एफटीआईआई को ऐसे चैयरमैन की जरूरत है जिनकी पहचान राजनीतिक विचारधारा विशेष से ना होकर सिनेमा से बनी हो!   


(जनसत्ता के समांतर स्तंभ में, 'मनमानी के पद' शीर्षक से 2 जुलाई 2015 को प्रकाशित)

Monday, April 27, 2015

निहत्थे और निरपराध का डर

अपने पीएचडी शोध के दौरान मैंने दिल्ली से निकलने वाले एक अखबार के नामी संपादक से पूछा था कि अखबारों में किसानों, खेती-बाड़ी की खबरें क्यों नहीं होती हैं, जबकि देश की करीब 70 प्रतिशत जनसंख्या गाँवों मे रहती है और जीविका का साधन उनके लिए खेती-किसानी ही है. उनका जवाब था: चैन्नई में कंबल और शिमला में हम कूलर नहीं बेच सकते! हम अख़बार दिल्ली से निकाल रहे हैं और हमारा टारगेट ऑडिएंश गाँव के ग़रीब किसान नहीं हैं! जाहिर है ‘राष्ट्रीय मीडिया’ के सरोकार से किसान या समाज के हाशिए पर रहने वाले ग़ायब हो गए हैं.  यही बात बॉलीवुड में बनने वाली हिंदी फिल्मों के बारे में भी सच है.  इन फिल्मों की विषय-वस्तु बहुसंख्यक भारतीय लोगों से वावस्ता ना होकर शहरी मध्यवर्ग को लक्षित होती है. 

ऐसे में,  पिछले दिनों दिल्ली में आम आदमी पार्टी की एक रैली के दौरान एक किसान की आत्महत्या की ख़बर को मुख्यधारा, खास तौर पर खबरिया चैनलों ने जो अप्रत्याशित जगह दी, वह आश्चर्यचकित करने वाली थी. वैसे  इस ख़बर को ऐसे परोसा गया जैसे कि कुछ अनहोनी घट गई हो! सच तो यह है कि भारत में उदारीकरण के बाद विभिन्न राज्यों में हर साल सैकड़ों की संख्या में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला बदस्तूर जारी है. असल में, मीडिया की रुचि किसानों की समस्याओं, सरकार की किसान विरोधी  नीतियों/ भूमि अधिग्रहण विधेयक में ना हो कर गजेंद्र सिंह नामक किसान की आत्महत्या के पीछे सच-झूठ के दावों की पड़ताल करने में और उसके पीछे ‘राजनीतिक साजिश’ तलाशने में ज्यादा रही. एक-दो दिनों की इस बहस के बाद फिर से किसान, खेती-बाड़ी को अखबारों और खबरिया चैनलों से पहले की तरह ही बेदखल कर दिया गया.

इन्हीं दिनों दिल्ली के ‘फैंसी मॉल’ के चुनिंदा सिनेमा घरों में चैतन्य तम्हाणे निर्देशित राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त मराठी फिल्म ‘कोर्ट’ दिखाई जा रही है. फिल्म की कहानी मुंबई के एक गटर में एक सफाई कर्मचारी की मौत की ख़बर से शुरु होती  है. पुलिस का मानना है कि सफाई कर्मचारी को एक दलित कवि-कार्यकर्ता, नारायण कांबले, के क्रांतिकारी गीत से उकसावा मिला था और यह एक आत्महत्या का मामला है. कवि-कार्यकर्ता के ऊपर मुकदमा चलता है, उसे दोषी पाया जाता है और गिरफ्तार कर लिया जाता है. और हम कोर्ट में दी गई दलील और बहस-मुबाहिसे के एक अंतहीन प्रक्रिया से रू-ब-रू होते हैं. गरीब, मज़लूम जनता के प्रतिनिधि दलित कवि-कार्यकर्ता की आवाज़, सफाई कर्मचारी के हक, समाज के हाशिए पर रहने वाले समूहों के जीने के अधिकार और न्याय के सवाल पृष्ठभूमि में ही रह जाते हैं.    

बिना किसी ताम-झाम के ‘कोर्ट’ हमारी संवेदना को गहरे झकझोरती है. पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुई मराठी फिल्में अपने कथ्य और कहन में साफगोई और सहजता के लिए जानी गई है. फिर भी यदि हम ‘कोर्ट’ फिल्म  में  चित्रित एक काल्पनिक सिनेमाई वृत्तांत और  संसद भवन से महज कुछ ही फर्लांग की दूरी पर घटी आत्महत्या की एक वास्तविक घटना को एक साथ रख कर देखें तो हमारे समय की भयावहता,  अच्छे दिनों की जुमलेबाजी, यर्थाथ और कल्पना के बीच की विभाजक रेखा आँखों के सामने धुंधली होने लगती है. 

ऐसा लगता है कि करीब सौ साल पहले  फ्रांज काफ्का ने जिस संसार को साहित्य में रचा था—एक ऐसा संसार जो विडंबना, हताशा, मानवीय संत्रास और चारों तरफ फैले घटाटोप को हमारे सामने लाता है,  वह आज भारतीय समाज और मानवीय अनुभवों के ज्यादा नजदीक है.  प्रसंगवश, काफ्का की विश्व प्रसिद्ध कृति ‘द ट्रायल’ के मुख्य पात्र जोसेफ के. से कोर्ट में न्याय पाने की जद्दोज़हद के बारे में बताते हुए एक अन्य पात्र टिटोरिल्ली (Titorelli) पेंटर कहता है: कोर्ट को कभी भी अपने विचार को बदलने के लिए राजी नहीं किया जा सकता. यदि मैं एक कैनवस पर एक पंक्ति में सभी जजों को चित्रित करूँ और तुम अपना पक्ष इसके सामने रखो तो तुम्हें कहीं ज्यादा सफलता मिलेगी, बनिस्बत ईंट-गारे के बने वास्तविक कोर्ट के सामने अपनी दलील रखने के!

(जनसत्ता के समांतर स्तंभ में 1 मई 2015 को 'सरोकार का परदा' शीर्षक से प्रकाशित )

Tuesday, March 31, 2015

कोहबर रचती औरतें

कोहबर 
अपनी चर्चित आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में प्रोफेसर तुलसी राम ने लिखा है कि शादी के दौरान ‘दीवार पर गेरू तथा हल्दी से जो पेंटिंग की जाती थी, उसे कोहबर कहा जाता था…अशिक्षा के कारण लिपि का ज्ञान न होने के कारण दलित लोग संभवत: भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अभिव्यक्ति के लिए कोहबर पेंटिंग का सहारा लिया था.’ अपने क्षेत्र मिथिला की बात करूं तो वहाँ कोहबर की परंपरा आमतौर पर सवर्ण परिवारों में दिखती है. इसमें महिलाओं की विशेष भागीदारी होती है. कायस्थ और ब्राह्मण घरों में कोहबर लिखने की परंपरा कई सदी से जारी है. लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस कला मे दलितों की उपस्थिति रेखांकित करने योग्य है. जाहिर है, इस कला की उत्पत्ति की तारीख ठीक-ठीक बताना मुश्किल है.

दिल्ली स्थित शिल्प संग्रहालय की दीवारों पर पद्मश्री गंगा देवी ने 1989 में बेहद खूबसूरत कोहबर पेंटिंग चित्रित किया था. पिछले दिनों जब मैं संग्रहालय में गंगा देवी की बनाए इस कोहबर को देखने पहुंचा तो निराशा हाथ लगी. जिस दीवार पर उसे चित्रित किया गया था उसे तोड़ कर वहाँ एक नए भवन का निर्माण किया जा रहा है. ज्योंतिद्र जैन की चर्चित किताब ‘गंगा देवी: ट्रेडिशन एंड एक्सप्रेशन इन मिथिला पेंटिंग ’ के आवरण पर उसी कोहबर का अंकन है.

बहरहाल, शोध के सिलसिले में मिथिला पेंटिंग के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त, शिल्प गुरु गोदावरी दत्त से मिलने उनके गाँव रांटी पहुँचा तो उनके ड्राइंग रूम की अंदरूनी दीवार पर मिथिला पेंटिंग की शैली में उकेरे गए एक वृहद कोहबर को देख कर सुकून मिला. वे मिथिला पेंटिंग की सबसे प्रसिद्ध जीवित कलाकार हैं.  जापान स्थित मिथिला म्यूजियम के सिलसिले में गोदावरी दत्त ने सात बार जापान की यात्रा की है. देश-विदेश में उनकी कलाकृतियों की अनेक प्रदर्शनियाँ लगाई गई हैं. उन्होंने बताया कि मिथिला पेंटिंग की शैली में उन्होंने जापान स्थित संग्रहालय में 18 फुट लंबा एक त्रिशूल बनाया था, जिसे बनाने में उन्हें छह महीने का वक्त लगा. हालांकि 80 वर्ष की उम्र में वह  मिथिला पेंटिंग को लेकर देश-विदेश की यात्रा अब नहीं करती हैं और ज्यादातर गाँव में ही रहती हैं. प्रसंगवश, मिथिला पेंटिंग की एक अन्य प्रसिद्ध कलाकार पद्मश्री महासुंदरी देवी भी रांटी की हीं थी.

यों दरभंगा, मधुबनी जिले के लगभग हर गाँव और नेपाल के तराई इलाके में घर की दीवारों और फर्श पर शादी-ब्याह, पर्व-त्योहारों के दिनों में पारंपरिक रूप से मिथिला पेंटिंग बनाई जाती हैं. पर हाल के वर्षों में मधुबनी के करीब स्थित रांटी और जितवारपुर गाँव इस कला के दो मुख्य केंद्र के रूप में उभरे हैं.
गोदावरी दत्त अपनी पेंटिंग के साथ

गोदावरी दत्त कहती हैं कि एक परंपरा के रूप में कोहबर लिखने की कला सदियों पुरानी है. मिथिला में शादी के बाद नव विवाहित वर-वधू  जिस घर में चार दिन तक रहते हैं, उसे कोहबर कहा जाता है. इस घर में दीवार, कागज या कपड़े पर कोहबर बनाया जाता है.  मिथिला में कायस्थ परिवारों में शादी के अवसर पर जिस कागज में भर कर सिंदूर वर पक्ष की तरफ से वधू के यहाँ भेजा जाता है, उसमें से दो कोहबर, एक दशावतार, एक कमलदह और एक बांस लिखे होने का रिवाज परंपरा से चला आ रहा है.  पूर्व में इसे ‘लिखिया’ कहा जाता था.  गोदावरी दत्त ने बताया कि उन्होंने मिथिला पेंटिंग अपनी माँ सुभद्रा देवी से सीखा था, जो खुद एक चर्चित कलाकार थीं. हालांकि बाहरी दुनिया में कागज पर लिखे मिथिला पेंटिंग का प्रचलन 60 के दशक में दिखाया गया है पर वर्षों से इसे दीवारों के अलावे कागज पर भी चित्रित किया जाता रहा है.  पहले इसे ‘बसहा पेपर’ पर लिखा जाता था.

कोहबर की कला स्त्री-पुरुष के सुखद दांपत्य की कामना को जीव-जगत के साथ संपूर्णता और एकमेक रूप में चित्रित करती है.  प्रतीक रूप में कोहबर में बांस, पूरइन, केले का थम्म, कमल, कछुआ, साँप, मछली, लटपटिया सुग्गा, सूर्य और शिव-पार्वती का चित्रण होता है. ऐसा नहीं कि मिथिला पेंटिंग में महज कोहबर का ही चित्रण होता है. इसमें पारंपरिक के साथ-साथ सामयिक विषय वस्तुओं को भी कलाकारों की कल्पना की तूलिका से यथार्थपरक ढंग से रंगा जाता है.  हाल ही में चर्चित कलाकार शांति देवी ने मिथिला पेंटिंग की शैली में कथा प्रकाशन से बच्चों के लिए ‘बाइस्कोप’ नाम से एक किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने अपने जीवन-वृत्त को उकेरा है.

मैंने गोदावरी दत्त से पूछा कि मिथिला पेंटिंग में ऐसी क्या विशेषता है जो अन्य आधुनिक या पारंपरिक कला रूपों में नहीं मिलती. हँसते हुए उन्होंने जवाब दिया-- ‘मुझे तो ऐसी कोई विशेष बात इसमें नहीं दिखती है! माँ सीता का आशीर्वाद हमें मिला है, बस मैं इतना ही कहूँगी.’


असल में, मिथिला पेंटिंग जीवन-यापन और लोक से गहरे से जुड़ी हुई है. आम तौर पर चटक रंग और लोक जीवन का चित्रण इसकी विशेषता है.  मिथिला के सामंती समाज में स्त्रियों के जीवन का कटु यथार्थ उनकी कल्पना से जुड़ कर इस कला को असाधारण बनाता है. 

(दुनिया मेरे आगे, जनसत्ता, 31.03.2015 में प्रकाशित)

Tuesday, March 10, 2015

मिथिला (मधुबनी) पेंटिंग की कुछ झलकियाँ

रांटी स्थित चर्चित कलाकार गोदवरी दत्त के साथ

कायस्थों की शादी में बनाए जाने वाली कोहबर पेंटिंग

गोदना शैली की चर्चित कलाकार चानो देवी का घर, जितवारपुर
रौदी पासवान , गोदना शैली की एक पेटिंग दिखाते हुए


मधुबनी स्थित विद्यापति टॉवर में बनी एक पेंटिंग

मल्लाह समुदाय की दुलारी देवी के आँगन मे 

दुलारी देवी

Monday, December 22, 2014

पी साइनाथ की पहल

पी साइनाथ
भारतीय साहित्य और राजनीति की भाषा में गाँव अभी भले जीवित हो, महानगरीय पत्रकारिता से गाँव-देहात गायब हो चला है. जब कभी हजारों किसान-मजदूर दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के लिए आते हैं, तो अखबारों, टेलीविजन चैनलों में खबरें इन लोगों की वजह से प्रभावित होने वाले ट्रैफिक की होती है. हमें पता भी नहीं चलता कि इनकी माँगें क्या थी? किन समस्याओं को लेकर ये दिल्ली आए थे? ऐसे में गाँव और उसके बदलते यर्थाथ को विश्वविद्यालयों में होने वाले समाजशास्त्रीय अकादमिक अध्ययनों के लिए छोड़ दिया गया है.

भारतीय गाँव, उसकी बोली-बानी, बदलते जीवन यथार्थ और उसकी समस्याओं को एक जगह समेटने के उद्देश्य से पिछले दिनों पी साईंनाथ की पहल से ‘पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया’ नामक एक वेब साइट शुरु की गई (http://www.ruralindiaonline.org/) है. इसे उन्होंने हमारे समय का एक जर्नल और साथ ही अभिलेखागार कहा है. इस वेबसाइट पर विचरने वाले एक साथ विषय वस्तु के उपभोक्ता और उत्पादक दोनों हो सकते हैं. इस पर उपलब्ध सामग्री, फोटो, वीडियो का इस्तेमाल कोई भी मुफ्त में कर सकता है. साथ ही कोई भी इस वेबसाइट के लिए सामग्री मुहैया करा सकता है और इसके लिए पेशेवर पत्रकारीय कौशल की जरुरत नहीं है. इस वेबसाइट को चलाने के लिए पी साईंनाथ किसी राजनीति या कारपोरेट जगत से धन नहीं लेना चाहते, बल्कि आम जनों के सहयोग की उन्हें दरकार है.

कई बार सोचता हूँ कि यदि हमारे समय में पी साइनाथ नहीं होते तो क्या हम भारतीय गाँव-देहातों, किसानों की खबरों से रू-ब-रू हो पाते? क्या उदारीकृत, वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसानों की समस्या, उनकी आत्महत्या के कारणों, विषम परिस्थितियों में खेतीबाड़ी को जान पाते? ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘द हिंदू’ में पत्रकारीय कार्य के दौरान उनकी रिपोतार्जों का कोई सानी नहीं है. उनकी लिखी चर्चित किताब ‘एवरीबॉडी लव्स ए गुड ड्रॉट’ पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक ‘टेक्स्ट बुक’ की तरह है.

जनसत्ता, 25 दिसंबर 2014
किसानों के जीवन, उनकी समस्याओं से मीडिया की बेरुखी और लाइफ स्टाइल, फैशन, फिल्मी शख्सियतों की जिंदगी में अतिरिक्त रूचि पर व्यंग्य करते हुए पी साइनाथ ने वर्ष 2005 में अपने एक लेख में लिखा था: 1991-2005 के दौरान लगभग 80 लाख किसानों ने खेतीबाड़ी छोड़ दी लेकिन वे कहाँ गए इसकी चिंता कोई नहीं करता. कोई व्यवस्थित काम इस सिलसिले में नहीं किया गया है. मीडिया की इसमें कोई रुचि नहीं है. हां, भले ही हम आपको यह बता सकते हैं कि पैरिस हिल्टन कहाँ हैं.”  पिछले सालों में भारतीय मीडिया में ना सिर्फ खबर बदले हैं, बल्कि खबरों की नई परिभाषा भी गढ़ी गई है. 

जन्मभूमि और कर्मभूमि आप खुद नहीं चुनते, वो आपको चुनती है. मेरा जन्म मिथिला के एक पिछड़े गाँव में हुआ और मेरी बेटी कैथी पिछले वर्ष दिल्ली में जन्मी. मेरे लिए गाँव एक जीवित यर्थाथ है जहाँ देश की आबादी के करीब 70 फीसद लोग रहते हैं. पर पता नहीं बीस-तीस साल बाद मेरी बेटी के लिए गाँव का मानचित्र कैसा हो!

मुझे गाँव छोड़े लगभग बीस साल हो गए. पर गाँव अभी छूटा नहीं है. बरस-दो बरस में एक-दो बार गाँव चला ही जाता हूँ. जब गाँव से शहर की ओर लौटता हूँ तो लगता है कि कुछ छूट रहा है. बचपन की कुछ स्मृतियां, सपने, रंग और आबोहवा. जो बचा है मन उसे तेजी से समेट लेना चाहता है. निस्संदेह मेरे जैसे हजारों लोगों के लिए यह पहल इस गुजिश्ता साल की एक सुखद भेंट हैं. पर इस भेंट को आने वाली पीढ़ी के लिए संभालने का जिम्मा भी हम जैसे लोगों पर ही है, जो मुख्यधारा की मीडिया के बरक्स न्यू मीडिया से बदलाव लाने की अपेक्षा पाले बैठे हैं!

Saturday, November 22, 2014

मार खा रोई नहीं

पत्रकार को पिटती पुलिस
हरियाणा के सतलोक आश्रम में रामपाल की गिरफ्तारी को लेकर पुलिस की कार्रवाई का खबरिया चैनलों पर शोर था, तभी अचानक स्क्रीन पर पत्रकारों की पिटाई के दृश्य आने लगे. लेकिन भाजपा की नई मनोहर लाल खट्टर सरकार की देखरेख में पुलिस की इस अप्रत्याशित और निंदनीय कार्रवाई के खिलाफ एनडीटीवी पर प्राइम टाइम में रवीश कुमार के कार्यक्रम जैसे एक-दो अपवाद को छोड़ मुख्यधारा के मीडिया में कोई बहस-मुबाहिसा नहीं है. हां, सोशल मीडिया में जरुर लोग इस घटना की चर्चा कर रहे हैं पर चटखारे लेकर. इस भाव से की अच्छा ही हुआ! ये चैनल वाले इसी काबिल हैं!  

भारत में सोशल मीडिया पर जो चर्चा देखी जाती है वह आम तौर पर ‘माई वे’ या ‘हाइ वे’ के बीच  बहस के लिए कोई और रास्ता नहीं छोड़ती. पर मुख्यधारा के मीडिया में पुलिस की इस कार्रवाई को लेकर, बहस, प्रतिक्रिया, आलोचना क्यों गायब है? ऐसा क्यों लग रहा है कि सबकी खबर देने वाला मीडिया अपनी खबर देना भूल गया. कुछ ही दिन पहले जब सोनिया गाँधी के दामाद और कारोबारी रॉबर्ट वॉडरा ने एक एजेंसी के पत्रकार को जब झिड़का और रिकॉर्ड किया गया फुटेज डिलीट करने को विवश किया तो टेलीविजन चैनलों, अखबारों और सरकार ने मिल कर ठीक ही इस कृत्य की चौतरफा निंदा की थी. पर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ. ना किसी को लोकतंत्र पर हमला दिखा ना हीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा. पुलिस से पत्रकारों की पिटाई के बाद जिस तरह की शांति  छाई रही उससे यह पंक्ति याद आई-- ‘मार खा रोई नहीं’! 

जनसत्ता, 24 नवंबर 2014
लोकतांत्रिक समाज के बने रहने के लिए मीडिया की स्वतंत्रता एक जरुरी शर्त है. आजाद भारत में मीडिया को वैधता सरकार, समाज और आम लोगों से मिलती रही है. नेहरू के दौर में मीडिया राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में अपना सहयोग दे रहा था. आधुनिक लोकतंत्र के निर्माण में मीडिया की विचारधारा राष्ट्र-राज्य से मेल खाती रही. गाहे-बगाहे मीडिया पहरुए की भूमिका में रहा पर मीडिया की स्वतंत्र आवाज कहीं दब गई थी. इंदिरा गाँधी के शासन काल में, खास तौर पर आपातकाल के दौरान मुख्यधारा का मीडिया झुक गया, या लालकृष्ण आडवाणी के शब्दों में कहें तो रेंगने लगा था. पर उसके बाद भाषाई पत्रकारिता के उभार से पहली बार मीडिया अपनी पहचान के साथ सत्ता के बरक्स खड़ा होता दिखा. पिछले दो दशकों में भूमंडलीकरण के बाद पत्रकारिता पर सरकार का दबदबा कम जरुर हुआ है, पर वह पूंजी की गिरफ्त में आ गया. बाजार के इशारों पर खबरों का उत्पादन होने लगा. अखबारों और चैनलों में खबर और विचार की संस्कृति समकालीन समाज की जरुरतों से कम ‘ब्रांड’ की जरुरतों से ज्यादा परिचालित होने लगी.   

इस बार आम चुनाव में जिस तरह से राजनीतिक पार्टियों, खास तौर पर भारतीय जनता पार्टी ने ‘मीडिया मैनेज’ किया,  वह अलग अध्ययन का विषय है. इस चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी एक ब्रांड के रुप में उभरे जिसे मीडिया ने खूब भुनाया. इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि इस चुनाव में मीडिया के अधिकांश घराने एक सहयोगी राजनीतिक पार्टी की भूमिका में थे! विशेष रूप से खबरिया चैनलों की भूमिका संदिग्ध रही.

हालांकि पिछले छह महीने की मोदी सरकार का मुख्यधारा के मीडिया को लेकर जो रवैया रहा है उससे ऐसा लगता है कि प्रत्यक्ष रूप से सरकार मीडिया के साथ एक निश्चित दूरी बरत रही है और सरकार सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय है.

ऐसे में मुख्यधारा का मीडिया अपनी भूमिका तय नहीं कर पा रहा है कि वह किसके साथ है-- सरकार के या समाज के. आम जन से उसकी दूरी बढ़ती जा रही है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसकी वैधता पर ही सवाल खड़े करता है. पिछले छह महीनों में यदि मीडिया की विषय वस्तु का विश्लेषण करें तो ऐसा लगता है कि सरकार की नीतियों और काम काज के तरीकों को लेकर मुख्यधारा के मीडिया के भीतर एक भय और बिन माँगे सरकार के समर्थन का रुख है.

Wednesday, February 19, 2014

German Media, Bosnia & Kosovo Wars


A review of German Print Media Coverage in the Bosnia and Kosovo Wars of the 1990s, by Margit Viola Wunsch.

http://dissertationreviews.org
Margit Viola Wunsch’s dissertation is an important scholarly addition to the study of the media in conflict zones. Wunsch has thoroughly and rigorously analyzed how the German press reported and interpreted the two epochal wars of modern times, namely the war in Bosnia (1992-95) and Kosovo (1998-99). In the course of her research she has closely examined visual and textual coverage of nine national publications over a condensed period of time. The research sheds light on “how the events were covered, what sources were used and what insights the publications conveyed” (p. 2). It must be noted here that the Bosnia and Kosovo wars have played a significant role in shaping and influencing Germany’s foreign policy in later years and thus this work becomes equally important for our understanding of the current socio-political dynamics of the European Union.

This research work is divided broadly into two parts. The first section concentrates on the Bosnia War, while the second section dwells upon the Kosovo War. Both sections follow a similar pattern of tracing the initial phase of each conflict, one atrocity – the Srebrenica massacre in Bosnia and the Račak incident in Kosovo – and, lastly, the international involvement in the war.

Chapter 1, “Background: Key Historical Milestones,” deals briefly with the historical moorings of the troubled region since the medieval ages to World War II. Here the researcher takes note of the battle of Kosovo in 1389 and the role of religion therein. She sums up: “Tito ruled this Socialist Federal Republic of Yugoslavia under the mantra ‘Unity and Brotherhood’. By superimposing Communism on the diverse republics, which in some 63 cases were at enmity with one another, academics generally agree that tensions stemming from various historical eras ranging from the Middle Ages to the Second World War, subsided. However, after Tito’s death in 1980, a decade of political instability and conflict ensued, which escalated in the 1990s” (pp. 62-63). During this period, however, the USSR, Germany and Eastern Europe were in great upheaval. Wunsch subtly situates her study in the larger context of these events which had great implications worldwide.

Chapter 2, “1991-1992: The Descent into War – Early German Press Coverage,” takes us to the main part of the dissertation. Wunsch underlines Slobodan Milosevic’s ascendancy in Yugoslavia in 1989, the consequent declaration of Slovenia and Croatia as independent republics in 1991 and Germany’s support of their self-determination. Bosnia also declared its independence on 1 March 1992 and, subsequently, Yugoslavia waged war that lasted for nearly four years in Bosnia and Croatia. This chapter delves deep into German print media coverage of the initial weeks of the Bosnian War by exploring the German press’ explanations for the violence, the role of the Yugoslav Peoples’ Army (JNA), while also examining issues such as language and authorship.

Chapter 3, “July 1995: Srebrenica – Reporting Genocide,” first takes into account the secondary literature available on the war and goes on to analyze the Srebrenica massacre through textual and visual coverage in the print media. The author places particular emphasis on the Holocaust memory and its ramification in the political and public sphere. Apart from qualitative analysis, Wunsch also focuses on the quantitative aspects of press articles, slant and semantics of the “genocide/ethnic cleansing.”

Chapter 4, “November-December 1995: Peace in Bosnia – The Dayton Agreement,” analyzes the aftermath of the Srebrenica massacre and the peace treaty under the supervision of the international community which was held in Dayton. In this chapter the author looks at Germany’s role in the peace process, how the media downplayed it and how Slobodan Milosevic’s perceptions by the press ranged from “war monger” to “seasoned politician.” She also examines Germany’s recurring past memory, military intervention, foreign policy and “Genocide Clause.”

Chapter 5, “March-June 1998: Renewed Violence – The Kosovo Conflict,” is the first chapter of the second section. It deals with the Kosovo conflict which started merely two months after the Dayton agreement. The Kosovo Liberation Army used violent means to attain Kosovo’s independence from Serbia. Some of the questions addressed in this chapter are: What was the cause of this conflict? Was Milosevic the main culprit?  How did the press compare this conflict with the Bosnian War and World War II? This chapter tries to decipher the German press’ responses to these questions while analyzing the historical background and the language of the press articles.  As in the first section, here too, the author takes into account in her analysis both the visual and textual coverage.

Chapter 6, “January 1999: The ‘Račak Massacre,’” examines events from the vantage point of a Kosovo-Albanian village, Račak, where 45 people were killed. It deals with the violence and the response of German publications. As the researcher notes, “In spite of this increased international interest and the importance of Račak attributed by the secondary literature, this controversial incident has not received much attention in the field of media analyses” (p. 245). This chapter examines in further detail the coverage of the Račak incident, the autopsy examination and the domestic debate surrounding the German involvement in a potential NATO intervention.

Chapter 7, “March-May 1999: Reporting ‘War’ – The NATO-Intervention in Kosovo and Serbia,” is the last chapter of the dissertation. Like the Dayton agreement in the Bosnian war, this chapter deals with the intervention of the international forces and, in particular, with the German military’s response to the conflict. It takes into account the public opinion and political debate regarding the intervention, which was without UN mandate, and the German print media’s coverage. The author also discusses the depiction of Milosevic and the language used by the press.

Based on a sound methodology and using primary and secondary sources, this dissertation is a major study on the interplay of media, politics and the history of wars. It paves the way for the further media analysis in conflict zones, where the cobweb of conflicting interest often overshadows the truth. Wunsch has skillfully presented and analyzed the German press’ varied interpretations of the conflict. This valuable work will be of interest to scholars, media practitioners and the general public alike.
Arvind Das
ITV, Senior Researcher, New Delhi
arvindkdas@gmail.com
Primary Sources
Die Welt
Frankfurter Allgemeine Zeitung (FAZ)
die tageszeitung (taz)
BILD-Zeitung
Der Spiegel, etc.
Dissertation Information
The London School of Economics and Political Science. 2012. 377 pp. Primary Advisor: Maria-José Rodriguez-Salgado.

(Published in Dissertation review: http://dissertationreviews.org/archives/7149 )