Monday, May 17, 2021

द डिसाइपल: शास्त्रीय संगीत की बंदिशें

फिल्म निर्देशक चैतन्य तम्हाणे की मराठी फिल्म ‘द डिसाइपल’  दुनिया भर में सुर्खियाँ बटोरने के बाद पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई. यह फिल्म हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में रची-बसी हैजिसके केंद्र में है एक युवा संगीतकार, जो बुलंदियों को छूना चाहता है. पर क्या वह
शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल कर पाता है?  क्या उसे वह सम्मानप्रतिष्ठा मिलती है जो उसके गुरु या गुरु के गुरु को मिलती हैएक युवा संगीतकार की संगीत यात्रा को तम्हाणे ने आधुनिक समय के मुंबई में अवस्थित किया है जहाँ दस तरह के प्रलोभन हैं और भटकाव हैं तथा लोकप्रियता के अलग पैमाने हैं.

यह फिल्म शास्त्रीय संगीत के बहाने कला की दुनिया में जो आत्म-संघर्ष है उसे रेखांकित करती है. सवाल है कि इस फिल्म में ऐसा क्या है, जो इस फिल्म को विशिष्ट बनाता है. असल मेंसहजता और साधरणता ही इस फिल्म की विशिष्टता है. फिल्म में कोई ड्रामा या कहानी के स्तर पर कोई अनायास मोड़ नहीं है. फिल्म एक लय में चलती हैजिसे खूबसूरती से सिनेमैटोग्राफर माइकल सोबोचेंस्की ने कैद किया है. फिल्म में ख्याल गायकी की कुछ प्रस्तुतियों को भी रखा गया है. एक कलाकार के आत्म-संशय और आत्म-बोध को शरद के किरदार के रूप में आदित्य मोदक ने बेहतरीन ढंग से निभाया है. वे खुद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित कलाकार हैं.

जैसा कि ‘द डिसाइपल’  नाम से स्पष्ट हैइस फिल्म में गुरु-शिष्य के संबंध पर जोर है. शरद के गुरु (अरुण द्रविड़) अपनी संगीत साधना में रत रहते हैं. वे ‘म्यूजिक कंसर्ट’ और दुनिया जिसे ‘लोकप्रिय’ मानती है, उससे दूर हैं. उनके अंदर अपने गुरु माई (सुमित्रा भावे) की सीख हमेशा रहती है कि शास्त्रीय संगीत वर्षों की साधना और त्याग का फल है. और वही सीख शरद की चेतना का भी निर्माण करती है. पर इस साधना में शरद के अंदर संशय और कुंठा का भाव जन्म लेता है.

फिल्म निर्माण की दृष्टि से यह फिल्म तम्हाणे की पिछली चर्चित फिल्म ‘कोर्ट’ से कमतर नहीं हैहालांकि जब बात सामाजिक यथार्थ के निरूपण की हो तब ‘कोर्ट’ निस्संदेह उनकी उत्कृष्ट फिल्म थी. इस फिल्म में गुरु-शिष्य परंपरा में जो अंतर्विरोध और विडंबना है उसे निर्देशक नहीं छूता है. शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में भक्ति-भाव के आवरण में जो बंदिशें हैं, उस पर यहाँ जोर नहीं है. गुरु के पाँव छूने और निस्वार्थ भाव से सेवा करने में पीछे जो प्रवृत्ति है उसे खंगालने की जरूरत थी.

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की परंपरा के केंद्र में सामंती और ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति रही है. एक जातिगत और वर्गवादी दबदबा भी इसमें हमेशा रहा है. मशहूर शास्त्रीय संगीतकार और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता टीएम कृष्णा कर्नाटक संगीत में सामाजिक विस्तार और समरसता की वकालत करते हैंताकि शास्त्रीय संगीत में वर्ग और जाति के वर्चस्व को तोड़ा जा सके. समकालीन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की भी यह ज़रूरत है. यदि इस फिल्म में गुरु-शिष्य परंपरा के बहाने इन बिंदुओं पर भी कैमरा की नजर जाती, तो फिल्म हमारे समय के यथार्थ के ज्यादा करीब हो सकती थी.



 (प्रभात खबर, 16.05.21)

Saturday, May 08, 2021

बहुत कठिन समय है साथी

पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान टेलीविजन के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि हम उम्मीद करें कि कोई साहित्यकार हमारे समय की त्रासदी को शब्द देगा.  साहित्य शब्दों के जरिए मानवीय भावों, प्रेमहिंसा, सुख-दुखपीड़ात्रासदियों को वाणी देता रहा है. यही वजह है कि कोरोना महामारी के दौरान अल्बैर कामू के चर्चित उपन्यास-प्लेगकी बार-बार चर्चा होती रही है. लोग इस महामारी को ‘प्लेग’ के मार्फत समझने की कोशिश करते दिखे. प्रसंगवशइस उपन्यास में एक पात्र रेमंड रैंबर्ट पत्रकार के रूप में मौजूद हैं!

साहित्य भोगे हुए जीवन को रचता हैपर वह जीवन नहीं है. और कोई भी कहानी जीवन से बढ़ कर नहीं हो सकती है. हालांकि कोरोना महामारी के दौरान खबरनवीस अपनी जान पर खेल कर भी खबर दे रहे हैंहमें इस आपदा की कहानियों से रू-ब-रू करवा रहे हैं. महामारी से लड़ने में जनसंचार की अहमियत और केंद्रीयता को सब स्वीकार करते हैं. सही सूचनाएँ जहाँ आम लोगों की दुश्चिंताएँ कम करती हैंवहीं दुष्प्रचार लोगों की परेशानियाँ बढ़ाने का कारण बनते हैं. जनसंचार के माध्यमों का इस्तेमाल जिस रूप में कोरोना महामारी के दौर में हो रहा है उसका सम्यक अध्ययन अभी बाकी है.

बहरहाल, ऐसा लगता है समकालीन घटनाक्रम को संवेदनशील ढंग से सामने रखने के लिए साहित्य पर्याप्त नहीं होता. आधुनिक समय में इसके लिए मीडिया माकूल है. यहाँ पर यह जोड़ना उचित है कि पारंपरिक मीडिया के अलावे सोशल मीडिया की भी इसमें प्रमुख भूमिका है. सूचना क्रांति के बाद मीडिया के अभूतपूर्व प्रसार ने छोटे शहरोंकस्बों और गाँवों को भी केंद्र से जोड़ दिया है. आज हम सब एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हैं. साथ ही तकनीकी ने देश और काल के फासले को कम कर दिया है. यही वजह है कि दिल्ली में बैठा हुआ कोई शख्स दरभंगा में किसी जरूरतमंद को मदद पहुँचा पा रहा है. दिल्ली में बैठा हुआ कोई पत्रकार अमेरिका या लंदन में बैठे महामारी और लोक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बिना किसी दिक्कत के सलाह-मशविरा करने में कामयाब हैं. इस आपदा ने संपूर्ण मानवता को जिस तरह प्रभावित किया है और संचार तकनीकी का इस्तेमाल कर जिस रूप में इससे लड़ा जा रहा हैमीडिया गुरु मार्शल मैक्लूहन की ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा प्रासंगिक हो उठती है. इस महामारी में मानवीय त्रासदी को हम-सब एक-साथ देख रहे हैंभोग रहे हैं. एक अनिश्चितता और भय सब तरफ व्याप्त है. पर जैसा कि वीरेन डंगवाल ने लिखा हैहर दौर कभी तो खत्म हुआ ही करता है/ हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है.

कोराना महामारी की विचलित करने वाले दृश्य (तस्वीरें) हमारी संवेदना को झकझोरने में, उद्वेलित करने में प्रभावी हैं. सड़कों परअस्पतालों मेंघरों में बेबसी की तस्वीरें मुख्यधारा और सोशल मीडिया के हवाले से हमारी चेतना का अंग बनी है और हम एक-दूसरे के दुख और शोक में शरीक हैं.

इस महामारी में पिछले साल लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की जो तस्वीरें मीडिया के माध्यम से आईंवे महाकाव्यात्मक पीड़ा लिए हुए थी. इन तस्वीरों ने देखने के हमारे नजरिए को बदल कर रख दिया. यह पीड़ा के साथ-साथ मानवीय जिजीविषाकरुणा और संघर्ष की तस्वीरें भी थी. साथ ही सामूहिकता और मानवीय सहयोग की सहज तस्वीरें हम इस आपदा में देख रहे हैं. मीडिया इन दृश्यों के माध्यम से पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ रहा है.

कोरोना महामारी के दूसरे वेव में जब प्रतिदिन संक्रमित लोगों की संख्या चार लाख के करीब है और हताहतों की संख्या चार हजारकई पेशेवर पत्रकार भी इससे संक्रमित हो रहे हैं. एक आंकड़ा के मुताबिक पूरे देश में कोराना महामारी से अब तक करीब सौ पत्रकारों ने अपनी जान गंवाई है. कई पत्रकार आज इस वायरस से संक्रमित हैं. पेशे के प्रति अपनी दीवानगी में कुछ पत्रकार इस हालत में भी लोगों के लिए हरसंभव सहायता करते दिखे हैं. सत्ता को कटघरे में खड़े करने में नाकामी और सरकार से सही समय पर सवाल नहीं पूछने की वजह से मीडिया की आलोचना अपनी जगह सही हैपर निस्संदेह जब भविष्य में पत्रकारिता और इस महामारी का इतिहास लिखा जाएगा इसे भी नोट किया जाएगा.

इन सबके बीच देर से ही सही उत्तर प्रदेशबिहारपंजाबपश्चिम बंगाल जैसे अनेक राज्यों ने पत्रकारों को भी महामारी से लड़ने में फ्रंटलाइन वर्कर्स माना है. इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए.

(नेटवर्क 18 हिंदी वेबसाइट पर प्रकाशित)

Monday, April 19, 2021

द ग्रेट इंडियन किचन: जियो बेबी से बातचीत


मलयालम फिल्म ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ (अमेजन प्राइम) की इन दिनों काफी चर्चा हो रही है. इस फिल्म के केंद्र में एक शादी-शुदा जोड़ा है. धर्मसत्ता, पितृसत्ता और खास कर इसके माध्यम से स्त्रियों के साथ मध्यवर्गीय परिवार में जो लैंगिक भेदभाव है उसे रसोईघर के माध्यम से प्रभावी ढंग से इस फिल्म में निरूपित किया गया है. प्रस्तुत है फिल्म के निर्देशक जियो बेबी के साथ हुई लेखक-पत्रकार अरविंद दास की बातचीत के कुछ अंश:

‘द ग्रेट इंडियन किचन’ बनाने का विचार आपके मन में कैसे आया?
असल में शादी के बाद मेरे मन में अपनी पत्नी के साथ किचेन में काम करने ख्याल आया. तब मैंने अपनी माँ, बहन और बीवी के बारे में सोचा. मेरे लिए किचेन एक जेल की तरह रहा. फिर मुझे अपनी स्वतंत्रता का अहसास हुआ. साथ ही मेरे मन में सवाल उठे कि हम तो पुरुष हैं, लेकिन स्त्रियों की आजादी का क्या? मैंने निश्चय किया कि किचेन जो स्त्रियों के लिए एक बेड़ी है उसे लेकर मुझे फिल्म बनानी है.
किस तरह की प्रतिक्रिया आपको इस फिल्म को लेकर मिल रही है?

सच तो यह है कि ज्यादातर आलोचना पॉजिटिव ही हैं. लोगों ने इसे सराहा है. कुछ लोगों ने खारिज भी किया है. पर वे ऐसे लोग हैं जिनके अपने एजेंडे हैं. ये वे लोग हैं जो हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं. उन्हें यह फिल्म पसंद नहीं आ रही. ज्यादातर स्त्रियाँ खुद को इस फिल्म से जोड़ पा रही है. जब आप खाना पकाने, बर्तन धोने, साफ-सफाई करने में जो परेशानी होती है उसे महसूस करते हैं तब आपको लगता है कि हर किचेन एक ‘कुंभी पाक नरक’ है.
सत्तर-अस्सी के दशक में अडूर गोपालकृष्णन, शाजी करुण की फिल्मों के बाद मलयालम सिनेमा में एक ठहराव आ गया था. एक बार फिर से जल्लीकट्टू या अंगमाली डायरीज जैसी फिल्मों के माध्यम से एक नयापन दिख रहा है. आप किस रूप में इसे देखते हैं?
‘द ग्रेट इंडियन किचेन’ में आपको अडूर गोपालकृष्णन और के जी जार्ज की फिल्मों की झलक दिखेगी. मुझ पर उनका प्रभाव हैं. अडूर की एलिप्पथाएम मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है. एलिप्पथाएम का सीधा असर इस फिल्म पर नहीं है, पर मेरे मन में यह फिल्म हमेशा रही. साथ ही के जी जार्ज की ‘अदामिंते वारियेल्लू’ भी रही. ‘अदामिंते वारियेल्लू’ एक उत्कृष्ट फिल्म है जिसके केंद्र में स्त्री हैं. मैं इन दोनों निर्देशकों का आभारी है, मेरे लिए ये प्रेरणास्रोत हैं.
निमिषा सजयन ने जिस किरदार को निभाया है वह बहुत ही मजबूत और विद्रोही चेतना से लैस हैं. आपने किस रूप में इसे रचा?
निमिषा के किरदार में मैं खुद मौजूद हूँ इस फिल्म में. मैंने किचेन में जो महसूस किया उसे निमिषा के किरदार के रूप में रचा है. किचेन में काम करने का बाद मैं पढ़ नहीं पाता था, कोई सिनेमा नहीं देख पाता था. जब मैं कुछ लिख रहा होता था तब मैं अपने हाथों में मौजूद गंध को सूंघा करता था.
यह फिल्म महज पितृसत्ता को ही सवाल के घेरे में नहीं लाती, बल्कि धर्मसत्ता को भी कटघरे में खड़ा करती है. आप क्या कहेंगे इस बारे में?
हां, फिल्म में फेमिनिज्म है, स्त्री स्वतंत्रता का सवाल है. पर हम पहले मनुष्य है, स्त्री या पुरुष बाद में हैं. स्त्रियों के बाद इस तरह का व्यवहार समाज में क्यों किया जाता है, मेरा सवाल यह है? और स्त्रियों के साथ भेद-भाव न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में मौजूद है. ऐसा क्यों है? पुरुष रसोईघर में भागीदारी क्यों नहीं करते हैं?
फिल्म देखते हुए मुझे लगा कि आखिर में जो ‘डांस स्वीकेंस’ है वह एक तरह से मुक्ति का उत्सव बन कर आता है. फिल्म की शुरुआत और अंत डांस के साथ होता है.
हां, यह सही है. पर डांस स्वीकेंस फिल्म का भाग नहीं है. जब निमिषा घर छोड़ कर चली जाती है. फिल्म वहीं खत्म हो जाती है.
क्या इस फिल्म को रिलीज करने में आपको परेशानी हुई?
हां, पहले इसे अमेजन और नेटफ्लिक्स ने अस्वीकार कर दिया था. इसका क्या कारण रहा, मुझे नहीं पता. जनवरी में मैंने इसे ‘नीस्ट्रीम’ पर रिलीज किया था. जब फिल्म के बारे में चर्चा होने लगी, अच्छे रिव्यू आने लगे तब अमेजन ने मुझसे संपर्क साधा और फिर हमने फिल्म को अमेजन प्राइम पर रिलीज किया.
इस फिल्म को बनाने में कितना वक्त आपको लगा और आगे क्या योजना है.
फिल्म के बारे में मैंने वर्ष 2017 में सोचना शुरु कर दिया था. पर शूटिंग, प्रोडक्शन का काम जुलाई 2020 में शुरु किया और करीब एक महीने में पूरा कर लिया था. अगली फिल्म के बारे में अभी कुछ भी निश्चित नहीं है, हम सोच रहे हैं. प्लान कर रहे हैं.

(प्रभात खबर, 18 अप्रैल 2021)

Friday, April 16, 2021

मलयालम सिनेमा का समकालीन स्वर

 


लिजो जोस पेल्लीसेरी की मलयालम फिल्म जलीकट्टूको जब पिछले साल भारत की तरफ से आधिकारिक रूप से ऑस्कर के लिए भेजा गया तब सबकी निगाह समकालीन मलयालम फिल्मों की ओर गई. इस बात पर बहस हो सकती है कि क्या जलीकट्टूफिल्म में ऑस्कर जीतने का माद्दा था, हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भारत में विभिन्न भाषाओं, इसमें हिंदी में बनने वाली बॉलीवुड की फिल्में भी शामिल हैं, में बनने वाली फिल्मों में मलयालम फिल्मों का आस्वाद सबसे अलग है. प्रसंगवश, वर्ष 2011 में सलीम अहमद निर्देशित मलयालम फिल्म एडामिंते माकन अबू’ (अबू, आदम का बच्चा) को भी ऑस्कर के लिए भेजा गया था.

पिछले दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई जियो बेबी की द ग्रेट इंडियन किचनऔर दिलेश पोथान की जोजीफिल्म ने एक बार फिर से मलयालम फिल्मों की केंद्रीयता को साबित किया है. सोशल मीडिया पर इन फिल्मों को लेकर काफी चर्चा है. द ग्रेट इंडियन किचनकी शुरुआत द ग्रेट इंडियन ड्रामायानी शादी से होती है. इस फिल्म के केंद्र में एक शादी-शुदा जोड़ा है. घर-परिवार के सदस्यों के रिश्ते, धर्मसत्ता, पितृसत्ता और खास कर स्त्रियों के साथ मध्यवर्गीय परिवार में जो लैंगिक भेदभाव है उसे रसोईघर के माध्यम से खूबसूरती से निरुपित किया गया है. फिल्म में अपनी इच्छाओं, डांस के प्रति अपने लगाव को दबा कर अदाकार निमिषा सजयन सुबह-दोपहर-शाम घर के पुरुषों की क्षुधाशांत करने की फिक्र में रहती है, पर उसकी फिक्र किसे है! पुरुष भोजनभट्ट हैं. अखबार पढ़ने में, योग करने में मशगूल हैं, वहीं स्त्री नमक-तेल-हल्दी की चिंता में आकंठ डूबी हुई है.

इस फिल्म को देखते हुए मुझे हिंदी के कवि रघुवीर सहाय की कविता पढ़िए गीताकी याद आती रही: पढ़िए गीता/ बनिए सीता/ फिर इन सब में लगा पलीता/किसी मूर्ख की हो परिणीता/निज घर-बार बसाइए/ होंय कँटीली/आँखें गीली/लकड़ी सीली, तबियत ढीली/घर की सबसे बड़ी पतीली/ भरकर भात पसाइए. हालांकि फिल्म में निमिषा सजयन ने जिस किरदार को निभाया है वह न गीता पढ़ती है, न सीता ही बनती है. एक विद्रोही चेतना से वह लैस है. यह चेतना फिल्म के आखिर में दिखाई पड़ती है जिसे एक डांस स्वीकेंसके माध्यम से निर्देशक ने फिल्माया है. एक तरह से यह फिल्म भारतीय समाज में व्याप्त सामंती प्रवृत्तियों का नकार है. यह फिल्म भले ही मलायली समाज में रची-बसी हो पर अपनी व्याप्ति में अखिल भारतीय है और यही वजह है कि निर्देशक ने पात्रों को कोई नाम नहीं दिया है.

जहाँ द ग्रेट इंडियन किचनको सुविधा के लिए हम विचार प्रधान फिल्म कह सकते हैं, वहीं 'जोजी' का कथानक शेक्सपियर के चर्चित नाटक मैकबेथपर आधारित है. इस फिल्म का परिवेश केरल के एक संवृद्ध परिवार के इर्द-गिर्द बुना गया है. इस फिल्म में भी सामंती पितृसत्ता की वजह से घुटन का चित्रण है. घर का मुखिया इस सत्ता का प्रतीक है. इस सत्ता का दंश पुरुष और स्त्री दोनों भोगते हैं, लेकिन प्रतिकार के लिए संवाद की गुंजाइश नहीं है और जिसकी परिणति हिंसा में होती है. फिल्म की पटकथा, चरित्र-चित्रण और सिनेमाटोग्राफी के माध्यम से निर्देशक ने मैकबेथ की कथा को भारतीय परिवेश में कुशलता से समाहित किया है. जोजी का किरदार मलयालम फिल्मों के चर्चित अभिनेता फहद फासिल ने जिस सहजता से निभाया है वह अलग से रेखांकित किया जाना चाहिए. साथ ही अन्य कलाकारों की भूमिका भी उल्लेखनीय है.

इस फिल्म में निर्देशक ने जिस तरह चरित्रों को बुना है कि उसे हम सफेद-स्याह से खाने में रख कर नहीं देख सकते. क्या जोजी परिस्थितियों की वजह से अपराध में संलग्न होता है या यह उसके चरित्र के अनुकूल है? क्या यही सवाल स्त्री पात्र बिन्सीके बारे में नहीं पूछा जा सकता है? फिल्म में अंतर्मन के भावों और अपराध के बाद बाह्य जगत की टीका-टिप्पणियों को हास्य के माध्यम से व्यक्त किया गया है. प्रसंगवश, विशाल भारद्वाज ने मैकबेथ को आधार बना कर मुंबई के माफिया संसार का चित्रण मकबूल’ (2003) फिल्म में किया था, पर पोथान कम बजट में बिना किसी तामझाम के एक बेहतरीन सिनेमाई अनुभव हमारे सामने परोसते हैं. यह क्षेत्रीय सिनेमा, खास कर मलायलम फिल्मों की, एक विशेषता है, जो पिछले दशक में देखने को मिली है. बात कुंबलंगी नाइट्सकी हो या अंगमाली डायरीजकी.

सत्तर-अस्सी के दशक में समांतर सिनेमा की धारा को मलयालम फिल्मों के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन, शाजी करुण की फिल्मों ने संवृद्ध किया था. उनकी फिल्मों ने मलयालम फिल्मों को देश-दुनिया में स्थापित किया, पर उसके बाद ऐसा लगा कि कथ्य और शैली में मलयालम सिनेमा पिछड़ गई. हालांकि अस्सीवें वर्ष में भी दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अडूर गोपालकृष्णन आज भी सक्रिय हैं. पिछले कुछ वर्षों में मलयालम सिनेमा में कथ्य और तकनीकी के स्तर पर युवा फिल्मकार काफी प्रयोग कर रहे हैं और उन्हें सफलता भी मिल रही है. जल्लीकट्टूभले ही ऑस्कर लाने में सफल नहीं हुई, पर समकालीन मलयालम फिल्मों को देखने से काफी उम्मीदें बंधती हैं. क्या इस दशक में भारतीय फिल्मों के लिए ऑस्कर का रास्ता मलयालम फिल्मों से होकर जाएगा? क्या इसमें उसे सफलता मिलेगी? यह सवाल भविष्य के गर्भ में है.

(नेटवर्क न्यूज18 हिंदी के लिए)

Tuesday, March 16, 2021

मणि कौल की मल्लिका: आषाढ़ का एक दिन के पचास साल

 


पिछले दिनों फिल्म निर्देशक अरुण खोपकर ने आषाढ़ का एक दिनफिल्म के पचास साल पूरे होने पर कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की थीं. जहाँ हिंदी में आधुनिक नाटक के प्रणेता मोहन राकेश के इस नाट्य कृति की चर्चा होती रहती है, मणि कौल (1944-2011) निर्देशित इस फिल्म की चर्चा छूट जाती है. उसकी रोटी’, ‘दुविधा’, ‘सिद्धेश्वरीकी तरह ही सिनेमाई दृष्टि और भाषा के लिहाज से आषाढ़ का एक दिनहिंदी सिनेमा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

इस फिल्म में मल्लिका (रेखा सबनीस) कालिदास (अरुण खोपकर) और विलोम (ओम शिव पुरी) की प्रमुख भूमिका है. मल्लिका कालिदास की प्रेयसी है. हिमालय की वादियों में बसे एक ग्राम प्रांतर में दोनों के बीच साहचर्य से विकसित प्रेम है. कालिदास को उज्जयिनी के राजकवि बनाए जाने की खबर मिलती है. मल्लिका और राजसत्ता को लेकर उनके मन में दुचित्तापन है. वहीं मल्लिका कालिदास को सफल होते देखना चाहती है और उन्हें स्नेह डोर से मुक्त करती है. उज्जयिनी और कश्मीर जाकर कालिदास सत्ता और प्रभुता के बीच रम जाते हैं. वे मल्लिका के पास लौट कर नहीं आते और राजकन्या से शादी कर लेते हैं. और जब वापस लौटते हैं तब तक समय अपना एक चक्र पूरा कर चुका होता है. सत्ता का मोह और रचनाकार का आत्म संघर्ष ऐतिहासिकता के आवरण में इस फिल्म (नाटक) के कथानक को समकालीन बनाता है.

दृश्य, प्रकाश, ध्वनि के संयोजन और परिवेश (मेघ, बारिश, बिजली) के माध्यम से सिनेमा में यह सब साकार हुआ है. कोलाहल के बीच एक रागात्मक शांति पूरी फिल्म पर छाई हुई है. मोहन राकेश के नाटक से इतर एक उदास कविता की तरह यह फिल्म हमारे सामने आती है. फिल्म में भावों की घनीभूत व्यंजना के लिए क्लोज अपका इस्तेमाल किया गया है. मणि कौल के सहयोगी रह चुके, चर्चित फिल्म निर्देशक कमल स्वरूप कहते  हैं कि इस फिल्म में मणि कौल ने विजुअल्सपर ज्यादा ध्यान रखा था. वे कहते हैं, “बजट कम था और उसी के हिसाब से ही फिल्म बनी है. सिंक साउंड में ज्यादा खर्च होता इसलिए नाटक के संवाद ट्रैक को पहले रिकॉर्ड कर लिया गया था. जैसे हम गाना प्ले बैक करते हैं उसी तरह फिल्म में साउंड प्ले बैक करती है. सबनीस भी पहले से सत्यदेब दुबे के प्ले में एक्टिंग करती थीं और बहुत अच्छी अदाकार थीं. मणि को बहुत कुछ रेडिमेड मिल गया था. उन्होंने आउटडोर सेट बनाया. इसमें प्रकृति और अंदर का सेट दोनों आ गया है.

मणि कौल की फिल्में साहित्यिक कृतियों पर बनी, हालांकि सबका आस्वाद अलग है. उनकी फिल्मों में एक उत्तरोतर विकास दिखाई पड़ता है, पर पेंटिंग, स्थापत्य और संगीत का स्वर सबमें मुखर रहा है. असल में, उनकी फिल्मों में विभिन्न कला रूपों की आवाजाही सहजता से होती है. जहाँ वे भारतीय सौंदर्यशास्त्र में पगे थे और ध्रुपद संगीत के गुरु थे, वहीं वे अपनी कला में फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां और आंद्रेई तार्कोवस्की के प्रभाव को स्वीकार करते थे. वे बातचीत में अक्सर स्व भावकी बात करते थे. सारे प्रभावों के बावजूद जिस स्पेसमें वे अपनी कला  रच थे वह नितांत वैयक्तिक है, जो फिल्म के हर शॉट और फ्रेम में महसूस किया जा सकता है.

 

इस फिल्म में प्रेम पूरी गरिमा और लालित्य के साथ मौजूद है. मल्लिका की आँखें जिस तरह से अंतर्मन के भावों, अंतर्द्वंद को सामने लाती हैं बरबस वह कृष्ण के वियोग में गोपियों के कहे-अंखियां अति अनुरागीकी याद दिलाती है. पर यहाँ आषाढ़ मास में जायसी के नागमती का विरह नहीं है. नागमती कहती हैं-मोहिं बिनु पिउ को आदर देई’.  जबकि फिल्म के शुरुआत में ही मल्लिका कहती है- मल्लिका का जीवन उसकी अपनी संपत्ति है. वह उसे नष्ट करना चाहती है तो किसी को उस पर आलोचना करने का क्या अधिकार है?’ इस फिल्म में मल्लिका के अपरूप रूप और सौंदर्य के साथ उसकी चेतना उभर कर सामने आई है.

इंतजार और विछोह

वर्षों पहले एक मुलाकात में मणि कौल ने मुझसे कहा था कि उन्हें मोहन राकेश की कहानी में जो इंतजार और विछोह है, काफी प्रभावित किया था. उन्होंने कहा था कि यह इंतजार हमें अनुभवजन्य समय से दूर ले जाता है, जहाँ एक मिनट भी एक घंटा हो सकता है.  जब वे संगीत की शिक्षा ले रहे थे तब सम और विषम के अंतराल में इस बात को काफी अनुभव करते थे.


इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जहाँ परस्पर संवाद करते पात्रों में अजंता भित्तिचित्र और मिथिला चित्रकला शैली की झलक मिलती है. छायांकन में एक लय है. कमल स्वरूप कहते हैं कि मणि कौल देश-विदेश की पेंटिंग शैली के रेफरेंस को सामने रख कर सचेत होकर फ्रेम बनाते थे. वे सिद्धेश्वरी फिल्म के एक दृश्य का खास तौर पर उदाहरण देते हैं, जहाँ वे पिकासो की पेंटिंग-थ्री म्यूजिशियन, से प्रेरित हैं. खुद मणि कौल हेनरी मातिस के प्रभाव को स्वीकार करते थे.

मणि कौल, एफटीआईआई के उनके समकालीन कुमार शहानी और कैमरामैन के के महाजन की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा में मनोरंजन से अलग सामाजिक-सांस्कृतिक तत्वों को कलात्मक रूप से समाहित किया, जिसे हम समांतर सिनेमा की धारा के नाम से जानते हैं. इसके लिए हिंदी की नयी कहानियों की ओर उन्होंने रुख किया.

उल्लेखनीय है कि आषाढ़ का एक दिनके बाद, वर्ष 1972 में, कुमार शहानी ने निर्मल वर्मा की कहानी माया दर्पणको निर्देशित किया था. दोनों ही फिल्मों को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था. दोनों निर्देशकों के फिल्म निर्माण की शैली मिलती जुलती भले हो (संगीत, पेंटिंग के इस्तेमाल को लेकर), विषय-वस्तु का ट्रीटमेंट काफी अलहदा है. मसलन, शहानी की तरण (माया दर्पण) फिल्म में सामंतवादी उत्पीड़न को तोड़ती है. जबकि निर्मल वर्मा की कहानी में सामंतवाद के खिलाफ विरोध नहीं दिखता है. शहानी का रुझान मार्क्सवादी विचारों की ओर रहा, जबकि मणि कौल अपनी कला में विचारधारा की सीमा का अतिक्रमण करते रहे. दोनों ही एफटीआईआई, पुणे में ऋत्विक घटक के शिष्य रहे थे. कमल स्वरूप कहते हैं कि मणि कौल राजनीतिक नहीं, रसिक थे.

बहरहाल, 70 और 80 के दशक में समांतर सिनेमा के दौर में बनी फिल्मों का प्रदर्शन मुश्किल था. दर्शकों का एक सीमित वर्ग था. 90 के दशक में होश संभालने वाली हमारी पीढ़ी की पहुँच से ये फिल्में बाहर थीं. मणि कौल से उनकी फिल्मों के बारे में पूछने पर वह बेतकल्लुफी से बात करते थे. उनकी फिल्में अमूमन सिनेमा समारोहों तक ही सीमित थीं. उदयन वाजपेयी से बातचीत करते हुए (1991) उन्होंने 'अभेद आकाश' किताब में स्वीकारा था, “शायद हमें फिल्म देखने की नयी पद्धति विकसित करनी होगी. फिल्मकार तो हैं लेकिन देखने वाले नहीं हैं. अगर देखने वाले हों तो फिल्मो में बहुत बदलाव आएगा. बिना देखने वालों के फिल्मकार नहीं होता.पिछले दशकों में संचार की नई तकनीकी, इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने के बाद प्रयोगधर्मी फिल्मकारों को एक नया दर्शक वर्ग मिला है. एक तरह से समांतर सिनेमा की धारा का विकास देखने को मिल रहा है. मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में भी बदलाव की इस बयार को महसूस किया जा रहा है. आश्चर्य नहीं कि एफटीआईआई से निकले कई युवा फिल्मकार मणि कौल को अपना गुरु मानते हैं.

(https://hindi.news18.com/blogs/arvind_5/fifty-years-of-ashadh-ka-ek-din-movie-by-mani-kaul-on-mohan-rakesh-play-3518123.html)

 

Saturday, March 13, 2021

मीडिया का मानचित्र


पिछले दशकों में सूचना की नयी तकनीकी से लैस भाषाई मीडिया, खास कर हिंदी अखबार, टेलीविजन, ऑनलाइन वेबसाइट ने शहरी केंद्रों से परे दूर-दराज के इलाकों तक नेटवर्क का अप्रत्याशित विस्तार किया है। निस्संदेह, सार्वजनिक दुनिया में मास मीडिया ने बहस-मुबाहिसा को गति दी है और लोकतांत्रिक समाज का सपना भी बुना है। लेकिन सच यह भी इन्हीं वर्षों में फेक न्यूजऔर दुष्प्रचार का एक ऐसा तंत्र खड़ा हुआ है, जिसकी चपेट में डिजिटल मीडिया के साथ-साथ अखबार और टेलीविजन भी आ गए, जो लोकतंत्र के लिए खतरा बन कर उपस्थित हैं।

समकालीन मीडिया परिदृश्य पर सोशल मीडिया और टेलीविजन हावी हैं, हालांकि कोरोना महामारी के बीच समाचार पत्र जैसे पारंपरिक माध्यम की अहमियत फिर से बढ़ी है। पर सवाल है कि इक्कीसवीं सदी में हिंदी के अखबारों की प्रमुख प्रवृत्तियाँ क्या हैं? क्या ऑनलाइन वेबसाइट अखबारों के पूरक बन कर उभरी हैं या ये टीवी समाचार चैनलों के करीब हैं? समाचार चैनल सच दिखाने और  सत्ता से सच बोलने की हमेशा बात करते हैं। उग्र राष्ट्रवाद के इस दौर में क्या तथ्य से सत्य की प्राप्ति पर इनका जोर है?  क्या इनकी जवाबदेही नागरिक समाज के प्रति है? सवाल यह भी है कि आज का पाठक/दर्शक खुद को मीडिया के पूरे परिदृश्य में कहाँ खड़ा पाता है

शोध और न्यूज रूम के अपने अनुभवों के आधार पर लेखक ने इस किताब में समकालीन हिंदी मीडिया के सरोकारों और संस्कृतियों का भाषा और कथ्य के मार्फत आलोचनात्मक विवेचन और विश्लेषण किया है। 

समकालीन समाज और मीडिया में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह एक जरूरी किताब है।

प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स, ISBN: 978-81-951105-1-3 (PB)

कीमत: 250 रुपए

अमेजन लिंक: https://www.amazon.in/dp/B0919XNV1F?ref=myi_title_dp


(किताब 25 मार्च, 2021 के करीब प्रकाशित होगी)

Sunday, March 07, 2021

मैला आँचल के ‘डागदर बाबू’ की अधूरी कहानी

प्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (4 मार्च 1921- 11 अप्रैल 1977) की जन्मशती मनाई जा रही है. इस बहाने उनके साहित्य पर खूब चर्चा हो रही है. 20वीं सदी के दो प्रमुख साहित्यकार नागार्जुन और रेणु दोनों ही मिथिला से थे. दोनों के साहित्य की कथा भूमि मिथिला का ग्रामीण समाज है. जहाँ नागार्जुन ने मैथिली में थोड़ा-बहुत लिखा, वहीं रेणु का मैथिली में लिखा नहीं मिलता.

केदारनाथ चौधरी ने 'अबारा नहितन' में लिखा है कि जब वे 'ममता गाबय गीत' (मैथिली फिल्म) के मुहूर्त के प्रसंग में रेणु से मिले (1964) तब उन्होंने कहा था- 'नेना मे हम जखन नेपालक विराटनगर मे रही तखन मैथिली मे कइएक टा कथा लिखने छलहूँ. मुदा मैथिली भाषाक क्षेत्र सकुचल, समटल आ एक विशेष जातिक एकाधिकार मे. अपने लिखू अपने पढ़ू.' (बचपन में जब मैं नेपाल के विराटनगर में रहता था तब मैंने मैथिली में कई कथाएँ लिखी. लेकिन मैथिली भाषा का क्षेत्र सीमित और एक विशेष जाति के एकाधिकार में है. खुद लिखिए और खुद पढ़िए). उसी दौर में रेणु की चर्चित कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ‘तीसरी कसम’ फिल्म बन रही थी, जिसे बासु भट्टाचार्य ने निर्देशित किया था और शैलेंद्र प्रोड्यूसर थे.
बहरहाल, रेणु ने मैथिली की पहली फिल्म 'कन्यादान' (1965) का संवाद लिखा था और आगे भी मैथिली सिनेमा के लिए कुछ करने की उनमें लालसा थी. यह अलग बात है कि मैथिली सिनेमा का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया. पर उनका जुड़ाव हिंदी सिनेमा से रहा. रेणु के इस रूप का जिक्र नहीं होता.
इसी प्रसंग में, जहाँ 'तीसरी कसम' फिल्म सबको याद है, वहीं मैला आँचल पर बनने वाली फिल्म- डागदर बाबू (डॉक्टर बाबू), जो अधूरी रह गई, उसकी चर्चा नहीं होती. मैला आँचल का कथानक पूर्णिया में स्थित है और कथानायक प्रशांत एक युवा डॉक्टर है. मेरीगंज गाँव के हवाले से जो सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ का चित्रण हुआ है वह इस उपन्यास को कालजयी बनाता है. इस उपन्यास का हर पाठ पाठक के समक्ष एक नए अर्थ के साथ उद्धाटित होता है.
रेणु की लेखनी दृश्यात्मक है. इस वजह से उनके कथा साहित्य को सिनेमा के परदे पर चित्रित करने की पूरी संभावना है. बात ‘तीसरी कसम’ की हो या ‘पंचलाइट’ की. बशर्ते फिल्मकार शैलेंद्र या नवेंदु घोष जैसा पारखी हो. हिंदी के चर्चित आलोचक प्रोफेसर वीर भारत तलवार ‘रेणु’ की प्रेम कहानी ‘रसप्रिया’ का जिक्र फिल्म निर्माण के प्रसंग में हमेशा करते हैं. वे बताते हैं कि उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक चिदानंद दास गुप्ता से इस कहानी पर फिल्म बनाने का इसरार भी किया था.
मन में सहज रूप से यह सवाल उठता है कि नवेंदु घोष, जिन्होंने ‘तीसरी कसम’ फिल्म की पटकथा लिखी थी, के निर्देशन में बनने वाली इस फिल्म का क्या स्वरूप होता? बिंबो और ध्वनियों के माध्यम से यह फिल्म मैला आँचल कृति को किस तरह नए आयाम में प्रस्तुत करती?
70 के दशक के मध्य में यह फिल्म बननी शुरू हुई थी, पर निर्माता और वितरक के बीच अनबन के चलते इसे अधबीच ही बंद करना पड़ा. उस दौर के लोग डागदर बाबू की शूटिंग और फिल्म के पोस्टर को आज भी याद करते हैं. रेणु के पुत्र दक्षिणेश्वर प्रसाद राय कहते हैं कि फिल्म के 13 रील तैयार हो गए थे. वे बताते हैं कि ‘मायापुरी’ फिल्म पत्रिका में ‘आने वाली फिल्म’ के सेक्शन में इस फिल्म का पोस्टर भी जारी किया गया था. पिछले साल अमिताभ बच्चन ने विवेकानंद के गेट-अप में जया बच्चन की इस फिल्म से एक तस्वीर अपने इंस्टाग्राम पर शेयर की थी, तब लोगों में इसे लेकर उत्सुकता जगी थी. हालांकि उन्होंने गलती से इसे बांग्ला में बनने वाली फिल्म –डागदर बाबू (डॉक्टर बाबू) कह दिया था.
नवेंदु घोष के पुत्र और फिल्म निर्देशक शुभंकर घोष कहते हैं कि उस वक्त मैं एफटीआईआई में छात्र था और अपने पिता को असिस्ट करता था. वे दुखी होकर कहते हैं, “बाम्बे लैब में इस फिल्म के निगेटिव को रखा गया था. 80 के दशक में बंबई में आई बाढ़ में वहाँ रखा निगेटिव खराब हो गया... अब कुछ नहीं बचा है.”
शूटिंग के दिनों को याद करते हुए शुभंकर घोष नॉस्टेलजिक हो जाते हैं. वे कहते हैं “काफी खूबसूरत कास्टिंग थी. धर्मेंद्र, जया बच्चन, उत्पल दत्त, पद्मा खन्ना, काली बनर्जी इससे जुड़े थे. जब रेणु की जन्मभूमि फारबिसगंज में इसकी शूटिंग हो रही थी तब धर्मेंद्र-जया को देखने आने वालों का तांता लगा रहता था. कई लोग पेड़ पर चढ़े होते थे.’ फिल्म के प्रसंग में वे आर डी बर्मन के दिए संगीत का जिक्र खास तौर पर करते हैं. वे कहते हैं कि नंद कुमार मुंशी जो इस फिल्म के निर्माता एस.एच. मुंशी के पुत्र हैं, किसी तरह आरडी बर्मन के संगीत को संरक्षित करने में उनकी सहायता करें. घोष कहते हैं कि फिल्म में पंचम ने असाधारण संगीत दिया था, जो मुंशी परिवार के पास ही रह गया.
यदि यह फिल्म बन के तैयार हो गई होती तो हिंदी सिनेमा की थाती होती. शुभंकर याद करते हुए बताते हैं कि उनके पिता नवेंदु घोष और रेणु अच्छे दोस्त थे. ‘मैला आंचल’ की पॉकेट बुक की प्रति हमेशा अपने पास रखते थे और वर्षों तक उन्होंने उसकी पटकथा पर काम किया था. यहां पर यह जोड़ना उचित होगा कि देवदास, सुजाता, बंदिनी, अभिमान जैसी फिल्मों की पटकथा लिखने का श्रेय नवेंदु घोष को ही है. साथ ‘त्रिशांगी’ फिल्म उन्हीं के निर्देशन में बनी थी, जिसे बेस्ट डायरेक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.
हालांकि बॉलीवुड में साहित्यिक कृतियो के साथ जिस तरह का व्यवहार किया जाता रहा है उसे लेकर रेणु नाखुश रहते थे. तीसरी कसम फिल्म का अंत बदलने का उन पर काफी दबाव बनाया गया था, पर वे राजी नहीं हुए. इसी सिलसिले में रॉबिन शॉ पुष्प ने अपने एक संस्मरण (1992) में नोट किया है कि किस तरह रेणु ने उनसे कहा था कि ‘हो सकता है कि मैं डॉक्टर बाबू न देखूं…’. यह पूछने पर कि क्यों? उन्होंने कहा था- “ पहले समीक्षा पढूंगा...देखने वालों से उनकी राय पूछूंगा.. यदि सब ठीक रहा, तभी देखूंगा. वरना जिस मैला आँचल ने मुझे यश दिया. मान दिया. साहित्य में स्थापित किया...उस कृति के विकृत रूप को देखने का शायद मैं साहस नहीं जुटा पाऊंगा...”
काश रेणु यह फिल्म देख पाते! दुर्भाग्यवश न हमने, न रेणु ने ही यह फिल्म देखी. क्या ही अच्छा होता कि नवेंदु घोष की लिखी पटकथा ही हम देख-पढ़ पाते, पंचम का दिया संगीत ही सुन पाते?

(https://hindi.news18.com पर प्रकाशित)

Sunday, February 28, 2021

कामगारों के दुख की ध्वनियाँ- ‘ईब आले ऊ’


कई फिल्म समारोहों में दिखाए जाने के बाद प्रतीक वत्स के निर्देशन में बनी फिल्म ईब आले ऊ को पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज किया गया है. एक लंबे अरसे के बाद हिंदी में कोई ऐसी फिल्म बनी है जिसमें रोजगार का सवाल, समाज में वर्गीय विभाजन और समकालीन राजनीति पर एक तीखी टिप्पणी है. हालांकि इसे ऐसे बिंबों और ध्वनियों के माध्यम से कहा गया है जिसका विश्लेषण शब्दों में मुश्किल है.

आम तौर पर हम सिनेमा में ध्वनि के इस्तेमाल पर गौर नहीं करते हैं. इस फिल्म के नाम में तीन ध्वनियाँ हैं. ईब-बंदर के लिए, आले-लंगूर के लिए और ऊ-मनुष्य के लिए. विभिन्न प्रकार के ध्वनियों को जिस कुशलता से इस फिल्म में समाहित किया गया है वह इसे विशिष्ट बनाता है. इस फिल्म का कथानक दिल्ली के रायसीना हिल के आस-पास बुना गया है. यहाँ पर सरकारी दफ्तर हैं, राजपथ पर गणतंत्र दिवस का परेड होता है. लेकिन यहाँ बंदरों का वर्चस्व है और उनका आतंक एक सच्चाई. रायसीना हिल सत्ता का प्रतीक भी है. सत्ता को बंदरों के आतंक से बचाए रखने के लिए कुछ लोगों को बकायदा नौकरी पर रखा जाता है, जो बंदरों को भगाने में माहिर होते हैं. एक बेहतर जिंदगी की तलाश में दिल्ली आए ग्यारहवीं पास अंजनी को इस नौकरी पर उसके जीजा रखबा देते हैं. खुद जीजा और अंजनी की बहन की आर्थिक स्थिति दयनीय है और वे झुग्गी झोपड़ी में रह कर किसी तरह जीवन बसर कर रहे हैं.

गालिब की दिल्ली में अंजनी वजीफाख्वार हुआ पर उसे शाह की दुआ नहीं मिलती. उसे महिंद्र का साथ मिलता है जो सात पुश्तों से ईब आले ऊ की ध्वनि निकाल कर बंदरों को भागता रहा है. महिंद्र के लिए यह ध्वनि निकालना जितना आसान है, अंजनी के लिए वह उतना ही मुश्किल साबित होता हैवह अंजनी से बंदरों की तरह सोचने की ताकिद करता है. अंजनी के लिए नौकरी निभाने और उसे बचाने की जद्दोजहद शुरू होती है. वह बार-बार अपने काम में उलझता जाता है. एक जगह वह कहता हैं- कहाँ नरक में लाके फंसा दिए हैं.’  दिल्ली में रहने वाले प्रवासी कामगारों को जिस अमानवीय परिस्थितियों में नौकरी करनी होती है वह हाशिए के समाज का ऐसा सच है जो सत्ता और सुविधाभोगी वर्ग की आँखों से ओझल ही रहता है.

यह फिल्म बिना किसी मेलोड्रामा के कामगारों के संघर्ष और जिजीविषा को हमारे सामने लेकर आती है. अंजनी के किरदार में शारदुल भारद्वाज का अभिनय दोष रहित है. एक बिहारी प्रवासी की भाषा, माधुर्य, भंगिमा और क्षोभ मिश्रित हताशा के भाव को उन्होंने बखूबी पकड़ा है. वहीं महिंद्र के किरदार में महिंद्र नाथ हैं जो निजी जीवन में बंदर पकड़ने का काम करते हैं. इस फिल्म में कैमरा बंदरों के करतूतों को सहजता से कैद करता है, जो हास्य का संचार करता है. सामाजिक यथार्थ को चित्रित करते हुए फिल्म कहीं भी बोझिल नहीं होती है. बिंबों और रूपकों का इस्तेमाल कर यह फिल्म धार्मिक कट्टरता, राष्ट्रवाद और समकालीन राजनीति पर टिप्पणी करने से भी नहीं चूकती. अपनी पहली फिल्म में जिस विश्वास के साथ प्रतीक वत्स सामने आते हैं उनसे काफी उम्मीद बंधती है.


(प्रभात खबर, 28 फरवरी 2021)