Sunday, May 31, 2020

बेआवाज़ महफिल से गए गीतकार योगेश

हिंदी फिल्मों में  गीतों को एक अहम मुकाम हासिल है. पर क्या यही बात गीतकारों के बारे में कही जा सकती है? 70 के दशक के चर्चित गीतकार योगेश (1943-2020) भरी महफिल से चुपचाप उठ कर चले गए, बिना किसी आवाज के. सच तो यह है कि भले ही उनके गीत लोगों की जुबान पर रहेपर वे वर्षों पहले ही विस्मृति में धकेल दिए गए थे. उन्हें फिल्मी दुनिया में वह जगह हासिल नहीं हो सकीजिसके वे हकदार थे. 

'जिंदगी कैसे है पहेलीया 'कहीं दूर जब दिन ढल जाएजैसे गाने सुनते ही हमें सुपरहिट फिल्म 'आनंद' और सुपरस्टार राजेश खन्ना-अमिताभ बच्चन की याद आती है. जिंदगी के फलसफे को इन सीधे-सादे शब्दों में ढालने वाले योगेश ही थेजिनका पूरा नाम योगेश गौर था. सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में  तैयार हुए इन गीतों ने उन्हें संगीत प्रेमियों के बीच मकबूलियत दी थी. असल में गीतकार शैलेंद्र के गुजरने के बाद एक जो खालीपन था उसे योगेश के भावपूर्ण गीतों से  भरने की एक उम्मीद जगी थी. उनके गीतों में शैलेंद्र की तरह ही आस-पास के जीवन के अनुभव व्यक्त हुए.  इसी दौर में निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी की फिल्में  शहरी मध्यवर्गीय जिंदगी के इर्द-गिर्द बुनी गई, जिसे योगेश के गीतों का भरपूर सहयोग मिला था. बात मिली फिल्म की हो रजनीगंधा की या छोटी सी बात की. योगेश के शब्दों ने उसमें जादू भर दिया था, जो सुनने वालों के दिलों को बेधता रहा. 'आए तुम याद मुझे' जैसे गाने में रोमांस और नॉस्टेलजिया एक साथ मिलता है. इसी तरह 'रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके यूँ ही जीवन मेंया 'कई बार यूँ ही देखा है जैसे गाने उस दौर के युवा प्रेमियों के जीवन दर्शनकश्मकश को बिना किसी बनावट के हमारे सामने लेकर आया. ये गाने वही लिख सकता है जिसने जीवन और उसकी पेचीदगियों को देखा और जिया हो. 

उल्लेखनीय है कि कि 'कई बार यूँ ही देखा हैगाने के लिए मुकेश को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. लता मंगेशकर ने भी योगेश के लिखे कई गानों को स्वर दिया था. उन्होंने श्रद्धांजलि देते हुए याद किया कि 'योगश जी बहुत शांत और मधुर स्वभाव के इंसान थे.इसी स्वभाव के चलते 80 के दशक में जिस तरह की तड़क-भड़क हिंदी फिल्मों के गीत-संगीत के क्षेत्र में देखने को मिली वे खुद को अनफिट पाते रहे. हालांकि उस दौर में बॉलीवुड में जो गुटबाजी थी इसके भी वे शिकार हुए, पर उन्होंने कभी गिला-शिकवा व्यक्त नहीं किया. 

बाद के वर्षों में भी कुछ गाने उन्होंने लिखे थे लेकिन उसमें 70 के दशक के योगेश की छाप नहीं दिखी. वर्ष 2017 में हरीश व्यास की फिल्म 'अंग्रेजी में कहते हैंके भी कुछ गाने उन्होंने लिखे थेजो उनकी आखिरी फिल्म थी. उन्हें वर्ष 1962 में आई फिल्म सखी रॉबिन फिल्म के गाने- तुम जो आ जाओ तो प्यार आ जाएसे ब्रेक मिला थाजिसे मन्ना डे और सुमन कल्याणपुरे ने स्वर दिया.


पचपन साल के फिल्मी कैरियर में योगेश के लिखे गानों की फेहरिस्त भले ही उनके समकालीन गीतकारों जितनी लंबी नहीं होपर जो भी गीत उन्होंने लिखे वे धरोहर के रूप में हमारे पास हमेशा रहेंगे. जब भी सावन की फुहारें पडेंगी हम गुनगुना उठेंगे- रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन बिना यह महसूस किए कि इसे योगेश ने लिखा था


(प्रभात खबर, 31 मई 2020)

Sunday, May 17, 2020

सूरज सा चमकता सत्यजीत रे का सिनेमा

बांग्ला सिनेमा के चार प्रमुख स्तंभों सत्यजीत रे (1921-1992), मृणाल सेन, तपन सिन्हा और ऋत्विक घटक की फिल्मों की तुलना होती रही है. पर, निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि सत्यजीत रे पहले ऐसे फिल्म निर्देशक थे जिन्होंने भारतीय सिनेमा को वैश्विक पटल पर स्थापित किया. वर्ष 1992 में विश्व सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उनकी फिल्मों के बारे में अकीरा कुरोसावा ने कहा था- 'सत्यजीत रे की फिल्मों को जिसने नहीं देखा, मानो वह दुनिया में बिना सूरज या चाँद देखे रह रहा है'.
अपनी पहली फिल्म पाथेर पांचाली (1955) के साथ उन्होंने विश्व सिनेमा को एक नया मुहावरा और शैली दी. इस फिल्म में यथार्थ में लिपटी एक काव्यात्मक मानवीय दृष्टि और गहन संवेदना को सबने सराहा था. सत्यजीत रे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे जिनकी अभिरूचि और गति पेंटिंग, संगीत, साहित्य आदि में थी. पाथेर पांचाली के साथ अपराजितो और अपूर संसार फिल्मों ने इसे बखूबी साबित किया. हालांकि पाथेर पांचाली जैसी सराहना और सफलता इन दो फिल्मों को नहीं मिली, लेकिन फिल्म समारोहों में इसे हाथों-हाथ लिया गया. आजादी के बाद करवट बदलते देश, परंपरा और आधुनिकता के बीच की कश्मकश इन फिल्मों में मिलती है. अपू त्रयी का पार्श्व संगीत महान सितार वादक रविशंकर ने दिया था.
समय के साथ सत्यजीत रे की फिल्मों के आस्वादन में बदलाव आता रहा है. समांतर सिनेमा के दौर में एफटीआईआई से निकले युवा निर्देशकों ने भी उनके फिल्म निर्माण और राजनीति की खूब आलोचना की थी. वे ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों से ज्यादा प्रभावित थे. हालांकि सत्यजीत रे ने भी उन्हें नहीं बख्शा था.
पचास-साठ साल के बाद आज भी ‘जलसाघर’ या ‘चारुलता’ जैसी फिल्में दर्शकों और सिने-समीक्षकों को एक साथ उद्वेलित करती है. उनकी अधिकांश फिल्में चर्चित साहित्यक कृति पर आधारित रही है, लेकिन जब हम इसे परदे पर देखते हैं तब एक नया दृश्य-श्रव्य अनुभव से भर उठते हैं. हिंदी में बनी उनकी दो फिल्मों ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और ‘सद्गति’ का जिक्र प्रासांगिक है. दोनों ही प्रेमचंद की प्रसिद्ध रचना है पर रे के हाथों ये कहानी अलग अर्थ और व्यंजना लेकर परदे पर आई. साहित्य और सिनेमाई रिश्ते को लेकर बहस होती रही है, पर जैसा कि गालिब ने कहा है- क्या फ़र्ज़ है कि सब को मिले एक सा जवाब/आओ न हम भी सैर करें कोह-ए-तूर की.
पिछले हफ्ते भारत सरकार के ‘फिलम्स डिवीजन’ ने सत्यजीत रे की डॉक्यूमेंट्री फिल्मों और उन पर बनी फिल्मों के ऑनलाइन प्रसारण कर विधिवत सत्यजीत रे जन्मशती वर्ष की शुरुआत की. रे ने फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल को एक इंटरव्यू में कहा था (सत्यजीत रे नाम से इस डॉक्यूमेंट्री का निर्देशन बेनेगल ने किया था) कि उन्होंने विषयगत दुहराव अपने फिल्मी कैरियर में नहीं किया. ‘घरे बायरे (1983)’ फिल्म के सेट पर काम में निमग्न रे को दिखाती यह डॉक्यूमेट्री उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को दर्शकों के सामने लेकर आती है. साथ ही हम सत्यजीत राय की रचना प्रक्रिया और संघर्ष से भी रू-ब-रू होते हैं.
बच्चों के लिए उन्होंने पचास साल पहले ‘गोपी गाइन बाघा बाइन’ फिल्म निर्देशित किया था जो फैंटेसी और संगीत के लिए आज भी याद की जाती है. यह कहानी बच्चों की पत्रिका संदेश में छपी थी, जिसे उनके दादा ने लिखा था. वे इस पत्रिका के संपादक भी थे. बाद में सत्यजीत रे ने इसे पुर्नप्रकाशित और संपादित किया. वे सिनेमा के गंभीर अध्येता भी थे. सिनेमा पर लिखे उनके लेखों का संग्रह-‘अवर फिल्मस, देयर फिल्मस’ नाम से चर्चित है.

(प्रभात खबर, 17.05.2020)

Thursday, May 07, 2020

इंफोडेमिक से लड़ाई: कोरोना महामारी


कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम को लेकर दुनिया भर में युद्ध स्तर पर कोशिश की जा रही है. इस वायरस के वैक्सीन की खोज भी जारी है. हालांकि  'लॉकडाउनके  बीच समाज में सूचनाओं का जाल भी चारों ओर फैला हुआ है. सही सूचनाएँ जहाँ आम लोगों की दुश्चिंताएँ कम करती हैंवहीं इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से फैलने वाले दुष्प्रचार लोगों की परेशानियाँ बढ़ाने का कारण बनते हैं. इस महामारी से बचाव के लिए जहाँ विशेषज्ञों की टीम के माध्यम से सही सूचनाएँ लोगों तक पहुँचती है, वहीं बेबुनियाद और अवैज्ञानिक समाधान से भी सूचना संसार अंटा पड़ा है. साथ ही, हाल ही में जिस तरह से लॉकडाउन के बीच कई जगहों पर प्रवासी कामगारों की भीड़ उमड़ीवह चिंताजनक है. इसी तरह से दुष्प्रचारफेक न्यूज की वजह से लोगों में समान खरीद कर घरों में जमा करने की होड़ भी दिखी. सामाजिक सौहार्द के बदले इस महामारी को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश भी मीडिया के कुछ हिस्से में देखने को मिला है.

कोरोना महामारी के बीच इस तरह के दुष्प्रचार को इंफोडेमिक’ कहा जा रहा है. शब्दकोष में यह शब्द अभी जगह नहीं पा सका हैपर वर्ष 2002-3 में सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिन्ड्रोम (सार्स) वायरस के फैलने के दौरान पहली बार इस शब्द की चर्चा हुई थी.  शाब्दिक अर्थ में इसे सूचना महामारी’ कह सकते हैं- सूचनाओं की अधिकता जो दुष्प्रचारअफवाह की शक्ल लेती है. महामारी से लड़ने मेंसमाधान ढूंढ़ने में यह बाधा बन कर खड़ी हो जाती है.  लोगों में भय का संचार भी इससे होता है. मानवीय भय और असुरक्षा के बीच सही सूचनाएँ एकजुटता को बनाए रखती हैंजो इस महामारी से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने हाल में कहा कि हमारा साझा दुश्मन कोविड-19 हैलेकिन दुष्प्रचार के माध्यम से जो इंफोडेमिक’ फैला है वह भी दुश्मन है.’ इसी बात को डब्लूएचओ के महानिदेशक टेडरोस गेब्रेयसस ने भी कहा कि हम ना सिर्फ महामारी से लड़ रहे हैं बल्कि इंफोडेमिक से भी लड़ रहे हैं.’ असल में लोगों का विश्वास हासिल कर ही सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियाँ इस महामारी के रोकथाम का उपाय कर सकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने संबोधन में नागरिकों से सहयोग की बार-बार अपील की है.

समाज के विकास की अवस्था के साथ ही संचार की तकनीकी और माध्यम का भी विकास होता रहा है. औपनिवेशिक शासन के दौरान  रिसालेहरकारेडाकभाट आदि खबरोंसूचनाओं के प्रसार का माध्यम होते थे. फिर अखबारों की दुनिया से गुजरते हुए हमारा समाज रेडियो और टेलीविजन जैसे जनसंचार के माध्यम तक पहुँचा.  भूमंडलीकरण के साथ हम एक बड़े सूचना समाज का हिस्सा बन गए हैं. समकालीन समाज में सूचना और तकनीक हमारे जीवन का अंग है. इंटरनेट के माध्यम से फैली सोशल मीडिया हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है. पिछले दशक में जिस तेजी से सोशल मीडिया की पहुँच बढ़ी है वह अखबारटेलीविजन जैसे मीडिया के मुकाबले अप्रत्याशित कही जा सकती है.

प्रसंगवशइतिहासकार रंजीत गुहा ने एक अध्ययन में नोट किया है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान  किसान विद्रोहों और सिपाही विद्रोह को सत्ता सरकारी कागजातों में महामारी’ के रूप में देख रही थी. यहाँ महामारी सत्ता के नजरिए से एक अलग अर्थ की व्यंजना करती हैजिसमें किसानों की सामूहिक उद्यमों की नकार है. वे लिखते हैं कि इन विद्रोहों के प्रसार में अफवाहों की एक बड़ी भूमिका थी. उस समय में हमारे समाज में शिक्षा का प्रसार बेहद कम था और खबरों के प्रसार की गति बहुत ही धीमी थी. वर्तमान समय में इंटरनेट के माध्यम से पलक झपकते ही सूचनाएँ मीलों की दूरी तय कर लेती है. जाहिर है खबर की शक्ल में मनगढंत बातेंदुष्प्रचारअफवाह आदि समाज में पहले भी फैलते रहते थे. पर उनमें और आज जिसे हम फेक न्यूज समझते हैंबारीक फर्क है. 

ऐसी खबर जो तथ्य पर आधारित ना हो और जिसका दूर-दूर तक सत्य से वास्ता ना हो फेक न्यूज कहलाता है. इस तरह की खबरों की मंशा सूचना या शिक्षा नहीं होता है बल्कि समाज में वैमनस्य फैलानालोगों को भड़काना होता है. लोगों के व्यावसायिक हित के साथ-साथ राजनीतिक हित भी इससे जुड़े होते हैं. समाज में तथ्यों के सत्यापन की संस्कृति का अभाव भी इसके लिए जिम्मेदार है.

सच यह है कि  कोई भी तकनीक इस्तेमाल करने वालों पर निर्भर करती है. दुष्प्रचार फैलाने का जिम्मा भी उन्हीं लोगों पर हैजो तकनीक का इस्तेमाल संचार के लिए कर रहे हैं. 

इंफोडेमिक के लिए सोशल मीडिया जैसे माध्यमों के सिर दोष मढ़ा जा रहा है. पर  लॉकडाउन’ के बीच घर से काम करने के दौरानस्कूली शिक्षा के लिए सूचना की नई तकनीक और सोशल मीडिया मुफीद साबित हो रहे हैं. साथ ही अखबार और टेलीविजन जैसे पारंपरिक जनसंचार के माध्यमों से जुड़े पत्रकार इंटरनेट के प्लेटफार्म का इस्तेमाल खबरों के संग्रहण और प्रसारण में कर रहे हैंजो एक हद तक दुष्प्रचार को रोकने में सहायक है.

(प्रभात खबर, 7 मई 2020)

Saturday, May 02, 2020

इरफान अभी यात्रा के बीच थे

मकबूल में इरफान
इरफान (1967-2020) अभी यात्रा के बीच थे. उन्हें एक लंबी दूरी तय करनी थी. हिंदी सिनेमा को उनसे काफी उम्मीदें थी. हिंदी जगत की बोली-बानी, हाव-भाव, किस्से-कहानी पर पिछले दो दशकों में बॉलीवुड में जोर बढ़ा है. उदारीकरण  के दौर में विकसित इस देशज चेतना के वे प्रतिनिधि कलाकार थे. उनकी अदाकारी में एक सम्मोहन था, जिसे देखने-परखने वालों ने  उनके एनएसडी के दिनों में ही नोट किया था. पुराने दौर के लोग  ‘लाल घास पर नीले घोड़े’ (1987-88) नाटक में उनके अभिनय को याद करते हैं.
वे एनएसडी के अस्तबल से निकले ऐसे घोड़े थे, जिसकी आँखों में बड़े परदे के सपने थे. पर बहावलपुर हाउस (एनएसडी) से बॉलीवुड और हॉलीवुड की उनकी यात्रा काफी लंबी और संघर्षपूर्ण थी. छोटा परदा (टेलीविजन) एक पड़ाव था. वर्ष 2004 में विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ में एनएसडी के अग्रजों- नसीरुद्दीन  शाह, ओम पुरी, पंकज कपूर और समकालीन पीयूष मिश्रा के साथ ‘मकबूल’ के किरदार को उन्होंने जिस सहज अंदाज में जिया वह हिंदी सिनेमा के प्रेमियों के बीच उन्हें मकबूलियत दी. फिल्म मक़बूल (2004) ही थी जिसे  मैंने बड़े परदे पर ‘चाणक्य’ सिनेमा हॉल में दो बार देखा था. फिल्म देखने के बाद मैंने जनसत्ता अखबार के लिए एक टिप्पणी लिखी- ‘खेंचे है मुझे कुफ्र’. इसमें बॉलीवुड में थिएटर की पृष्ठभूमि से आए कलाकारों की दुखद स्थिति और बेकद्री का जिक्र था. इरफान खुद इस बेकद्री को झेल चुके थे.
हालांकि इससे पहले एनएसडी के दिनों के मित्र और निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की कैंपस राजनीति को केंद्र रख कर बनी ‘हासिल (2003)’ फिल्म  ने उन्हें पहचान दिला दी थी. कहने को वे मीरा नायर की बहुचर्चित ‘सलाम बॉम्बे’ (1988) और तपन सिन्हा की पुरस्कृत फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’ (1990)  में दिखे थे, पर उन्हें नोटिस नहीं किया गया. बाद में मीरा नायर की ‘नेमसेक’ ने जहाँ उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया वहीं तिग्मांशु धूलिया की ‘पान सिंह तोमर’ (2012) ने राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाया.
मैं फिर से उनकी कम चर्चित फिल्म ‘क़रीब क़रीब सिंगल’ (2017) देख रहा था, जिसमें उनके साथ मलयालम फिल्मों की काबिल अभिनेत्री पार्वती थिरूवोथु है. इस फिल्म में उन्हें जितना स्क्रीन टाइम मिला है उतना उन्हें पूरे कैरियर में दो-एक फिल्मों में ही मिल पाया. क्राफ्ट पर एक अभिनेता की पकड़ के लिए यह फिल्म देखी जानी चाहिए. उनकी हँसी, आँखों की भाव-भंगिमा, संवाद अदायगी का अंदाज उन्हें आम दर्शकों के करीब ले आता है. यही कारण है कि उनके असमय गुजरने का दुख किसी आत्मीय के गुजरने का दुख है.
इस फिल्म में प्रेम के फलसफे को उन्होंने जिस खूबसूरती और खिलंदड़ापन के साथ जिया है वह हमारे समय के करीब है. इरफान का किरदार कहता हुआ प्रतीत होता है- प्रेम में हैं तो अच्छा , प्रेम को खो चुके हैं तो फिर से नए प्रेम की तलाश में रहिए…एक और जिंदगी आपका इंतज़ार कर रही है.
मैंने नसीरुद्दीन शाह, पंकज कपूर, पीयूष मिश्रा आदि को मंच पर नजदीक से देखा-सुना है. पर इरफान को कभी नहीं देखा. मुझे उनसे रश्क है जो उनके करीब थे. मैं कभी उनसे बात नहीं कर पाया. मुझे दुख है कि मैं कभी मिल भी नहीं सका.
‘करीब करीब सिंगल’ फिल्म में जब वे अपनी तीसरी प्रेमिका से मिलने जाते हैं  तो उसे नृत्य में मग्न पाते है. एक झरोखे से वे उसे देखते हैं और उसके लिए काग़ज़ पर एक नोट छोड़ जाते हैं- ‘तेरी उड़ान को मेरा सलाम.’ सलाम इरफान!

Monday, April 27, 2020

सिनेमाघर में बसे यादों के जुगनू


दुनिया भर में कोरोना वायरस की वजह से सिनेमाघरों पर ताले लगे हैं. सोशल डिस्टेनसिंगजैसे शब्द सिनमाघरों के भविष्य पर सवाल बन कर खड़े हैं. हालांकि चीन में करीब दो महीने बाद पाँच सौ सिनेमाघरों को फिर से खोला गया, पर दर्शकों के उत्साह नहीं दिखाने के बाद इन्हें फिर से बंद कर दिया गया.

लॉकडाउनके बीच सिनेमाप्रेमियों में सिनेमाघरों को लेकर एक तरह का नॉस्टेलजिया देखने को मिल रहा है. मुंबई भले ही बॉलीवुड का आंगन हो, सिनेमा की संस्कृति आजाद भारत में दिल्ली में फली-फूली. साल 1995 में जब मैं दिल्ली आया, वह हॉलीवुड का सौंवा साल था. यह साल भारतीय सिनेमा के प्रदर्शन, सिनेमा देखने-दिखाने की संस्कृति को बदल कर रख देने वाला साल भी है. इसी साल पीवीआर लिमिटेड (प्रिया विलेज रोड शो) अस्तित्व में आया. संयोगवश, दिल्ली में पहली फिल्म बेसिक इंस्टिंक्ट (माइकल डगल्स और शेरोन स्टोन अभिनीत)मैंने दक्षिण दिल्ली में स्थित प्रिया सिनेमामें ही देखी थी. 

उन दिनों के अखबारों में इस फिल्म की खूब चर्चा थी. इस फिल्म को सर्टिफिकेट दिया गया था और मैं तब अठारह साल का नहीं हुआ था. किसी तरह मान-मनुहार कर मैं सिनेमा हॉल में घुस गया था. बालकनी के बाहर हॉलीवुड के विभिन्न दशकों के फिल्मों के पोस्टर लगे थे, जो सिनेमा के सौ वर्षों की यात्रा को दिखाते थे.

आज किसी शहर की संस्कृति को हम सिनेमाघरों के रास्ते भी परख सकते हैं. सिनेमा के इतिहास को पत्रकार और समीक्षक जिया उस सलाम ने अपनी किताब देल्ही 4 शोज: टाकिज ऑफ यस्टरइयरमें सिनेमाघरों के माध्यम से बखूबी समेटा है. उन्होंने लिखा है कि प्रिया और उसके साथ चाणक्य और अर्चना 80 के दशक के मध्य तक अंग्रेजी फिल्में दिखाने के लिए मशहूर थे, जबकि शीला, ओडियन और रिवोली हिंदी सिनेमा दिखाने की ओर पूरी तरह कदम बढ़ा चुके थे. कभी-कभार हॉलीवुड की फिल्मों के लिए एक खिड़की इन्होंने खुली छोड़ रखी थी.’ 

हालांकि 90 के दशक में यहाँ भी हिंदी फिल्में दिखाने का चलन जोर पकड़ा, पर हॉलीवुड की फिल्में भी नियमित रूप से दिखाई जाती रही. सही मायनों में मेरे जैसे सिनेमाप्रेमी के लिए सिनेमाघर फिल्म एप्रिशिएशनका एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है. मल्टीप्लेक्स के दौर में जवान हो रही पीढ़ी और लॉकडाउन के बीच ओवर द टॉपस्ट्रीमिंग वेबसाइट (नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉट स्टार आदि)पर सिनेमा का लुत्फ लेने वाले सिनेमाप्रेमियों को बालकनी, रियर और स्टॉल जैसे शब्दों के अर्थ ढूंढ़ने के लिए शब्दकोश का शायद सहारा लेना पड़े.

प्रसंगवश, 1918-20 में जब स्पेनिश फ्लूवायरस दुनिया में फैली थी, तब भी सिनेमाघरों को बंद किया गया था, पर उस वक्त ऐसे एकमुश्त ताले नहीं लगे थे. उस वक्त भारत जैसे देश में सिनेमा की संस्कृति ठीक से विकसित भी नहीं हुई थी. बाद में टेलीविजन के आने से फिल्म संस्कृति पर ग्रहण लगता दिखा था, पर सिनेमाघर टिके रहे. ज्यादातर सिनेमाघर सिंग्ल स्क्रीन से मल्टीप्लेक्स में तब्दील हुए. मॉल की संस्कृति, सिनेमा की संस्कृति से जुड़ती गई. उम्मीद करें कि जब कोरोना का कोहरा छटेगा अंधेरे बंद कमरों में चमकते जुगनूओॆ का जादू लोगों को फिर से सिनेमाघर खींच लाने में कामयाब होंगे. सिनेमा से बड़ा मनोरंजन का कोई जरिया भी तो नहीं!

(प्रभात खबर, 26 अप्रैल 2020)

Friday, April 10, 2020

टेलीविजन की वापसी


कोरोना वायरस की वजह से देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान लोग घरों में सिमटे हैं. समाचार पत्रों के वितरण-प्रकाशन, पठन-पाठन पर इसका प्रभाव पड़ा है. ऐसे में फिर से टेलीविजन घरों के केंद्र में आ गया. रामायण, महाभारत जैसे सिरीयलों के साथ-साथ एक बार फिर से समाचार चैनल प्रासंगिक हो उठे है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कोरोना संकट के बीच राष्ट्र के नाम संदेश के लिए टेलीविजन का बखूबी सहारा लिया.

पिछले दो दशकों में उदारीकरण की नीतियों के फलस्वरूप सेटेलाइट, निजी टेलीविजन समाचार चैनलों का अभूतपूर्व प्रसार हुआ. जनसंचार, विचार-विमर्श, छवियों के निर्माण और संसदीय चुनावों के दौरान राजनीतिक लामबंदी में टेलीविजन समाचार चैनल एक प्रमुख माध्यम बनके उभरे हैं. चर्चित आलोचक रेमंड विलियम्स ने टेलीविजननाम से लिखी अपनी किताब में टेलीविजन माध्यम को तकनीक और विशिष्ट सांस्कृतिक रूप में परखा है. विजुअल माध्यम होने से टीवी के दर्शकों के बीच सहभागिता का सहज बोध होता है. हालांकि खबरों, विभिन्न कार्यक्रमों के साथ विज्ञापन भी लिपटा हुआ दर्शकों तक चला जाता है, जो इन कार्यक्रमों के लागत और चैनलों के मुनाफा का प्रमुख जरिया है.

उदारीकरण के बाद खुली अर्थव्यस्था में मीडिया पूंजीवाद का प्रमुख उपक्रम है. उसकी एक स्वायत्त संस्कृति भले हो पर अब वह कारपोरेट जगत का हिस्सा है. समकालीन मीडिया की व्याख्या में इन रिश्तों की पड़ताल भी बेहद जरूरी है. निस्संदेह, हाल के वर्षों में बड़ी पूंजी के प्रवेश से मीडिया की सार्वजनिक दुनिया का विस्तार हुआ है, लेकिन पूंजीवाद के किसी अन्य उपक्रम की तरह ही मीडिया उद्योग का लक्ष्य और मूल उदेश्य दर्शकों की संख्या को बढ़ाना, टीआरपी बटोरना और मुनाफा कमाना है. 21वीं सदी के दो दशक भारत में टेलीविजन समाचार चैनलों के विस्तार के रहे, पर इसके साथ ही इसी दशक में चैनलों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे.

प्रसंगवश, 2008-09 में दुनिया भर में आए आर्थिक मंदी का असर भारतीय टेलीविजन उद्योग की सेहत पर पड़ा और चैनलों का जोर दूर-दराज की सुध लेने, खोजपरक कहानियों को ढूंढ़ने से ज्यादा टीवी स्टूडियो में होने वाले विचार-विमर्श और बहस की ओर तेजी से बढ़ा है. एंकर और प्रोड्यूसर का ध्यान ऐसे मुद्दों पर बहस करवाना होता है जिससे कि स्टूडियो में एक नाटकीयता का संचार हो. इनका उद्देश्य दर्शकों की सोच-विचार में इजाफा करना नहीं होता, बल्कि उनके चित-वृत्तियों के निम्नतम भावों को जागृत करना होता है. ऐसे में एंकरों-प्रोड्यूसरों की तलाश उन मुद्दों की तरफ ज्यादा रहती है जिसमें सनसनी भाव हो.

टेलीविजन न्यूज का दूसरा दशक पूरी तरह इन्हीं विमर्शों को समर्पित रहा. इन वर्षों में समाचार चैनलों में संवादताओं की भूमिका कम हुई, ‘कास्ट कटिंगपर जोर रहा. कोरोना संकट के बाद फिर से आर्थिक मंदी का असर समाचार चैनलों की सेहत पर पड़ेगा. ऐसे में सवाल है कि इस बीच जो दर्शकों में टीवी उद्योग ने अपनी पैठ बनाई है, क्या उसे बरकरार रख पाएगी. क्या खोई हुई विश्वसनीयता वह अर्जित कर पाएगी?

(प्रभात खबर, 10 अप्रैल 2020)

Monday, March 16, 2020

समंदर किनारे संस्कृतियों का संगम: पांडिचेरी


पुडुचेरी (पांडिचेरी) में 'ऑरविले बीच पर घूमते हुए अनायास मन में प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक अल्बेयर कामू के उपन्यास द आउटसाइडरका ध्यान आया. आगे-पीछे देखा, कहीं कोई नहीं था. तट पर दूर कुछ मछुआरे जाल को मिल-जुल कर सुलझा रहे थे. कुछ अपनी डोंगियों को लेकर समंदर में उतर चुके थे. सूर्योदय हो रहा था. लकड़ियों के कॉटेज और खर-पतवार से छाए घरों के बीच से गुजरते हुए मुझे लगा कि समुद्र तट पर कहीं कोई गोली चलेगी या चाकू. जैसा कि उपन्यास में होता है. यह मेरे मन का वहम था.

ऐसा लगता है कि कोरोना विषाणु से संक्रमण को लेकर असुरक्षा और भय शहर में हर जगह मौजूद है. कामू के उपन्यासों मसलन, ‘प्लेगमें भी यह बेतुकापन और असुरक्षा अस्तित्ववादी विमर्श की शक्ल में आता है. पूरे देश-दुनिया से पांडिचेरी में साल भर पर्यटक आते रहते हैं. सड़कों पर, मोटर साइकिल से घूमते, होटलों में मौज मनाते वे बेफ्रिक से दिख रहे हैं. असल में पांडिचेरी का मिजाज ही बेफ्रिकी का है. समंदर के किनारे बसे इस शहर सबसे का बड़ा आकर्षण पूरे शहर में फैले साफ-सुथरे समुद्र तट हैं. हर तट ही अपनी खासियत हैं. जैसे सेरेनिटी बीचपर सूर्योदय देखने पर्यटक जाते हैं, वहीं पैराडाइज बीचपर सर्फिंग का लुत्फ लेने.

यह शहर पहले मछुआरों का छोटा सा गाँव हुआ करता था, जिसे औपनिवेशिक शासकों ने कारोबार के लिए एक सफल बंदरगाह में तब्दील किया. यह शहर कई बार बना-बिगड़ा है पर कहते हैं कि इसके मूल स्वभाव में बदलाव नहीं आया. बंगाल की खाड़ी पर 1674 में फ्रांसीसी ने इसे बसाया, जिसे डच ने उजाड़ दिया. फिर फ्रांसीसी ने कब्जे में लिया जिसे अंग्रेजों ने उजाड़ दिया. वर्ष 1954 में भारत में विलय के बाद इसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया, जिसकी एक वजह इसकी सांस्कृतिक विशिष्टता है. हालांकि पांडिचेरी भारत का अभिन्न अंग तब बना जब वर्ष 1963 में फ्रांस की सरकार और भारत सरकार के बीच औपचारिक संधि अनुबंध पर हस्ताक्षर हुए.

बहरहाल, पांडिचेरी में जितना फ्रांस का रंग गहरा है, उतनी ही तमिल संस्कृति रची-बसी है. घर के बाहर बने कोलम हो, फूल बेचती महिलाएं हों या तमिल गीत-संगीत. यह मेल खान-पान में भी दिखता हैं. फ्रेंच और इटालियन क्यूजिन के साथ इडली, डोसा और पारंपरिक दक्षिण भारतीय व्यंजन हर नुक्कड़, चौराहे पर मिलता है.
Serenity Beach

व्हाइट टाउनमें सफेद और सरसों के पीले रंग में सजे मकानों में फ्रांसीसी वास्तुकला का अनुपम सौंदर्य अभी भी मौजूद है. हरी-भरी गलियों में घूमते हुए ऐसा लगता है कि हम पेरिस पहुँच गए हैं. आज भी कई परिवार ऐसे है जिनकी जड़ें फ्रांस से जुड़ी हैं. जिस होटल में मैं रुका था उसका वास्तुशिल्प भी एक फ्रांसीसी ने ही डिजाइन किया था. लॉबी में फ्रेंच फिल्मों के पोस्टर इसकी गवाही देते थे. साथ ही एक छोटी लाइब्रेरी भी फ्रांसीसी साहित्य से सजी मिली. प्रसंगवश, महात्मा गांधी के करीबी और फ्रांसीसी विद्वान रोम्या रोलां के नाम पर बना पुस्तकालय देश के सबसे पुराने पब्लिक लाइब्रेरी में से एक है. वर्ष 1827 में इसकी स्थापना हुई. पिछले साल जनवरी में जब मैं यहाँ आया था तब पुनर्निमार्ण का काम पूरा हो रहा था. आधुनिक साजो-सज्जा से लैस इस पुस्तकालय में आज विभिन्न भाषाओं में चार लाख से ज्यादा किताबें हैं. चूंकि शहर में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, इस वजह से देश के अन्य हिस्सों से छात्रों की आवाजाही यहाँ दिखती है.

एक पुरसकून धीमी लय में शहर चलता है और रात में भी सड़क पर लोग दिखते हैं. 'रॉक बीच' पर स्थित रंगीन रोशनियों में नहाए चर्चित रेस्तरां 'ल कैफे' में देर रात भी गहमागहमी रहती है. यह चौबीसों घंटे खुला रहता है.

प्रकृति के बीच ऑरविले में स्थित अरविंदो आश्रम में दुनिया भर के पर्यटकों का जमघट लगा रहता है. वर्ष 2018 में इसने पचास साल पूरे किए. यह आश्रम एक बीते दौर और उस दौर के सपनों को प्रतिबिंबित करता है. भय और असुरक्षा के बीच मानवीय एकजुटता और विश्व शांति इसके मूल में है.

(प्रभात खबर, 15 मार्च 2020)