Wednesday, January 25, 2023

पल्प की शोधपरक कहानी: सिनेमा मरते दम तक


हिंदी में लुगदी साहित्य की चर्चा गाहे-बगाहे होती है, पर लुगदी सिनेमा का जिक्र नहीं होता. असल में मुख्यधारा (पॉपुलर) और समांतर (पैरलल) के बीच सिनेमा की एक और धारा हिंदी में रही है जिसे ‘पल्प सिनेमा’ कहा जाता रहा है.

पिछली सदी के 90 के दशक में इस सिनेमा का बोलबाला रहा है. बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल के कस्बों और महानगरों के सीमांत इलाकों में ये फिल्में दिखाई जाती थी. कम बजट की इन फिल्मों में मुख्यधारा के हीरो मसलन मिथुन, धर्मेंद्र भी दिखते थे हालांकि ज्यादातर ऐसे कलाकार होते थे जो माया नगरी में आए तो हीरो-हीरोइन बनने थे, पर घर-परिवार चलाने के लिए कम बजट की इन फिल्मों में काम करते थे. मसाला फिल्मों की तरह इसमें मारधाड़, हॉरर, सेक्स के सहारे कहानी बुनी जाती थी, चटपटे संवाद होते थे. इन फिल्मों को सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में रिलीज किया जाता था. चार दिन, एक हफ्ते में शूट की जाने वाली इन फिल्मों से निर्माता को काफी अच्छा मुनाफा हो जाता था और कलाकारों की नकद में कमाई हो जाती थी. बी ग्रेड, सी ग्रेड कही जाने वाली इस तरह की फिल्मों का एक अलग अर्थतंत्र विकसित हो गया था.
एक-दो फिल्मों को छोड़ दिया जाए (लोहा, गुंडा) तो आम तौर पर मीडिया या मध्यवर्ग के ड्राइंग रूम में इन फिल्मों को चर्चा के लायक नहीं समझा जाता था. सिनेमा के समीक्षक भी इन फिल्मों पर लिखने में नाक-भौं सिकोड़ते थे. पर क्या ये फिल्में पॉपुलर संस्कृति हिस्सा नहीं रही है? सवाल है कि इसके दर्शक वर्ग कौन थे? वे किस तरह की मनोरंजन की तलाश में आते थे? 21वीं सदी में इन फिल्मों का बाजार क्यों खत्म हो गया?
पिछले दिनों अमेजन प्राइम पर रिलीज हुई ‘सिनेमा मरते दम तक’ नाम से छह पार्ट की डॉक्यू-सीरीज इन सब सवालों की पड़ताल करती है. ‘मोनिका, ओ माय डार्लिंग’ और ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ जैसी फिल्मों के निर्देशक वासन बाला ‘सीरीज क्रिएटर’ हैं, इसे दिशा रंदानी, जुल्फी और कुलिश कांत ठाकुर ने निर्देशित किया है. राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फिल्म 'मिस लवली (2012)' के निर्देशक अशीम अहलूवालिया इसके क्रिएटिव कंसलटेंट हैं. प्रसंगवश, ‘मिस लवली’ पल्प सिनेमा से जुड़े दो भाइयों की कहानी को परदे पर चित्रित करती है जो फिल्म निर्देशक कांति शाह और किशन शाह से प्रेरित है.
सिनेमा के शोधार्थियों और अध्येता के लिए यह सीरीज काफी महत्वपूर्ण है. इन फिल्मों से जुड़े रहे दिलीप गुलाटी, विनोद तलवार, किशन शाह और जे नीलम की जुबानी यह कहानी कही गई है. उन्हें एक बार फिर से कम बजट में फिल्म बनाने का मौका दिया गया है. हालांकि पुरानी पल्प फिल्मों के साथ इनकी बनाई फिल्मों के कुछ ही अंश सीरीज में शामिल हैं. आने वाले समय में इसे अलग से दिखाए जाने की उम्मीद है.
इन फिल्मों के बनाने की रचनात्मक प्रक्रिया क्या थी? दर्शक इस पहलू से रू-ब-रू होता है. साथ ही मुंबई के माया नगरी की एक झलक भी हम देखते हैं. चमकते परदे के पीछे की सच्चाई, संघर्ष की दास्तान जो अलिखित रह जाती है उसे फिल्म से जुड़े फिल्मकारों-कलाकारों ने बयां किया है. कांति शाह और सपना सप्पू के आंसू और उनके अकेलेपन की स्वीकारोक्ति से यह स्पष्ट है.
जिस दौर में ये फिल्में बन रही थी, उसी दौर में भूमंडलीकरण के साथ सिनेमा बनाने की नई तकनीक आ रही थी. सिंगल स्क्रीन की जगह मल्टीप्लेक्स लेने लगा. साथ ही पोर्न और सॉफ्ट पोर्न इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध होने लगी. जैसा कि इस सीरीज में एक जगह टिप्पणी की गई है, हिंदी क्षेत्र के जो दर्शक इन फिल्मों को देखते थे उसकी रूचि भोजपुरी फिल्मों से पूरी होने लगी थी! इसी के साथ यह सवाल भी जुड़ा है कि आज मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में एक जैसे दर्शक ही क्यों दिखते हैं? निम्नवर्गीय जीवन से जुड़ी कहानियां क्यों पॉपुलर सिनेमा से गायब होने लगी है? हाशिए के समाज के पास सिनेमा मनोरंजन का एक प्रमुख साधन था, जो उनसे दूर हो गया है. अपनी जड़ों से दूर, शहरों में मजदूर का जीवन जीते हुए दर्शकों के लिए ये फिल्में एक तरह से ‘सेफ्टी वॉल्व’ की तरह थी.
जाहिर है इन फिल्मों में स्त्रियों को भोग्या, एक वस्तु के रूप में चित्रित किया जाता था. इसके दर्शक पुरुष होते थे. हालांकि इस सीरीज में फिल्मों में व्याप्त अश्लीलता पर अलग से टिप्पणी नहीं की गई है. निर्माता-निर्देशक ने अपनी नैतिकता को नहीं थोपा है, उस दौर को महज शोधपरक ढंग से संग्रहित करने का काम किया है.
आखिर में, फिल्मकारों ने खुद इसे स्वीकार किया है कि जब फिल्मकारों, वितरकों में लालच का भाव बढ़ा और सेंसर को धता बताते हुए ये बिट्स (पोर्न क्लिप) परोसने लगे तब ही ‘पल्प सिनेमा’ का अंत तय हो गया था!

Sunday, January 22, 2023

'आरआरआर’ से ऑस्कर की उम्मीद


पैन नलिन की गुजराती फिल्म 'छेल्लो शो' (आखिरी शो) को मार्च में होने वाले 95वें ऑस्कर पुरस्कार के लिए भले ही शॉर्टलिस्ट किया गया हो, लेकिन सबकी नज़र एस एस राजामौली की तेलुगू फिल्म ‘आरआरआर’ पर है. भारत की ओर से ‘छेल्लो शो’ फिल्म ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी’ के लिए आधिकारिक रूप से भेजी गई थी. ‘आरआरआर’ के गाने ‘नाटू-नाटू’ को ‘म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की श्रेणी में शॉर्टलिस्ट किया गया है. गौरतलब है कि अभी तक किसी भी भारतीय फिल्म को ऑस्कर पुरस्कार नहीं मिल सका है, जबकि दुनिया में आज सबसे ज्यादा फीचर फिल्म भारत में ही बनती हैं.

‘आरआरआर’ एक ‘एक्शन ड्रामा’ फिल्म है जिसे इतिहास और मिथक के इर्द-गिर्द भव्य स्तर पर रचा गया है. फिल्म में अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई को धार्मिक प्रतीकों के सहारे काल्पनिक रूप में परदे पर दिखाया गया है, जिसके केंद्र में आंध्र प्रदेश-तेलंगाना के अल्लूरी सीताराम राजू (राम चरण) और कोमाराम भीम (एनटीआर जूनियर) जैसे स्वतंत्रता सेनानी हैं. ताम-झाम और तकनीक (वीएफएक्स) कौशल के सहारे यह फिल्म हॉलीवुड की फिल्मों से होड़ लेती हुई दिखती है. असल में ‘आरआरआर’ के वितरण, प्रचार-प्रसार और ‘नेटफ्लिक्स’ प्लेटफॉर्म ने इसे देश-विदेश के एक बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचाया है. यही कारण है कि अमेरिका और यूरोप में भी इस फिल्म की चर्चा है. हॉलीवुड के प्रतिष्ठित फिल्मकार भी इस फिल्म की प्रशंसा कर रहे हैं, ऐसे में आश्चर्य नहीं कि लॉस एंजेलिस में फिल्म को इस हफ्ते ‘बेस्ट सांग’ और ‘बेस्ट फॉरेन फिल्म’ की श्रेणी में ‘क्रिटिक्स च्वाइस’ पुरस्कार मिला है. यह पुरस्कार हॉलीवुड के फिल्म समीक्षकों के वोट के आधार पर मिलते हैं.
ऑस्कर पुरस्कार के लिए फिल्म की गुणवत्ता एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकती है, पर वही काफी नहीं है. पुरस्कार के लिए एक बड़े स्तर पर ‘लॉबिंग’ की जरूरत होती है. ‘आरआरआर’ जैसे बड़े बजट की फिल्म के लिए यह असंभव नहीं है और निर्माता इस काम में जुटे हुए भी हैं.
जबसे ‘नाटू-नाटू’ को लॉस एंजेलिस में सर्वश्रेष्ठ ‘ओरिजिनल सांग-मोशन पिक्चर’ श्रेणी में प्रतिष्ठित ‘गोल्डन ग्लोब’ पुरस्कार मिला है, उम्मीद की जा रही है कि अगले हफ्ते ‘आरआरआर’ को बेस्ट पिक्चर के लिए नामांकित (नॉमिनेशन) किया जा सकता है. यदि ऐसा होता है तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी. फिल्मी दुनिया से जुड़े अकादमी के सदस्य अपने वोट के जरिए फिल्मों को नामांकित और पुरस्कृत करते हैं.
ऑस्कर पुरस्कारों पर बहुलता की अनदेखी करने और नस्लवाद का आरोप दशकों से लगता रहा है. पिछले वर्षों में सदस्यों में स्त्रियों और अल्पसंख्यकों की भागेदारी बढ़ी है फिर भी इनमें अधिकांश श्वेत पुरुष ही है. हाल के वर्ष में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर विरोध भी दिखते रहे हैं. प्रसंगवश, ऑस्कर के इतिहास में महज पाँच ब्लैक अभिनेता को ही अब तक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला है.
ऐसे में सवाल है कि क्या ऑस्कर इतना समावेशी है कि उनकी नज़र भारतीय भाषा में बनी एक ऐसी फिल्म पर पड़ेगी जिसे आधिकारिक रूप से नहीं भेजा गया हो? क्या अकादमी के सदस्य ‘आरआरआर’ की विषय-वस्तु और संस्कृति को लेकर संवेदनशील होंगे? क्या ‘नाटू-नाटू’ उन्हें थिरकने को मजबूर कर पाएगा?

Friday, January 13, 2023

‘गोल्डन ग्लोब’ में नाटू-नाटू की सफलता और विस्मृति में एम एम करीम

 


तेलुगू फिल्म ‘आरआरआर’ के गाने ‘नाटू-नाटू’ को सर्वश्रेष्ठ ‘ओरिजिनल सॉन्ग-मोशन पिक्चर’ श्रेणी में प्रतिष्ठित ‘गोल्डन ग्लोब’ पुरस्कार मिला है. ‘नाटू नाटू’ के संगीतकार एम. एम. कीरावानी हैं और इसे काल भैरव और राहुल सिप्लिगुंज ने स्वर दिया है. ‘बाहुबली’ फेम के एस एस राजामौली की यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफलता के परचम फहराने के बाद पश्चिमी देशों के फिल्म समारोहों में अपनी दावेदारी पेश कर रही है. मार्च में होने वाले प्रतिष्ठित ऑस्कर पुरस्कार समारोह के लिए भी ‘नाटू-नाटू’ को ‘म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की कैटेगरी में शॉर्टलिस्ट किया गया है.

बॉलीवुड सहित दक्षिण भारतीय सिनेमा में ‘स्टार’ पर इतना जोर रहा है कि समीक्षक गीत-संगीत पर कम ही बात करते हैं, जबकि गीत-संगीत का फिल्मों में केंद्रीय महत्व रहा है. कई फिल्म तो बॉक्स ऑफिस पर असफल होने के बाद भी सिर्फ गीत-संगीत की वजह से ही लोगों के जुबान पर दशकों बाद भी रहती आई है. खुद एम. एम. कीरावानी हिंदी प्रदेश के लिए अपरिचित नाम नहीं है. एम एम करीम नाम से उन्होंने पिछली सदी के नब्बे के दशक में कुछ हिंदी फिल्मों में बेहतरीन संगीत दिया है. ‘तुम मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए (क्रिमनल)’, ‘चुप तुम रहो चुप हम रहें, खामोशी को खामोशी से ज़िंदगी को ज़िंदगी से बात करने दो (इस रात की सुबह नहीं)’, ‘जाने कितने दिनों के बाद गली में आज चांद निकला (जख्म)’ जैसे गीत आज भी लोगों को याद हैं, भले करीम को भूल गए! इस विस्मृति के क्या कारण हैं?

आरआरआर एक ‘एक्शन ड्रामा’ फिल्म है जिसे इतिहास, मिथक के इर्द-गिर्द भव्य स्तर पर रचा गया है. जिस ताम-झाम और तकनीक (वीएफएक्स) कौशल का यह सहारा लेती है उसका इस्तेमाल हॉलीवुड वर्षों से करता रहा है. असल में आरआरआर फिल्म के वितरण और प्रचार-प्रसार ने इसे देश-विदेश के एक बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचाया है. पिछले दिनों लॉस एंजेलिस (अमेरिका) में प्रदर्शन के दौरान इस फिल्म के प्रति लोगों में जो उत्साह था वह सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी रही. पिछले दिनों जर्मनी के एक समाजशास्त्री, प्रोफेसर माइकल बौरमैन ने मुलाकात के दौरान जब आरआरआर के बारे में बातचीत की तो मुझे आश्चर्य हुआ था. हालांकि उनकी दिलचस्पी के केंद्र में फिल्म में जिस तरह से राष्ट्रवाद को परोसा गया है वह थी. इस फिल्म की राजनीति पर बात नहीं होती. फिल्म में अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई के दौरान जिस तरह धार्मिक मिथकों, प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है वह आलोचना से परे नहीं है.

बहरहाल, पिछली सदी में उदारीकरण-भूमंडलीकरण के बाद यह चिंता जताई जा रही थी कि हॉलीवुड, अमेरिकी पॉप म्यूजिक कहीं भारतीय समाज को अपने घेरे में न ले ले. अखबारों-पत्रिकाओं में एमटीवी, विसंस्कृतिकरण के खतरे के बारे में लेख लिखे जा रहे थे. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच में एक भारतीय फिल्म की मौजूदगी और पुरस्कृत होना उल्टी बयार को दिखाता है. भूमंडलीकरण भारतीय फिल्मों के लिए अवसर भी लेकर आया है जहाँ उसकी प्रतिस्पर्धा विश्व के बेहतरीन फिल्मकारों के साथ है.

यहां पर यह नोट करना उचित होगा कि कीरावानी की प्रतिस्पर्धा टेलर स्विफ्ट, रिहाना और लेडी गागा जैसे चर्चित संगीतकारों से थी. ऐसे में उनकी इस जीत को कम कर नहीं आंकना चाहिए. हालांकि संगीत के जानकारों का मानना है कि कीरावानी (करीम) का यह सर्वश्रेष्ठ नहीं है, न ही भारतीय सिने संगीत का सर्वश्रेष्ठ ही है.निस्संदेह एनटीआर जूनियर और राम-चरण ने नाटू-नाटू गाने में डांस के माध्यम से जो ऊर्जस्विता दिखाई है वह लोगों को लुभाता है. इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस गाने को फिल्म से अलग जीवन प्रदान किया है.

हिंदी के कवि और सिनेमा के गहरे जानकार विष्णु खरे ने एक जगह लिखा है: “1950-60 के बाद फिल्म संगीत ने भारतीय युवक-युवतियों की निम्न मध्यवर्गीय भावनाओं को जो अभिव्यक्ति दी है, वह विश्व के किसी भी लोकप्रिय संगीत में मिलना असंभव है.” हिंदी फिल्मों की ही बात करें तो कई ऐसे संगीत निर्देशक हुए हैं जिनके भावपूर्ण गीत-संगीत दशकों से लोगों के दिलों पर राज करती हैं और लोक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. यह अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भारतीय फिल्म संगीतकारों को और बेहतरीन संगीत रचने को प्रेरित करेगा. साथ ही उम्मीद की जानी चाहिए कि बॉलीवुड कीरावानी (करीम) की प्रतिभा का समुचित इस्तेमाल कर पाएगा.

Sunday, January 08, 2023

सिनेमा का सम्मोहन: एक फिल्मकार की स्मृतियों में ‘छेल्लो शो’


सिनेमा का सम्मोहन किसमें होता है? देखने वालों में, जिसे सहृदय कहा जाता है. हालांकि यह सम्मोहन साहित्य या चित्रकला से अलग होता है. सिनेमा संगीत की तरह समय में आबद्ध होता है, पर असल में सिनेमा एक ऐसी कला है जिसमें तकनीक का हस्तक्षेप रहता है. यही कारण है कि तकनीक बदलने के साथ फिल्में पुरानी भी पड़ जाती है. मसलन पचास साल पहले फिल्में भले अच्छी बनी हो लेकिन वह आज हमें उस रूप में आकर्षित नहीं करती जिस रूप में वह रिलीज होने के वक्त थी. अपवाद भले हों. फिल्में हालांकि हमारी स्मृतियों का हिस्सा बनी रहती हैं.

पिछली पीढ़ी के पास सिनेमा देखने के अपने किस्से हैं. हाल ही में टेलीविजन पर खानदान’ (1965) फिल्म देखते हुए माँ ने कहा कि यह फिल्म मेरी शादी के आस-पास रिलीज हुई थी. तुम्हारे पापा ने इसे दरभंगा में देखा था और मुझसे देखने कहा था. मैंने इसे गाँव के पास के कस्बे सकरी के सिनेमा घर में देखा था. उस समय एक रुपए का टिकट होता था. अब जब पापा नहीं रहे यह फिल्म माँ की स्मृतियों में नॉस्टेलजिया की तरह आया है. सवाल है कि एक फिल्मकार किस रूप में सिनेमा के साथ अपने संबंध को देखता है? जाहिर है एक निर्देशक पर सिनेमा का जादू आम दर्शक से भिन्न होता है.

पैन नलिन की गुजराती फिल्म 'छेल्लो शो' (आखिरी शो) को ऑस्कर के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है. भारत की ओर से यह फिल्म बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी’ के लिए आधिकारिक रूप से भेजी गई थी. छेल्लो शो’ नौ साल के ऐसे बच्चे की कहानी है जो आगे चल कर एक फिल्मकार बनता है. उस बच्चे के सिनेमा के प्रति सम्मोहन, दुर्निवार आकर्षण को फिल्म खूबसूरत ढंग से चित्रित करती है. एक निश्छलता है यहां.

इस फिल्म से पहले संसार (2001) और वैली ऑफ फ्लावर (2006) से पैन नलिन की अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत में काफी प्रतिष्ठा मिली थी. दोनों ही फिल्में सेक्स के अकुंठ चित्रण को ले कर दर्शकों के बीच काफी चर्चा में रही थी. ये फिल्में फ्रांसजापान और जर्मनी  के सहयोग से बनी थी, जो पश्चिमी दर्शक वर्ग के लिए बनाई गई प्रतीत होती है. इसके उलट छेल्लो शो में एक कस्बाई बच्चा, समय, सिनेमा के जादू में इस कदर गिरफ्तार है कि उसे पढ़ने-लिखने में मन नहीं लगता. गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में वह स्कूल से भाग कर, रेल पकड़ कर नजदीक के कस्बे में सिनेमा देखने आता हैयहाँ उसकी दोस्ती एक प्रोजेक्शनिस्ट (जो प्रक्षेपण के माध्यम से परदे पर सिनेमा दिखाने के लिए जिम्मेदार होता था) से होती है. अपने लंच बॉक्स की अदला-बदली से उसे मुफ्त में फिल्म को देखने मिल जाती है. यहाँ वह प्रकाश और फिल्म के खेल को समझता है.

इस फिल्म में रेल का रूपक बार-बार आता है. यहाँ रेल की यात्रा सिनेमा की यात्रा प्रतीत होती है. असल में, यह एक आत्म-कथात्मक फिल्म है. पैन नलिन आज अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्देशक हैं. उनका जन्म गुजरात के एक गाँव में हुआ. पिता रेलवे कैंटीन चलाते थे और उनका बचपन रेलगाड़ी के सानिध्य में बीतता था. सिनेमा बनाने की इच्छा ने उन्हें आगे के अध्ययन के लिए बड़ौदा जाने को प्रेरित किया.

समय (भाविन रबारी) अपने पिता से कहता है: मैं प्रकाश का अध्ययन करना चाहता हूँ. प्रकाश से वार्ता (स्टोरी) बनती है. और वार्ता से फिल्म. यह फिल्म जहाँ एक निर्देशक के आत्म का निरूपण है वहीं सिनेमा प्रक्षेपन की तकनीक में आए बदलाव को भी खूबसूरती से दिखाती है. साथ ही रील से गायब होने से एक फिल्मकार की नजर में रंगों की दुनिया कैसी बदली इसे भी आखिर में कलात्मकता के साथ फिल्माया गया है. यहाँ संवाद बेहद कम हैं. सिनेमा का समाज में आर्काइवल’ (संग्रहण) महत्व भी है, छेल्लो शो’ फिल्म यह बखूबी हमारे सामने लेकर आती है.

पिछली सदी के आखिरी दशक में भूमंडलीकरण के साथ आई नई तकनीक ने समाज के हर हिस्से को प्रभावित किया है. सिनेमा पर इसका प्रभाव खास तौर पर पड़ा. न सिर्फ सिनेमा बनाने की तकनीक (सेल्यूलाइड से डिजिटल की यात्रा) को इसने प्रभावित किया है, बल्कि वितरण, सिनेमा देखने-दिखाने को भी. अब सिनेमा देखने के लिए सिनेमाहॉल के बंद कमरे की जरूरत नहीं रही, इसे घर बैठे टेलीविजन, मोबाइल-लैपटॉप पर बार-बार देखा जा सकता है. बार-बार इसे स्ट्रीम किया जा सकता है. छेल्लो शो भी सिनेमाहॉल से उतर कर आज नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है. इस फिल्म में प्रोजेक्शनिस्ट फजल समय से कहता है कि भविष्य कहानी कहने वालों की है. सिनेमा का भविष्य भी बदलते तकनीक से जुड़ा है. कहानी किस रूप में कही जाएगी यह भी भविष्य के गर्भ में है, पर एक बात स्पष्ट है कि कहानी कहने का वही रूप नहीं रह जाएगा जो डिजिटल के पहले था.

यह फिल्म एक तरह से पूर्व के फिल्मकारों को श्रद्धांजलि भी है. अनायास नहीं कि आखिर में हम सत्यजीत रे, गुरुदत्त, फेलिनी, गोदार, आजेंस्टाइन, चार्ली चैपलिन जैसे फिल्मकारों का नाम सुनते हैं. छेल्लो शो देखते हुए इटालियन निर्देशक जिएसेपे टोर्नटोर की ऑस्कर विजेता फिल्म सिनेमा पैराडिसो (1988) की याद आती है. विषय-वस्तु में समानता भले दिखे, गुजरात का लैंडस्केप, रंग और ध्वनि इस फिल्म को ठेठ भारतीय बनाता है. गुजराती फिल्म का इतिहास भारतीय सिनेमा जितना ही पुराना है, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया में इसकी चर्चा नहीं होती.


(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Sunday, January 01, 2023

प्रयोगधर्मी युवा फिल्मकारों का सिनेमा


बॉलीवुड और हाल की पापुलर दक्षिण भारतीय फिल्मों की सफलता की पीछे वितरण का तंत्र और प्रचार का भारी योगदान रहा है, जिसका लाभ प्रयोगधर्मी युवा फिल्मकार नहीं उठा पाते हैं. उनके पास प्रचार के लिए बजट नहीं होता. जब अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इन फिल्मकारों की चर्चा होती है, तब ही मुख्यधारा के मीडिया में इन्हें नोटिस लिया जाता है.

फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे से अभिनय में प्रशिक्षित फिल्मकार पुष्पेंद्र सिंह ने पिछले दिनों फेसबुक पर लिखा कि जो दोस्त मुझसे मेरी फिल्मों के बारे में पूछते रहते हैं, उनके लिए मेरी फिल्म देखने का मौका ‘मूबी’ (ऑनलाइन वेबसाइट) पर है. पुष्पेंद्र सिंह हमारे समय के एक महत्वपूर्ण फिल्मकार हैं. पुष्पेंद्र की फिल्में देश-विदेश के प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों का हिस्सा भले रही है, पर आम जनता के लिए उसका प्रदर्शन नहीं हो पाया है. उनकी दो फिल्में—‘लाजवंती’ (2014) और ‘अश्वात्थामा’ (2017) के साथ ‘मारु रो मोती’ (2019) डॉक्यूमेंट्री स्ट्रीम हो रही है.

सितंबर-अक्टूबर में न्यूयॉर्क के ‘द म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट (मोमा)’ में नई पीढ़ी के भारतीय स्वतंत्र फिल्मकारों की विभिन्न भाषाओं में बनी सोलह फीचर और पाँच लघु फिल्में दिखाई गई जो वर्ष 2010 के बाद बनी है. इस समारोह में पुष्पेंद्र सिंह, अचल मिश्र के साथ अवांगार्द फिल्मकार अमित दत्ता (हिंदी) की फिल्में भी दिखाई गई थी. प्रसंगवश, अमिता दत्ता की फिल्म ‘आदमी की औरत और अन्य कहानियाँ’ में पुष्पेंद्र सिंह ने भी अभिनय किया था.

तकनीक (डिजिटल) के विकास और ओटीटी प्लेटफॉर्म ने सिनेमा निर्माण और वितरण की सहूलियत दे दी है. अमित दत्ता भी एफटीआईआई, पुणे से प्रशिक्षित हैं. उनकी फिल्मों को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है. ‘नैनसुख’, ‘सातवीं सैर’, ‘सोनचिड़ी’, ‘लाल भी उदास हो सकता है’ जैसी फीचर और लघु फिल्मों की चर्चा विभिन्न फिल्म समारोहों में खूब हुई.

सिनेमा तकनीक आधारित आधुनिक कला है, जो साहित्य, संगीत और चित्रकला से जीवन रस लेता रहा है. समांतर सिनेमा के दौर में जो भारतीय फिल्मकार हुए उनकी फिल्मों ने सिनेमा को मनोरंजन से अलग एक विचार के रूप में स्थापित किया. विभिन्न कलाओं को समाहित करती इन स्वतंत्र युवा फिल्मकारों की फिल्में भारतीय सौंदर्य शास्त्र में पगी है और समांतर सिनेमा की परंपरा को आगे बढ़ाती है.

अमित्त दत्ता, गुरविंदर सिंह (पंजाबी), चैतन्य ताम्हाणे (मराठी) जैसे फिल्मकारों के यहाँ दृष्टि से लैस सिनेमा का जो स्वरूप है वह इन्हें दुनिया के प्रसिद्ध फिल्मकारों की श्रेणी में खड़ा करता है. अमित द्त्ता ने अपनी किताब ‘खुद के कई सवाल’ में नोट किया है: “अगर मैंने सिर्फ सेल्युलाइड पर ही फिल्में बनाने की सोची होती और डिजिटल छवियों के विकल्प पर ध्यान नहीं दिया होता, तो मैं कुछ नहीं कर पाता.” ऐसा नहीं कि इनकी फिल्मों में कला पक्ष हावी है और सामाजिक-राजनीतिक तत्व गायब. मसलन, चर्चित साहित्यकार विजयदान देथा (बिज्जी) की कहानी ‘केंचुली’ को आधार बना कर पुष्पेंद्र सिंह ने अपनी फिल्म ‘लैला और सात गीत’ (2020) को जम्मू-कश्मीर के खानाबदोश जनजाति--बकरवाल के जीवन यथार्थ के बीच अवस्थित किया है. फिल्म में स्त्री स्वतंत्रता के साथ समकालीन राजनीतिक सवाल भी उभर कर आए हैं. यहाँ ‘लैला’ कश्मीर का रूपक है.

Friday, December 30, 2022

वर्षांत 2022: दक्षिण भाषाई फिल्मों के दबदबे में रहा बॉलीवुड


साल के आखिर में खबर आई कि ऑस्कर पुरस्कार के लिए पान नलिन की गुजराती फिल्म 'छेल्लो शो' (आखिरी शो) को शॉर्टलिस्ट किया गया है. भारत की ओर से यह फिल्म ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी’ के लिए आधिकारिक रूप से भेजी गई थी. साथ ही बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाने वाली एसएस राजामौली की ‘आरआरआर’ (तेलुगु) के गाने ‘नाटू-नाटू’ को भी ‘म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की कैटेगरी में शॉर्टलिस्ट किया गया.

नए वर्ष में ऑस्कर पुरस्कार का परिणाम चाहे जो हो, तय है कि वर्ष 2022 में भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय भाषाओं में बनी फिल्मों का दबदबा रहा. एक आंकड़ा के मुताबिक कोरोना महामारी के दो साल के बाद भारतीय सिनेमा ने बॉक्स ऑफिस पर करीब 11 हजार करोड़ का कारोबार किया. यहाँ भी हिंदी फिल्मों पर दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनी फिल्मों की बढ़त दिखी. न सिर्फ ‘आरआरआर’ बल्कि कन्नड़ भाषा में बनी ‘केजीएफ 2’ और ‘कांतारा’ ने भी सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. मणि रत्नम की ‘पोन्नियन सेल्वन (पीएस-1)’ (तमिल) के प्रति भी लोगों में उत्सुकता रही. इन फिल्मों की विषय-वस्तु और परदे पर फिल्मांकन में पर्याप्त भिन्नता है.
‘छेल्लो शो’ सौराष्ट्र के एक बच्चे की सिनेमा के प्रति दुर्निवार आकर्षण को केंद्र में रखती है. यह एक आत्मकथात्मक फिल्म है, वहीं ‘कांतारा’ एक ऐसी दंत कथा है जिसमें दक्षिण कर्नाटक के तटीय इलाकों की स्थानीय लोक-संस्कृति, परंपरा, आस्था-विश्वास, रीति-रिवाज, धार्मिक मान्यताओं और मिथक को कहानी के साथ खूबसूरती से पिरोया गया है. आरआरआर (आजादी के आंदोलन) और पीएस-1 (चोल राजवंश) इतिहास को कथा का आधार बनाती है. ‘एक्शन ड्रामा’ इन फिल्मों के केंद्र में है. बड़े बजट की इन फिल्मों में ताम-झाम, रंग-रभस, भव्यता को जिस कौशल से बुना गया वह दर्शकों को सिनेमाहॉल में खींच लाने में कामयाब रहा. देश की बदलती सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति, संचार के साधनों का विस्तार, वितरण की रणनीति का भी इन फिल्मों की सफलता में योगदान रहा है. बॉलीवुड की पापुलर फिल्मों के फ्रेमवर्क में ही ये सारी फिल्में आती है. यहाँ विचार-विमर्श के बदले तकनीक हावी है. प्रसंगवश, कन्नड़ में समांतर सिनेमा का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है, जिसकी आज चर्चा नहीं होती.
बहुसंख्यकवाद और हिंदुत्ववादी राजनीति की चहलकदमी इन फिल्मों में दिखाई दी. इस प्रसंग में बॉक्स ऑफिस पर खूब सफल रही विवेक अग्निहोत्री निर्देशित ‘ द कश्मीर फाइल्स’ की चर्चा जरूरी है. भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल (आईएफएफआई) के ज्यूरी प्रमुख, चर्चित फिल्मकार नादव लैपिड के द्वारा इस फिल्म को ‘अश्लील और प्रोपेगेंडा’ बताने से काफी विवाद हुआ, लेकिन फिल्म देखने वाले किसी भी सहृदय दर्शक और समीक्षक से यह बात छिपी नहीं थी कि फिल्मकार की मंशा सिनेमा के माध्यम से सत्य तलाशने की नहीं थी. एक बातचीत में चर्चित फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने मुझे कहा था कि ‘एक फिल्मकार के रूप में इतिहास के प्रति आपकी एक जिम्मेदारी होती है. जिस फिल्म में जितना प्रोपगेंडा होगा, उसका महत्व उतना ही कम होगा. फिल्म का इस्तेमाल प्रोपगेंडा के लिए भी होता है, पर ऐतिहासिक फिल्मों को बनाते हुए वस्तुनिष्ठता का ध्यान रखना जरूरी है. बिना वस्तुनिष्ठता के यह प्रोपगेंडा हो जाती है.’ दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में (करीब दो हजार) हिंदुस्तान में बनती है और इसे सांस्कृतिक शक्ति (सॉफ्ट पावर) के रूप में स्वीकार किया जाता है. लोकतांत्रिक भारत की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ भी चाहे-अनचाहे फिल्मों में अभिव्यक्ति होती हैं.
बहरहाल, हिंदी फिल्मों की बात करें तो बड़े-बड़े स्टार भी कोई खास करिश्मा नहीं दिखा पाए. रणबीर कपूर की ‘शमशेरा’, अक्षय कुमार की ‘रक्षाबंधन’ और ‘सम्राट पृथ्वीराज’, रणवीर सिंह की ‘जयेशभाई जोरदार’ और ‘सर्कस’, कंगना रनौत की ‘धाकड़’ आदि फिल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाने में असफल रही. आर्थिक बदहाली भी एक कारण है. ऐसे में बॉलीवुड पर काफी दबाव रहा. जाहिर है बॉलीवुड को नए विचारों, कहानियों की सख्त जरूरत है, जो दर्शकों के बदलते मिजाज के साथ तालमेल बना कर चल सके, पर डर है कि कहीं यह रास्ता दक्षिण भारतीय फिल्मों की ओर न ले जाए! पिछले दो दशक में हिंदी सिनेमा ने पापुलर और पैरलल के बीच का एक रास्ता अख्तियार कर कई बेहतरीन फिल्में दी और सही मायनों में आगे की दिशा का निर्धारण यहीं से होगा, न की घिसी-पिटी मसाला फिल्मों से.
बॉलीवुड के प्रमुख निर्देशक संजय लीला भंसाली ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ लेकर आए. एक ‘सेक्स वर्कर’ की भूमिका में आलिया भट्ट ने अपने अभिनय से सबको प्रभावित किया. इसी क्रम में आमिर खान की ‘लाल सिंह चढ्ढा’ और रणबीर कपूर की ‘ब्रह्माशस्त्र’ की चर्चा जरूरी है, जिसने ठीक-ठाक व्यवसाय भले किया हो कुछ नया गढ़ने में नाकाम रही. सिनेमा निर्माण की दृष्टि से नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई ‘डार्लिंग्स (डार्क कॉमेडी, निर्देशक जसमीत के रीन)’ और ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग (मर्डर मिस्ट्री, निर्देशक वासन बाला)’ बेहतरीन थी जिसकी चर्चा कम हुई. इन दोनों फिल्मों के निर्देशक और अभिनेता (आलिया भट्ट, विजय वर्मा, शेफाली शाह, राजकुमार राव) से नए साल में भी काफी उम्मीद रहेगी.
हिंदी फिल्मों के प्रति एक खास तबके में नकारात्मक भाव भी दिखाई दिया. मनोरंजन के साथ कोई दर्शक किस रूप में सिनेमा को ग्रहण करता है वह उसकी रूचि और सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है. एक खास विचारधारा के तहत सिनेमा को देखने-परखने पर रसास्वादन में बाधा पहुँचती है. आए दिन हिंदी फिल्मों को लेकर सोशल मीडिया पर ‘बॉयकॉट’ की ध्वनि सुनाई देती है वह कला और सिनेमा व्यवसाय दोनों के लिए चिंताजनक है. भूलना नहीं चाहिए कि सिनेमा उद्योग लाखों लोगों के लिए रोजगार का जरिया है जो भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है.
पापुलर से अलग पिछले कुछ सालों में जिन फिल्मों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पसंद किया गया उनमें स्वतंत्र फिल्मकारों की फिल्में ही रही. बजट के अभाव में इस प्रयोगधर्मी फिल्मों का प्रचार नहीं हो पाता, न हीं सिनेमाघरों में ये फिल्में रिलीज हो पाती है. ओटीटी प्लेटफॉर्म और फिल्म समारोह इनके लिए मुफीद हैं. कान फिल्म समारोह में भारत को ‘कंट्री ऑफ ऑनर’ के रूप में शामिल किया गया था. समारोह के फिल्म बाजार में ‘गामक घर’ फिल्म से चर्चित हुए अचल मिश्र की मैथिली फिल्म ‘धुइन (धुंध)’ दिखाई गई.
जहाँ ‘गामक घर’ में निर्देशक का पैतृक घर था, वहीं यह पूरी फिल्म दरभंगा में अवस्थित है. दरभंगा को मिथिला का सांस्कृतिक केंद्र कहा जाता है, पर कलाकारों की बदहाली, बेरोजगारी इस सिनेमा में मुखर है. ‘गामक घर’ की तरह ही इस फिल्म के सिनेमैटोग्राफी में एक सादगी है, जो ईरानी सिनेमा की याद दिलाता है. इन फिल्मों की सफलता ने मैथिली सिनेमा में एक युग की शुरुआत की है. इसी क्रम में प्रतीक शर्मा की ‘लोट्स ब्लूमस’ ने आईएफएफआई में शामिल होकर सुर्खियां बटोरी. अंत में, ऑस्कर में दो डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘ऑल दैट ब्रिद्स (शौनक सेन)’ और द एलीफेंट व्हिस्परर्स' (कार्तिकी गोंसाल्वेस) भी शॉर्टलिस्ट हुई है. आने वाले साल में फीचर के अलावे वृत्तचित्र पर भी लोगों की नजर रहेगी.

Friday, December 23, 2022

पुष्पेंद्र सिंह का सिनेमा संसार: सौंदर्य का संगीत


पिछले महीने युवा फिल्मकार पुष्पेंद्र सिंह ने फेसबुक पर लिखा कि जो दोस्त मुझसे मेरी फिल्मों के बारे में पूछते रहते हैंउनके लिए मेरी फिल्म देखने का मौका मूबी (ऑनलाइन वेबसाइट) पर है. असल में उनकी दो फिल्मोंलजवंती’ (2014) और अश्वात्थामा (2017) के साथ मारु रो मोती’ (2019) डॉक्यूमेंट्री स्ट्रीम हो रही है. पुष्पेंद्र सिंह हमारे समय के एक महत्वपूर्ण फिल्मकार हैं. पुष्पेंद्र की फिल्में देश-विदेश के प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों का हिस्सा भले रही हैपर आम जनता के लिए उसका प्रदर्शन नहीं हो पाया है.

इससे पहले सितंबर-अक्टूबर में न्यूयॉर्क के द म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट (मोमा) में नई पीढ़ी के भारतीय स्वतंत्र फिल्मकारों की जो फिल्में दिखाई गई उसमें लजवंती और लैला और सात गीत (2020) भी शामिल थी. आगरा के नजदीक सैंया कस्बे में जन्मे और राजस्थान में पले-बढ़े, पुष्पेंद्र ने पुणे स्थित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) से अभिनय में प्रशिक्षण लिया और फिर चर्चित फिल्मकार अनूप सिंह (किस्सा और सांग ऑफ स्कॉर्पियंस) के सहायक रहे. अमित दत्ता (हिंदी)गुरविंदर सिंह (पंजाबी)उमेश विनायक कुलकर्णी (मराठी), चैतन्य ताम्हाणे (मराठी) जैसे फिल्मकारों की तरह ही पुष्पेंद्र की फिल्में समकालीन भारतीय सिनेमा और उसकी परंपरा के उज्ज्वल पक्ष को अपनी कला में समाहित करती हैं.

लैला और सात गीत और लजवंती राजस्थान के चर्चित साहित्यकार विजयदान देथा (बिज्जी) की कहानियों पर आधारित है. लैला और सात गीत केंचुली कहानी को आधार बनाती हैलेकिन उसकी कथाभूमि राजस्थान न होकर जम्मू-कश्मीर है. जाहिर है कथाभूमि बदलने से विषय-वस्तु के निरूपण और परदे पर उसके फिल्मांकन में भी बदलाव आया हैहालांकि स्त्री के मनोभावइच्छा, द्वंद और स्वतंत्रता की आकांक्षा सार्वभौमिक है. यहाँ जंगल में एक जलता हुए पेड़ भी है जो वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति को इंगित करता है. पुलिस राजसत्ता का प्रतीक है और लैला कश्मीर का रूपक.

सब जानते हैं कि बिज्जी लोक-कथा को आधुनिक रंग में अपनी कहानियों में ढालने में सिद्धस्थ थे. यही कारण है कि मणि कौल (दुविधा1973), श्याम बेनेगल (चरणदास चोर1975) से लेकर पुष्पेंद्र जैसे युवा फिल्मकार भी उनकी कहानियों की ओर रुख करते रहे हैं. प्रसंगवशएक मुलाकात में जब मैंने मणि कौल से पूछा था कि क्या वे बिज्जी की किसी और कहानी पर फिल्म बनाना चाह रहे थेउन्होंने कहा था कि हांचरण दास चोर पर मैं फिल्म बनाना चाह रहा था पर श्याम ने उस पर फिल्म बना ली थी.

पुष्पेंद्र की पहली फिल्म लजवंती (बिज्जी की इसी नाम से कहानी है) राजस्थान के थार मरुस्थल को केंद्र में रखती है. फिल्म के लैंडस्केप में रेत के धोरोंखेजड़ी का पेड़पवनचक्की का सौंदर्य शामिल है. यहाँ ऊंटबकरी और कबूतर भी लोक में घुले-मिले हैं. घूंघट काढ़े एक शादी-शुदा स्त्री की पितृसत्तात्मक बंधन में जकड़नप्रेम की उत्कट चाह और मुक्ति की चेतना को फिल्म ने खूबसूरत दृश्यों से रचा है. दुविधा की तरह (जहाँ भूत भी एक प्रेमी हो सकता है) लजवंती’ पाठ का अतिक्रमण नहीं करती बल्कि गल्प को बिंबों और ध्वनि के सहारे परदे पर उकेरती है. जिस तरह मणि कौल अपनी फिल्मों में ध्वनि पर खास जोर देते थेउसी तरह पुष्पेंद्र की फिल्मों में ध्वनि का संयोजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. महिलाओं के परिधान में यहां चटक रंगों के इस्तेमाल के साथ सफेद कबूतरों की सोहबत में नायक (पुष्पेंद्र सिंह) का सफेद लिबास अंतर्मन और बहिर्मन के द्वंद्व को उभारने में सहायक है.

भारतीय कला सिनेमा के चर्चित नाम कुमार शहानीमणि कौल की परंपरा में ही पुष्पेंद्र की फिल्में आती हैं. कई दृश्यों के संयोजन में भी इन निर्देशकों का असर दिखाई पड़ता है. उनकी फिल्मों के कई दृश्य देशी-विदेशी पेंटिंग ( भारतीय मिनिएचर और यूरोपीय नवजागरण की पेंटिंग) से भी प्रभावित हैंजिसे पुष्पेंद्र स्वीकारते भी हैं. दोनों ही फिल्मों में लोक गीत-संगीत का प्रयोग फिल्म के विन्यास के साथ गुंथा हुआ है. साथ ही फिल्म में जिस तरह से दृश्य को फ्रेम किया गया है, वह संगीतात्मकता और काव्यात्मकता से ओत-प्रोत है. लैला और सात गीत देखते हुए मणि कौल की सिद्धेश्वरी और कुमार शहानी की 'विरह भरयो घर आंगन कोने वृत्तचित्र की याद आती रही.

जहाँ लाजवंती की भाषा हिंदी और मारवाड़ी है वहीं लैला और सात गीत  में हिंदी और गूजरी का प्रयोग है. लजवंती से हट कर यह फिल्म कहानी के मूल को विस्तार देती है और यहाँ फिल्म में समकालीन राजनीतिक घटनाओं की ध्वनि जुड़ती है. जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस फिल्म के केंद्र में लैला है (कहानी में लाछी) जो अपने पति के साथ रहती है पर उसके मन में एक दुविधा हैउथल-पुथल है. यह प्रेम की अतृप्ता से उपजी है. पर  पूरा होने पर क्या प्रेम बचा रहता है? 

निर्देशक ने कहानी को खानाबदोश जनजाति--बकरवाल के जीवन यथार्थ के बीच अवस्थित किया है. पहाड़, जंगल, बकरे और जीव-जंतुओं के संग बसा घर-परिवार एक ठहराव के साथ लांग शॉट्स के माध्यम से हमारे सामने आता है. लैला का सौंदर्य उसकी वेशभूषा, बोली-वाणी, हाव-भाव में है. निर्देशक ने क्लोज-अप से परहेज किया है.

पति के दब्बूपन के प्रति लैला के स्वाभिमानी व्यक्तित्व में एक तरह का विद्रोह है. पर इस विद्रोह की क्या दिशा होगी इस कहानी में लाछी एक जगह कहती हैऔरतों की इस जिंदगी में वह इस जकड़ से कभी मुक्त होगी कि नहीं?".  फिल्म को क्रमश: सात अध्यायों में बांटा गया है- सांग ऑफ मैरिजसांग ऑफ माइग्रेशनसांग ऑफ रिग्रेटसांग ऑफ प्लेफुलनेससांग ऑफ एक्ट्रैक्शनसांग ऑफ रियलाइजेशन और सांग ऑफ रिनंसीएशन. आखिर में घर-परिवारनाते-रिश्ते को छोड़निर्वसन लैला प्रकृति के साथ एकमेक हो जाती है. मणि कौल की फिल्मों की बालो’, ‘मल्लिका और लच्छी की तरह ही पुष्पेंद्र की फिल्मों की लजवंती (संघमित्रा हितैषी) और लैला (नवजोत रंधावा) अंतर्मन के द्वंद के साथ स्वतंत्रता की चेतना और मुक्ति कामना से लैस है.

 

Sunday, December 11, 2022

टेलीविजन न्यूज चैनल के सितारे: रवीश कुमार का इस्तीफा


हिंदुस्तान में टेलीविजन न्यूज चैनल के 'स्टार एंकर' फिल्म सितारे से कम लोकप्रिय नहीं हैं. असल में, टीवी के पास महज एक परदा है जिसके मार्फत पिछले दो दशक से ये एंकर रोज हमारे ड्राइंग रूम में हाजिर होते रहे हैं. टेलीविजन के एंकरों की एक खास शैली होती है, जो उन्हें विशिष्ट बनाती है. रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित टेलीविजन के चर्चित पत्रकार-एंकर रवीश कुमार जमीनी और लोक से जुड़े मुद्दों को सहज ढंग से चुटीले अंदाज में पेश करते रहे हैं. सत्ता से ईमानदारी से सवाल पूछना भी इसमें शामिल है. पिछले दिनों देश के एक प्रमुख समाचार चैनल एनडीटीवी इंडिया से उन्होंने इस्तीफा दे दिया. इस चैनल से वे करीब पच्चीस वर्षों से जुड़े थे. इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया पर रवीश के प्रति लोगों का प्रेम उमड़ पड़ा. साथ ही मीडिया और पूंजी के गठजोड़ को लेकर भी आलोचना हुई. यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि भले एक एंकर की भूमिका समाचार चैनल में प्रमुख हो, पर जहाँ ‘स्टार वैल्यू’ से उनका कद बढ़ा वहीं टीवी समाचार उद्योग की निर्भरता भी इन पर बढ़ती चली गई. टीआरपी के पीछे आज जो भागदौड़ दिखती है वह भी इसी से जुड़ी हुई है. एनडीटीवी के पूर्व रिपोर्टर संदीप भूषण ने अपनी किताब ‘द इंडियन न्यूजरूम’ में एनडीटीवी के हवाले से स्टार एंकरों के बारे में विस्तार से लिखा है कि किस तरह इनकी वजह से टीवी उद्योग में आज रिपोर्टर की भूमिका सिमट कर रह गई है. किताब में एनडीटीवी की आलोचना भी शामिल है.

जब हम बीस साल पहले पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले रहे थे तब टीवी पत्रकार बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई का जोर था. पिछले दशक में अर्णब गोस्वामी, रवीश कुमार चर्चा में रहे. रवीश अपनी रिपोर्टिंग के लिए जाने गए, लेकिन बाद में वे प्राइम टाइम में ही सिमट कर रह गए. निस्संदेह रिपोर्टर की छवि का उन्हें प्राइम टाइम में लाभ हुआ. वर्ष 2014 में सत्ता बदलने के बाद भी रवीश सत्ता से बेलाग सच कहने के साहस के साथ खड़े रहे. यह हिंदी पत्रकारिता की एक उपलब्धि रही, रवीश उसके अगुआ है.

सोशल मीडिया के कोलाहल के बीच एक बात दबी रह गई, जिसका जिक्र जरूरी है. टेलीविजन मीडिया बड़ी पूंजी की मांग करता है. शुरुआती दौर से मीडिया पूंजीवाद का उपक्रम रहा है. मीडिया पर नजर रखने वाले जानते थे कि एनडीटीवी देर-सबेर कर्ज के बोझ से डूबेगी ही, हालांकि पारदर्शिता की बात करने वाले मीडिया की अर्थव्यवस्था की जानकारी लोगों के सामने कम ही आ पाती है.

मीडिया विशेषज्ञ मार्शल मैक्लुहान ने लिखा है कि ‘माध्यम ही संदेश’ है. पिछले दिनों देश के कई प्रमुख टेलीविजन एंकर टीवी उद्योग से अलग होकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म (यूट्यूब चैनल) पर दिखाई देने लगे हैं. करण थापर, बरखा दत्त, पुण्य प्रसून वाजपेयी, अजीत अंजुम, आरफा खानम शेरवानी, अभिसार शर्मा आदि की लिस्ट में एक नाम और जुड़ गया है, रवीश का. आने वाले समय में यह नया माध्यम लोकतंत्र के लिए क्या संदेश लेकर आता है, यह देखना रोचक होगा.

Wednesday, December 07, 2022

आलाप लेते ऋषिकेश मुखर्जी के अमिताभ

 


पिछले दिनों अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर आनंद फिल्म का जिक्र करते हुए एक वाकया का उल्लेख किया था कि किस तरह उनके लाल होठों’ को लेकर फिल्म निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी सेट पर बिफर पड़े थे. उन्हें लगा था कि अमिताभ ने लिपस्टिक लगा रखी है. यह फिल्म जितना उस दौर के सुपर स्टार राजेश खन्ना के लिए याद की जाती है उतना ही उभरते हुए अदाकार अमिताभ बच्चन के लिए. सही मायनों में व्यावसायिक रूप से सफल इस फिल्म से ही अमिताभ पहचाने गए.

ऋषिकेश मुखर्जी (1922-2006) का यह जन्मशती वर्ष भी है. पिछली सदी के सत्तर के दशक में अमिताभ की जो फिल्में आई उसमें ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘शोले’ आदि ने उन्हें एंग्री यंग मैन’ की छवि में बांध दियाआज यह विश्वास करना मुश्किल होता है कि ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘आनंद’, ‘अभिमान’, ‘नमक हराम’, ‘चुपके चुपके’, ‘मिली’ में भी अमिताभ ही थे. और ये फिल्में उथल-पुथल से भरे सत्तर के दशक में बन रही थी. हालांकि खुद मुखर्जी अमिताभ की स्टारडम  की छवि से खुश नहीं थे. वे कहते थे कि मसाला फिल्मों के निर्देशकों ने अमिताभ को स्टंटमैन’ बना दिया है. असल मेंसाफ-सुथरी और सहज शैली उनके फिल्मों की विशेषता थीजो मारधाड़हिंसा से कोसो दूर रही. परिवार और घर इन फिल्मों के केंद्र में है. ये ऋषिकेश मुखर्जी ही थे जो अमिताभ को शास्त्रीय संगीत प्रेमी के रूप में परदे पर लाने का हौसला रखते थे.

सत्तर के दशक में हिंदी सिनेमा में एक साथ तीन धाराएँ-मेनस्ट्रीमपैरलल और मिडिल प्रवाहित हो रही थी. प्रकाश मेहरामनमोहन देसाई जैसे निर्देशको के साथसमांतर सिनेमा के मणि कौलकुमार शहानी के लिए यह दशक जितना जाना जाता हैउतना ही मुखर्जी की ‘मध्यमार्गी’ फिल्मों के लिए भी.

सिनेमा के अध्येता जय अर्जुन सिंह ने अपनी किताब-द वर्ल्ड ऑफ ऋषिकेश मुखर्जी’ में उल्लेख किया है कि मुख्यधारा के फिल्म निर्देशक मनमोहन देसाई और समांतर सिनेमा के निर्देशक कुमार शहानी दोनों के ही मुखर्जी के साथ सहज रिश्ते थे. यह उनके व्यक्तित्व के उस पहलू को दिखाता है जिसकी स्पष्ट छाप उनकी फिल्मों पर है. इस किताब में वर्ष 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा को याद करते हुए शहानी ऋषि दा के घर (अनुपमा) पर जमावड़े का उल्लेख करते हैं: “वहां सौ-दो सौ युवाअधेड़ फिल्मकारों का जमावड़ा था. हमने आपातकाल का विरोध करते हुए एक पत्र इंदिरा गाँधी के नाम तैयार किया. ऐसा नहीं कि उससे कुछ निकला होपर देश में जो राजनीतिक माहौल था उसे लेकर ऋषि दा बहुत चिंतित थे.” उल्लेखनीय है कि अमिताभ बच्चन-रेखा अभिनीत आलाप (1977)’ फिल्म की असफलता के लिए वे आपातकाल को जिम्मेदार ठहराते थे. मुखर्जी की फिल्मोग्राफी में भी इस फिल्म का जिक्र नहीं होता, लेकिन यह एक उल्लेखनीय फिल्म है जहाँ अमिताभ 'स्टार' छवि से अलग एक अभिनेता के रूप में सामने आते हैं.

इस फिल्म में अमिताभ एक शास्त्रीय संगीत प्रेमी की भूमिका में हैंजो पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर वकालत नहीं करता है. यहाँ वकील पिता (ओम प्रकाश) एक पितृसत्ता के रूप में आते हैं, जिसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है. आलोक (अमिताभ) कहता हैमेरी जिंदगी कोई झगड़े में फंसी जमीन तो नहीं है कि पिताजी कानूनी खेल दिखा कर उसके बारे में जो चाहे फैसला कर लें. ये मुकदमा वो नहीं जीत सकते.” इस फिल्म में एक कलाकार अन्याय के खिलाफ खड़ा है. प्रसंगवशवर्ष 1977 में मनमोहन देसाई की अमर अकबर एंथनी’ फिल्म भी रिलीज हुई थी जो उस साल की सबसे सफल फिल्म रही थी. गीत-संगीत के लिहाज से भी यह एक बेहतरीन फिल्म है. यहाँ ‘आलाप’ लेते अमिताभ ‘एंग्री यंग मैन’ नहीं है बल्कि आलोक हैंइससे पहले ‘अभिमान (1973)’ में वे जया भादुड़ी के साथ एक गायक के रूप में दिखे थे.

70 के दशक में बनी ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्में मध्यवर्ग को संबोधित करती है. ‘चुपके-चुपके’, ‘गोल माल’, ‘गुड्डी’ में हास्य के साथ मध्यवर्गीय ताने-बानेड्रामा को जिस खूबसूरती से उन्होंने रचा हैवह पचास वर्ष बाद भी विभिन्न उम्र से दर्शकों का मनोरंजन करती है. बिना ताम-झाम के कहानी कहने की सहज शैलीसामाजिकता और नैतिकता का ताना-बाना उन्हें समकालीन फिल्मकारों से अलग करता है. मध्यमार्गी सिनेमा के योगदान के लिए मुखर्जी को वर्ष 1999 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उल्लेखनीय है कि आनंद (1971) फिल्म से पहले मुखर्जी दिलीप कुमारराज कपूरदेवानंदगुरुदत्त जैसे अभिनेताओं को निर्देशित कर चुके थे.

मुखर्जी जितने कुशल फिल्म निर्देशक थे उतने की कुशल संपादक भी. उन्होंने विमल रॉय की चर्चित फिल्म ‘दो बीघा जमीन’, ‘मधुमती’ का संपादन किया था. वे विमल रॉय की फिल्मों में सहायक निर्देशक भी थे. वर्ष 1957 में वे पहली फिल्म मुसाफिर के साथ निर्देशन के क्षेत्र में उतरे पर राज कपूर-नूतन अभिनीत ‘अनाड़ी (1959)’ के निर्देशन के साथ उनकी प्रसिद्धि फैलती गई. उन्होंने करीब 40 फिल्मों का निर्देशन किया और वर्ष 1998 में रिलीज हुई 'झूठ बोले कौआ काटेउनकी आखिरी फिल्म थी.

सिंह लिखते हैं कि एक बार सत्तर के दशक में कुमार शहानी ने मुखर्जी से पूछा था कि तकनीक और सिनेमा के अद्यतन सिद्धांतों की जानकारी के बावजूद वे और प्रयोगात्मक चीजों की ओर अग्रसर क्यों नहीं हुए? उन्होंने कहा था कि 'हमारा परिवेश एक सीमा के बाद इसकी इजाजत नहीं देता'. यह कहने में कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि मुखर्जी की फिल्में बॉलीवुड की सीमा का अतिक्रमण कर संभावनाओं का विस्तार करती है. उनकी फिल्मों में जो जिंदगी का फलसफा है वह आज भी दर्शकों को अपनी ओर खींचता है.

Sunday, November 27, 2022

कुमार शहानी का कला संसार


कुमार शहानी कला सिनेमा, जिसे समांतर सिनेमा भी कहा जाता है, के एक प्रतिनिधि फिल्मकार हैं. उनकी ‘माया दर्पण’ (1972), ‘तरंग’ (1984), ‘ख्याल गाथा’ (1989), ‘कस्बा’ (1990), ‘चार अध्याय’ (1997) आदि फिल्मों को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, हालांकि मुख्यधारा के मीडिया में आज उनकी चर्चा नहीं होती है. उल्लेखनीय है कि वर्ष 1972 में रिलीज हुई ‘माया दर्पण’ फिल्म इस वर्ष अपने पचास वर्ष पूरे कर रही है. इस फिल्म को हिंदी में ‘बेस्ट फिल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. इस अवसर पर उनकी फिल्मों का पुनरावलोकन (रेट्रोस्पेक्टिव) जरूरी है, ताकि हिंदी सिनेमा में उनके विशिष्ट योगदान को रेखांकित किया जा सके.

बातचीत में शहानी कहते हैं कि ‘माया दर्पण’ के पचास वर्ष पूरे होने पर दुनिया भर में उनकी फिल्मों के प्रति रूचि दिखाई जा रही है और भविष्य में फिल्म निर्माण को लेकर हॉलीवुड से भी पूछताछ किया जा रहा है. पिछली सदी के 70-80 के दशक में उनके फिल्मों की चर्चा फ्रांस और अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबारों में होती रही. असल में, पुणे फिल्म संस्थान से निर्देशन और पटकथा लेखन में प्रशिक्षित शहानी सिनेमा को उसी तरह विशिष्ट माध्यम के रूप में स्वीकार करते हैं जैसे कि कोई लेखक लेखन को या नाट्यकर्मी रंगमंच को. बिंब और ध्वनि का कुशल संयोजन जैसा उनकी फिल्मों में दिखता है, वह हिंदी सिनेमा के इतिहास में दुर्लभ है.

साठ के दशक में, फिल्म संस्थान में उन्हें फिल्मकार ऋत्विक घटक जैसे गुरु मिले और ‘एपिक फार्म’ से उनका परिचय करवाया, वहीं छात्रवृत्ति लेकर जब वे पेरिस गए तब महान फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां के संग ‘उन फाम डूस (ए जेंटल वूमन, 1969)’ फिल्म में सहायक निर्देशक के रूप में जुड़े. उनकी फिल्मों पर दोनों ही निर्देशकों का असर है, लेकिन फिल्म-निर्माण की शैली उनकी निजी है. यहाँ सौंदर्यशास्त्र और विचारधारा में विरोध नहीं है.

कुछ वर्ष पहले एक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि ‘मैं सौभाग्यशाली था कि ब्रेसां और ऋत्विक घटक जैसे गुरुओं ने मेरा लालन-पालन किया.’ जहाँ ‘माया दर्पण’ फिल्म में तरन के ऊपर ब्रेसां की चर्चित फिल्म ‘मूशेत’ (1967) के केंद्रीय चरित्र की छाप दिखती है, वही ‘मिनिमलिज्म’ का प्रभाव भी. ब्रेसां की फिल्मों में जो मोक्ष या निर्वाण की अवधारणा है, उससे भी वे प्रभावित रहे हैं. रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास ‘चार अध्याय’ पर आधारित फिल्म पर ऋत्विक घटक का असर है.

उनकी सभी फिल्मों में फॉर्म या रूप के प्रति एक अतिरिक्त सजगता और संवेदनशीलता दिखती है. निर्मल वर्मा की कहानी पर आधारित ‘माया दर्पण’ फिल्म में हवेली को जिस तरह फिल्माया गया है वह सामंती परिवेश, केंद्रीय पात्र ‘तरन’ के मनोभावों, एकाकीपन को दर्शाने में कामयाब है. रंगों का कुशल संयोजन इस फिल्म की विशेषता है. वे कहते हैं ‘रंग हमारे होने की खुशबू को परिभाषित करता है.’ ‘माया दर्पण’ से लेकर ‘चार अध्याय’ तक ध्वनि का विशिष्ट प्रयोग उल्लेखनीय है. यह दुर्भाग्य ही है कि इस ‘अवांगार्द’ फिल्मकार को हमेशा संसाधन की कमी से जूझना पड़ा, लेकिन उपभोक्तावादी दौर में अपनी कला से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया.