हिंदी में लुगदी साहित्य की चर्चा गाहे-बगाहे होती है, पर लुगदी सिनेमा का जिक्र नहीं होता. असल में मुख्यधारा (पॉपुलर) और समांतर (पैरलल) के बीच सिनेमा की एक और धारा हिंदी में रही है जिसे ‘पल्प सिनेमा’ कहा जाता रहा है.
Wednesday, January 25, 2023
पल्प की शोधपरक कहानी: सिनेमा मरते दम तक
हिंदी में लुगदी साहित्य की चर्चा गाहे-बगाहे होती है, पर लुगदी सिनेमा का जिक्र नहीं होता. असल में मुख्यधारा (पॉपुलर) और समांतर (पैरलल) के बीच सिनेमा की एक और धारा हिंदी में रही है जिसे ‘पल्प सिनेमा’ कहा जाता रहा है.
Sunday, January 22, 2023
'आरआरआर’ से ऑस्कर की उम्मीद
पैन नलिन की गुजराती फिल्म 'छेल्लो शो' (आखिरी शो) को मार्च में होने वाले 95वें ऑस्कर पुरस्कार के लिए भले ही शॉर्टलिस्ट किया गया हो, लेकिन सबकी नज़र एस एस राजामौली की तेलुगू फिल्म ‘आरआरआर’ पर है. भारत की ओर से ‘छेल्लो शो’ फिल्म ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी’ के लिए आधिकारिक रूप से भेजी गई थी. ‘आरआरआर’ के गाने ‘नाटू-नाटू’ को ‘म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की श्रेणी में शॉर्टलिस्ट किया गया है. गौरतलब है कि अभी तक किसी भी भारतीय फिल्म को ऑस्कर पुरस्कार नहीं मिल सका है, जबकि दुनिया में आज सबसे ज्यादा फीचर फिल्म भारत में ही बनती हैं.
Friday, January 13, 2023
‘गोल्डन ग्लोब’ में नाटू-नाटू की सफलता और विस्मृति में एम एम करीम
तेलुगू फिल्म ‘आरआरआर’ के गाने ‘नाटू-नाटू’ को सर्वश्रेष्ठ ‘ओरिजिनल सॉन्ग-मोशन पिक्चर’ श्रेणी में प्रतिष्ठित ‘गोल्डन ग्लोब’ पुरस्कार मिला है. ‘नाटू नाटू’ के संगीतकार एम. एम. कीरावानी हैं और इसे काल भैरव और राहुल सिप्लिगुंज ने स्वर दिया है. ‘बाहुबली’ फेम के एस एस राजामौली की यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफलता के परचम फहराने के बाद पश्चिमी देशों के फिल्म समारोहों में अपनी दावेदारी पेश कर रही है. मार्च में होने वाले प्रतिष्ठित ऑस्कर पुरस्कार समारोह के लिए भी ‘नाटू-नाटू’ को ‘म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की कैटेगरी में शॉर्टलिस्ट किया गया है.
बॉलीवुड सहित दक्षिण भारतीय सिनेमा में ‘स्टार’ पर इतना जोर रहा है कि समीक्षक गीत-संगीत पर कम ही बात करते हैं, जबकि गीत-संगीत का फिल्मों में केंद्रीय महत्व रहा है. कई फिल्म तो बॉक्स ऑफिस पर असफल होने के बाद भी सिर्फ गीत-संगीत की वजह से ही लोगों के जुबान पर दशकों बाद भी रहती आई है. खुद एम. एम. कीरावानी हिंदी प्रदेश के लिए अपरिचित नाम नहीं है. एम एम करीम नाम से उन्होंने पिछली सदी के नब्बे के दशक में कुछ हिंदी फिल्मों में बेहतरीन संगीत दिया है. ‘तुम मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए (क्रिमनल)’, ‘चुप तुम रहो चुप हम रहें, खामोशी को खामोशी से ज़िंदगी को ज़िंदगी से बात करने दो (इस रात की सुबह नहीं)’, ‘जाने कितने दिनों के बाद गली में आज चांद निकला (जख्म)’ जैसे गीत आज भी लोगों को याद हैं, भले करीम को भूल गए! इस विस्मृति के क्या कारण हैं?
आरआरआर एक ‘एक्शन ड्रामा’ फिल्म है जिसे इतिहास, मिथक के इर्द-गिर्द भव्य स्तर पर रचा गया है. जिस ताम-झाम और तकनीक (वीएफएक्स) कौशल का यह सहारा लेती है उसका इस्तेमाल हॉलीवुड वर्षों से करता रहा है. असल में आरआरआर फिल्म के वितरण और प्रचार-प्रसार ने इसे देश-विदेश के एक बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचाया है. पिछले दिनों लॉस एंजेलिस (अमेरिका) में प्रदर्शन के दौरान इस फिल्म के प्रति लोगों में जो उत्साह था वह सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी रही. पिछले दिनों जर्मनी के एक समाजशास्त्री, प्रोफेसर माइकल बौरमैन ने मुलाकात के दौरान जब आरआरआर के बारे में बातचीत की तो मुझे आश्चर्य हुआ था. हालांकि उनकी दिलचस्पी के केंद्र में फिल्म में जिस तरह से राष्ट्रवाद को परोसा गया है वह थी. इस फिल्म की राजनीति पर बात नहीं होती. फिल्म में अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई के दौरान जिस तरह धार्मिक मिथकों, प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है वह आलोचना से परे नहीं है.
बहरहाल, पिछली सदी में उदारीकरण-भूमंडलीकरण के बाद यह चिंता जताई जा रही थी कि हॉलीवुड, अमेरिकी पॉप म्यूजिक कहीं भारतीय समाज को अपने घेरे में न ले ले. अखबारों-पत्रिकाओं में एमटीवी, विसंस्कृतिकरण के खतरे के बारे में लेख लिखे जा रहे थे. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच में एक भारतीय फिल्म की मौजूदगी और पुरस्कृत होना उल्टी बयार को दिखाता है. भूमंडलीकरण भारतीय फिल्मों के लिए अवसर भी लेकर आया है जहाँ उसकी प्रतिस्पर्धा विश्व के बेहतरीन फिल्मकारों के साथ है.
यहां पर यह नोट करना उचित होगा कि कीरावानी की प्रतिस्पर्धा टेलर स्विफ्ट, रिहाना और लेडी गागा जैसे चर्चित संगीतकारों से थी. ऐसे में उनकी इस जीत को कम कर नहीं आंकना चाहिए. हालांकि संगीत के जानकारों का मानना है कि कीरावानी (करीम) का यह सर्वश्रेष्ठ नहीं है, न ही भारतीय सिने संगीत का सर्वश्रेष्ठ ही है.निस्संदेह एनटीआर जूनियर और राम-चरण ने नाटू-नाटू गाने में डांस के माध्यम से जो ऊर्जस्विता दिखाई है वह लोगों को लुभाता है. इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस गाने को फिल्म से अलग जीवन प्रदान किया है.
हिंदी के कवि और सिनेमा के गहरे जानकार विष्णु खरे ने एक जगह लिखा है: “1950-60 के बाद फिल्म संगीत ने भारतीय युवक-युवतियों की निम्न मध्यवर्गीय भावनाओं को जो अभिव्यक्ति दी है, वह विश्व के किसी भी लोकप्रिय संगीत में मिलना असंभव है.” हिंदी फिल्मों की ही बात करें तो कई ऐसे संगीत निर्देशक हुए हैं जिनके भावपूर्ण गीत-संगीत दशकों से लोगों के दिलों पर राज करती हैं और लोक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. यह अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भारतीय फिल्म संगीतकारों को और बेहतरीन संगीत रचने को प्रेरित करेगा. साथ ही उम्मीद की जानी चाहिए कि बॉलीवुड कीरावानी (करीम) की प्रतिभा का समुचित इस्तेमाल कर पाएगा.
Sunday, January 08, 2023
सिनेमा का सम्मोहन: एक फिल्मकार की स्मृतियों में ‘छेल्लो शो’
सिनेमा का सम्मोहन किसमें होता है? देखने वालों में, जिसे सहृदय कहा जाता है. हालांकि यह सम्मोहन साहित्य या चित्रकला से अलग होता है. सिनेमा संगीत की तरह समय में आबद्ध होता है, पर असल में सिनेमा एक ऐसी कला है जिसमें तकनीक का हस्तक्षेप रहता है. यही कारण है कि तकनीक बदलने के साथ फिल्में पुरानी भी पड़ जाती है. मसलन पचास साल पहले फिल्में भले अच्छी बनी हो लेकिन वह आज हमें उस रूप में आकर्षित नहीं करती जिस रूप में वह रिलीज होने के वक्त थी. अपवाद भले हों. फिल्में हालांकि हमारी स्मृतियों का हिस्सा बनी रहती हैं.
पिछली पीढ़ी के पास सिनेमा देखने के अपने किस्से हैं. हाल ही में टेलीविजन पर ‘खानदान’ (1965) फिल्म देखते हुए माँ ने कहा कि ‘यह फिल्म मेरी शादी के आस-पास रिलीज हुई थी. तुम्हारे पापा ने इसे दरभंगा में देखा था और मुझसे देखने कहा था. मैंने इसे गाँव के पास के कस्बे सकरी के सिनेमा घर में देखा था. उस समय एक रुपए का टिकट होता था.’ अब जब पापा नहीं रहे यह फिल्म माँ की स्मृतियों में नॉस्टेलजिया की तरह आया है. सवाल है कि एक फिल्मकार किस रूप में सिनेमा के साथ अपने संबंध को देखता है? जाहिर है एक निर्देशक पर सिनेमा का जादू आम दर्शक से भिन्न होता है.
पैन नलिन की गुजराती फिल्म 'छेल्लो शो' (आखिरी शो) को ऑस्कर के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है. भारत की ओर से यह फिल्म ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी’ के लिए आधिकारिक रूप से भेजी गई थी. ‘छेल्लो शो’ नौ साल के ऐसे बच्चे की कहानी है जो आगे चल कर एक फिल्मकार बनता है. उस बच्चे के सिनेमा के प्रति सम्मोहन, दुर्निवार आकर्षण को फिल्म खूबसूरत ढंग से चित्रित करती है. एक निश्छलता है यहां.
इस फिल्म से पहले ‘संसार (2001)’ और ‘वैली ऑफ फ्लावर (2006)’ से पैन नलिन की अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत में काफी प्रतिष्ठा मिली थी. दोनों ही फिल्में सेक्स के अकुंठ चित्रण को ले कर दर्शकों के बीच काफी चर्चा में रही थी. ये फिल्में फ्रांस, जापान और जर्मनी के सहयोग से बनी थी, जो पश्चिमी दर्शक वर्ग के लिए बनाई गई प्रतीत होती है. इसके उलट ‘छेल्लो शो’ में एक कस्बाई बच्चा, समय, सिनेमा के जादू में इस कदर गिरफ्तार है कि उसे पढ़ने-लिखने में मन नहीं लगता. गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में वह स्कूल से भाग कर, रेल पकड़ कर नजदीक के कस्बे में सिनेमा देखने आता है. यहाँ उसकी दोस्ती एक प्रोजेक्शनिस्ट (जो प्रक्षेपण के माध्यम से परदे पर सिनेमा दिखाने के लिए जिम्मेदार होता था) से होती है. अपने ‘लंच बॉक्स’ की अदला-बदली से उसे मुफ्त में फिल्म को देखने मिल जाती है. यहाँ वह प्रकाश और फिल्म के खेल को समझता है.
इस फिल्म में रेल का रूपक बार-बार आता है. यहाँ रेल की यात्रा सिनेमा की यात्रा प्रतीत होती है. असल में, यह एक आत्म-कथात्मक फिल्म है. पैन नलिन आज अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्देशक हैं. उनका जन्म गुजरात के एक गाँव में हुआ. पिता रेलवे कैंटीन चलाते थे और उनका बचपन रेलगाड़ी के सानिध्य में बीतता था. सिनेमा बनाने की इच्छा ने उन्हें आगे के अध्ययन के लिए बड़ौदा जाने को प्रेरित किया.
समय (भाविन रबारी) अपने पिता से कहता है: “मैं प्रकाश का अध्ययन करना चाहता हूँ. प्रकाश से वार्ता (स्टोरी) बनती है. और वार्ता से फिल्म.” यह फिल्म जहाँ एक निर्देशक के आत्म का निरूपण है वहीं सिनेमा प्रक्षेपन की तकनीक में आए बदलाव को भी खूबसूरती से दिखाती है. साथ ही रील से गायब होने से एक फिल्मकार की नजर में रंगों की दुनिया कैसी बदली इसे भी आखिर में कलात्मकता के साथ फिल्माया गया है. यहाँ संवाद बेहद कम हैं. सिनेमा का समाज में ‘आर्काइवल’ (संग्रहण) महत्व भी है, ‘छेल्लो शो’ फिल्म यह बखूबी हमारे सामने लेकर आती है.
पिछली सदी के आखिरी दशक में भूमंडलीकरण के साथ आई नई तकनीक ने समाज के हर हिस्से को प्रभावित किया है. सिनेमा पर इसका प्रभाव खास तौर पर पड़ा. न सिर्फ सिनेमा बनाने की तकनीक (सेल्यूलाइड से डिजिटल की यात्रा) को इसने प्रभावित किया है, बल्कि वितरण, सिनेमा देखने-दिखाने को भी. अब सिनेमा देखने के लिए सिनेमाहॉल के बंद कमरे की जरूरत नहीं रही, इसे घर बैठे टेलीविजन, मोबाइल-लैपटॉप पर बार-बार देखा जा सकता है. बार-बार इसे स्ट्रीम किया जा सकता है. ‘छेल्लो’ शो भी सिनेमाहॉल से उतर कर आज नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है. इस फिल्म में प्रोजेक्शनिस्ट फजल समय से कहता है कि ‘भविष्य कहानी कहने वालों की है’. सिनेमा का भविष्य भी बदलते तकनीक से जुड़ा है. कहानी किस रूप में कही जाएगी यह भी भविष्य के गर्भ में है, पर एक बात स्पष्ट है कि कहानी कहने का वही रूप नहीं रह जाएगा जो डिजिटल के पहले था.
यह फिल्म एक तरह से पूर्व के फिल्मकारों को श्रद्धांजलि भी है. अनायास नहीं कि आखिर में हम सत्यजीत रे, गुरुदत्त, फेलिनी, गोदार, आजेंस्टाइन, चार्ली चैपलिन जैसे फिल्मकारों का नाम सुनते हैं. ‘छेल्लो शो’ देखते हुए इटालियन निर्देशक जिएसेपे टोर्नटोर की ऑस्कर विजेता फिल्म ‘सिनेमा पैराडिसो’ (1988) की याद आती है. विषय-वस्तु में समानता भले दिखे, गुजरात का लैंडस्केप, रंग और ध्वनि इस फिल्म को ठेठ भारतीय बनाता है. गुजराती फिल्म का इतिहास भारतीय सिनेमा जितना ही पुराना है, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया में इसकी चर्चा नहीं होती.
Sunday, January 01, 2023
प्रयोगधर्मी युवा फिल्मकारों का सिनेमा
बॉलीवुड और हाल की पापुलर दक्षिण भारतीय फिल्मों की सफलता की पीछे वितरण का तंत्र और प्रचार का भारी योगदान रहा है, जिसका लाभ प्रयोगधर्मी युवा फिल्मकार नहीं उठा पाते हैं. उनके पास प्रचार के लिए बजट नहीं होता. जब अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इन फिल्मकारों की चर्चा होती है, तब ही मुख्यधारा के मीडिया में इन्हें नोटिस लिया जाता है.
Friday, December 30, 2022
वर्षांत 2022: दक्षिण भाषाई फिल्मों के दबदबे में रहा बॉलीवुड
साल के आखिर में खबर आई कि ऑस्कर पुरस्कार के लिए पान नलिन की गुजराती फिल्म 'छेल्लो शो' (आखिरी शो) को शॉर्टलिस्ट किया गया है. भारत की ओर से यह फिल्म ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी’ के लिए आधिकारिक रूप से भेजी गई थी. साथ ही बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाने वाली एसएस राजामौली की ‘आरआरआर’ (तेलुगु) के गाने ‘नाटू-नाटू’ को भी ‘म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की कैटेगरी में शॉर्टलिस्ट किया गया.
Friday, December 23, 2022
पुष्पेंद्र सिंह का सिनेमा संसार: सौंदर्य का संगीत
पिछले महीने युवा फिल्मकार पुष्पेंद्र सिंह ने फेसबुक पर लिखा कि जो दोस्त मुझसे मेरी फिल्मों के बारे में पूछते रहते हैं, उनके लिए मेरी फिल्म देखने का मौका ‘मूबी’ (ऑनलाइन वेबसाइट) पर है. असल में उनकी दो फिल्मों—‘लजवंती’ (2014) और ‘अश्वात्थामा’ (2017) के साथ ‘मारु रो मोती’ (2019) डॉक्यूमेंट्री स्ट्रीम हो रही है. पुष्पेंद्र सिंह हमारे समय के एक महत्वपूर्ण फिल्मकार हैं. पुष्पेंद्र की फिल्में देश-विदेश के प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों का हिस्सा भले रही है, पर आम जनता के लिए उसका प्रदर्शन नहीं हो पाया है.
इससे पहले सितंबर-अक्टूबर में न्यूयॉर्क के ‘द म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट (मोमा)’ में नई पीढ़ी के भारतीय स्वतंत्र फिल्मकारों की जो फिल्में दिखाई गई उसमें ‘लजवंती’ और ‘लैला और सात गीत (2020)’ भी शामिल थी. आगरा के नजदीक सैंया कस्बे में जन्मे और राजस्थान में पले-बढ़े, पुष्पेंद्र ने पुणे स्थित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) से अभिनय में प्रशिक्षण लिया और फिर चर्चित फिल्मकार अनूप सिंह (किस्सा और सांग ऑफ स्कॉर्पियंस) के सहायक रहे. अमित दत्ता (हिंदी), गुरविंदर सिंह (पंजाबी), उमेश विनायक कुलकर्णी (मराठी), चैतन्य ताम्हाणे (मराठी) जैसे फिल्मकारों की तरह ही पुष्पेंद्र की फिल्में समकालीन भारतीय सिनेमा और उसकी परंपरा के उज्ज्वल पक्ष को अपनी कला में समाहित करती हैं.
‘लैला और सात गीत’ और ‘लजवंती’ राजस्थान के चर्चित साहित्यकार विजयदान देथा (बिज्जी) की कहानियों पर आधारित है. ‘लैला और सात गीत’ ‘केंचुली’ कहानी को आधार बनाती है, लेकिन उसकी कथाभूमि राजस्थान न होकर जम्मू-कश्मीर है. जाहिर है कथाभूमि बदलने से विषय-वस्तु के निरूपण और परदे पर उसके फिल्मांकन में भी बदलाव आया है, हालांकि स्त्री के मनोभाव, इच्छा, द्वंद और स्वतंत्रता की आकांक्षा सार्वभौमिक है. यहाँ जंगल में एक जलता हुए पेड़ भी है जो वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति को इंगित करता है. पुलिस राजसत्ता का प्रतीक है और लैला कश्मीर का रूपक.
सब जानते हैं कि बिज्जी लोक-कथा को आधुनिक रंग में अपनी कहानियों में ढालने में सिद्धस्थ थे. यही कारण है कि मणि कौल (दुविधा, 1973), श्याम बेनेगल (चरणदास चोर, 1975) से लेकर पुष्पेंद्र जैसे युवा फिल्मकार भी उनकी कहानियों की ओर रुख करते रहे हैं. प्रसंगवश, एक मुलाकात में जब मैंने मणि कौल से पूछा था कि क्या वे बिज्जी की किसी और कहानी पर फिल्म बनाना चाह रहे थे? उन्होंने कहा था कि ‘हां, चरण दास चोर पर मैं फिल्म बनाना चाह रहा था पर श्याम ने उस पर फिल्म बना ली थी.’
पुष्पेंद्र की पहली फिल्म ‘लजवंती’ (बिज्जी की इसी नाम से कहानी है) राजस्थान के थार मरुस्थल को केंद्र में रखती है. फिल्म के लैंडस्केप में रेत के धोरों, खेजड़ी का पेड़, पवनचक्की का सौंदर्य शामिल है. यहाँ ऊंट, बकरी और कबूतर भी लोक में घुले-मिले हैं. घूंघट काढ़े एक शादी-शुदा स्त्री की पितृसत्तात्मक बंधन में जकड़न, प्रेम की उत्कट चाह और मुक्ति की चेतना को फिल्म ने खूबसूरत दृश्यों से रचा है. ‘दुविधा’ की तरह (जहाँ भूत भी एक प्रेमी हो सकता है) ‘लजवंती’ पाठ का अतिक्रमण नहीं करती बल्कि गल्प को बिंबों और ध्वनि के सहारे परदे पर उकेरती है. जिस तरह मणि कौल अपनी फिल्मों में ध्वनि पर खास जोर देते थे, उसी तरह पुष्पेंद्र की फिल्मों में ध्वनि का संयोजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. महिलाओं के परिधान में यहां चटक रंगों के इस्तेमाल के साथ सफेद कबूतरों की सोहबत में नायक (पुष्पेंद्र सिंह) का सफेद लिबास अंतर्मन और बहिर्मन के द्वंद्व को उभारने में सहायक है.
भारतीय कला सिनेमा के चर्चित नाम कुमार शहानी, मणि कौल की परंपरा में ही पुष्पेंद्र की फिल्में आती हैं. कई दृश्यों के संयोजन में भी इन निर्देशकों का असर दिखाई पड़ता है. उनकी फिल्मों के कई दृश्य देशी-विदेशी पेंटिंग ( भारतीय मिनिएचर और यूरोपीय नवजागरण की पेंटिंग) से भी प्रभावित हैं, जिसे पुष्पेंद्र स्वीकारते भी हैं. दोनों ही फिल्मों में लोक गीत-संगीत का प्रयोग फिल्म के विन्यास के साथ गुंथा हुआ है. साथ ही फिल्म में जिस तरह से दृश्य को फ्रेम किया गया है, वह संगीतात्मकता और काव्यात्मकता से ओत-प्रोत है. ‘लैला और सात गीत’ देखते हुए मणि कौल की ‘सिद्धेश्वरी’ और कुमार शहानी की 'विरह भरयो घर आंगन कोने’ वृत्तचित्र की याद आती रही.
जहाँ ‘लाजवंती’ की भाषा हिंदी और मारवाड़ी है वहीं ‘लैला और सात गीत’ में हिंदी और गूजरी का प्रयोग है. ‘लजवंती’ से हट कर यह फिल्म कहानी के मूल को विस्तार देती है और यहाँ फिल्म में समकालीन राजनीतिक घटनाओं की ध्वनि जुड़ती है. जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस फिल्म के केंद्र में लैला है (कहानी में लाछी) जो अपने पति के साथ रहती है पर उसके मन में एक ‘दुविधा’ है, उथल-पुथल है. यह प्रेम की अतृप्ता से उपजी है. पर पूरा होने पर क्या प्रेम बचा रहता है?
निर्देशक ने कहानी को खानाबदोश जनजाति--बकरवाल के जीवन यथार्थ के बीच अवस्थित किया है. पहाड़, जंगल, बकरे और जीव-जंतुओं के संग बसा घर-परिवार एक ठहराव के साथ लांग शॉट्स के माध्यम से हमारे सामने आता है. लैला का सौंदर्य उसकी वेशभूषा, बोली-वाणी, हाव-भाव में है. निर्देशक ने ‘क्लोज-अप’ से परहेज किया है.
पति के दब्बूपन के प्रति लैला के स्वाभिमानी व्यक्तित्व में एक तरह का विद्रोह है. पर इस विद्रोह की क्या दिशा होगी? इस कहानी में लाछी एक जगह कहती है: औरतों की इस जिंदगी में वह इस जकड़ से कभी मुक्त होगी कि नहीं?". फिल्म को क्रमश: सात अध्यायों में बांटा गया है- सांग ऑफ मैरिज, सांग ऑफ माइग्रेशन, सांग ऑफ रिग्रेट, सांग ऑफ प्लेफुलनेस, सांग ऑफ एक्ट्रैक्शन, सांग ऑफ रियलाइजेशन और सांग ऑफ रिनंसीएशन. आखिर में घर-परिवार, नाते-रिश्ते को छोड़, निर्वसन लैला प्रकृति के साथ एकमेक हो जाती है. मणि कौल की फिल्मों की ‘बालो’, ‘मल्लिका’ और ‘लच्छी’ की तरह ही पुष्पेंद्र की फिल्मों की लजवंती (संघमित्रा हितैषी) और लैला (नवजोत रंधावा) अंतर्मन के द्वंद के साथ स्वतंत्रता की चेतना और मुक्ति कामना से लैस है.
Sunday, December 11, 2022
टेलीविजन न्यूज चैनल के सितारे: रवीश कुमार का इस्तीफा
हिंदुस्तान में टेलीविजन न्यूज चैनल के 'स्टार एंकर' फिल्म सितारे से कम लोकप्रिय नहीं हैं. असल में, टीवी के पास महज एक परदा है जिसके मार्फत पिछले दो दशक से ये एंकर रोज हमारे ड्राइंग रूम में हाजिर होते रहे हैं. टेलीविजन के एंकरों की एक खास शैली होती है, जो उन्हें विशिष्ट बनाती है. रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित टेलीविजन के चर्चित पत्रकार-एंकर रवीश कुमार जमीनी और लोक से जुड़े मुद्दों को सहज ढंग से चुटीले अंदाज में पेश करते रहे हैं. सत्ता से ईमानदारी से सवाल पूछना भी इसमें शामिल है. पिछले दिनों देश के एक प्रमुख समाचार चैनल एनडीटीवी इंडिया से उन्होंने इस्तीफा दे दिया. इस चैनल से वे करीब पच्चीस वर्षों से जुड़े थे. इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया पर रवीश के प्रति लोगों का प्रेम उमड़ पड़ा. साथ ही मीडिया और पूंजी के गठजोड़ को लेकर भी आलोचना हुई. यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि भले एक एंकर की भूमिका समाचार चैनल में प्रमुख हो, पर जहाँ ‘स्टार वैल्यू’ से उनका कद बढ़ा वहीं टीवी समाचार उद्योग की निर्भरता भी इन पर बढ़ती चली गई. टीआरपी के पीछे आज जो भागदौड़ दिखती है वह भी इसी से जुड़ी हुई है. एनडीटीवी के पूर्व रिपोर्टर संदीप भूषण ने अपनी किताब ‘द इंडियन न्यूजरूम’ में एनडीटीवी के हवाले से स्टार एंकरों के बारे में विस्तार से लिखा है कि किस तरह इनकी वजह से टीवी उद्योग में आज रिपोर्टर की भूमिका सिमट कर रह गई है. किताब में एनडीटीवी की आलोचना भी शामिल है.
Wednesday, December 07, 2022
आलाप लेते ऋषिकेश मुखर्जी के अमिताभ
पिछले
दिनों अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर ‘आनंद’ फिल्म का जिक्र करते हुए एक
वाकया का उल्लेख किया था कि किस तरह उनके ‘लाल होठों’ को लेकर
फिल्म निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी सेट पर बिफर पड़े थे. उन्हें लगा था कि अमिताभ ने
लिपस्टिक लगा रखी है. यह फिल्म जितना उस दौर के सुपर स्टार राजेश खन्ना के लिए याद
की जाती है उतना ही उभरते हुए अदाकार अमिताभ बच्चन के लिए. सही मायनों में
व्यावसायिक रूप से सफल इस फिल्म से ही अमिताभ पहचाने गए.
ऋषिकेश
मुखर्जी (1922-2006) का यह जन्मशती
वर्ष भी है. पिछली सदी के सत्तर के दशक में अमिताभ की जो फिल्में आई उसमें ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘शोले’ आदि ने उन्हें ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि में
बांध दिया. आज यह विश्वास करना मुश्किल होता है कि
ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘आनंद’, ‘अभिमान’, ‘नमक हराम’, ‘चुपके
चुपके’, ‘मिली’ में भी अमिताभ ही
थे. और ये फिल्में उथल-पुथल से भरे सत्तर के दशक में बन रही थी. हालांकि खुद
मुखर्जी अमिताभ की ‘स्टारडम’ की छवि से खुश नहीं थे. वे कहते थे कि मसाला फिल्मों
के निर्देशकों ने अमिताभ को ‘स्टंटमैन’ बना दिया है. असल में, साफ-सुथरी और सहज शैली उनके
फिल्मों की विशेषता थी, जो मारधाड़, हिंसा से कोसो दूर रही. परिवार और घर इन फिल्मों के केंद्र में है. ये
ऋषिकेश मुखर्जी ही थे जो अमिताभ को शास्त्रीय संगीत प्रेमी के रूप में परदे पर
लाने का हौसला रखते थे.
सत्तर के
दशक में हिंदी सिनेमा में एक साथ तीन धाराएँ-मेनस्ट्रीम, पैरलल और
मिडिल प्रवाहित हो रही थी. प्रकाश मेहरा, मनमोहन देसाई
जैसे निर्देशको के साथ, समांतर सिनेमा के मणि कौल, कुमार शहानी के लिए यह दशक जितना जाना जाता है, उतना ही मुखर्जी की ‘मध्यमार्गी’ फिल्मों के लिए भी.
सिनेमा के
अध्येता जय अर्जुन सिंह ने अपनी किताब-‘द वर्ल्ड ऑफ ऋषिकेश मुखर्जी’ में उल्लेख
किया है कि मुख्यधारा के फिल्म निर्देशक मनमोहन देसाई और समांतर सिनेमा के
निर्देशक कुमार शहानी दोनों के ही मुखर्जी के साथ सहज रिश्ते थे. यह उनके
व्यक्तित्व के उस पहलू को दिखाता है जिसकी स्पष्ट छाप उनकी फिल्मों पर है. इस
किताब में वर्ष 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा को याद करते हुए शहानी ऋषि दा के घर (अनुपमा) पर जमावड़े का उल्लेख करते हैं: “वहां सौ-दो सौ युवा, अधेड़ फिल्मकारों का जमावड़ा
था. हमने आपातकाल का विरोध करते हुए एक पत्र इंदिरा गाँधी के नाम तैयार किया. ऐसा
नहीं कि उससे कुछ निकला हो, पर देश में जो राजनीतिक
माहौल था उसे लेकर ऋषि दा बहुत चिंतित थे.” उल्लेखनीय
है कि अमिताभ बच्चन-रेखा अभिनीत ‘आलाप (1977)’ फिल्म की
असफलता के लिए वे आपातकाल को जिम्मेदार ठहराते थे. मुखर्जी की फिल्मोग्राफी में भी
इस फिल्म का जिक्र नहीं होता, लेकिन यह एक उल्लेखनीय फिल्म
है जहाँ अमिताभ 'स्टार' छवि से अलग एक
अभिनेता के रूप में सामने आते हैं.
इस फिल्म
में अमिताभ एक शास्त्रीय संगीत प्रेमी की भूमिका में हैं, जो पिता की
इच्छा के विरुद्ध जाकर वकालत नहीं करता है. यहाँ वकील पिता (ओम प्रकाश) एक
पितृसत्ता के रूप में आते हैं, जिसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा
है. आलोक (अमिताभ) कहता है: “मेरी जिंदगी कोई
झगड़े में फंसी जमीन तो नहीं है कि पिताजी कानूनी खेल दिखा कर उसके बारे में जो
चाहे फैसला कर लें. ये मुकदमा वो नहीं जीत सकते.” इस फिल्म
में एक कलाकार अन्याय के खिलाफ खड़ा है. प्रसंगवश, वर्ष 1977 में मनमोहन देसाई की ‘अमर अकबर
एंथनी’ फिल्म भी रिलीज हुई थी जो उस साल की सबसे सफल फिल्म रही थी. गीत-संगीत के
लिहाज से भी यह एक बेहतरीन फिल्म है. यहाँ ‘आलाप’ लेते अमिताभ ‘एंग्री यंग मैन’ नहीं है बल्कि आलोक हैं! इससे पहले ‘अभिमान (1973)’ में वे जया भादुड़ी के साथ एक
गायक के रूप में दिखे थे.
70 के दशक
में बनी ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्में मध्यवर्ग को संबोधित करती है. ‘चुपके-चुपके’,
‘गोल माल’, ‘गुड्डी’ में हास्य के साथ मध्यवर्गीय ताने-बाने, ड्रामा
को जिस खूबसूरती से उन्होंने रचा है, वह पचास वर्ष बाद
भी विभिन्न उम्र से दर्शकों का मनोरंजन करती है. बिना ताम-झाम के कहानी कहने की
सहज शैली, सामाजिकता और नैतिकता का ताना-बाना उन्हें
समकालीन फिल्मकारों से अलग करता है. मध्यमार्गी सिनेमा के योगदान के लिए मुखर्जी
को वर्ष 1999 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उल्लेखनीय है
कि आनंद (1971) फिल्म से पहले मुखर्जी दिलीप कुमार, राज
कपूर, देवानंद, गुरुदत्त
जैसे अभिनेताओं को निर्देशित कर चुके थे.
मुखर्जी
जितने कुशल फिल्म निर्देशक थे उतने की कुशल संपादक भी. उन्होंने विमल रॉय की
चर्चित फिल्म ‘दो बीघा जमीन’, ‘मधुमती’ का
संपादन किया था. वे विमल रॉय की फिल्मों में सहायक निर्देशक भी थे. वर्ष 1957 में
वे पहली फिल्म ‘मुसाफिर’ के साथ निर्देशन के क्षेत्र में
उतरे पर राज कपूर-नूतन अभिनीत ‘अनाड़ी (1959)’ के निर्देशन के साथ उनकी प्रसिद्धि फैलती गई. उन्होंने करीब 40 फिल्मों का
निर्देशन किया और वर्ष 1998 में रिलीज हुई 'झूठ बोले
कौआ काटे' उनकी आखिरी फिल्म थी.
सिंह लिखते हैं कि एक बार सत्तर के दशक में कुमार शहानी ने मुखर्जी से पूछा था कि तकनीक और सिनेमा के अद्यतन सिद्धांतों की जानकारी के बावजूद वे और प्रयोगात्मक चीजों की ओर अग्रसर क्यों नहीं हुए? उन्होंने कहा था कि 'हमारा परिवेश एक सीमा के बाद इसकी इजाजत नहीं देता'. यह कहने में कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि मुखर्जी की फिल्में बॉलीवुड की सीमा का अतिक्रमण कर संभावनाओं का विस्तार करती है. उनकी फिल्मों में जो जिंदगी का फलसफा है वह आज भी दर्शकों को अपनी ओर खींचता है.
Sunday, November 27, 2022
कुमार शहानी का कला संसार
कुमार शहानी कला सिनेमा, जिसे समांतर सिनेमा भी कहा जाता है, के एक प्रतिनिधि फिल्मकार हैं. उनकी ‘माया दर्पण’ (1972), ‘तरंग’ (1984), ‘ख्याल गाथा’ (1989), ‘कस्बा’ (1990), ‘चार अध्याय’ (1997) आदि फिल्मों को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, हालांकि मुख्यधारा के मीडिया में आज उनकी चर्चा नहीं होती है. उल्लेखनीय है कि वर्ष 1972 में रिलीज हुई ‘माया दर्पण’ फिल्म इस वर्ष अपने पचास वर्ष पूरे कर रही है. इस फिल्म को हिंदी में ‘बेस्ट फिल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. इस अवसर पर उनकी फिल्मों का पुनरावलोकन (रेट्रोस्पेक्टिव) जरूरी है, ताकि हिंदी सिनेमा में उनके विशिष्ट योगदान को रेखांकित किया जा सके.
बातचीत में शहानी कहते हैं कि ‘माया दर्पण’ के पचास वर्ष पूरे होने पर दुनिया भर में उनकी फिल्मों के प्रति रूचि दिखाई जा रही है और भविष्य में फिल्म निर्माण को लेकर हॉलीवुड से भी पूछताछ किया जा रहा है. पिछली सदी के 70-80 के दशक में उनके फिल्मों की चर्चा फ्रांस और अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबारों में होती रही. असल में, पुणे फिल्म संस्थान से निर्देशन और पटकथा लेखन में प्रशिक्षित शहानी सिनेमा को उसी तरह विशिष्ट माध्यम के रूप में स्वीकार करते हैं जैसे कि कोई लेखक लेखन को या नाट्यकर्मी रंगमंच को. बिंब और ध्वनि का कुशल संयोजन जैसा उनकी फिल्मों में दिखता है, वह हिंदी सिनेमा के इतिहास में दुर्लभ है.
साठ के दशक में, फिल्म संस्थान में उन्हें फिल्मकार ऋत्विक घटक जैसे गुरु मिले और ‘एपिक फार्म’ से उनका परिचय करवाया, वहीं छात्रवृत्ति लेकर जब वे पेरिस गए तब महान फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां के संग ‘उन फाम डूस (ए जेंटल वूमन, 1969)’ फिल्म में सहायक निर्देशक के रूप में जुड़े. उनकी फिल्मों पर दोनों ही निर्देशकों का असर है, लेकिन फिल्म-निर्माण की शैली उनकी निजी है. यहाँ सौंदर्यशास्त्र और विचारधारा में विरोध नहीं है.
कुछ वर्ष पहले एक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि ‘मैं सौभाग्यशाली था कि ब्रेसां और ऋत्विक घटक जैसे गुरुओं ने मेरा लालन-पालन किया.’ जहाँ ‘माया दर्पण’ फिल्म में तरन के ऊपर ब्रेसां की चर्चित फिल्म ‘मूशेत’ (1967) के केंद्रीय चरित्र की छाप दिखती है, वही ‘मिनिमलिज्म’ का प्रभाव भी. ब्रेसां की फिल्मों में जो मोक्ष या निर्वाण की अवधारणा है, उससे भी वे प्रभावित रहे हैं. रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास ‘चार अध्याय’ पर आधारित फिल्म पर ऋत्विक घटक का असर है.
उनकी सभी फिल्मों में फॉर्म या रूप के प्रति एक अतिरिक्त सजगता और संवेदनशीलता दिखती है. निर्मल वर्मा की कहानी पर आधारित ‘माया दर्पण’ फिल्म में हवेली को जिस तरह फिल्माया गया है वह सामंती परिवेश, केंद्रीय पात्र ‘तरन’ के मनोभावों, एकाकीपन को दर्शाने में कामयाब है. रंगों का कुशल संयोजन इस फिल्म की विशेषता है. वे कहते हैं ‘रंग हमारे होने की खुशबू को परिभाषित करता है.’ ‘माया दर्पण’ से लेकर ‘चार अध्याय’ तक ध्वनि का विशिष्ट प्रयोग उल्लेखनीय है. यह दुर्भाग्य ही है कि इस ‘अवांगार्द’ फिल्मकार को हमेशा संसाधन की कमी से जूझना पड़ा, लेकिन उपभोक्तावादी दौर में अपनी कला से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया.









