Sunday, December 10, 2023

हाशिए की आवाज का संगीत


पिछले दिनों इंडिया हैबिटेट सेंटर के भारतीय भाषाओं के समारोह ‘समन्वय’ का समापन चर्चित रॉक बैंड इंडियन ओशन के कार्यक्रम से हुआ. जब मैं दस वर्ष की कैथी से इस बैंड के बारे में बात कर रहा था तो उसने आश्चर्य से मुझसे कहाइंडियन बैंड! पिछले कुछ वर्षों में भारतीय किशोरों-युवाओं के बीच कोरियन पॉप बैंड खूब चर्चित हुआ हैउसकी भी पसंद के-पॉप है.

पिछली सदी में भारतीय संगीत में कई तरह के प्रयोग और फ्यूजन देखने को मिले. देश में उदारीकरणभूमंडलीकरण की बयार बहीजिसने श्रोताओं का मिजाज बदला. उनकी रुचि भी बदली.  इन्हीं दिनों स्पिक मैके जहाँ स्कूल-कॉलेजों और आम जनों के बीच भारतीय शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देना शुरू कियावहीं कई रॉक और पॉप बैंड उभरे. इनमें से अधिकांश जहाँ आज विस्मृति में है, वहीं इंडियन ओशन टिका हुआ है. इसके क्या कारण हैं?

इंडियन ओशन बैंड के मुख्य गायक और गिटारवादक राहुल राम ने कहा कि यह बैंड अपने 34वें साल में है. गिटार वादक सुष्मित सेन ने असीम चक्रवर्ती के साथ मिल कर दिल्ली में वर्ष 1990 में इस बैंड की स्थापना की थी. वर्ष 199में इंडियन ओशन नाम से पहला एलबम रिकार्ड किया था. राहुल शुरुआती दिनों से इस बैंड से जुड़े रहे हैंहालांकि इस बीच इसके सदस्य बदलते रहे. इस साल इनका नया एलबम तू है रिलीज हुआ हैजिसमें राहुल रामहिमांशु जोशीअमित किलामनिखिल राव का योगदान है. समन्वय के मंच पर भी ये सब कलाकार मौजूद दिखे. प्रसंगवशपिछले दिनों रिलीज हुई विशाल भारद्वाज की फिल्म खुफिया में कबीर और रहीम के पदों को गाते राहुल दिखे थे. उनकी छोटी भूमिका भी इस फिल्म में थी. इंडियन ओशन ने 'पीपली लाइव', 'ब्लैक फ्राइडेजैसी फिल्मों में भी संगीत दिया. मसान’ (2015)  फिल्म के लिए दिया संगीत काफी लोकप्रिय हुआ.

इंडियन ओशन के गीत-संगीत में पारंपरिक लोक धुनों और शब्दों पर जोर रहा है जो आसानी से लोगों की जुबान चढ़े. एक तरफ नथ बेसर बालम मंगवा देमंगवा दे’  जैसे पारंपरिक गानों को उन्होंने गायावहीं लोक धुनों पर माँ रेवा थारो पानी निर्मल, कल कल बहतो जायो रे भी गाया जो खूब चर्चित हुआ था. आईआईटी कानपुर से पढ़े और अमेरिका के कॉर्नेल विश्वविद्यलाय से पर्यावरण इंजीनियरिंग में पीएचडी राहुल खुद नर्मदा आंदोलन से जुड़े हुए थे. इसी तरह इंडियन ओशन ने हिंदी के जनकवि गोरख पांडेय के लिखे गीत जनता के आवे पलटनियाहिल्ले ले झकझोर दुनिया को आम लोगों तक पहुँचाया. युवा छात्रों के बीचआंदोलनों में ये आज भी सुनाई देता है. असल मेंयह बैंड हाशिए के समाज और संघर्षरत जनता की आवाज है.

समन्वय में जब उन्होंने नया गाना आयो रेबाघ आयो रे’ सुनाया तो बरबस केदारनाथ सिंह की कविता बाघ की याद ताजा हो गई. बाघ यहाँ व्यवस्था का रूपक है. बिना बोझिल हुए इस बैंड की पक्षधरता स्पष्ट रही है. जहाँ एक तरफ बैंड में कबीर जैसे क्रांतिधर्मा कवि की झीनी चदरिया सुनाई देती रही है, वहीं युवा कवि वरुण ग्रोवर और अदाकार पीयूष मिश्रा के शब्दों को भी उन्होंने स्वर दिया है. 

Wednesday, November 22, 2023

आम आदमी का नायकत्व: द रेलवे मेन


एक पत्रकार अपने समय का साक्षी होता है. कहानियों, तस्वीरों के माध्यम से वह सामाजिक यथार्थ को सामने लाता है, पर जरूरी नहीं कि उसका यह हस्तक्षेप कारगर ही हो. उसके पास महज कलम की ताकत होती है, जो लोगों की चेतना जगाने में हमेशा सफल नहीं होती.

ऐसी ही एक कहानी राजकुमार केसवानी (1950-2021) की है. भोपाल में जन्मे पत्रकार केसवानी यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में सुरक्षा, लापरवाही को लेकर रिपोर्ट, लेखों के माध्यम से ढाई साल पहले से चेतावनी देते रहे थे जिसकी अनदेखी की गई. सच सुना नहीं गया, नतीजा फैक्ट्री में हुए गैस लीक और भोपाल त्रासदी (1984) के रूप में हुआ जिसमें पंद्रह हजार से ज्यादा लोगों की जान गई. आजाद भारत की यह ऐसी कहानी है जिसका दर्द आज भी सालता है. कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं.
नेटफ्लिक्स पर चार एपिसोड में रिलीज हुई वेब सीरीज ‘द रेलवे मेन’ एक पत्रकार जगमोहन कुमावत (सन्नी हिंदुजा) की आँखों देखी है, जो यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में सुरक्षा की अनदेखी, कारगुजारियों को उजागर करने की कोशिश में लगा है. उसे पुलिस और तंत्र से उपेक्षा हासिल होती है. सीरीज की शुरुआत ही इस सवाल के साथ होती है कि ‘जानते हैं इस देश मे एक जान लेने की सजा क्या है?’ और फुटेज और मीडिया रिपोर्ट के सहारे यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वॉरेन एंडरसन को हिरासत में लिए जाने और फिर छोड़ दिए जाने का विवरण है. इस प्रसंग में यहाँ महात्मा गाँधी के अहिंसा और वर्तमान प्रासंगिकता पर एक टिप्पणी है. वॉयस ओवर के रूप में की गई यह टिप्पणी जितना आम नागरिकों को लक्ष्य है, उतनी ही राजनीतिक सत्ता को भी घेरे में लेती है.
जैसा कि नाम से स्पष्ट है, फैक्ट्री के कारनामों को लेकर कुमावत की पड़ताल के साथ-साथ यह वेब सीरीज भोपाल रेलवे स्टेशन पर घटती है, जहाँ पर स्टेशन मास्टर इफ्तिखार सिद्दीकी (के के मेनन) और उसके सहयोगी इमाद रियाज (बाबिल खान) के साहस, कर्म के प्रति ईमानदारी और सहज मानवीय संवेदनाओं से हम रू-ब-रू होते हैं. शक्तिशाली व्यवस्था की असंवेदनशीलता के उलट आम आदमी के नायकत्व से हम परिचित होते हैं. महाकाव्यों के प्रसंग में जिस धीरोदात्त नायकों का जिक्र होता है, कई बार किताबों से निकल कर वे हमारे सामने आ खड़े होते हैं.
दुनिया भर में हुए औद्योगिक त्रासदियों में भोपाल गैस त्रासदी कुख्यात है. चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट में हुए हादसे को लेकर बनी वेब सीरीज (2019) से यह सीरीज प्रभावित लगती है. साथ ही इस सीरीज से पहले भोपाल गैस लीक और त्रासदी को लेकर फिल्में और वृत्तचित्र सामने आ चुकी हैं, हालांकि आम आदमियों की कहानी कहती यह वेब सीरीज वेदना और मानवीय संवेदना के इर्द-गिर्द बुनी गई है. के के मेनन, बाबिल खान, दिव्येंदु, आर माधवन जैसे कुशल अदाकारों के मार्फत यह हमारे सामने भावपूर्ण ढंग से खुलती है.
इन ‘रेलवे मेन’ ने दो-तीन दिसंबर की भयावह रात अपनी जान पर खेल कर अनेक लोगों की जान बचाई, बिना किसी उम्मीद और अपेक्षा के. कर्तव्यों का समुचित निर्वहन करना उनका एकमात्र ध्येय था. कथानक के साथ उनके निजी जीवन प्रसंग भी लिपटे हुए चले आते हैं.
वेब सीरीज की ज्यादातर घटनाएँ प्लेटफॉर्म पर ही घटती है. सीरीज में दृश्यों के साथ ध्वनियों का कुशल संयोजन है. दूर से आती रेलगाड़ी की आवाज एक उम्मीद है. गोरखपुर-बंबई एक्सप्रेस को भोपाल पहुँचने से रोकने और राहत के लिए ट्रेन के इंतजाम की जद्दोजहद के बीच स्टेशन पर जमा यात्रियों के अंदर व्याप्त भय, असुरक्षा और जीवन-मौत के बीच की पतली डोर को नाटकीयता से बुना गया है. निर्देशक अतिशय भावुकता या मेलोड्रामा में नहीं फंसे है.
यह वेब सीरीज मर्म को छूती है और कहीं बोझिल नहीं हुई है. एक कारण तो यह है कि सीरीज को महज चार एपिसोड में ही खत्म किया गया है और इसे ज्यादा खींचा नहीं गया, जैसा कि वेब सीरीज में हम देखते रहे हैं. इस सीरीज में एक उपकथा इंदिरा गाँधी की हत्या और उसके बाद देश में जो सांप्रदायिक उन्माद फैला उसके सहारे बुनी गई है, जो बहुत प्रभावी नहीं कही जाएगी. यह उप-कथा ट्रेन के अंदर ही घटती है.
'द रेलवे मेन' सीरीज देखते हुए आप प्रोडक्शन (उत्पादन) की गुणवत्ता से काफी प्रभावित होते हैं. चालीस साल पहले के कालखंड को यथार्थपूर्ण ढंग से रचा गया है, पर ऐसा नहीं कि इसमें आत्मा कहीं खो गई हो. यश राज फिल्मस के बैनर के तले बनी इस सीरीज के साथ शिव रवैल ने निर्देशक का दायित्व पहली बार संभाला है और सफल हुए. उत्कृष्ट लेखन और अदाकारों का उन्हें भरपूर सहयोग मिला है.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Friday, November 10, 2023

A Song for Mujib—Shyam Benegal on his Latest Film


The noted filmmaker discusses the syncopation of a happy domestic life for Bangabandhu Sheikh Mujibur Rahman and the tragic flaws of heroes.
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Well-known filmmaker and Dadasaheb Phalke award-winner Shyam Benegal’s biographical movie on Bangladesh’s first president, Sheikh Mujibur Rahman, “Mujib: The Making of a Nation”, was recently released in Bangladesh and India. It was a collaborative project of the Indian and Bangladesh governments. Journalist Arvind Das has spoken with Benegal about the film during the early stages of its making. He caught up with Benegal again after the biopic’s release. They discuss the music in the movie, the all-new experience of directing a film in Bangla, and about how public life can influence character and attitudes. Edited excerpts:
Arvind Das: You directed “The Making of the Mahatma” (1996) and “Netaji Subhash Chandra Bose: The Forgotten Hero” (2005). How difficult was it to direct a biopic on the father of Bangladesh?
Shyam Benegal: Oh, in fact, it was easier [than making the other films]. Mujib’s daughter, Sheikh Hasina, is the present Prime Minister of Bangladesh. So, [I ended up] meeting her and listening to her about her family and particularly about her father, mother and brothers, all of whom were assassinated. This film is about them, so you get to know their political and domestic personas. We get to know them through their relations, roles which outsiders are not likely to know.
AD: “Mujib: The Making of a Nation” was a collaborative project of two nations—the governments of India and Bangladesh. What were the resultant pressures you faced, or were there possibly any red lines drawn by either government when you set about this project?
SB: None, none at all. As a matter of fact, I was told, ‘You make the film the way you perceive, the way you think, and the way you believe.’ I was told I should make the film in the way a character would [ordinarily] develop. And there were enough materials available to do this. Mujib had kept diary notes during his frequent jail sentences and incarceration. He had a kind of literary flair like Jawaharlal Nehru, who wrote three books in jail.
AD: Renowned Malayalam film director Adoor Gopalakrishnan once told me that he could not direct a Hindi film because he did not understand the language well enough and would not be able to direct the actors. You have always made your movies in Hindi/Hindustani. But “Mujib: The Making of a Nation” is originally in Bangla. Did you face difficulty in directing actors?
SB: No, different people think differently. Their perceptions are also different. For me, I never had a problem of this kind. I don’t know Bangla, but I had very, very good language advisors. Like most Indian languages, Bangla also has local idioms. For instance, if you are a Bengali from West Bengal, your idioms are not necessarily the same as those of Bangladesh. You will find that happens with Hindi, too. There is an idiom: language changes according to how you drink water. Say, for instance, Dakkani, spoken by people living in Hyderabad. They always say, ‘Hussain Sagar ka paani peeta hai.’ The Dakkani of Hyderabad is different from that spoken in Mysore.
AD: Although Mujib, the movie, is about the times and struggle of Mujibur Rahman and the birth of a nation, its striking feature is the lilting music and songs. They reminded me of your musical films like “Sardari Begum” (1996) and “Zubeida” (2001). Please tell us about the songs in the movie.
SB: There are three songs in the film. One is the opening sequence, a rural Bhatiyali song, Abujh Majhi, about the wonderful landscape of Bengal, its richness, and so on. The second is a wedding song (Ki Ki Jinish Enecho Dulal). And the third one is a marsiya. When someone of eminence dies, you have a mourning chant in a poetic form known as marsiya. It is about Mujib himself, and the words are, ‘Where have you gone?’
AD: Let us talk some more about Ki Ki Jinish Enecho Dulal. It has different words in Bangla and Hindi. In the Bangla version, there is a reference to Sita’s sindoor (vermillion) and syncretic culture.
SB: This is the song sung for the bride-to-be. The man who will marry her brings sindoor to apply on her maang [parting in the hair] and that sort of thing. It is also a traditional song, sung just before the nuptials. We changed it in the Hindi version, but in the Bengali version, it is the same. Again, this is part of the tradition.
SB: It is doing extremely well and going strong. It opened in 170 cinemas all across Bangladesh. Bangladesh does not have many cinemas, so they are using school halls. They are adding to the number of cinemas in the country. The film has become a runaway hit.
AD: While watching the movie, I felt there was no contradiction or conflict in the character of Mujib. He came across a loving family man…
SB: Unlike a large number of very famous politicians, Mujibur Rahman’s domestic life was not an unhappy one. If you look at other people, for instance, Nehru—he lost his wife very early, and he did not know her too well because he was in jail for most of the time. Even [Mahatma] Gandhi is accused of having neglected his family. His eldest son said as much to him to his face.
These things happen to people who are not only eminent but driven by a certain kind of idealism, as Nehru, Gandhi, and others were. Mujibur Rahman was the same way. But, strangely enough, his rapport with his family was not so alienated. He was very close to his wife and had a happy domestic life, although he was put in jail an umpteen number of times, much like Gandhi and Nehru.
AD: Also, I didn’t find any criticism of the politician, Mujib, even though, before his assassination, he had taken all powers into his hands.
SB: There is a kind of tragic flaw in all heroes. Shakespeare’s plays have that feature, too. So, you have tragic flaws even in Mujib. When you get power, it has a way of alienating you from your people. What happens is that when there is a threat to your life, you create differences around yourself. It means that in some way, your ability to perceive what people are thinking about you [diminishes, or] you will not hear it at all. In other words, you have been insulated from all of that. Also, people around you are not likely to say anything that may make you upset or angry. It happens to all of us; it is not unusual.

(https://www.outlookindia.com/art-entertainment/song-for-mujib-an-interview-with-shyam-benegal-on-his-new-film-weekender_story-330237)

(For Newsclick)

Sunday, November 05, 2023

अपने छात्रों के हवाले से ऋत्विक घटक


आज महान फिल्मकार ऋत्विक घटक (1925-76) का जन्मदिन है. अजांत्रिकमेघे ढाका ताराकोमल गांधारसुवर्ण रेखातिताश एकटि नदीर नाम जैसी उनकी फिल्में भारतीय सिनेमा की थाती है. पर बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने भारतीय सिनेमा की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया, जब वे वर्ष 1965-67 में भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई), पुणे में उप-प्राचार्य के रूप में नौकरी की.

पिछली सदी के 70-80 के दशक में व्यावसायिक फिल्मों से अलग समांतर सिनेमा की धारा को पुष्ट करने वाले फिल्मकार मणि कौल, कुमार शहानी, अडूर गोपालकृष्णन, जानू बरुआ, सईद मिर्जा, जॉन अब्राहम जैसे फिल्मकार खुद को घटक की संतान’ कहलाने में फख्र महसूस करते रहे हैं.

मणि कौल घटक के एपिक फॉर्म से काफी प्रभावित थे. कौल ने मुझे कहा था कि ऋत्विक दा की फिल्मों से आज भी में बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नव-यथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.’ उन्होंने कहा था 'उनकी फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है. वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे. उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाए.'  'मेघे ढाका तारा' फिल्म को छोड़ कर उनकी कोई फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही. 

अन्यत्र एक बातचीत में कौल ने घटक की फिल्मों के प्रसंग में एपिक फॉर्म की चर्चा की है. उन्होंने कहा है कि एपिक फॉर्म मेलोड्रामा के विपरीत होता है. यहाँ आमतौर पर नैरेटिव क्षीण होता है. और हर चरण में इसका विकास होता है जहाँ हमें नए परिप्रेक्ष्य मिलते हैं. न सिर्फ चरित्रों को लेकर बल्कि प्रकृति, इतिहास और विचारों के मामले में भी.

पिछले दिनों एक बातचीत में कुमार शहानी ने मुझे कहा कि 'जब आप मेरी फिल्म चार अध्याय देखेंगे तो ऋत्विक दा आपको भरपूर नजर आएंगे'.  शहानी भी स्वीकार करते हैं कि एपिक फॉर्म से घटक ने ही फिल्म संस्थान में उनका परिचय करवाया था. इसी तरह पुणे फिल्म संस्थान के छात्र रहे फिल्मकार अनूप सिंह की फिल्मों में भी एपिक फॉर्म दिखाई देता है.

सिंह की बेहतरीन फिल्म 'एकटि नदीर नाम' (2002) ऋत्विक घटक को ही समर्पित है.  उन्होंने मुझे ऋत्विक घटक के बारे में बातचीत करते हुए कहा कि फिर से सोचनाफिर से चखनाफिर से छूनाफिर से जीना... क्योंकि हर पल नया है औरअगर आप वास्तव में जीना चाहते हैंतो हर पल आपके जीवन को बदलना होगा. ऋत्विक घटक की फिल्में मुझे यहाँ लेकर आईं.

असमिया फिल्मों के चर्चित निर्देशक जानू बरुआ बताते हैं, मैं जिंदगी में पहली बार ऐसे आदमी (ऋत्विक घटक) से मिला जिसके लिए खाना-पीनासोनाउठना-बैठना सब कुछ सिनेमा था.

ऋत्विक घटक के बिना आज भी फिल्म संस्थान के बारे में कोई भी बात अधूरी रहती है. वर्षों बाद भी उनकी उपस्थिति कैंपस के अंदर महसूस की जा सकती है.सईद मिर्जा जब फिल्म संस्थान (73-76) में थे तब कोर्स के दूसरे वर्ष में ऋत्विक घटक संस्थान आए थे और उन्हें (एक क्लास) पढ़ाया था. सईद और कुंदन शाह (जाने भी दो यारो) सहपाठी थे.

सईद मिर्जा  ने अपनी किताब- आई नो द साइकोलॉजी ऑफ रैट्स’, में लिखा है कि कुंदन ने क्लास के दौरान घटक से पूछा था कि कैसे कोई अच्छा निर्देशक बनता है?' उन्होंने सिनेमा पर टेक्सट बुक पढ़नेतकनीक दक्षता हासिल करने को कहा. साथ ही उन्होंने जोड़ा था कि एक अच्छा निर्देशक एक पॉकेट में अपने बचपने को और दूसरे में शराब की बोतल लेकर चलता है’. फिर घटक ने कुंदन से पूछा कि मेरी बात समझ आईजिस पर कुंदन ने कहा था- यससर. अपने पर विश्वास रखो और सहज ज्ञान (इंट्यूशन) को न छोड़ो’. सईद लिखते हैं कि कुंदन ने बस वही किया!

घटक ढाका में जन्मे थे और विभाजन की त्रासदी को झेला था. उनकी फिल्में बंगाल विभाजन, विस्थापन और शरणार्थी की समस्या का दस्तावेज है. सुवर्णरेखा की कथा विभाजन की त्रासदी से शुरू होती है. फिल्म के आरंभ में ही एक पात्र कहता है 'यहाँ कौन नही है रिफ्यूजी?' ऋत्विक घटक निर्वासन और विस्थापन की समस्या को एक नया आयाम देते हैं. आज भूमंडलीय ग्राम में जब समय और स्थान के फासले कम से कमतर होते चले जा रहे हैं हमारी अस्मिता की तलाश बढ़ती ही जा रही है. ऋत्विक की फिल्में हमारे समय और समाज के ज्यादा करीब है.  घटक अपनी कला यात्रा की शुरुआत में इप्टा’ (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन) से जुड़े थे. वर्ष 1948 में विजन भट्टाचार्य और शंभु मित्रा के प्रसिद्ध नाटक नवान्न से उन्होंने अभिनय की शुरुआत की. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अदूर गोपालकृष्णन घटक के इप्टा की पृष्ठभूमि और संगीत के कलात्मक इस्तेमाल की ओर इशारा करते हैं.

एक गुरु अपने योग्य शिष्यों के माध्यम से भी हमारे सामने आते रहते हैं, फिल्मकार ऋत्विक घटक के बारे में यह कहना बिलकुल सटीक है.

श्याम बेनेगल के मुजीब

 


Monday, October 30, 2023

बंगबंधु मुजीब के जीवन को रचती फिल्म

 


चर्चित फिल्मकार श्याम बेनेगल को ऐतिहासिक, जीवनीपरक विषयों के फिल्मांकन में महारत हासिल है. ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ और ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ जैसी उनकी फिल्में तथा ‘भारत एक खोज’ सीरीज काफी सराही गई. इसी कड़ी में ‘मुजीब-द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ फिल्म है. जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ‘बंगबंधु’ के नाम से चर्चित, बांग्लादेश के प्रथम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री शेख हसीना के पिता, शेख मुजीबुर्रहमान (1920-1975) ‘मुजीब-द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ फिल्म के केंद्र में हैं.

इस फिल्म के संबंध में बात करते हुए बेनेगल ने मुझे कहा था कि ‘ऐतिहासिक विषयों पर आधारित फिल्मों में एक निश्चित मात्रा में वस्तुनिष्ठता का होना जरूरी है’. साथ ही उन्होंने फिल्मकारों की इतिहास के प्रति जिम्मेदारी पर जोर देते हुए आगाह किया था कि बिना वस्तुनिष्ठता के फिल्म ‘प्रोपगेंडा’ बन जाती है. इस लिहाज से यह फिल्म अपने विषय के साथ न्याय करती है. यह दर्शकों को मुजीब के स्कूल-कॉलेज के दिनों, नए पाकिस्तान में बांग्ला भाषा को लेकर हुए आंदोलन, अवामी लीग के गठन और बांग्लादेश राष्ट्र के निमार्ण में संघर्ष को घेरे में लेती है. इससे लिपट कर मुजीब का परिवार, बीवी-बच्चों के साथ उनके संबंध भी सामने आते हैं, जो उनके व्यक्तित्व को आम लोगों के करीब लाता है. नए राष्ट्र बांग्लादेश के निर्माण (1971) में धार्मिक अस्मिता से अलग भाषाई अस्मिता सबसे महत्वपूर्ण अवयव रहा. नए राष्ट्र के लिए हुआ आंदोलन उर्दू राष्ट्रवाद के विरोध में था. असल में, धर्म से अलग भाषा की अस्मिता बांग्लादेश राष्ट्र के निर्माण के लिए शुरुआत से ही जुड़ गई थी.

यह फिल्म भारत और बांग्लादेश के सरकार के सहयोग से बनी है, जिसमें दोनों देशों के कलाकारों का योगदान है. पचास साल पहले बनी ऋत्विक घटक की फिल्म ‘तिताश एकटि नदीर नाम’ (1973) अपवाद ही कही जाएगी, जो इस फिल्म की तरह ही भारत और बांग्लादेश सरकार के संयुक्त परियोजना का हिस्सा थी. वैसे भी हिंदुस्तान और बांग्लादेश की संस्कृति की भूमि एक ही है. अनायास नहीं कि फिल्म में रवींद्रनाथ टैगोर, काजी नजरुल इस्लाम की छवियाँ कई बार दिखाई देती है.

बहरहाल, यह फिल्म मुजीब को एक ऐसे नायक के रूप में परदे पर चित्रित करती है जिसके जीवन में कोई फांक या विरोधाभास नहीं था. उनके चरित्र में कोई द्वंद का न होना फिल्म को एकरस बनाती है, जिससे यह कहीं-कहीं बोझिल हो जाती है. हालांकि बेनेगल ने कहा था कि ‘शेख मुजीब की पृष्ठभूमि गाँधी या नेहरू की तरह नहीं थी. वे धनाढ्य या जमींदार नहीं थे. वे एक काम-काजी शख्स थे और मध्यवर्ग से ताल्लुक रखते थे.’ बांग्लादेश के कलाकार अरिफिन शुभो ने मुजीब के किरदार को बखूबी निभाया है. वे इस फिल्म की जान हैं. मध्यांतर के बाद फिल्म गति पकड़ती है, जब ‘मुक्तिवाहिनी’ योद्धाओ के संघर्ष से हम रू-ब-रू होते हैं. फिल्म में ऐतिहासिक वीडियो फुटेज और तस्वीरों का भी इस्तेमाल किया गया है. शेख मुजीब के भारतीय नेताओं, खासकर इंदिरा गाँधी के साथ मधुर संबंध थे.

मुजीब इस उपमहाद्वीप के एक बेहद खास शख्सियत थे. मुजीब ने एक नए राष्ट्र को जन्म दिया, लेकिन वर्ष 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान की उनके परिवार के ज्यादातर सदस्यों के साथ हत्या कर दी गई. यह फिल्म उनके जीवनवृत्त को संपूर्णता में भले समेटती है, लेकिन यहाँ उनके व्यक्तित्व की आलोचना का अभाव दिखाई देता है. स्वतंत्र बांग्लादेश में उनके शासन के प्रति नागरिक समाज की क्या राय थी? यह फिल्म इस सवाल का जवाब नहीं देती है.

अंत में, इस फिल्म में इस्तेमाल हुए गीत-संगीत की चर्चा जरूरी है. फिल्म का संगीत शांतनु मोइत्रा का है. खास कर रेणु (बेगम फजिलातुन्नेसा) की मुजीब के संग शादी के प्रसंग को लेकर जो लोक गीत का इस्तेमाल किया है वह बेहद खूबसूरत है. इस गीत में कहा गया है कि ‘सीता के लिए कागज पर लिख कर जो सिंदूर भेजा गया है वह सिंदूर लेकर बन्ना आएगा.’ मुस्लिम शादी-विवाह में हिंदू संस्कृति के इस प्रसंग को सुनकर आश्चर्य हो सकता है पर सच है कि सैकड़ों वर्षों से हिंदू-मुस्लिम बांग्लादेश में साथ रहते आए थे. वर्ष 1971 में आजादी के बाद चीजें बदली. प्रसंगवश, मिथिला में शादी के समय वर वालों की तरफ से वधू के लिए जिस कागज में भर कर सिंदूर भेजा जाता है वह मिथिला पेंटिंग (लिखिया) से सजा होता है. कहा जाता है कि सीता की शादी के समय ही राजा जनक ने मिथिला पेंटिंग अपने घर की दीवारों पर करवाई थी, जो परंपरा के रूप में आज भी कायम है. आज जब विभिन्न राष्ट्रों के बीच संघर्ष बढ़े हैं, सिनेमा के माध्यम से दो देशों की संस्कृतियाँ यदि करीब आती है तो इससे अच्छा क्या होगा!

Sunday, October 29, 2023

हिंसा के बीच द्रौपदी के सवाल

 


मशहूर फ्रेंच दार्शनिक रोलां बार्थ ने मिथक के प्रसंग में भाषा के रूपक का इस्तेमाल किया है, जिसका अर्थ इस्तेमाल करने पर ही हमारे सामने स्पष्ट होता है. महाभारत महाकाव्य की ‘द्रौपदी’ एक ऐसी मिथकीय चरित्र है जो लेखकों, कलाकारों को बार-बार अपनी तरफ आकृष्ट करती रही हैं. नए संदर्भों में इस चरित्र की सवर्था नई व्याख्या होती रही हैं. स्त्री विमर्श के इस दौर में द्रौपदी महज द्रुपद की बेटी, पांचाली या पांडवों की पत्नी नहीं है. वह अपनी पहचान और सवालों को लेकर उपस्थित होती है. महाभारत के युद्ध के केंद्र में द्रौपदी का चरित्र है. प्रतिशोध और हिंसा के बीच न्याय का सवाल बार-बार सामने आता है. क्यों द्रौपदी को युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है? क्यों द्रौपदी को अपना पति चुनने का अधिकार नहीं दिया गया? हिंसा के बाद आखिर क्या शांति स्थापित हो पाई?


पिछले दिनों दिल्ली के श्रीराम सेंटर सभागार में युवा नाट्यकर्मियों की संस्था ‘ट्रेजर आर्ट एसोसिएशन’ ने ‘अग्निसुता द्रौपदी’ नाटक का मंचन किया, जिसके केंद्र में द्रौपदी और उसके सवाल ही थे. इस नाटक को युवा रंगकर्मी मोहन जोशी ने लिखा है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित जॉय माईस्नाम और साजिदा की जोड़ी इस नाटक के पीछे थी. जहाँ परिकल्पना और निर्देशन जॉय का था, वहीं मंच पर साजिदा थी. इससे पहले मैंने इस टीम का प्रॉडक्शन-‘तमाशा-ए-नौंटकी’ और ‘अंधा युग’ देखा था और प्रभावित हुआ था.

द्रौपदी के चरित्र के माध्यम से हमारे समय में हिंसा के बीच अपने अस्तित्व और पहचान के सवाल को उठाया गया है. मणिपुर हो यूक्रेन या फिलिस्तीन सब जगह हिंसा के दृश्य दिखाई दे रहे हैं, ऐसे में महाभारत के विभिन्न प्रसंग, चरित्र उभर कर हमारे सामने आ जाते हैं. साथ ही युद्ध और शांति के सवाल भी हमें मथते रहते हैं. क्या महाभारत से हम कोई सबक ले पाएँ हैं?

महाभारत जैसे महाकाव्य को एक निश्चित समयावधि में मंच पर कुशल रूप में प्रस्तुत करना किसी भी निर्देशक के लिए एक चुनौती है. इस नाटक को देखते हुए लगता रहा है कि दृश्य बहुत तेजी से मंच पर घटित हो रहे हैं और अभिनेता हड़बड़ी में हैं. फिर भी इस नाटक के कई दृश्यों का संयोजन बेहद कुशलता से किया गया था और वे आकर्षक थे. चौसर के खेल और द्रौपदी को दांव पर लगाने के प्रसंग के लिए निर्देशक ने सवर्था नई युक्ति का सहारा लिया है. इसमें मिजोरम के प्रसिद्ध बांस नृत्य की झलक दिखाई देती हैं. खुद जॉय मणिपुर के हैं. महाभारत के विभिन्न प्रसंगों को निर्देशक ने बेहद कम साजो-सामान के साथ मंच पर प्रस्तुत किया. अवतार साहनी की प्रकाश परिकल्पना नाटक के अनुकूल थी.

दिल्ली या देश किसी भी शहर में आज व्यावसायिक थिएटर करना आसान नहीं है. संसाधनों के अभाव में गैर पेशवर या नौसिखुए कलाकारों से ही अभिनय करवाना पड़ता है. इस नाटक में भी युवा नाट्यकर्मियों के जुनून मंच पर दिखाई दे रहे थे, लेकिन उन्हें अभी और अभ्यास और कला के प्रति समर्पण की जरूरत है.

Friday, October 20, 2023

Celebrating A Classic: Mani Kaul's Duvidha

 


In June 2010, when I was attending the Film Appreciation course at the Film and Television Institute of India (FTII), Pune, avant-garde film director Mani Kaul came for a valedictory lecture and interacted with us. The coordinator of the course, Professor Suresh Chabria, introduced Mani as ‘‘the best film director of our time.’’ Many of us in the batch had not seen Kaul’s movies as they were not easily available. I remember during our course his documentary Siddheshwari was screened at the Film Archives auditorium and we were mesmerised by its form and aesthetics. It felt like we were watching a long poem gently unfold on celluloid.

 I wanted to talk with Mani about his movies but unfortunately, he passed away a year later in Gurgaon. Recently, while watching his movie Duvidha (Dilemma) again, I remembered a long meeting which I had, when he was the creative director of Osian Film Festival in Delhi, in 2006. I was doing my Ph.D research at Jawaharlal Nehru University (JNU) at that time and Mani talked to me like a friendly teacher. Besides being an auteur, he was a great teacher as well.

During our conversation at a hotel lobby in Delhi, he remarked self-depreciatingly, “Mujhse zyada extreme mein bahut kam log gaye, jitni bhi filmein banayi saari flop” (Very few people went to the extreme I did; all of my films flopped). It’s a pity that his films didn’t get box-office release but they won national and international awards and were screened at film festivals worldwide. With the digital revolution his films have become available online for interested viewers. Many young film-makers from FTII swear by his name. Avant-garde contemporary film-makers like Amit Dutta, Gurvinder Singh and Pushpendra Singh’s movies are influenced by his aesthetics and minimalistic style.

Mani Kaul is hailed as a pioneer of the parallel cinema movement in India. After graduating from the Film Institute, Pune, where he was ace dir­ector Ritwik Ghatak’s favourite pupil, he directed Uski Roti (1969) based on a short story of the same name by Hindi fiction writer Mohan Rakesh. It is known for its formalist experimentation in New Indian Cinema. Later, he made Ashad ka Ek Din (1971) based on Rakesh’s eponymous play, and Duvidha (1973). His first colour feature film, Duvidha, which is now fifty years old, asks for critical engagement afresh, particularly when Bollywood is witnessing the emergence of a new kind of woman on screen. Duvidha is adapted from famous Rajasthani writer Vijaydan Detha’s folk tale of the same name.

It’s interesting to note that almost all of Kaul’s feature films are based on Hindi literature. He said, “I think and write in Hindi only.” Among his earlier three films named above, Duvidha is the most accomplished and nuanced work that he directed. The film revolves around a newly-wed young woman named Lachhi (Raisa Padamsee), whose husband (Ravi Menon) leaves for a business tour without consummating their marriage. The son of a Baniya (merchant), he is more concerned about the khata-bahi (ledger) than the beauty of his bride. In the husband’s absence, a ghost impersonates the husband and starts living with the bride. Although enamoured by the young beauty, the ghost doesn’t hide his identity from her. Lachhi doesn’t resist the relationship. Does she have any agency? In the course of time, a child is born to her and the ghost. Subsequently, the husband also returns to the haveli. Finally, in accordance with the justice meted out by a shepherd, the ghost is imprisoned in a leather bag and thrown into a well and thus the dilemma is resolved. Is it really resolved though? No one asks about the wishes and desires of the woman. The film is a feminist tale about agency and the choices available to women. Through its unique non-linear narrative style, the film treads between the real and the imaginary. In the short story, Detha writes, “Kahin ye dulhan ke mann ka hi bhoot tho nahi tha, jo sakar roop dhar kar prakat hua?” (Was the ghost the bride’s imagination?).

Speaking before the screening of Siddheshwari in his characteristic humorous style, Mani had remarked, ‘‘If you don’t get a few points, don’t fret over it. It’s not that important.’’ Mani’s story-telling technique always asks for the audience’s active participation. He emphasised that a movie is an amalgamation of image and sound and should be read in that way only.

We find women protagonists waiting in different time/space in three of his movies. Be it Balo (Uski Roti), Mallika (Ashad ka Ek Din) or Lachhi (Duvidha). When I asked him about the ‘waiting’ in his films he said, ‘‘This waiting takes us away from experiential/empirical time, when even one minute can be an hour.’’ Later, he told me when he was learning classical music (he was an accomplished Dhrupad singer) that he used to feel this very strongly in the interval of Sam and Visham.

In Mani’s films, landscape is very important. Duvidha was shot in Detha’s village, Borunda (Rajasthan). Born in Jodhpur, Mani was familiar with this landscape. Also, he was very much immersed in Indian poetics and aesthetics, in particular, he emphasised dhwani (sound), which gets reflected in his movies. While seeing Duvidha, the way he captures the beauty of the veiled Lachhi (Raisa Padamsee) in the palanquin, the ancient Maithili court poet Vidyapati comes to mind, “Sundari tu mukh mangal data” (O, beautiful lady your face is auspicious). It has been said that the images in this film resemble miniature paintings. Talking about the colour (red) and form (object-landscape), film director and Mani’s colleague Kamal Swaroop recalls famous painter—and Raisa’s father—Akbar Padamsee calling him Mani’s ‘Guru’. In fact, during 1969-72, Mani Kaul and Kumar Shahani, who made Maya Darpan (1972) based on Nirmal Verma’s short story, were part of Padamsee’s Inter Art Vision Exchange Workshop in Bombay. Padamsee lent his support to the movie and it was financed by Film Finance Corporation of India (FFC). Here, it’s pertinent to note that the cinematography of this movie was done by multi-faceted artist Navroze Contractor who passed away recently in a road accident.

Mani talked to me about the influence of film-makers like Robert Bresson, Andrei Tarkovsky and artist Henri Matisse. He said, “I still learn a lot from Ritwik da. He took me out of the neorealist stream.” Despite various influences, the ‘space’ in which Mani created his art is very personal, which can be felt in every shot and frame of his films. He emphasised ‘svabhava’ (nature/temperament). Mani’s films are not only influenced by painting but by literature, music and architecture too. Even in his later phase, he made a film on famous Hindi writer Vinod Kumar Shukla’s Naukar ki Kameez (The Servant’s Shirt) and was planning to make Khilega toh Dekhenge (Will See When it Blossoms) into a movie. He also wanted to direct Detha’s story ‘Charandas Chor’ but Shyam Benegal had already adapted it into a movie.

Mani always struggled to raise funds for his movies. Even today, when we talk to young independent film-makers they too bemoan the lack of resources. In a recent interview, Pushpendra Singh, who made Lajwanti (The Honour Keeper) and Laila aur Satt Geet (The Shepherdess and the Seven Songs), said to me, “We can expand on our style and vision, but our aesthetics are determined by the constraints in which we work.” Mani’s films are testament to those constraints; however, he aspired to create the best out of meagre means. When Duvidha was released, renowned film-maker Satyajit Ray was very critical of the movie in his essay titled ‘Four and a Quarter.’ However, fifty years later, its aesthetics and form are still discussed among young film-makers and millennial audiences alike. Singh said he too wanted to make a film on Duvidha but Mani had already made the movie, so he chose Detha’s ‘Kenchuli’ to make Lajwanti. He called it an ode to Mani Kaul.

(For Outlook magazine, 21st Oct 2023)

Wednesday, October 18, 2023

वहीदा रहमान: सिनेमा के सौंदर्य का सम्मान


वहीदा रहमान को सिनेमा में योगदान के लिए इस वर्ष का प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिया गया है. भले वर्ष 1969 में देविका रानी से इस पुरस्कार की शुरुआत हुईलेकिन लगभग पचास सालों के इतिहास में महज छह अभिनेत्रियों को ही इस पुरस्कार से नवाजा गया है.

 वर्ष 1955 में तेलुगू फिल्म रोजुलू माराई’ के एक गाने में वहीदा रहमान पहली बार पर्दे पर दिखी. उस गाने पर फिल्मकार गुरुदत्त की नजर पड़ी और वे उन्हें मायानगरी (मुंबई) खींच लाए. वर्ष 195में ‘सीआईडी’ फिल्म से शुरू हुआ उनका सफर जारी है. उन्होंने अब तक करीब 90 फिल्मों में काम किया है. 

उम्र के 85 वर्ष पूरी कर चुकी वहीदा इस साल प्रयोगधर्मी निर्देशक अनूप सिंह की फिल्म द सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियंस में नज़र आई थीं. उनकी कई ऐसी फिल्में हैंजिन पर हिंदी सिनेमा को नाज है. पिछली सदी के पचास-साठ के दशक में आईं प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘चौदहवीं का चाँद’, ‘साहब बीवी और गुलाम’, ‘गाइड’, ‘तीसरी कसम’, ‘खामोशी फिल्में आज क्लासिक मानी जाती है और रोजी’, ‘हीराबाई’, ‘गुलाबो’, ‘शांति’ राधा’ जैसे किरदार आज भी याद किए जाते हैं.

वैसे तो अपने फिल्मी करियर में उन्होंने सबसे ज्यादा फिल्में देवानंद के साथ कीजिनकी जन्मशती मनाई जा रही है, पर शुरुआती दौर की फिल्मों की सफलता का श्रेय वे गुरुदत्त को देती हैं. अपनी सिनेमाई यात्रा के बारे में वे कहती हैं: “मेरा करियर शुरु से ही बहुत अच्छा रहा. मुझे कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा और सब कुछ अच्छा होता गया. ऊपर वाले की बहुत दया थी.”  

वहीदा रहमान के करियर में विजय आनंद (गोल्डी) निर्देशित ‘गाइड’ (1965) का स्थान सबसे ऊपर है.. राजू (देवानंद) और रोजी (वहीदा रहमान) के बीच प्रेम संबंध को यह फिल्म जिस अंदाज और फलसफे से प्रस्तुत करती हैवह इसे समकालीन बनाता हैयह फिल्म मशहूर लेखक आर के नारायण के इसी नाम से लिखे उपन्यास पर आधारित है.

आज 21वीं सदी के भारत में स्त्रियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में पिछली सदी के पचास-साठ के दशक की अपेक्षा बहुत परिवर्तन हुए हैं. सिनेमा भी इस बदलाव को अंगीकार कर रहा हैलेकिन साठ के दशक में एक विवाहित स्त्री के अन्य पुरुष के साथ संबंध को पर्दे पर दिखाना सिनेमा की परंपरा के विपरीत था. 'गाइड' में एक विवाहित स्त्री एक पुरुष के साथ लिव-इन में रहती है, जो  अपनी पहचान और स्वतंत्रता को लेकर काफी सचेत है. वहीदा स्वीकार करती हैं कि रोजी का किरदार उनके व्यक्तित्व के करीब है. वे कहती हैं कि रोजी को पता है कि वह क्या चाहती है और स्पष्ट बोलती है.

प्रसंगवश, ‘गाइड उपन्यास पर मशहूर फिल्मकार सत्यजीत रे भी फिल्म बनाना चाह रहे थे. जब वहीदा बांग्ला फिल्म ‘अभीजान (1962)’ में उनके साथ काम कर रही थीं तब उन्होंने इस बात की चर्चा की थी. पर बाद में फिल्म बनाने के अधिकार देवानंद ने खरीद लिए थे और यह फिल्म नवकेतन’ के बैनर तले बनी. वे कहती हैं कि ‘ऐसा लगता है कि रोजी मेरे लिए ही लिखी गई थी. सत्यजीत बनाएँ या देवानंद,  करना मुझे ही था. गाइड की तरह ही फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम पर बनी तीसरी कसम (1966) भी हीरामन (राजकपूर) और हीराबाई (वहीदा) की असफल प्रेम कहानी हैजिसकी चर्चा आज भी होती है.

हिंदी सिनेमा में कहानीगीत-संगीत की केंद्रीय भूमिका रही है. ‘मेलोड्रामा अभिनेता-अभिनेत्री सहारे ही पर्दे पर मूर्त होता है. उनके माध्यम से ही पर सिनेमा देखते-परखते हैं. ऐसे में इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि ‘गाइड’  और तीसरी कसम’ फिल्म का सौंदर्य रोजी’ और ‘हीराबाई’ के इर्द-गिर्द है. फिल्म का गीत-संगीत जिस किरदार से जुड़ा है वह एक नर्तकी है. खुद वहीदा भरतनाट्यम में प्रशिक्षित हैं. जब मैंने उनसे पूछा कि किस तरह उन्होंने एक साथ रोजी और हीराबाई के किरदार के लिए खुद को तैयार कियातो उन्होंने कहा कि एक आर्टिस्ट के रूप में हमें समझना पड़ता है कि हीराबाई गाँव की नौटंकी करती है. उसका डांस करने का अंदाज अलग है. यह क्लासिकल नहीं है. वहीं रोजी प्रोफेशनल स्टेज डांसर है.’ सिनेमा में आने से पहले वे मंच पर अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन करती थीं. वहीदा अपने वालिद के कहे इस बात को याद करती हैं कि हुनर नहीं खराब होता हैआदमी खराब होता है. आप जिस तरह पेश आते हैं उस तरह प्रोफेशन का नाम होता है.

वहीदा ने अपनी प्रतिभा के बूते देश-विदेश में खुद का और हिंदी सिनेमा का नाम रोशन किया.  अभी तक हम अभिनेताओं के नजरिए से ही हिंदी फिल्मों को परखते रहे हैंवहीदा रहमान के किरदारोंभाव-अभिनय की रोशनी में उनकी फिल्मों को देखना-परखना सिनेमा के पारखियों और प्रेमियों के लिए आज भी रोचक है.