Monday, August 28, 2023

पाकिस्तानी खुफिया समाज के पाखंड पर एक टिप्पणी: जिंदगी तमाशा

 

पिछले दिनों यूट्यूब पर रिलीज हुई पाकिस्तानी फिल्म ‘जिंदगी तमाशा’ को लेकर सोशल मीडिया पर काफी टीका-टिप्पणी दिखी. असल में, सरमद खूसट निर्देशित इस फिल्म को लेकर मीडिया में चर्चा रही है. चार साल पहले प्रतिष्ठित बुसान फिल्म समारोह में इसका प्रीमियर हुआ था. साथ ही इस फिल्म को पाकिस्तान की तरफ से 93 वें ऑस्कर पुरस्कार के लिए भेजा गया था. बावजूद इसके सेंसरशिप और विरोध के कारण सिनेमाघरों में इसे रिलीज नहीं होने दिया गया. हार-थक कर निर्देशक ने यूट्यूब पर रिलीज करना मुनासिब समझा. सरहदों के पार जाकर यह फिल्म काफी सराही जा रही है.

इस फिल्म के केंद्र में एक अधेड़ पुरुष राहत ख्वाजा (आरिफ हसन) हैं. वे एक रियल एस्टेट एजेंट हैं, जिनकी गाने में अभिरुचि है. उन्हें सभा-समारोहों में नात गाने के लिए बुलाया जाता है. घर में वे बिस्तर पर बीमारी से जूझ रही अपनी बीवी फरखंदा (सामिया मुमताज) की सेवा-सुश्रुषा करते हैं. उनकी एक शादी-शुदा बेटी, सदाफ (इमान सुलेमान), है जो बराबर घर आती-जाती रहती है. यह फिल्म लाहौर में अवस्थित है.

जिस तरह से राहत अपनी बीवी की देखभाल करते हैं, वह पुरुष प्रधान समाज में काम-काज को लेकर लैंगिक विभाजन है उस पर सवाल खड़े करती है. मध्यवर्गीय परिवार के ताने-बाने से बुनी यह कहानी पाकिस्तानी समाज में व्याप्त पाखंड पर चोट करती है.

राहत एक धार्मिक पुरुष हैं. एक दोस्त के बेटे की शादी के अवसर पर वे एक पुराने गाने-जिंदगी तमाशा बनी (पाकिस्तान की चर्चित फिल्म नौकर वोटी दा (1974) से लिया गया है) पर डांस करते हैं. समारोह में बैठा एक शख्स इसे मोबाइल पर रिकॉर्ड कर लेता है, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है. घर-परिवार के सदस्यों के आपसी रिश्तेसामाजिक संबंध इससे किस तरह प्रभावित होते हैंइसे निर्देशक ने बेहद सधे ढंग से फिल्म में दिखाया है. साथ ही राहत के बहाने पाकिस्तानी खुफिया समाज की झलकियाँ यहाँ दिखाई देती है. हर कोई एक-दूसरे पर नजर रखे हुआ है. जहाँ निजता, स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं है.

सवाल यह भी है सोशल मीडिया के इस दौर में निजता/गोपनीयता (प्राइवेसी) क्या कोई मायने रखता हैफिल्म के एक दृश्य में सदाफ जो देर रात सोते वक्त मोबाइल स्क्रॉल कर रही होती है, उससे राहत कहते हैं-सो जाओ कल ऑफिस भी जाना है.’ सिनेमा एक स्तर पर जहाँ मानवीय संबंधों के इर्द-गिर्द है, वहीं दूसरे स्तर पर तकनीक का मानवीय जिंदगी में दखल या मध्यस्थता को लेकर भी है. फिल्म की शुरुआत ही राहत की एक रिकॉर्डिंग से होती है. साथ ही रिकॉर्ड किए मैसेज के माध्यम से ही उनसे माफी मांगने को कहा जाता है, जहाँ उनकी झड़प एक मौलाना से होती है. वे रिकॉर्डिंग से इंकार कर देते हैं. सिनेमा में मौलाना के चरित्र को जिस रूप में दिखाया गया है उसे लेकर ही पाकिस्तान में विवाद हुआ था.

प्रसंगवश, विभाजन के बाद लाहौर पाकिस्तान के सिनेमा का केंद्र बन कर उभरा, लेकिन उसका विकास बॉलीवुड की तरह नहीं हुआ. खास कर पिछले सदी में पाकिस्तान के शासक जनरल जिया उल हक के समय में सिनेमा, गीत-संगीत को लेकर काफी पाबंदी हुई, जिससे सिनेमा उद्योग लुढक गया. बॉलीवुड के दीवाने वहाँ मौजूद है. 

21वीं सदी में कुछ युवा निर्देशकों की वजह से पाकिस्तानी सिनेमा में एक सुगबुगाहट सी हुई है. पिछले दशक में रिलीज हुई पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिएरामचंद पाकिस्तानीबोल आदि के प्रशंसक हिंदुस्तान में भी काफी है. साथ ही, पाकिस्तानी फिल्म जॉयलैंड’ को पिछले साल95वें ऑस्कर पुरस्कार में, ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म’ के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था. प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में इसे ‘उन सर्टेन रिगार्ड’ में प्रदर्शित किया गया जहाँ ज्यूरी पुरस्कार मिला था. विभिन्न फिल्म समारोहों में ‘जॉयलैंड’ ने सुर्खियाँ बटोरी लेकिन आम भारतीय दर्शकों के लिए यह फिल्म उपलब्ध नहीं थी. पिछले दिनों अमेजन प्राइम (ओटीटी) पर इसे रिलीज किया गया. 

यह दोनों फिल्में पाकिस्तान में भले रची-बसी हैलेकिन कहानी भारतीय दर्शकों के लिए जानी-पहचानी है. ‘जिंदगी तमाशा’ की तरह ही ‘जॉयलेंड’ के केंद्र में भी लाहौर में रहने वाला एक परिवार है. बेहद संवेदनशीलता से निर्देशक ने राहत के मनोभावों, पीड़ा और कमजोरियों को फिल्म में उकेरा है. आरिफ हसन राहत के किरदार में बेहद विश्वसनीय हैं. धार्मिक उसूलों वाले राहत के दकियानूसी विचार- मसलन, समलैंगिक रिश्तों को लेकर, सिनेमा में मुखर है. लाहौर के परिवेश, बाजार, गली-मोहल्ले को सूक्ष्मता और कुशलता से निर्देशक ने सिनेमा में समाहित किया है. सैम सादिक, सरमद खूसट जैसे युवा निर्देशकों से पाकिस्तानी सिनेमा को काफी उम्मीद है.

सिनेमा या किसी कला के लिए जिस स्वतंत्रता या सामाजिक खुलेपन की हालांकि दरकार है, वह पाकिस्तान में सिरे से गायब है. सिनेमा एक निर्देशक की आत्माभिव्यक्ति है. मुख्य किरदार राहत की तरह ही सरमद को भी प्रताड़ित किया गया. दुखद रूप से उनकी जिंदगी कला का अनुसरण करती दिखती है!  

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Sunday, August 20, 2023

पुराने गाने नए रंग में


 पिछले दिनों रिलीज हुई रॉकी और रानी की प्रेम कहानी फिल्म चर्चा में है. मनोरंजक शैली में बनी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाई भी अच्छी कर रही है. शाहरुख खान की पठान के बाद करण जौहर की इस फिल्म ने दर्शकों को सिनेमाघरों की ओर आकर्षित किया है.

एक फिल्म की व्याख्या कई स्तरों पर होती है. इस फिल्म को भी समीक्षक कई तरीकों से देख-परख रहे हैं. कहा जा रहा है कि अपने पच्चीस साल के फिल्मी करियर में पहली बार जौहर की इस फिल्म में राजनीतिक स्वर उभरे हैं. स्त्री-पुरुषों के संबंध में आ रहे बदलाव को भी यह फिल्म बखूबी पकड़ती है, साथ ही नृत्य कला को जेंडर के चश्मे से देखने पर भी सवाल उठाया गया है.

हिंदी सिनेमा पॉपुलर संस्कृति के माध्यम से समाज के एक बड़े तबके की भावनाओं, आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करता रहा है. बॉलीवुड में जहाँ कथा तत्व  हमेशा हावी रहता आया है, वहीं गीत-संगीत की भूमिका कम नहीं है. अपवाद छोड़ दिया जाए तो गीतकार-संगीतकार की बात समीक्षक कम ही करते है. पर जैसा कि चर्चित फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने लिखा है: ‘इंडियन टॉकी फिल्मों ने बोलने से पहले ही गाना शुरु कर दिया था. इंदर सभा (1932) फिल्म में 70 गाने थे. बहरहाल, इस फिल्म की कहानी में हिंदी सिनेमा के पुराने गीत-संगीत को बेहद खूबसूरती से बुना गया है. फिल्म की शुरुआत में रॉकी (रणवीर सिंह) और रानी (आलिया भट्ट) के ऊपर फिल्माए गाने- रायबरेली के बीच बजारी जब हुस्न दिखाने जाएगी...’ में रानी मोहक अदा से रॉकी से पूछती है व्हाट झुमका? असल में, अमिताभ भट्टाचार्य ने इस गाने को भले लिखा हो, एक तरह से यह गाना मेरा साया (1966) फिल्म के सदाबहार गाने झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में’ को श्रद्धांजलि है. मदन मोहन के धुनों को संगीतकार प्रीतम ने सुरक्षित रखा है.

इसी तरह से फिल्म में पुरानी पीढ़ी के किरदारों की कहानी हम दोनों (1961) फिल्म में साहिर लुधियानवी के लिखे गाने अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं के माध्यम से कही गई है. साथ ही गाइड (1965)’ फिल्म के गाने आज फिर जीने की तमन्ना है और कुर्बानी (1980) के बेहद लोकप्रिय गाने आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए, तो बात बन जाए’ का भी बखूबी इस्तेमाल किया गया है. नाजिया हसन के गाए इस डिस्को की धूम आज भी सुनाई देती है. पाकिस्तान की नाजिया उस वक्त महज पंद्रह वर्ष की थी, जब उन्हें इस गाने के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजा गया. ऐसा नहीं कि रॉकी और रानी की प्रेम कहानी में में मूल गाने नहीं है, लेकिन पुराने गाने की तासीर फिल्म को एक अलग खुशबू देती है.

सौ सालों में चर्चित हुए हर फिल्मी गानों की एक अलग कहानी है. पीढ़ियों की स्मृतियों को इन गानों ने सुरक्षित रखा है. रानी का सवाल व्हाट झुमका असल में नयी पीढ़ी से है. ये पुराने गाने एक दौर की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थिति को स्वर देने के साथ ही आधुनिक पीढ़ी की प्रेम कहानी भी कहते आए है.

Tuesday, August 15, 2023

पीढ़ियों के साथ सिनेमा का सफर


सिनेमा के बिना आधुनिक भारत की कल्पना नहीं की जा सकती है. सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का यह अभिन्न हिस्सा है. हाल में रिलीज हुई करण जौहर की फिल्म रॉकी और रानी की प्रेम कहानी में किरदार फिल्मी गानों के सहारे ही स्मृतियों और सपनों को जीते हैं. जीवन भी तो स्मृतियों, इच्छाओं और सपनों का ही पुंज है.

याद कीजिए हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पंचलाइट में भी गोधन मुनरी को देखकर सलीमा का गाना गाता है- हम तुमसे मोहब्बत करके सलम..’.  सिनेमा विभिन्न कलाओं-साहित्यसंगीतअभिनयनृत्यपेंटिगस्थापत्य को खुद में समाहित किए हुए है. जनसंचार का माध्यम होने के नाते और पॉपुलर संस्कृति का अंग होने से सिनेमा का प्रभाव एक बहुत बड़े समुदाय पर पड़ता है. जाहिर है, आजाद भारत में बॉलीवुड ने देश को एक सूत्र में बांधे रखने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है.

आजादी के तुरंत बाद सरकार ने भी देश में सिनेमा के प्रचार-प्रसार में रुचि ली. आज देश में हिंदीमराठी, बांग्लातमिलतेलुगूमलयालमअसमियाभोजपुरीमैथिलीमणिपुरी समेत लगभग पचास भाषाओं में फिल्म का निर्माण होता है. आश्चर्य नहीं कि आज दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्म का उत्पादन भारत में ही होता हैलेकिन जहाँ बॉलीवुड की फिल्मों की चर्चा होती हैअन्य क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में समीक्षकों की नजर से ओझल ही रहती हैं.

भले बॉलीवुड के केंद्र में कारोबारमनोरंजन और स्टार’ का तत्व होलेकिन ऐसा नहीं कि पिछले सत्तर सालों में सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ से इसने नजरें चुराई हैं. इन दशकों में सामाजिक प्रवृत्तियों को सिनेमा ने परदे पर चित्रित किया. खासकरपिछले दशकों में भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बाद तकनीक और बदलते बाजार ने इसे नए विषय-वस्तुओं को टटोलनेसंवेदनशीलता से प्रस्तुत करने और प्रयोग करने को प्रेरित किया है.

पिछली सदी के पचास और साठ के दशक की रोमांटिक फिल्मों में आधुनिकता के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण के सपनों की अभिव्यक्ति मिलती है. पचास-साठ के दशक की फिल्मों मसलन आवारादो बीघा जमीननया दौरमदर इंडियाप्यासा, मुगले आजमसाहब बीवी और गुलाम, गाइड आदि ने हिंदी सिनेमा को एक मजबूत आधार दिया. इस दशक की फिल्मों पर नेहरू के विचारों की स्पष्ट छाप है. दिलीप कुमार इसके प्रतिनिधि स्टार-अभिनेता के तौर पर उभरते हैं. हालांकि राज कपूरदेवानंदगुरुदत्त जैसे अभिनेताओं की एक विशिष्ट पहचान थी.

पचास के दशक में पाथेर पांचाली के साथ सत्यजीत रे का आविर्भाव होता हैजिनकी फिल्मों के बारे में चर्चित जापानी फिल्मकार अकीरा कुरोसावा ने कहा था- 'सत्यजीत रे की फिल्मों को जिसने नहीं देखामानो वह दुनिया में बिना सूरज या चाँद देखे रह रहा है'. आजादी के बाद करवट बदलते देशपरंपरा और आधुनिकता के बीच की कश्मकश इन फिल्मों में मिलती है. रे के समकालीन रहे ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों का मुहावरा और सौंदर्यबोध रे से साफ अलग था. जहाँ घटक की फिल्में मेलोड्रामा से लिपटी थी वहीं सेन की फिल्मों के राजनीतिक तेवरप्रयोगशीलता ने आने वाली पीढ़ी के फिल्मकारों को खूब प्रभावित किया. सेन का सौंदर्य बोध रे से अलहदा था. वे कलात्मकता के पीछे कभी नहीं भागे. रे की गीतात्मक मानवता’ भी उन्हें बहुत रास नहीं आती थीसाथ ही ऋत्विक घटक के मेलोड्रामा से भी उनकी दूरी थी

साठ के दशक में पुणे में फिल्म संस्थान की स्थापना हुई जहाँ से अडूर गोपालकृष्णनमणि कौलकुमार शहानीकेतन मेहता, सईद मिर्जाजानू बरुआगिरीश कसरावल्लीजॉन अब्राहम जैसे फिल्मकार निकले जिन्होंने विभिन्न भाषाओं में सिनेमा को मनोरंजन से अलग एक कला माध्यम के रूप में स्थापित किया.

सत्तर के दशक में सिनेमा नक्सलबाड़ी आंदोलन’ की पृष्ठभूमि से होते हुए युवाओं के मोहभंगआक्रोश और भ्रष्टाचार को अभिव्यक्त करता है. जंजीरदीवार जैसे फिल्मों के साथ अमिताभ बच्चन इस दशक के प्रतिनिधि बन कर उभरे. हालांकि सत्तर-अस्सी के दशक में देश-दुनिया में भारतीय समांतर सिनेमा की भी धूम रही. आक्रोशअर्धसत्य, जाने भी दो यारोमंडी जैसी फिल्मों की चर्चा हुई. असल मेंभारतीय सिनेमा में शुरुआत से ही पॉपुलर’ के साथ-साथ पैरेलल’ की धारा बह रही थीपर इन दशकों में पुणे फिल्म संस्थान (एफटीआईआई) से प्रशिक्षित युवा निर्देशकोंतकनीशियनों के साथ-साथ नसीरुद्दीन शाहओम पुरीशबाना आज़मीस्मिता पाटिल जैसे कलाकार उभरे. सिनेमा सामाजिक यथार्थ को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करने लगा. सिनेमा साहित्य के करीब हुआ. मणि कौलकुमार शहानीअडूर गोपालकृष्णन की फिल्में इसका उदाहरण हैंजहाँ निर्देशक की एक विशेष दृष्टि दिखाई देती है. हम कह सकते हैं कि समांतर सिनेमा का सफर 21वीं सदी में भी जारी हैभले स्वरूप में अंतर हो. अनूप सिंहगुरविंदर सिंहअमित दत्ता जैसे अवांगार्द फिल्मकार इसी श्रेणी में आते हैं.

नब्बे के दशक में उदारीकरण और भूमंडलीकरण के बाद देश में जो सामाजिक-आर्थिक बदलाव हुए उसे शाहरुखसलमानआमिर खानअक्षय कुमारअजय देवगन की फिल्मों ने पिछले तीन दशकों में प्रमुखता से स्वर दिया हैं. यकीननबॉलीवुड मनोरंजन के साथ-साथ समाज को देखने की एक दृष्टि भी देता है.

कोई भी कला समकालीन समय और समाज से कटी नहीं होती है. हिंदी सिनेमा में भी आज राष्ट्रवादी भावनाएं खूब सुनाई दे रही है. आजादी के तुरंत बाद बनी फिल्मों में भी राष्ट्रवाद का स्वर थाहालांकि तब के दौर का राष्ट्रवाद और आज के दौर में जिस रूप में हम राष्ट्रवादी विमर्शों को देखते-सुनते हैं उसके स्वरूप में पर्याप्त अंतर है. यह एक अलग विमर्श का विषय है.

तकनीक क्रांति के इस दौर में मनोरंजन की दुनिया में सामग्री के उत्पादन और उपभोग के तरीकों में काफी बदलाव आया है. एक आंकड़ा के मुताबिक भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म का बाजार सब्सक्रिप्शन सहित करीब दस हजार करोड़ रुपए का हैजो इस दशक के खत्म होते-होते तीस हजार करोड़ तक पहुँच जाएगा. बॉलीवुड और सिनेमाघरों को ओटीटी प्लेटफॉर्म से चुनौती मिल रही है. साथ ही संभावनाओं के द्वार भी खुले हैं. यहाँ नए विषयों के चित्रण के साथ प्रयोग की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं. न सिर्फ दर्शक बल्कि बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशक और कलाकारों की नज़र भी इस बढ़ते हुए बाजार पर टिकी है. 

पिछले दशक में भारत आर्थिक रूप से दुनिया में शक्ति का एक केंद्र बन कर उभरा हैलेकिन जब हम सांस्कृतिक शक्ति (सॉफ्ट पॉवर) की बात करते हैं सिनेमा ही नज़र आता है. यह भारतीय सिनेमा की सफलता है.

Monday, August 14, 2023

पुराने गाने नए रंग में: व्हाट झुमका?

 


शाहरुख खान की फिल्म ‘पठान’ के बाद करण जौहर की फिल्म ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ ने दर्शकों को सिनेमाघरों की ओर आकर्षित किया है. आम बॉलीवुड की फिल्मों की तरह मनोरंजक शैली में बनी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाई भी अच्छी कर रही है, जबकि इसे ‘ओपेनहाइमर’ और ‘बार्बी’ जैसी हॉलीवुड की फिल्मों से टक्कर है.

बॉलीवुड के फिल्मों की व्याख्या कई स्तरों पर होती है. इस फिल्म को भी समीक्षक कई तरीकों से देख-परख रहे हैं. कहा जा रहा है कि अपने पच्चीस साल के फिल्मी करियर में पहली बार जौहर की इस फिल्म में राजनीतिक स्वर उभरे हैं. स्त्री-पुरुषों के संबंध में आ रहे बदलाव को भी यह फिल्म बखूबी पकड़ती है, साथ ही नृत्य कला को ‘जेंडर’ के चश्मे से देखने पर भी सवाल उठाया गया है. यथार्थ और फैंटेसी के बीच फिल्म आवाजाही करती रहती है.
मेरे लिए इस फिल्म की एक खूबी पुराने फिल्मी गानों का का इस्तेमाल है, जिसे निर्देशक ने कहानी में खूबसूरती से बुना है. ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ में किरदार फिल्मी गानों के सहारे ही स्मृतियों और सपनों को जीते हैं. जीवन भी तो स्मृतियों, इच्छाओं और सपनों का ही पुंज है. याद कीजिए हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की कहानी ‘पंचलाइट’ में भी गोधन मुनरी को देखकर ‘सलीमा’ का गाना गाता है- ‘हम तुमसे मोहब्बत करके सलम..’.
बॉलीवुड में जहाँ कथा तत्व हमेशा हावी रहता आया है, वहीं गीत-संगीत की भूमिका कम नहीं है. जैसा कि चर्चित फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने लिखा है: ‘इंडियन ‘टॉकी’ फिल्मों ने बोलने से पहले ही गाना शुरु कर दिया था. इंदर सभा (1932) फिल्म में 70 गाने थे.’ हिंदी सिनेमा अगर समाज के एक बड़े तबके की भावनाओं, आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करता रहा है तो इसमें सिनेमा के गीत-संगीत की बड़ी भूमिका रही है. गहन वेदना, एकाकीपन या प्रेम के क्षणों में अनायास फिल्मी गाने मुँह से निकल पड़ते हैं. अपवाद छोड़ दिया जाए तो आजकल गीतकार-संगीतकार की बात समीक्षक कम ही करते है. साहिर लुधियानवी, शकील बदायुनी, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मजरूह सुल्तानपुरी, गुलजार के बाद आनंद बक्षी, जावेद अख्तर, इंदीवर, समीर जैसे गीतकारों से होते हुए गीतों की परंपरा वर्तमान पीढ़ी तक पहुँची है.
बहरहाल, इस फिल्म की शुरुआत में रॉकी (रणवीर सिंह) और रानी (आलिया भट्ट) के ऊपर फिल्माए गाने- ‘रायबरेली के बीच बजारी जब हुस्न दिखाने जाएगी...’ में रानी मोहक अदा से रॉकी से पूछती है, ‘व्हाट झुमका’? असल में, अमिताभ भट्टाचार्य ने इस गाने को भले लिखा हो, एक तरह से यह गाना ‘मेरा साया (1966)’ फिल्म के सदाबहार गाने ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में’ (राजा मेंहदी अली खान) को श्रद्धांजलि है. मदन मोहन के लोक धुनों को संगीतकार प्रीतम ने सुरक्षित रखा है. प्रसंगवश, भट्टाचार्य आज की पीढ़ी के समर्थ गीतकार हैं, जिन्हें राष्ट्रीय समेत कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है.
इसी तरह से फिल्म में पुरानी पीढ़ी के किरदारों की कहानी ‘हम दोनों (1961’) फिल्म में साहिर लुधियानवी के लिखे गाने ‘अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं’ के माध्यम से कही गई है. साथ ही ‘गाइड (1965)’ फिल्म के गाने ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ (शैलेंद्र) और ‘कुर्बानी (1980)’ के बेहद लोकप्रिय गाने ‘आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए, तो बात बन जाए’ (इंदीवर/बिड्डू) का भी बखूबी इस्तेमाल किया गया है. नाजिया हसन के गाए इस ‘डिस्को’ की धूम आज भी सुनाई देती है. पाकिस्तान की नाजिया उस वक्त महज पंद्रह वर्ष की थी, जब उन्हें इस गाने के लिए ‘फिल्म फेयर’ पुरस्कार से नवाजा गया. ऐसा नहीं कि ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी में’ में मूल गाने नहीं है, लेकिन पुराने गाने की तासीर फिल्म को एक अलग खुशबू देती है.
पिछले 75 सालों में चर्चित हुए हर फिल्मी गानों की एक अलग कहानी है. पीढ़ियों की स्मृतियों को इन गानों ने सुरक्षित रखा है. पाँच साल पहले आई किताब ‘नोट बाय नोट’ में बेहतर ढंग से आजादी के बाद हिंदी फिल्मों की संगीत यात्रा को आजाद भारत की कहानी से जोड़ कर देखा गया है. खैर, ‘प्रीटी लेडी’ रानी का सवाल ‘व्हाट झुमका’ असल में नयी पीढ़ी से है.
ये पुराने गाने एक दौर की सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परिस्थितियों को स्वर देने के साथ ही आधुनिक पीढ़ी की प्रेम कहानी भी कहते आए हैं. गौर करने वाली बात है कि रानी का सवाल हिंदी या उर्दू में नहीं है, बल्कि 'हिंग्लिश' में है, जो उदारीकरण के बाद शहरी मध्यवर्गीय (धनाढ्य) हिंदुस्तानियों की भाषा बन कर उभरी है.

Friday, August 11, 2023

‘जॉयलैंड’ जहाँ पितृसत्ता प्रतिपक्ष की भूमिका में है



दक्षिण एशिया में बॉलीवुड का इतना दबदबा है कि अन्य फिल्म उद्योगों की चर्चा नहीं होती. भूटान की फिल्म ‘लुनानाए यॉक इन द क्लास रूम’ को 94वें ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था. यह अलग बात है कि इसे सफलता नहीं मिली पर कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इसे सम्मानित किया गया है. इसी तरह पाकिस्तान की फिल्म ‘जॉयलैंड’ को पिछले साल95वें ऑस्कर पुरस्कार में, ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म’ के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था. यह फिल्म भी ऑस्कर जीतने में सफल नहीं हुईपर प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में इसे ‘उन सर्टेन रिगार्ड’ में प्रदर्शित किया गया जहाँ ज्यूरी पुरस्कार मिला था. इस फिल्म के निर्माताओं में  हैदराबाद की अमेरिका में रहने वाली भारतीय अपूर्व गुरु चरण भी शामिल हैं.

भारतीय मीडिया में पाकिस्तान की चर्चा जब भी होती है खबरें आतंकवाद या राजनीतिक उथल-पुथल से ही जुड़ी रहती है. साहित्यसंस्कृति या सिनेमा अमूमन गायब ही रहते आए हैं. फरवरी में पाकिस्तान के चर्चित अदाकार और उर्दू साहित्य को लयात्मक और अपने सस्वर पाठ से चर्चित करने वाले जिया मोहिउद्दीन की जब मौत हुई तब भारतीय मीडिया में उनकी चर्चा बेहद कम हुई जबकि हिंदुस्तान में भी उनके चाहने वाले (खास कर फैज की नज्म पढ़ने की वजह से) बहुत  हैं. प्रसंगवशपाकिस्तान के युवा निर्देशक उमर रियाज की एक डॉक्यूमेंट्री- कोई आशिक किसी महबूब से जिया मोहिउद्दीन को लेकर बनाई हैजिसकी काफी चर्चा भी हुई.

बहरहालविभिन्न फिल्म समारोह में पाकिस्तानी फिल्म ‘जॉयलैंड’ ने सुर्खियाँ बटोरी लेकिन आम भारतीय दर्शकों के लिए यह फिल्म उपलब्ध नहीं थी. पिछले महीने अमेजन प्राइम (ओटीटी) पर इसे रिलीज किया गया. सैम सादिक ने इसे निर्देशित किया हैफिल्म में सलमान पीरसरवत गिलानीरस्ती फारूक और अली जुनैजो सहित ट्रांसजेंडर अभिनेता अलिना खान की प्रमुख भूमिका है.

भले ही यह फिल्म पाकिस्तान में रची-बसी हैलेकिन कहानी भारत समेत दक्षिण एशिया के दर्शकों के लिए जानी-पहचानी है. फिल्म के केंद्र में लाहौर में रहने वाला एक परिवार है. इस परिवार का मुखिया एक विधुर है जिसके दो बेटे और बहुएँ हैं. परिवार को एक पोते की लालसा है. बड़ी बहु की तीन बेटियाँ हैं. छोटा बेटा (हैदर) जो बेरोजगार है उसकी नौकरी एक ‘इरॉटिक थिएटर कंपनी’ में लग जाती है. वहाँ वह एक ट्रांसजेंडर डांसर (बीबा) का सहयोगी डांसर होता है. धीरे-धीरे वह उसकी तरफ वह आकर्षित होता है. घर में छोटे बेटे की बहु (मुमताज) की नौकरी छुड़वा दी जाती है. घुटन और इच्छाओं के दमन से उसका व्यक्तित्व खंडित हो जाता है.

यह फिल्म घर-परिवार के इर्द-गिर्द हैपर किरदारों की इच्छा-आकांक्षा से लिपट कर लैंगिक राजनीतिस्वतंत्रता और पहचान का सवाल उभर कर फिल्म में सामने आता है. चाहे वह घर का मुखिया होउसका बेटा होबहु हो या थिएटर कंपनी की डांसर बीबा. फिल्म में एक संवाद है-मोहब्बत का अंजाम मौत है! सामंती परिवेश में प्रेम एक दुरूह व्यापार हैबेहद संवेदनशीलता के साथ निर्देशक ने इसे फिल्म में दिखाया है.

यह फिल्म अपने विषय-वस्तु का जिस कुशलता से निर्वाह करती है उसी कुशलता से परिवेशभावनाओं और तनाव को भी उकेरती है. ट्रांसजेंडर की पहचान और अधिकार को लेकर मीडिया में बहस होने लगी है. सिनेमा भी इससे अछूता नहीं है. फिल्म में अलिना खान ने ट्रांसजेंडर डांसरबीबा की भूमिका विश्वसनीय ढंग से निभाई है. सादिक की शॉर्ट फिल्म डार्लिंग (2019) में उन्होंने अभिनय किया था. 'जॉयलैंडएक तरह से ‘डार्लिंग’ का विस्तार है. इस वर्ष मई में लाहौर में अलिना खान को मिस ट्रांस पाकिस्तान’ से सम्मानित किया गया.

फिल्म में कोई विलेन नहीं है. पितृसत्ता यहाँ प्रतिपक्ष की भूमिका में है. सवाल बहुत सारे हैंजवाब कोई नहीं. ऐसे में रास्ता नजर नहीं आता. नाम जॉयलैंड हैपर यहाँ खुशी के क्षण रेगिस्तान में पानी की बूंद की तरह हैं- अप्राप्य. इस बोझिल वातावरण को निर्देशक ने सहजता से बुना है. इसमें उन्हें कलाकारों का काफी सहयोग मिला है. 

फिल्म के कई दृश्य जेहन में रह जाते हैं. एक ऐसा ही दृश्य फ्लाईओवर पर बीवा का कट-आउट लिएस्कूटर के पीछे सीट पर बैठे हैदर का है.

निर्देशक ने जबरन अपने विचारों को दर्शकों के ऊपर थोपा नहीं है. न ही फिल्म में किसी तरह का उपदेश या प्रवचन ही दिया गया हैजैसा कि आम तौर पर बॉलीवुड की फिल्मों में हम देखते हैं. फिल्म एक प्रवाह में आगे बढ़ती है. बिंबों के सहारे कई बातें मुखरता से कहीं गई है. युवा निर्देशक सादिक की यह पहली फिल्म हैजहाँ वे संभावनाओं से भरे नज़र आते हैं.


Tuesday, August 08, 2023

पायरेसी के खिलाफ पहल


 सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में सिनेमैटोग्राफ संशोधन विधेयक के बारे में जोर देकर कहा कि फिल्म उद्योग को इस बिल से आने वाले सौ-दो सौ सालों तक पायरेसी से मुक्ति मिलेगी. संसद के दोनों सदनों से इस विधेयक को मंजूरी मिल गई है.

मनोरंजन और राष्ट्र-निर्माण में सिनेमा जैसे जनसंचार माध्यम की महत्ता को समझते हुए आजादी के तुरंत बाद सरकार ने सिनेमा के प्रचार-प्रसार में रुचि ली थी. इसी उद्देश्य से वर्ष 1949 में सिनेमा उद्योग की वस्तुस्थिति की समीक्षा के लिए जवाहरलाल नेहरू ने फिल्म इंक्वायरी कमेटी’ का गठन किया था. इस समिति ने सिनेमा के विकास के लिए कई सुझाव दिए थे. बहरहाल, वर्ष 1952 में देश में सिनेमैटोग्राफ कानून लागू किया गया थाजिसका मूल उद्देश्य फिल्मों के प्रदर्शन के लिए प्रमाण पत्र जारी करना था. देश में सिनेमा का इतिहास एक सौ दस साल पुराना है. जब सिनेमेटोग्राफ कानून बना था तब सिनेमा को लेकर आज की तरह दीवानगी नहीं थीन ही इसकी पहुँच देश के कोन-कोने तक ही थी. आज करीब पचास भाषाओं में सबसे ज्यादा  फिल्मों का उत्पादन भारत में होता है. पिछले दशकों में जहाँ तकनीकी क्रांति ने सिनेमा के उत्पादन और प्रसारण में सहूलियत दी हैवही तकनीक की सहायता से फिल्में सिनेमाघरों में रिलीज होते ही इंटरनेटसोशल मीडिया के माध्यम से चोरी-छिपे देश-दुनिया में पहुँच जाती है. दूसरे शब्दों में, सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान फिल्मों की चोरी-छिपे कॉपी कर ली जाती है. इससे सिनेमा और मनोरंजन उद्योग से जुडे लाखों लोगों प्रभावित होते हैं. जाहिर है पायरेसी का खामियाजा निर्माता-निर्देशकों भुगतना पड़ता है. इसे रोकने की माँग फिल्म उद्योग से जुड़े लोग वर्षों से कर रहे थे. नए कानून का मुख्य ध्येय इस पायरेसी पर रोक लगाना ही है. 

संशोधित  वधेयक के तहत बिना अनुमति के (अनाधिकृत) फिल्मों का ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग करनेजहाँ पर प्रदर्शन के लिए लाइसेंस नहीं दिया गया हो वहाँ दिखाने कॉपीराइट कानून का उल्लंघन करने पर तीन महीने से लेकर तीन साल तक जेल की सजा हो सकती है. इसके अतिरिक्त दोषी व्यक्ति को तीन लाख रुपए से लेकर कुल उत्पादन लागत का पाँच प्रतिशत हर्जाना देना पड़ेगा. अनुराग ठाकुर ने कहा कि पायरेसी की वजह से हर साल फिल्म उद्योग को 20 हजार करोड़ का नुकसान उठाना पड़ता है. इस आंकड़े पर बहस हो सकती है, पर इससे इंकार नहीं कि पायरेसी का मुद्दा महज भारत तक ही सीमित नहीं है. तकनीक क्रांति और भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया एक गाँव में बदल चुकी है. सिनेमाघरों की बात अलग हैपर ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जब कोई फिल्म रिलीज होती है वहाँ से कॉपी करना या डाउनलोड करना मुश्किल नहीं है. आज कई ऐसे गैर-कानूनी वेबसाइट हैं जहाँ पर विभिन्न भाषाओं की दुनिया भर की नई-पुरानी फिल्मेंडॉक्यूमेंट्रीफीचर आसानी से उपलब्ध है. ऐसे में सवाल है कि क्या पायरेसी को रोकना आज के दौर में संभव है?  न सिर्फ फिल्म बल्कि महंगी किताबें, शोध ग्रंथ, अकादमिक जर्नल भी एक बार प्रकाशित होने के बाद ऑनलाइन, ‘फ्री एक्सेस’  के लिए उपलब्ध हो जाती है. पिछले कुछ सालों से महंगी वैज्ञानिक जर्नलों की मुफ्त में उपलब्धता को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है. नए कानून लागू करने वाले एजेंसियों को ध्यान रखना होगा कि पायरेसी के तहत वेबजह प्रताड़ना न हो. 

सवाल यह भी है कि क्या सरकार के पास देश में हर कोने में चल रहे सिनेमाघरों पर नजर रखने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं पिछले वर्षों मेंखास कर कोविड के बाद सिनेमाघरों को ओटीटी प्लेटफॉर्म से चुनौती मिल रही है. स्मार्ट फोन पर सस्ते डाटा पैक की आसान उपलब्धता से ओटीटी का कारोबार बढ़ा है. इन प्लेटफॉर्म पर कंटेंट में विविधता भी आई है. नई पीढ़ी भी मनोरंजन के लिए नए विषय-वस्तु और पटकथा की तलाश में हमेशा रहती हैजो विभिन्न ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज होने वाली वेब सीरीज और फिल्मों की खासियत है. यहाँ प्रयोग करने की गुंजाइश है. कई प्रयोगशील फिल्मकार आज सिनेमाघरों के बदले ओटीटी को तरजीह दे रहे हैं. सवाल यह भी है कि क्या सिनेमा प्रदर्शन के हर प्लेटफॉर्म, मसलन ओटीटी पर नज़र रखना संभव है

इस विधेयक में पायरेसी के अतिरिक्त विभिन्न आयु वर्गों को लेकर जो श्रेणी बनाई गई है उस पर नजर जाती है. जहाँ मूल सिनेमैटोग्राफ कानून के तहत यू (यूनिवर्सल) और ए (एडल्ट) प्रमाणपत्र जारी करने का प्रावधान थासंशोधन विधेयक में अब विभिन्न आयु वर्गों को ध्यान में रखते हुए साततेरह और सोलह वर्ष की आयु से ऊपर के बच्चों के लिए सिनेमा सामग्री देखने-दिखाने की श्रेणी बनाई गई है. इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी लागू किया जाएगा. साथ हीकेन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड इन फिल्मों के टेलीविजन या अन्य माध्यमों पर प्रदर्शन के लिए अलग से प्रमाण पत्र भी जारी कर सकता है. प्रसंगवशसेंसर बोर्ड पहले फिल्मों को दस वर्ष के लिए प्रमाण पत्र जारी करता था. यह समयावधि अब समाप्त कर दी गई है. प्रमाण पत्र अब हमेशा के लिए मान्य होगा.

बहरहालसात साल या तेरह साल के बच्चे के लिए माता-पिता की संरक्षण में ही इस बदलाव को सुचारू ढंग से अमलीजामा पहनाया जा सकता है. जिस तरह से आज बच्चों के हाथों में मोबाइल और लैपटॉप आ गया है ये  प्रावधान बेहद जरूरी हैंलेकिन घर में विभिन्न आयु वर्ग के बच्चे सामूहिक रूप से ऑनलाइन कंटेंट का उपभोग करते पाए जाते हैं. हर समय उन पर नजर रखना कहीं सेंसरशिप का रूप न ले लेसाथ ही मनोवैज्ञानिक रूप से भी नजरबंदी’ बच्चों के लिए क्या सही होगा? 

Sunday, August 06, 2023

पर्दे पर मिलान कुंदेरा का साहित्य


 द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग मिलान कुंदेरा (1923-2023) की बहुचर्चित कृति है. उनकी मृत्यु के बाद साहित्य पर टीका-टिप्पणी हुई लेकिन उपन्यास पर इसी नाम से अमेरिकी फिल्मकार फिलिप कॉफमैन के निर्देशन बनी फिल्म (1988) उपेक्षित रही. मूल चेक में लिखा यह उपन्यास (1984) पहले अंग्रेजी में ही छपा था. फिल्म के बाद ही किताब की धूम दुनिया भर में मची थी.

यह उपन्यास दर्शनइतिहासराजनीतिमानवीय संबंधोंद्वंदो, अधिनायकवादी सत्ता के दुरुपयोग को 1968 में प्राग स्प्रिंग (चेकोस्लोवाकिया) की पृष्ठभूमि में अद्भुत शिल्प में रचता है. इस बहुस्तरीय किताब के कई अंश को निर्देशक ने नहीं छुआ है. मसलन फिल्म में उपन्यासकार नहीं दिखता है. फिर भी उपन्यास के मूल कथ्य और किरदारों को स्क्रीनप्ले में सुरक्षित रखा गया है. उपन्यास से अलग फिल्म एक स्वतंत्र विधा के रूप में हमें प्रभावित करती है. कई दृश्यकिरदारों के प्रभावी अभिनय और संगीत जेहन में टंगे रह जाते हैं.

टॉमास एक कुशल सर्जन है जो प्राग में रहता है. उसके कई स्त्रियों से संबंध है. तेरेजा से मुख्तसर सी मुलाकात के बाद वह शादी कर लेता है. टॉमास के संबंध हालांकि अन्य स्त्रियों से जारी रहते हैं. सबीना एक ऐसी स्वतंत्रचेता पेंटर है जिसके साथ भी टॉमास के अंतरंग रिश्ते हैं. सबीना की सहायता से तेरेजा की नौकरी एक फोटोग्राफर के रूप में लग जाती है. 1968 में जब साम्यवादी सोवियत संघ की सेना टैंकों के साथ प्राग पर धावा बोलती है, तब हम उसी के लेंस से लोमहर्षक दृश्य देखते हैं. फिल्मकार ने दस्तावेजी फुटेज के साथ बेहद खूबसूरती से टैंको के ईद-गिर्द लोगों के विरोध प्रदर्शन को चित्रित किया है. प्राग के निवासी अपने घर-बार छोड़ कर दूसरे देशों में रिफ्यूजी बनने को मजबूर हैं. फिल्म में आए घरमानवीय अस्तित्वस्वतंत्रता का सवाल मौजू है. आज जब रूसी सेना यूक्रेन में हैद अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग फिल्म प्रासंगिक हो उठी है.

उपन्यास की तरह ही फिल्म में टॉमासतेरेजासबीना देश छोड़ कर स्विट्जरलैंड चले जाते हैं. यहाँ सबीना की मुलाकात फ्रांज (प्रोफेसर) से होती है. तेरेजा स्विट्जरलैंड को स्वीकार नहीं कर पाती है और प्राग लौट आती है. सबीना फ्रांज को छोड़ कर अमेरिका चली जाती है. टॉमास को एहसास होता है कि वह तेरेजा के बिना नहीं रह सकता है और फिर पीछे-पीछे प्राग लौट आता है. लेकिन फिर भी उसके संबंध अन्य स्त्रियों के साथ बने रहते हैं. टॉमास (डेनियल डे लेविस), तेरेजा (जूलीएट बिनोचे) और सबीना (लेना ओलेन) के बीच संबंधों के तनाव, अस्तित्व के भारीपन और हल्केपन के द्वंद को बेहद खूबसूरती से फिल्म सामने लाती है.

आम तौर पर साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्मों से उनके रचनाकार खुश नहीं रहते हैं, कुंदेरा अपवाद नहीं थे. पर यदि हम ग्रैबिएल गार्सिया मार्केज़ या सलमान रुश्दी के उपन्यासों पर बनी फिल्मों से इस फिल्म की तुलना करें तो यह फिल्म उपन्यास की देह और आत्मा को परदे पर साकार करने में सफल रही है. उपन्यास की तरह ही फिल्म का फलसफा है: हम जीवन एक ही बार जीते हैंजिसकी तुलना न हम पिछले जीवन से कर सकते हैं न ही इसे आने वाले जीवन में बेहतर बना सकते हैं

Wednesday, August 02, 2023

भूत जब प्रेमी हो: मणि कौल की ‘दुविधा’ के पचास साल


एक बातचीत में जब मैंने युवा फिल्मकार पुष्पेंद्र सिंह से पूछा कि चर्चित राजस्थानी साहित्यकार विजयदान देथा की किस कहानी पर वे फिल्म बनाना चाह रहे थेउन्होंने दुविधा का नाम लिया. फिर उन्होंने जोड़ा कि मणि (कौल) इस पर फिल्म बना चुके थे इसलिए मैंने उनकी केंचुली कहानी चुनी. उल्लेखनीय है कि केंचुली पर सिंह ने लैला और सात गीत फिल्म बनाई, जिसकी काफी चर्चा है.

 

राजस्थानी लोककथा पर आधारित दुविधा देथा की बहुचर्चित कहानी रही है. इस कहानी को आधार बना कर अमोल पालेकर ने भी पहेली (2005) नाम से एक फिल्म निर्देशित की थीजिसमें शाहरुख खान और रानी मुखर्जी की प्रमुख भूमिका थी. पिछले दिनों एनएसडी रंगमंडल ने दुविधा कहानी पर माई री मैं का से कहूं का मंचन किया था.

 

बहरहालसमांतर सिनेमा के पुरोधा मणि कौल की फिल्म दुविधा (1973) के पचास साल पूरे हो रहे हैं. दुविधा के केंद्र में एक नवविवाहिता स्त्री हैजिसका पति शादी के दूसरे दिन ही घर छोड़ कर दिसावर’ (व्यापार के लिए) निकल जाता है. इस बीच एक भूत पति का रूप धर घर वापस आता है और उस स्त्री के संग-साथ रहने लगता है. यह जानते हुए भी कि पति का रूप धरने वाला भूत हैवह नहीं जिसने उसका हाथ थामा थास्त्री प्रतिरोध नहीं करती. भूत अपने छल को लेकर स्त्री से झूठ नहीं बोलता. पति (रवि मेनन) को लच्छी (राईसा पद्मसी) के अपरूप सौंदर्य की चाह नहीं हैवह हिसाब-किताब में उलझा हैपर भूत उस पर मोहित है. यहाँ विद्यापति की पंक्ति याद आती है-सुंदरि तुअ मुख मंगलदाता

 

हिंदी सिनेमा में स्त्री का यह रूप सर्वथा अलग है. क्या एक स्त्री मौन रह कर अपनी स्वतंत्र चेतना का इस्तेमाल करती है? एक बच्चे का जन्म होता है. पति भी वापस लौट आता है. आखिर में, एक गड़रिए के न्याय से भूत को थैले में कैद कर दिया जाता है और कुएं में डाल दिया जाता है. उस स्त्री की क्या इच्छा थी, यह कोई नहीं पूछता. फिल्म देखने पर नए सवाल और नए अर्थ हमेशा उद्धाटित होते हैं.

 

मणि कौल ने साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाईहालांकि सबका आस्वाद अलग है. दुविधा से पहले वे मोहन राकेश की कहानी उसकी रोटी और नाटक आषाढ़ का एक दिन पर फिल्म बना चुके थे. 


उनकी फिल्में सादगीसिनेमाई दृष्टि, बिंबो-रंगो के संयोजन के लिए जानी जाती है. उसकी रोटी’, ‘आषाढ़ का एक दिन और दुविधा में स्त्रियों के द्वारा विभिन्न देश-काल में इंतजार का चित्रण मिलता है. उल्लेखनीय है कि समांतर सिनेमा के फिल्मकारों ने नई कहानी को आधार बनाया जहाँ इंतजार प्रमुखता से चित्रित है.

 

मणि कौल की फिल्मों में विभिन्न कला रूपों-पेंटिंगस्थापत्य और संगीत की आवाजाही सहजता से होती हैइस फिल्म में जिस तरह से लच्छी (राईसा पद्मसी) को परदे पर मणि कौल ने उकेरा है वह मिनिएचर पेंटिंग से प्रभावित है. यहाँ पर इस बात का उल्लेख जरूरी है कि राईसा प्रसिद्ध पेंटर अकबर पद्मसी की पुत्री हैं. जब उन्होंने इस फिल्म में अभिनय किया तब सोलह वर्ष की थी. प्रसंगवश, मुंबई में अकबर पद्मसी ने 1969-72 के दौरान इंटर आर्ट विजन एक्सचेंज वर्कशाप’ (कार्यशाला) का आयोजन किया था, जिसमें मणि कौलकुमार शहानी जैसे युवा फिल्मकारों ने भी भाग लिया था. कलाओं के बीच आवाजाही को लेकर हुए इस कार्यशाला का असर उनकी फिल्मों पर साफ है. कुमार शहानी की फिल्म माया दर्पण’ (1972) भी रंग-योजना को लेकर याद की जाती है. पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षित और मणि कौल के सहयोगी रहे फिल्मकार कमल स्वरूप बातचीत में अकबर पद्मसी को मणि कौल का गुरु कहते हैं.

 

दुविधा की शूटिंग बोरुंदा (देथा का गाँव) में हुई थी. इस लैंडस्केप से मणि भलीभांति परिचित थे. राजस्थान (जालौर) में मणि कौल का बचपन बीता और ग्रेजुएशन की शिक्षा उन्होंने जयपुर विश्वविद्यालय से ली थी और आगे फिल्म प्रशिक्षण के लिए वे पुणे फिल्म संस्थान (एफटीआईआई) गए. उनकी फिल्मों का स्वरूप लैंडस्केप से काफी प्रभावित रहा है.

 

इस फिल्म की सिनेमाटोग्राफी की चर्चा अलग से होनी चाहिए. आम तौर पर मणि कौल और कुमार शहानी की फिल्मों में पुणे संस्थान से प्रशिक्षित के के महाजन का छायांकन होता था, लेकिन इस फिल्म में  बहुमुखी प्रतिभा के धनी नवरोज कांट्रैक्टर ने कैमरा संभाला. कांट्रेक्टर की यह पहली फिल्म होने के साथ ही मणि कौल की पहली रंगीन फिल्म थी.

 

बेहद सूक्ष्मता से किरदारों की भाव-भंगिमा को ब्यौरे के साथ से इस फिल्म में जिस तरह दिखाया गया है, वह सिनेमा और रंगमंच के फर्क के हमारे सामने लाता है. डोली में हिचकोले खाती लच्छी की 'एक फांक आंख, एक फांक नाक' के सौंदर्य को मणि कौल जिस संयम से दिखाया है, वह उन जैसे रसिक के बूते ही संभव है. 


फिल्म के एक दृश्य का उल्लेख यहाँ जरूरी है जब लच्छी का पति दिसावर जाने को होता है: किवाड़ की ओट में टिमटिमाती लौ, किवाड़ खोल कर काजल भरी आंखों से लच्छी जिस तरह से घर-आंगन को देखती है, बाह्य प्रकाश में उसकी अंतर्मन की पीड़ा (विरह) साफ झलक उठती है.


मणि कौल की फिल्मों में ध्वनि के इस्तेमाल का काफी महत्व रहा है, हालांकि इस फिल्म में संवाद नहीं हैवॉयस ओवर का इस्तेमाल किया गया है. यहाँ मौन मुखर है. फिर भी संवाद से इतर एक सजग दर्शक फिल्म में विभिन्न रूप में आए ध्वनि की बारीकियों को सुन सकता है. मणि कौल की फिल्में संसाधनों से भी प्रभावित रही. उन्हें हमेशा वित्तीय संकट से जूझना पड़ा. कम बजट की इन फिल्मों को फिल्म वित्त निगम (एफएफसी) से सहायता मिली. 


प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे ने 'फोर एंड ए क्वार्टर' (1974) शीर्षक लेख में इस फिल्म की आलोचना की थी, लेकिन आने वाले दशकों में अवांगार्द फिल्मकारों के वे प्रिय रहे. अनूप सिंह, पुष्पेंद्र सिंह, गुरविंदर सिंह, अमित दत्ता जैसे अवांगार्द फिल्मकारों के यहाँ मणि कौल की छाप स्पष्ट है.