Tuesday, August 28, 2018

जहां बुढ़ापा एक रोग है


साल 2011 में अ सेपरेशननाम से एक फिल्म आयी थी, जिसे ईरान के मशहूर निर्माता-निर्देशक असगर फरहादी ने बनाई थी. तेहरान के एक मध्यवर्गीय परिवार को केंद्र में रख कर इस फिल्म के बहाने अल्जाइमर बीमारी के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाया गया है. इस फिल्म को ऑस्कर पुस्कार से भी नवाजा गया.

अल्जाइमर बीमारी में लोग पुरानी बातें भूल जाते हैं, सोचने-समझने की क्रिया में परेशानी आती है. यहां तक कि लोग सगे-संबंधी को भी भूल जाते हैं. अनेक तरह की मानसिक और शारीरिक अक्षमता आ जाती है.

इसी तरह पार्किंसंस रोग में भी बीमार व्यक्ति स्मृति लोप का शिकार होता है, मानसिक बीमारियां घेर लेती हैं और अंत में व्यक्ति व्हील चेयरकी शरण में चला जाता है. इन बीमारियों की रोक-थाम के लिए जो दवाएं अभी बाजार में हैं, वह अपर्याप्त है.

करीब दस वर्षों से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी अल्जाइमर रोग से बुरी तरह पीड़ित थे. इसी वजह से वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद उन्हें सार्वजनिक जीवन में नहीं देखा जाता था. इस बात का जिक्र उल्लेख एनपी ने अपनी किताब द अनटोल्ड वाजपेयी : पॉलिटिशियन एंड पैराडॉक्समें किया है. समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस भी वर्षों से अल्जाइमर से जूझ रहे हैं.

हिंदुस्तान में इन बीमारियों के प्रति लोगों में सूचना और  संवेदना का अभाव है. आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियों को वहन करना मध्यवर्गीय परिवारों के लिए आसान नहीं होता. हिंदी के चर्चित साहित्यकार स्वदेश दीपक जो बायपोलर डिसआर्डरके मरीज थे, इसका उदाहरण हैं. वे बारह वर्षों से लापता हैं. यदि आप स्वस्थ हैं, तो इस बात की कल्पना से ही सिहरन पैदा होती है कि एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब आपकी स्मृति आपका साथ ना दें. बढ़ती हुई उम्र में मस्तिष्क की कई कोशिकाओं के काम करने की गति धीमी हो जाती है.

एक आंकड़ा के मुताबिक भारत में करीब 40 लाख लोग भूलने की बीमारी (डिमेंशिया) से पीड़ित हैं और वर्ष 2035 तक यह संख्या दुगुनी हो जायेगी. भारत युवाओं का देश है. देश की जनसंख्या का 65 प्रतिशत 35 वर्ष से कम आयु के हैं, पर हमारी पीढ़ी जब बूढ़ी होगी, तो ये बीमारियां और बढ़ेंगी. पर क्या हम उसके लिए तैयार हैं?

पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के पास हर तरह की सुख-सुविधा थी, लेकिन देश के बहुसंख्यक लोगों के पास ऐसी सुविधाएं नहीं हैं. बिना किसी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के बुढ़ापा एक रोग बन कर सामने आता है. सरकार को चाहिए इन बीमारियों से पीड़ित बूढ़े-बेसहारों के देख-भाल की अलग से सुविधा का बंदोबस्त करे. साथ ही मेडिकल शोध पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, ताकि भविष्य में इन बीमारियों का इलाज संभव हो सके. मेरी समझ से पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी!
 (प्रभात खबर, 28 अगस्त 2018 को प्रकाशित)

Sunday, August 12, 2018

आधुनिक मन और पुष्कर पुराण

भारत में फीचर फिल्मों का इस कदर बोलबाला है कि डॉक्यूमेंट्री फिल्में महज फिल्म समारोहों तक ही सिमट कर रह जाती हैं. न तो इन फिल्मों का ठीक से प्रदर्शन होता है और न ही समीक्षक चर्चा के लायक समझते हैं. आनंद पटवर्धन या अमर कंवर जैसे फिल्म निर्देशक अपवाद हैं, जिनकी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की चर्चा गाहे-बगाहे हो जाती है.
पिछले दिनों एक फिल्म समारोह में फिल्म निर्देशक कमल स्वरूप की डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘पुष्कर पुराण’ देखने का मौका मिला. यह फिल्म भगवान ब्रह्मा की नगरी और उससे जुड़े मिथक, किंवदंतियों के बहाने वर्तमान पुष्कर की आबोहवा में रची-बसी है. उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया में ब्रह्मा का एक मात्र मंदिर राजस्थान के पुष्कर में ही स्थित है.
कमल स्वरूप कहते हैं- ‘मैं फीचर फिल्म डॉक्यूमेंट्री की शैली में और डॉक्यूमेंट्री फीचर फिल्म की शैली में बनाता हूं.’ कमल अजमेर में पले-बढ़े हैं और आसपास के समाज, हिंदू धर्म और कर्मकांडों से बखूबी परिचित हैं. बाद में उन्होंने फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे से फिल्म निर्माण की बारीकियों को सीखा-समझा.
इस फिल्म का विचार पक्ष रॉबर्तो कलासो की बहुचर्चित किताब- ‘का : स्टोरीज ऑफ द माइंड एंड गॉड्स ऑफ इंडिया’ से प्रेरित है. हालांकि कमल कहते हैं कि उनके लिए विषय वस्तु (कंटेंट) ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि शैली (क्राफ्ट) है. यह बात इस डॉक्यूमेंट्री को देखने पर स्पष्ट भी हो जाती है. इसमें दृश्य, बिंब और ध्वनि का जिस तरह से संयोजन किया गया है, वह इसे लीक से हटकर एक सफल वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) बनाता है. विभिन्न तरह की ध्वनियों का संयोजन इसे समकालीन वृत्तचित्रों से अलग श्रेणी में ले जाता है. 
साल 1988 में बनी कमल स्वरूप की क्लासिक फीचर फिल्म ‘ओम दर-ब-दर’ की पृष्ठभूमि भी पुष्कर ही है, पर यह वृत्तचित्र उस फिल्म से अलग है. ‘पुष्कर पुराण’ में वेद, पुराण और वैदिक समाज की चर्चा के साथ ही पुष्कर के आसपास के समकालीन समाज का निरूपण है. इस तरह यह फिल्म एक साथ लोक और शास्त्र दोनों की आवाजाही करती है. कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर में लगनेवाले विशाल पशु मेले के दृश्यांकन में यह बेहद खूबसूरती से दर्शकों के सामने आता है. 
इस फिल्म में संवाद बेहद कम हैं. फिल्मकार अपनी तरफ से लोक में मौजूद विश्वास, अंधविश्वास पर टीका-टिप्पणी नहीं करता है. इसमें आये अश्वमेघ प्रसंग और घोड़े की बलि की बात आधुनिक मन को भले ही विचलित करे, पर दर्शकों को भारतीय मिथक और उसके विश्लेषण को भी बाध्य करता है. धर्म के बाजार और पिछले कुछ वर्षों में पर्यटकों की आवाजाही से स्थानीय स्तर पर जो संबंधों में तनाव आया है, उसे भी यह वृत्तचित्र संग्रहित करते चलता है. आश्चर्य नहीं कि एक घंटा चालीस मिनट लंबी इस वृत्तचित्र में ‘कालबेलिया का नृत्य’ और ‘बैले’ को निर्देशक ने एक साथ समाहित किया है.
समाजशास्त्रियों व धर्म-मिथक अध्येताओं के लिए जहां यह एक प्रमुख अध्ययन की तरह है, तो वहीं दर्शकों व फिल्म निर्माण से जुड़े छात्रों के लिए एक ‘मास्टर क्लास’ की तरह है.

(प्रभात खबर, रवि रंग,  12 अगस्त 2018)