Saturday, March 18, 2017

रंगकर्म में नौटंकी

तमाशा-ए-नौटंकी का एक दृश्य
पिछले दिनों दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की एक ग्रेजुएट साजिदा के निर्देशन में एक नाटक तमाशा-ए-नौटंकीदेखने का मौका मिला। इसे युवा रंगकर्मी और पत्रकार मोहन जोशी ने लिखा है। यह नाटक लोक नाट्य शैली, नौटंकी के उरूज, अवसान और मौजूदा समय में उसकी बदहाल स्थिति पर एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी है। हालांकि यह नाटक दुखांत न होकर सुखांत है। इसमें नाट्यकार नौटंकी की हिंदी समाज में पुनर्वापसी को लेकर यथार्थ के बदले मंच पर एक आदर्श लोक की सृष्टि करता है, जो आश्चर्य में डालता है!

बात चाहे नौटंकी की हो, जात्रा की या भवाई की, आधुनिक समाज में लोक नाट्य विधाओं की जो स्थिति है, वह सुखद नहीं कही जा सकती। जब से पॉपुलर कल्चर और खासतौर पर सिनेमा का प्रचार-प्रसार और मनोरंजन के साधन के रूप में उसकी पहुंच भारतीय समाज में बढ़ी है, लोक में प्रदर्शनकारी कला के जो रूप चलन में थे, वे हाशिये पर आ गए। जाहिर है, सिनेमा के प्रचलन में आने से पहले और बाद के दशकों में भी ये लोक नाट्य विधाएं लोगों की रुचि और प्रोत्साहन की वजह से चलन में रहीं। अगर आज ये दर्शकों या मंच के लिए तरस रही हैं तो इसके लिए हमारा समय और समाज भी जिम्मेदार है।

बेशक सिनेमा आधुनिक समय में मनोरंजन का सबसे प्रभावशाली माध्यम है जो नाटक की तरह ही कला के अमूमन सभी शिल्पों को खुद में समेटे हुए है। भरत मुनि ने नाटक को सर्वशिल्प-प्रवर्तकमकहा था, पर यह बात शिल्प-तकनीक और दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करने की क्षमता के कारण सिनेमा के बारे में भी कही जा सकती है। प्रसंगवश, सत्तर के दशक में चर्चित फिल्मकार ऋत्विक घटक ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि अगर कल को या दस साल बाद कोई नया माध्यम सामने आता है जो सिनेमा से ज्यादा प्रभावशाली है, तो मैं तुरंत सिनेमा छोड़ कर उस नए माध्यम को अपना लूंगा।किसी भी प्रतिभाशाली कलाकार या रचनाकार के लिए विचार महत्त्वपूर्ण होते हैं, पर नए माध्यम की तलाश भी उन्हें हमेशा रहती है जो उनकी बातों को दूर और एक वृहद समुदाय तक ले जाए। वह लगातार उस माध्यम की तलाश में रहता है जहां उसके मनोभावों की ठीक ढंग से अभिव्यक्ति मिल सके। इसलिए कहा गया है कि प्रतिभा नवोन्मेषशालिनी होती है।


बहरहाल, बात सिर्फ नौटंकी जैसी लोक नाट्य विधाओं की नहीं है, जिसे सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम से चुनौती मिली, बल्कि आधुनिक नाटक के बारे में भी यह सच है। हाल में कई नाटक ऐसे देखने का मौका मिला, जिनसे काफी निराशा हुई। बल्कि कई मशहूर लेखकों के उपन्यासों पर जैसी कमजोर प्रस्तुति हुई, उसे देख कर लगा कि प्रयोग के नाम पर किस तरह का हल्कापन परोसा जा रहा है। कला और मनोरंजन के साथ-साथ बखूबी सामाजिक-सांस्कृतिक आलोचना करने वाले और बीते लंबे समय से मशहूर किसी उपन्यास की प्रस्तुति भी अगर उसे हल्का बना देती है तो यह चिंता की बात है। नाटकों में प्रयोग ने बहुत ऊंचाई हासिल की है। इसलिए ऐसा नहीं कि नाट्य प्रयोग नहीं होना चाहिए। लेकिन उसके लिए जो दृष्टि या तैयारी होनी चाहिए, वह एक सिरे से गायब दिखती है।

हालांकि इसके लिए दोष सिर्फ नाटक के निर्देशक या उससे जुड़े अदाकारों के सिर नहीं मढ़ा जा सकता। सारे कलाकार पेशेवर नहीं कहे जा सकते। कई ऐसे भी कलाकार होते हैं जो शौकिया रंगमंच से जुड़े होते हैं और जिनके लिए रंगमंच रोजी-रोटी का जरिया नहीं है। ऐसे में इनमें पेशेवर उत्कृष्टता देखने को नहीं मिलती। देश के विभिन्न भागों में जो भी कलाकार रंगकर्म से जुड़े हैं, उनमें अधिकतर के बारे में कहा जा सकता है कि वे अपने जुनून के कारण इसे निबाह रहे हैं या उन्हें मुंबई की मायानगरी में अपना भविष्य दिख रहा है। मगर सवाल है कि मुंबई की मायानगरी में भी इन चार-पांच दशकों में नाटक की पृष्ठभूमि वाले बमुश्किल दस-बीस ऐसे अदाकार हैं जिन्हें पर्याप्त प्रतिष्ठा और पैसा मिला है। बाकी लोगों की क्या स्थिति है, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है या एक चुप्पी का आलम है।

पिछले कुछ दशकों के दौरान बाजार के फैलने के बाद कला के कई रूपों को फायदा पहुंचा है। लेकिन लोक नाट्य विधाएं इससे अछूती रहीं। रंगकर्मियों के लिए बाजार नए अवसर लेकर नहीं आया। ऐसे में तमाशा, नौटंकी या जात्रा के लिए बाजार से कोई उम्मीद नहीं। सवाल उठता है कि फिर उम्मीद किससे है? मेरा उत्तर यह होगा कि उम्मीद उसी समाज से, जो अपनी आदिम अभिव्यक्ति के लिए लोक नाट्य शैलियों का सहारा लेता रहा है। लेकिन तेजी से बदलते इस आधुनिक समाज में क्या यह उम्मीद सच के करीब है!

(दुनिया मेरे आगे, जनसत्ता, 18 मार्च, 2017 को प्रकाशित)  

Wednesday, February 01, 2017

लोक की कलाकार: बउआ देवी

बउआ देवी के साथ लेखक 
मिथिला पेंटिंग की सिद्धहस्त कलाकार बउआ देवी से बात करते हुए लगता है कि हम किसी किस्सागो के सामने बैठे हैं. दिल्ली के जिस कमरे में हम बैठे थेउसकी दीवारों पर मिथिला पेंटिंग यानी मधुबनी पेंटिंग की कोई छाप भले न दिखेमगर उनकी चित्रकला और जीवन यात्रा के बारे में सुनना आह्लादकारी अनुभव है. करीब साठ वर्षों से वे इस लोकचित्र कला से जुड़ी हैं और भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें इस वर्ष पद्मश्री से नवाजा है. वे कहती हैं कि चित्रों को बनाते हुए मोन नहिं भरै अछि’ यानी मन नहीं भरता है.’ पिछले ही महीने वे एक बड़े कैनवास पर मिथिला पेंटिंग करके वडोदरा से लौटी हैं.

हिंदूबौद्धइस्लाम धर्मोंलोक-वेद की परंपराओं और लोक कथाओं से मिथिला की सभ्यता और संस्कृति प्रभावित रही है. बउआ देवी से कोहबरसूर्यग्रहणकालिया मर्दन और रामायण-महाभारत के किस्से सुन कर आप पल भर के लिए मिथिला के लोक में पहुंच जाते हैं. ये पारंपरिक विषय उनकी पेंटिंग के मूल में हैं. खासकर नाग-नागिन का चित्रण असंख्य बार हैपर नए रूप में. उन्होंने बताया कि इन चित्रों में आप मेरे मनोभावों को पढ़ सकते हैंअगर मैंने रोते हुए इन तस्वीरों को उकेरा हैतो संभव है कि यह आपको भी महसूस हो! मेरी आंखों के सामने विभिन्न मुद्राओं में हमेशा सांप नाचते रहते हैं. जब मैंने पूछा कि क्या आपको सांप से डर नहीं लगता?’ तो मुस्कारते हुए उन्होंने कहा कि डर तो लगता हैपर बचपन से नागदेवी विषहारा की दंत कथाओं को सुनती आई हूं.’ असल में नाग-नागिन एक प्रतीक के रूप में इन चित्रों में आते हैंजो रक्षक भी हैं और संहारक भी. नाग के चित्रण को लेकर ही उन्हें 1985-86 के दौरान राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. उनकी पेंटिंग में रेखाओं की स्पष्टता और ज्यामितीय आकृतियों में चटक रंग (भरनी शैली में) मोहक लगता है. पर इन रेखाओं में कई बार अनगढ़पन भी दिखता हैजो आकृति निरूपण से परे जाकर इन चित्रों को एक विशिष्टता प्रदान करता है.

सत्तर के दशक में फ्रांस के कला प्रेमी और उपन्यासकार इवस विको जब मिथिला पेंटिंग के ऊपर शोध के सिलसिले में मधुबनी पहुंचे तो उन्होंने अपनी किताब द वूमेन पेंटर्स आॅफ मिथिला’ में नोट किया कि यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि यह कला भारतीय सभ्यता के सबसे उजले पक्ष को अभिव्यक्त करती है.’ विको की चर्चा करने पर बउआ देवी कहती हैं कि पहली बार विको ही उन्हें पेरिस एक प्रदर्शनी में लेकर गए थे. सत्तर के दशक में जब यह कला मिथिला की चौहद्दी से बाहर निकलीतब यूरोप और खास कर पेरिस में इस कला के कद्रदान काफी रहे. पिछले साल अक्तूबर में भी पेरिस में पेंटर्स ऑफ मिथिला’ नाम से एक प्रदर्शनी लगाई गई थीजिसमें नए कलाकारों की भागीदारी थी.

उन्हें न तो हिंदी ठीक से आती है न अंग्रेजी. जब उन्हें पता चला कि मैं खुद एक मैथिली भाषा-भाषी हूंपचहत्तर वर्ष की बउआ देवी के चेहरे पर बच्चों-सी निश्छल हंसी उभर आई. उन्होंने कहा कि मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूंबस पांचवीं तक की पढ़ाई की. अपने समाज में जो गीत-संगीतकिस्से-कहानी हमने सुने थे और बचपन में दादी-मां से जो लिखिया’ सीखा थाउसी को लेकर मैं आगे बढ़ी.’ असल में बउआ देवी को यह कला परंपरा के रूप में अपनी दादी और मां से मिली. इस कला को लेकर वे देश और विदेश के अनेक शहरों में गर्इं पर उनका मन रमता है जितवारपुर में ही. जब मैंने पिछले तीस वर्षों में जापानब्रिटेनफ्रांसस्पेन के विभिन्न शहरों के उनके अनुभव के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा- मुझे अच्छा नहीं लगा.


जिस तरह मिथिला पेंटिंग या मधुबनी पेंटिंग की रेखाओंरंगों और बनावट में एक लोक की सामूहिकता आकार लेती हुई दिखती हैउसी प्रकार उनकी बातचीत में भी मिथिला पेंटिंग की परंपरा लिपटी हुई चली आती है. बार-बार वे मिथिला पेंटिंग की कलाकार सीता देवी और जगदंबा देवी का जिक्र करती हैं. असल में गौने के बाद वे मधुबनी के नजदीक अपने ससुराल जितवारपुर आर्इंतब उन्हें इनसे परिचित होने का मौका मिला. ये दोनों भी जितवारपुर की ही थीं और सत्तर के दशक में इनकी पेंटिंग से देश-विदेश के कलाप्रेमी परिचित हो चुके थे. जहां सीता देवी को भरनी शैली में महारत हासिल थीवहीं जगदंबा देवी कचनी शैली में. 1970 में जगदंबा देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया. गंगा देवीसीता देवीजगदंबा देवी और महासुंदरी की तरह ही बउआ देवी मिथिला पेंटिंग की विशिष्ट स्वर हैं. 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी जर्मनी यात्रा के दौरान हनोवर के मेयर को बउआ देवी कीबनाई एक पेंटिंग भेंट की थीजिसमें जीवन चक्र को निरूपित किया गया है.

(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे कॉलम में, 'लोक की कला' शीर्षक से 01.02.2017 को प्रकाशित) 

Saturday, January 28, 2017

मिथिला पेंटिंग का पंचम स्वर हैं बउआ देवी

बउआ देवी
दिल्ली के किशनगढ़ इलाके में जब मिथिला के लोक कलाकार बउआ देवी से मिलने पहुँचा, गोरख पांडेय की पंक्तियाँ दिमाग में घूम रही थीगालिब-मीर की दिल्ली देखीदेख के हम हैरान हुए/उनका शहर लोहे का बना था फूलों से कटता जाए है.

संकरी गलियों के बीच बने बउआ देवी के किराए के मकान के सामने सबसे पहले नज़र लोहे के दुकान पर पड़ी. कामगार, मजदूर लोहे से खिड़की, ग्रिल बनाने में लगे हैं. बगल में सब्जियों, चाय-अंडे के ठेले लगे हैं. भले ही मिथिला की अमराइयां, ताल-तलाब, हरसिंगार और गेंदे के फूल की क्यारियाँ यहाँ नहीं हो, पर मिथिला के लोक का एक रंग ज़रूर दिखता है. बिहार की बोली-वाणी सुनाई पड़ जाती है. 

पद्मश्री पुरस्कारों के लिए जोड़-तोड़ होता रहा है. और अब यह कोई ख़बर नहीं है. बिना किसी जोड़-तोड़ और शोर के जब बउआ देवी जैसे लोक कलाकारों को इस पुरस्कार से नवाज़ा जाता है तब पुरस्कार की गरिमा बढ़ जाती है. 

सदियों से मिथिला की महिलाएँ  अरिपन, कोहबर, मछली, साँप, सूर्य, चंद्र आदि दीवारों पर उकेरती रही हैं. पर 1960 के दशक में आए अकाल (1967) ने इस कला को मिथिला से बाहर  पहुँचाया. औपचारिक शिक्षा से वंचित और बिना किसी नेटवर्क के गंगा देवी, सीता देवी, जगदंबा देवी और महासुंदरी देवी जैसी कलाकार इसे देश-विदेश लेकर गईं (इन चारों को मिथिला/मधुबनी पेंटिंग में योगदान के लिए पद्मश्री से नवाजा गया और अब सिर्फ उनकी स्मृति शेष है). गंगा देवी, जगदंबा देवी और महासुंदरी देवी जहाँ कछनी (लाइन) शैली में सिद्धहस्त थीं, वहीं सीता देवी भरनी शैली में. हालांकि बाद के दशकों में दलित कलाकारों के दख़ल से इस शैली में विस्तार आया और गोदना शैली भी इससे जुड़ गई.

बउआ देवी बताती हैं कि उन्होंने सिर्फ पाँचवी तक पढ़ाई की. याद कर वह बताती हैं कि जब अकाल के दौरान पुपुल जयकर और भाष्कर कुलकर्णी जितवारपुर आए तब उन्होंने इनकी पेंटिंग देख कर कहा था- लड़की तुम बहुत आगे जाओगी.’ असल में भारत सरकार ने मिथिला क्षेत्र (दरभंगा, मधुबनी) की महिलाओं को कागज पर इन चित्रों को उकेरने को प्रेरित किया ताकि आमदनी के स्रोत के रूप में यह कला विकसित हो सके.  बाद के वर्षों में यह कला मिथिला के सामंती समाज में स्त्रियों के लिए आज़ादी और समाजिक न्याय के अवसर लेकर आए.

यह पेंटिंग मिथिला की लोक संस्कृति हिस्सा है. बउआ देवी कहती हैं कि खुद उन्होंने अपनी दादी, देवकी देवी से इस कला को सीखा था. मधुबनी जिले के राजनगर सिमरी गाँव में जन्मी बउआ देवी जब गौने के बाद जितवारपुर आईं तब उनकी कला में निखार आया. इसी गाँव की सीता देवी और जगदंबा देवी मिथिला पेंटिंग को वर्षों से साध रही थीं.  

पहली बार भाष्कर कुलकर्णी ने (70 के दशक में)14 रुपए में तीन पेंटिंग (बउआ देवी कागद कहती हैं) ख़रीदा था.  इसमें उन्होंने शंकर, काली, दुर्गा को उकेरा था. बाद के वर्षो में भी बउआ देवी धार्मिक, मिथक और लोक प्रतीकों के इर्द-गिर्द ही रचती रही. ख़ास कर उनकी पेंटिंग में नाग-नागिन का चित्रण अनेक बार होता है. उल्लेखनीय है कि नाग पंचमी मिथिला में धूम-धाम से मनाया जाता है.  मिथिला में सावन के महीने में नाग पंचमी से शुरु होकर पंद्रह दिनों तक मधुस्रावनी का पर्व नव विवाहिता मनाती हैं. इस दौरान लोक कथाओं का पाठ होता है और विषहारा की पूजा की जाती है.  नाग-नागिन की पेंटिंग का जिक्र होने पर वे मैथिली में नागदेवी बिषहारा का मंत्र मुंहजबानी सुनाती हैं. वाल-वसंत का किस्सा सुनाती हैं. नाग के चित्रण को लेकर ही उन्हें 1985-86 में राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था. फिर इस कला को लेकर वह मिथिला म्यूजियम, जापान लगातार जाती रही. यूरोप के कई शहरों-लंदन, पेरिस, बारसिलोना, स्पेन में भी कला प्रदर्शनी में उन्होंने भाग लिया.


फ्रांस के चर्चित कला समीक्षक विको, जिन्होंने 70 के दशक में द वूमेन पेंटर्स ऑफ मिथिला नामक किताब लिखा था, का जिक्र  होने पर उनके चेहरे पर स्मृति की रेखा उभर आती हैं. वह कहती हैं कि पहली बार पेरिस विको ने ही उन्हें बुलाया था. वह कहती हैं कि पता नहीं अब वे ज़िंदा हैं भी या नहीं!

बउआ देवी कहती हैं  कि वह अकेले एक कदम भी शहर में नहीं चल सकतीहम त अतय हेराय जेबै. हम न तै हिंदी जनैत छी, नय तै अंग्रेजी. सच पूछि त हमरा विदेश में बढ़िया कहियो नहिं लागल (मैं तो यहाँ खो ही जाऊँगी. मैं ना तो हिंदी जानती हूँ, ना अंग्रेजी. सच पूछिए तो मुझे विदेश में कभी अच्छा नहीं लगा). अपने बेटों-बेटियों के साथ वह दिल्ली रहती हैं, जो मिथिला पेंटिंग से जुड़े हुए हैं पर जितवारपुर गाँव उनसे छूटा नहीं है. वहाँ आना-जाना लगा रहता है.  वह कहती हैं कि जब 12 -13 साल की थी तब से वह लिखिया करती रही हैं, पर उनका मन अब भी नहीं भरा है. पर वह जोड़ती हैं  अब कलाकार कम और बिजनेसमैन ज्यादा हो गए हैं. साथ ही वह बिहार में एक भी मिथिला पेंटिंग के म्यूजियम के नहीं होने का भी जिक्र करती हैं.

क़रीब 75 वर्ष की बउआ देवी पिछले ही महीने  बड़ौदा से सूर्य ग्रहण, अर्धनारीश्वर का वृहद पेंटिंग बना कर लौटी हैं. यह पूछने पर कि कोहबर, भगवती, नाग-नागिन का चित्रण करते हुए उनके मन में क्या उमड़-घुमड़ रहा होता है; वह कहती हैं, बचपन से सुनती आ रही गीतों, प्रार्थनाओं की पंक्तियाँ गूंजती रहती हैं.” शायद Schopenhauer ने पहली बार कहा था- all arts aspire to the condition of music (सभी कला अंतिम परिणति में संगीत हो जाना चाहती है). बउआ देवी के भरनी शैली में बनाए ज्यामितीय आकृतियों में ढले रंग बातें करती प्रतीत होती हैं. ऐसा लगता है  किसी संगीत साधक की ध्वनि इनमें रची-बसी हैं. सीता देवी, जगदंबा देवी, गंगा देवी और महासुंदरी देवी के बाद बउआ देवी मिथिला पेंटिंग का पंचम स्वर हैं!


(द लल्लन टॉप पर प्रकाशित)

Monday, October 24, 2016

हिंदी में एकांगी मीडिया मंथन

राज्यसभा टीवी पर मीडिया मंथननाम से एक रोचक कार्यक्रम आता है, जिसके एंकर हैं हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश. शनिवार (22 Oct) को प्रसारित हुए इस कार्यक्रम का विषय था मीडिया में विज्ञापन या विज्ञापन में मीडिया’. विषय काफी मौजू और समकालीन पत्रकारिता की चिंता के केंद्र में है.
पर कार्यक्रम देख कर काफ़ी निराशा हुई. उम्मीद थी कि मंथन से कुछ निकलेगा, लेकिन निकला वही ढाक के तीन पात! हिंदी में जो इन दिनों मीडिया विमर्श है वह मंडी, दलाल स्ट्रीट, दुष्चक्र जैसे जुमलों के इधर-उधर ही घूमता रहता है. इसी तरह उर्मिलेश और जो कार्यक्रम में मौजूद गेस्ट थे इसी विमर्श के इर्द-गिर्द अपने विचारों को परोसते रहे, जो कि अंग्रेजी विमर्श में कब का बासी हो चला है. उर्मिलेश भी अंत में इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि बाज़ार के दुष्चक्र से मीडिया की मुक्ति नहीं’. ‘वह अभिशप्त है’. वगैरह, वगैरह.
विमर्श की चिंता के केंद्र में यह था कि विज्ञापन और ख़बर के बीच अब कोई फर्क नहीं बचा है’. ‘पत्रकारिता के सामाजिक सरोकर बिलकुल ख़त्म हो गए हैं.पेड न्यूज, एडवरटोरियल इन दिनों ख़बरों पर हावी है, आदि.
सवाल बिलकुल जायज है और यह स्थापित तथ्य है कि पेड न्यूज़, एडवरटोरियल मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न बन कर खड़े हैं. और इस पर कई वरिष्ठ पत्रकार, शोधार्थी पिछले दशक से लिखते रहे हैं, बहस-मुबाहिसा करते रहे हैं
पर कार्यक्रम के दौरान इन सारे सवालों, बहस के बीच कोई आंकड़ा नहीं था (पहले कितना रेशियो विज्ञापन और खबर का था जब आठ-दस पेज का अखबार होता था, और आज 20-25 पेज के अखबार में क्या रेशियो है). कोई स्रोत नहीं थे.
1953 में ही संपादक अंबिका प्रसाद वाजपेयी विज्ञापन को समाचार पत्र की जान कह रहे थे. और हिंदी समाचार पत्रों के विज्ञापन के अभाव में निस्तेज होने का रोना रो रहे थे. 1954 में पहले प्रेस कमीशन ने अखबारों में बड़ी पूंजी के प्रवेश की बात स्वीकारी थी. पर इसका लाभ अंग्रेजी के अखबारों को मिलता रहा.
उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण के बाद ही भारतीय भाषाई अखबार विज्ञापन उद्योग से जुड़ कर लोगों तक ठीक से पहुंच सके. रौबिन जैफ्री ने अपने लेखों में विस्तार से इसे रेखांकित किया है, सेवंती निनान इसे हिंदी की सार्वजनिक दुनिया का पुनर्विष्कार कहती हैं. जाहिर है इस पुनर्विष्कार में विज्ञापन, पूंजीवादी उद्योग के उपक्रम तकनीक की प्रमुख भूमिका थी. मैंने भी अपनी किताब हिंदी में समाचारमें विस्तार से रेखांकित किया है कि किस तरह भूमंडलीकरण के बाद हिंदी के अखबार जो अंग्रेजी के पिछलग्गू थे, एक निजी पहचान लेकर सामने आए हैं.
पर अपनी बहस में उर्मिलेश ना तो इस भाषाई मीडिया क्रांतिकी चर्चा करते है, ना ही अखबारों, चैनलों के प्रचार-प्रसार से आए लोकतंत्र के इस स्थानीय, देसी रूप को देखते-परखते हैं. साथ ही विज्ञापन की इस बहुतायात मात्रा से परेशानी किसे है? पाठकों-दर्शकों को कि मीडिया के विमर्शकारों को? क्या कोई सर्वे है कि असल में पाठक-दर्शक विज्ञापन चाहते हैं या नहीं. यदि हां, तो कितना विज्ञापन उपभोक्ता चाहते हैं? हम एक कंज्यूमर सोसाइटी (उपभोक्ता समाज) में रह रहे हैं, ऐसे में विज्ञापन की भूमिका को एक नए सिरे से देखने की जरूरत है, महज 'शोर' कह कर हम इसे खारिज़ नहीं कर सकते.

जब पच्चीस रुपए का अख़बार पाँच रुपए में मिल रहा हो, ज्यादातार मीडिया हाउस का कारोबार घाटे में हो, ऐसे में विज्ञापन पर निर्भरता स्वाभाविक है. पर हिंदी में मीडिया मंथन इसे एक इच्छाशक्ति से बदलने’, ‘organic approach (?)’ को बढ़ावा देने से आगे किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा. यह विमर्श मीडिया को पूंजीवाद की महत्वपूर्ण इकाई मानने से ही परहेज करता प्रतीत होता है. इसके विश्लेषण के औजार पत्रकारिता के वही गाँधीवादी, शुद्धतावादी कैनन है (गाँधी विज्ञापन के प्रति काफी सशंकित थे. वे अपने पत्रों में विज्ञापन के लिए कोई जगह नहीं छोड़ते थे, 99 प्रतिशत विज्ञापन को पूरी तरह से बकवास मानते थे) जो आज़ादी के साथ ही भोथरे हो गए थे.
(जानकी पुल पर प्रकाशित)

Sunday, October 16, 2016

अंग्रेजी टीवी न्यूज़ चैनल का हिंदीकरण

वर्ष 2001 में भारत के संसद भवन पर हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान सीमा रेखा पर दोनों देशों की सेनाओं का जमावड़ा था और युद्ध के बादल मंडरा रहे थे. ‘आजतक’ जैसे चैनलों ने युद्ध का समां बाँधने और युयुत्सु मानसिकता तैयार करने में एक बड़ी भूमिका अदा की थी. उसी दौरान (2001-02) हम भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), नई दिल्ली में पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले रहे थे. हमें तथ्य और सत्य के रिश्ते की बारीकियों को समझाया जा रहा था. सवाल करना, पूछना, कुरेदना, ख़बर की तह तक जाने की सीख दी जा रही थी. असहज तथ्यों को छुपाने की सत्ता की आदत, ख़बर निकालने के गुर, साथ ही सत्ता के साथ एक हाथ की दूरी बरतने की सलाह दी जा रही थी.
उस वक्त आज तक चैनल से जुड़े रहे दीपक चौरसिया व्याख्यान देने आए थे. बातों-बातों में उन्होंने हमसे पूछा कि- ‘आज तक की प्रसिद्धि क्यों इतनी है?’ मैंने कहा- ‘युद्ध हो ना हो, आप टैंक, मोर्टार स्टूडियो में तैनात रखते हैं और यह आम दर्शकों को लुभाता है. दर्शकों के अंदर की हिंसा को उद्वेलित करता है!’ चौरसिया साहब का चेहरा बुझ गया था. मेरे एक मित्र ने एक चिट बढ़ाई- भाई, आपको शायद नौकरी की जरुरत नहीं होगी, हमें है!
उस वक्त हमें लगता था और मीडिया के जानकार कहते थे कि टेलीविजन मीडिया अपने शैशव अवस्था में है. ये संक्रमण काल है, कुछ वर्षों में यह ठीक हो जाएगा. पंद्रह वर्ष बाद ऐसा लगता है कि हिंदी समाचार चैनलों के इस संक्रमण से अंग्रेजी के चैनल भी संक्रमित हो चुके हैं. अर्णव गोस्वामी और ‘टाइम्स नॉउ’ इसके अगुआ है. और इस बीच अर्णव के कई ‘क्लोन’ तैयार हो चुके हैं.
भारतीय भाषाई मीडिया पर राष्ट्रवादी भावनाओं को बेवजह उभारने का आरोप हमेशा लगता रहा है, जो एक हद तक सच भी है. पर मोदी सरकार के आने के बाद, ‘न्यूज नैशनलिज्म’ के इस दौर में, अंग्रेजी पत्रकारिता खास तौर से खबरिया चैनलों की भाषा और उनके तेवर देख कर लगता है कि अब सामग्री के उत्पादन और प्रसारण के स्तर पर ‘अंग्रेजी और वर्नाक्यूलर’ के बीच विभाजक रेखा मिट गई है. यह अंग्रेजी चैनलों का ‘हिंदीकरण’ है.
ऐसा नहीं है कि सत्ता या बाजार के दबाव मे खबरें अखबारों ना चैनलों से पहले नहीं गिराई जाती थी, पर हाल में जिस तरह से एनडीटीवी ने लचर तर्क देकर पूर्व गृहमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम के इंटरव्यू को प्रोमो दिखाने के बाद रोका है, वह स्वतंत्र पत्रकारिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है. गौरतलब है कि हमारी पीढ़ी हज़ार कमियों के बावजूद भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता में एनडीटीवी को एक मानक के रूप में देखते बड़ी हुई है. एक-दो अपवाद को छोड़ कर उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद जिस तरह से भारतीय मीडिया सेना और सत्ता से सवालों से परहेज करता रहा है, उससे लगता है कि आने वालों दिनों में पत्रकारिता सरकारी प्रेस रीलिजों के भरोसे ही चलेगी.
पाकिस्तान और सेना के मामले में भारतीय मीडिया राज्य और सत्ता के नज़रिए से ही ख़बरों को देखने और उन्हें विश्लेषित करने को अभिशप्त लगता है.
जाहिर है कि सीमा रेखा पर किसी चैनल का कैमरा नहीं लगा है और संघर्ष के वक्त पत्रकार वहाँ नहीं थे. खबरें ‘विश्वस्त सूत्रों’ से ही मिलती है, पर विश्लेषण करने, सवाल पूछने को तो हमारे स्वनामधन्य पत्रकार-संपादक स्वतंत्र हैं!
कुछ वर्ष पहले नोम चोमस्की ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि पाकिस्तानी मीडिया भारतीय मीडिया से ज्यादा स्वतंत्र है और उन पर सत्ता का दवाब अपेक्षाकृत कम है. संभव है इसमें हमें अतिरंजना लगे. पर सर्जिकल स्ट्राइक्स के बाद जिस तरह से पाकिस्तानी की मीडिया सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत दिखाई है, ये सच लगता है.
हाल ही में पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग होने और सेना और राजनेताओं के बीच उभरे मतभेद की खबर डॉन अख़बार के पत्रकार-विश्लेषक सिरिल अलमेइडा ने प्रकाशित की थी. इस पर पाकिस्तानी सरकार-सेना ने जो रुख अपनाया उसकी मजम्मत करने में वहाँ की अखबारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी. मसूद अजहर और हाफिज सईद के ऊपर ‘राष्ट्रीय हितों’ को ध्यान में रखते हुए कोई कार्रवाई नहीं करने पर सवाल उठाते हुए ‘द नेशन’ ने लिखा: सरकार और सेना के अलाकमान प्रेस को लेक्चर देने की कि वह किस तरह अपना काम करे, कैसे हिम्मत कर रहे हैं? एक प्रतिष्ठित रिपोर्टर के साथ अपराधी की तरह बर्ताव करने की वे हिम्मत कैसे कर रहे है? कैसे वे हिम्मत कर रहे हैं यह बताने का कि उनके पास एकाधिकार है, योग्यता है यह घोषणा करने का कि पाकिस्तान का ‘नेशनल इंटरेस्ट’ क्या है? 

क्या ऐसी किसी प्रतिक्रिया की उम्मीद आज हम भारतीय मीडिया से कर सकते हैं? गौरतलब है कि पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीएनएन न्यूज 18 को दिए इंटरव्यू के दौरान कहा था: मीडिया अपना काम करता है, वह करता रहे. और मेरा यह स्पष्ट मत है कि सरकारों की, सरकार के काम-काज का कठोर से कठोर analysis होना चाहिए, criticism होना चाहिए, वरना लोकतंत्र चल ही नहीं सकता है.
पर लोकतंत्र ठीक से चले इसकी फिक्र किसे है!

Wednesday, August 24, 2016

हवेली में भित्तिचित्र

जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर की एक प्रसिद्ध किताब है- प्रोटेस्टेंट इथिक एंड स्पिरीट ऑफ कैपिटलिज्म. इस किताब में वे लिखते हैं कि किस तरह प्रोटेस्टेंट संबंधी धार्मिक मान्यताओं से यूरोप में पूंजीवाद के प्रचार-प्रसार को बल मिला. इसमें वे ईसाई धर्म की इस शाखा की उन विशेषताओं को रेखांकित करते हैं जो आधुनिक पूंजीवादी विचारधारा की प्रेरक हैं. वर्षों पहले समाजशास्त्र के एक शिक्षक ने मारवाड़ी बनिया समुदाय के भारतीय पूंजीवाद में योगदान और उनके रीति-रिवाजों, रहन-सहन, धर्म से उनके जुड़ाव और रिश्तों की बात की थी. पता नहीं, इस बारे में कोई अध्ययन किया गया है या नहीं. अमूमन भारत के अकादमिक जगत में कारोबारी घराने, महाराजाओं के बारे में एक तरह की उपेक्षा का भाव है, जिस वजह से इनके बारे में कम ही शोध उपलब्ध हैं.

राजस्थान के शेखावटी इलाके ने भारत में कारोबारियों के कई घराने दिए हैं. बिड़ला, मित्तल, बजाज, गोयनका, झुनझुनवाला, डालमिया, पोद्दार, चोखानी आदि की जड़ें इन्हीं इलाकों से जुड़ी हैं. आधुनिक भारत के निर्माण में इन कारोबारियों की भूमिका असंदिग्ध है. इन घरानों के कई कारोबारी आजादी के दौरान राष्ट्रीय आंदोलनों से भी जुड़े हुए थे. उन्नीसवीं सदी में अफीम, कपड़ों, मसालों के कारोबार से इन इलाकों के कारोबारियों ने अकूत धन अर्जित किया था. इन धनिकों की हवेलियों को देखने पर उनकी संपत्ति, माल-असबाब की एक झलक मिलती है, हालांकि हवेलियों से कारोबारियों के कला-संस्कृति के प्रति रुझान, उनके दृष्टिकोण का भी पता चलता है.

सीकर से तीस-चालीस किलोमीटर दूर मंडावा और नवलगढ़ इलाकों में भारत के चर्चित इन कारोबारी घरानों की हवेलियां स्थित हैं. तकरीबन सौ साल पहले इनके बाशिंदे कारोबार की खोज में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और सुदूर देश चले गए, तब से ये हवेलियां वीरान पड़ी हैं. कई हवेलियों पर ताले जड़े हैं और कुछ रखवालों, चौकीदारों के भरोसे हैं. ऐसी ही एक हवेली में रह रहे एक चौकीदार ने मुझे बताया कि हवेली के मालिक-कारोबारी दो-चार साल में मांगलिक कार्यों के दौरान अपने कुल देवता के दर्शन के लिए आते हैं.

बहरहाल, इस समय जो चीज इन हवेलियों को विशिष्ट बनाती है, वह है इन पर बने भित्ति-चित्र. इन हवेलियों की दीवारों, मेहराबों, खंभों पर बने करीब सौ-डेढ़ सौ साल पुराने इन भित्ति-चित्रों की शैली और इनका सौंदर्य मनमोहक है. साथ ही राजस्थानी लोक कथाओं, पशु-पक्षी, मिथकों, धार्मिक रीति-रिवाजों, आधुनिक रेल, जहाज, मोटर, ईसा मसीह आदि के चित्रों का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक महत्त्व भी है. इन चित्रों से उस जमाने में लोगों के रहन-सहन, सामाजिक स्थिति, संस्कृतियों के मेल-जोल का भी पता चलता है. अनाम कलाकारोंके बनाए इन भित्ति-चित्रों में इस्तेमाल किए गए रंग प्राकृतिक हैं. मसलन, लाल के लिए सिंदूर, काले रंग के लिए काजल, नीले रंग के नील का प्रयोग किया गया है. हालांकि बाद के दिनों में इन चित्रों के संरक्षण के दौरान सिंथेटिक रंगों का प्रयोग किया जाने लगा. जिस तरह मिथिला पेंटिंग में मछली, वर्ली पेटिंग में मोर, पट चित्र में घोड़े का चित्रण कलाकार बार-बार करते हैं, उसी तरह शेखावटी के इन भित्ति-चित्रों में ऊंट का चित्रण खूब किया गया है.


इन हवेलियों में प्रवेश करने पर ऐसा लगता है जैसे कि यह कोई कला-दीर्घा हो. पर कुछ हवेलियों को छोड़ कर (मंडावा के किले, पोद्दार म्यूजियम, मोरारका म्यूजियम आदि) बाकी की हालत खस्ता है. कुछ हवेलियों में होटल खोल दिए गए हैं. उपेक्षा और वर्षों धूल, हवा, प्रदूषण और रख-रखाव के अभाव में चित्रों से रंग उड़ गए हैं तो कहीं भीत उखड़ रही है. चित्रकार भैरोंलाल स्वर्णकार पोद्दार म्यूजियम के पुनर्नवा अभियान में वर्षों से जुटे हुए हैं. वे बताते हैं कि इस हवेली के मालिक ने बीसवीं सदी की शुरुआत में इन दीवारों पर रेलगाड़ी का अंकन तब करवाया था, जब इस इलाके के लोग रेलगाड़ी से अपरिचित थे. कई भित्ति-चित्र ऐसे हैं जिन्हें देख कर समय और काल के साथ इन चित्रों के रिश्ते को देख कर अचंभा होता है. मुझे उन्होंने बताया कि इस म्यूजियम में अब तक करीब आठ सौ भित्ति-चित्रों का संरक्षण किया जा चुका है. करीब दो सौ हवेलियों में इन भित्ति-चित्रों का एक ऐसा संसार फैला है जो अनमोल है. पूरे देश में एक साथ हजारों भित्ति-चित्र शायद ही कहीं और बिखरे पड़े हों!


पिछले दिनों चर्चित फिल्म पीकेऔर बजरंगी भाईजानकी शूटिंग इन इलाकों में हुई, जिसके कारण एक बार फिर से ये इलाके चर्चा में आए हैं. साथ ही पिछले कुछ वर्षों में विदेशी सैलानियों के बीच यह इलाका तेजी से एक पर्यटक स्थल के रूप में उभरा है. धनकुबेरों को अपने इस पुराने ठौर से आज कोई खास मतलब नहीं दिखता है. आस-पड़ोस के लोगों और सरकार के लिए भी कला के इस खजाने का कोई मूल्य नहीं है और न ही शायद उन्हें इसके संरक्षण की कोई चिंता है.

(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे, 24 अगस्त 2016 को प्रकाशित)

Saturday, July 30, 2016

राष्ट्र सारा देखता है

पूरी दुनिया में पिछले दो दशकों में भूमंडलीकरण के आने से राष्ट्र-राज्य की शक्ति में कमी आई है.  हालांकिराष्ट्र-राज्य की शक्ति में आई कमी के साथ-साथ इन्हीं वर्षों में दुनिया भर में दक्षिणपंथी ताकतों और उग्र-राष्ट्रवाद  का उभार भी हुआ है. पिछले महीने यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने के लिए हुए जनमत संग्रह दक्षिणपंथी ताकतों की मजबूती और राष्ट्र-राज्य की कमजोर होती शक्ति को फिर से पाने का ही एक प्रयास है. अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के इमिग्रेशन, मुस्लिम समुदाय को लेकर दिए गए भड़काऊ बयानों को हम इसकी अगली कड़ी के रूप में देख सकते हैं.

भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में इसकी अभिव्यक्ति पिछले कुछ महीनों से विभिन्न मुद्दों (लव जिहाद, बीफ बैन, जेएनयू, कश्मीर) के बहाने राष्ट्रवाद के ऊपर चल रही बहस के रुप में भी देखी जा सकती है.

इस बहस के पीछे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की  राजनीति,  आत्म और अन्य की एकांगी व्याख्या और भारतीय इतिहास की औपनिवेशिक समझ-बूझ की एक बड़ी भूमिका है, जो भारतीय इतिहास को हिंदू, मुस्लिम और ब्रितानी हुकूमतों के काल के आधार पर विभाजित करके देखती रही है.

बहरहाल, ये सारी बहसें अखबारों, खबरिया चैनलों और खास कर प्राइम टाइम’ के माध्यम से जिस रूप में हमारे सामने आ रही है, वह एक अलग विश्लेषण की मांग करता है. दुनिया भर में बाजार और सूचना क्रांति को भूमंडलीकरण का मुख्य औजार माना गया है.  प्रसंगवशभारत में भूमंडलीकरण के बाद ही भाषाई अखबारों और खबरिया चैनलों का अभूतपूर्व प्रसार हुआ.

सवाल है कि भारत में राष्ट्रवाद और मीडिया के इस संबंध को हम किस रूप में देखेंक्या यह भूमंडलीकरण के साथ ही सहज रुप से विकसित हुए हैंया भारतीय संदर्भ में इसकी कोई ख़ास विशेषता है?

राष्ट्रवाद के उदय और उभार के पीछे बेंडिक्ट एंडरसन ने प्रिंट पूंजीवाद’ की भूमिका को रेखांकित किया है. उनका मानना है कि राष्ट्र की अवधारणा हमारी कल्पना में ही साकार होती हैऔर इसे साकार बनाने में मास मीडिया की एक बड़ी भूमिका होती है. हालांकि, भारत में भाषाई मीडिया और खास तौर पर खबरिया चैनल जिस तरह के राष्ट्रवाद को इन दिनों बढ़ावा दे रहे हैं वह उग्र-राष्ट्रवाद का नमूना है. पिछले दिनों कश्मीर में चरमपंथी बुरहान वानी के सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हुई मौत और बाद के घटनाक्रम पर कुछ न्यूज चैनलों के कवरेज और उन्मादी बहस-मुबाहिसा को देख कर कश्मीर के आईएएस अधिकारी शाह फैसल ने आक्रोश में इसे न्यूजरूम नैशलनिज्म’ का नाम दियाजो हिंदुस्तान में वाद-विवाद-संवाद की पुरानी परंपरा को कुंद करता है.  यह राष्ट्रवाद कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग तो मानता हैपर जब कोई कश्मीर भू-भाग में रहने वाले कश्मीरियों की वेदना-संवेदना का जिक्र करता है तो वह राष्ट्रविरोधी करार दिया जाता है. 

उल्लेखनीय है कि भारत में 19वीं सदी के आखिरी और 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने राष्ट्रवाद को खूब बढ़ावा दिया था. यह राष्ट्रवाद औपनिवेशिक शक्तियों के खिलाफ था, पर आज़ादी के बाद एक संप्रभु राष्ट्र-राज्य में राष्ट्रवाद और मीडिया का वहीं स्वरूप नहीं रह गया जो आजादी के संघर्ष के दिनों में था. हालांकि, आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में अखबारफिल्म और सरकारी रेडियो- टेलीविजन राष्ट्र निर्माण में सहयोग दे रहे थे, पर उनमें उग्रता नहीं थीं. मीडिया का प्रसार और पब्लिक स्फीयर में उसकी भूमिका भी सीमित थी. 

पिछले दशकों में हिंदी क्षेत्र में मंडल-कमंडल की एक नई राजनीति सामने आई. साथ ही लोगों की आय और शिक्षा में भी बढ़ोतरी हुई और एक नया पाठक-दर्शक वर्ग उभरा है, जिसे हम नव मध्यम वर्ग कह सकते हैं. मीडिया की पहचान एक हद तक इसी वर्ग (टारगेट आडिएंश) से जुड़ी हैं. इस वर्ग में बहुसंख्यक दलित, आदिवासी, किसान, मजदूर और महिलाएँ शामिल नहीं हैं. 

उदारीकरण के बाद खुली अर्थव्यस्था में मीडिया पूंजीवाद का प्रमुख उपक्रम हैलोकतंत्र की एक मजबूत संस्था है, उसकी एक स्वायत्त संस्कृति है. जब भी हम मीडिया और राष्ट्रवाद के संबंधों की विवेचना करेंगे तो हमें पूंजीवाद और मीडिया के इस द्वंद्वात्मक रिश्तों की भी पड़ताल करनी होगी. निस्संदेह, हाल के वर्षों में बड़ी पूंजी के प्रवेश से मीडिया की सार्वजनिक दुनिया  का विस्तार हुआ है लेकिन पूंजीवाद के किसी अन्य उपक्रम की तरह ही मीडिया उद्योग का लक्ष्य और मूल उदेश्य पाठकों की संख्या को बढ़ाना, टीआरपी बटोरना और मुनाफा कमाना है.   

साथ ही हमें इन मीडिया संस्थानों के संपादकों-मालिकों की राजनीतिक और कारोबारी हितों को भी रेखांकित करना होगा. क्या यह अनायास है कि पिछले कुछ वर्षों में मीडिया घराने के मालिक संसद में पहुँचने के लिए लालायित रहते हैं. कुछ मालिक-संपादक बकायदा राजनीतिक पार्टियों के साथ मंच साझा करने में, उनके करीबी कहलाने में गर्व महसूस करते हैं. जाहिर हैऐसे में राष्ट्रवाद और संस्कृति की उनकी समझ उनके चैनलों पर उनकी राजनीति से प्रेरित दिखेगी. बात चाहे जेएनयू की होकश्मीर की हो या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की.

साथ ही, राष्ट्रवाद जैसे जटिल मुद्दे के विवेचन-विश्लेषण में मीडियाकर्मियों की शिक्षण-प्रशिक्षण की भी अपनी भूमिका है. पिछले दो दशकों में जिस तरह से मीडिया का उभार हुआ है और जिस तरह राजनीति मीडिया जनित होकर प्राइम टाइम के माध्यम से हमारे सामने आती है वह पत्रकारों के पेशेवर होने की मांग करती है. वर्तमान में मीडिया में पेशेवर नैतिकता की दरकार किसी भी अन्य पेशे से ज्यादा है. दुर्भाग्यवशभारत में मीडिया के अभूतपूर्व फैलाव के बाद जो मीडिया संस्कृति विकसित हुई है उसमें अभी भी पत्रकारों के शिक्षण-प्रशिक्षण पर विशेष जोर नहीं है. फलत: कई बार पत्रकार राजनीतिक पार्टियों के पैरोकार बन जाते हैं और उनके एजेंडे को ही मीडिया का एजेंडा मान लेते हैं.