Wednesday, June 14, 2017

मृत्यु-गंध में लिपटी बगूगोशे की ख़ूशबू

मृत्यु-गंध कैसी होती है/ वह एक ऐसी खुशबू है/ जो लंबे बालों वाली/ एक औरत के ताजा धुले बालों से आती है/ तब आप उस औरत का नाम याद करने लगते हैं/ लेकिन उसका कोई नाम नहीं (कुमार विकल)
बगूगोशेकी ख़ूशबू में मृत्यु-गंध है. स्वदेश दीपक इस गंध से वर्षों परिचित रहे. इस आत्मकथात्मक कहानी में वे लिखते हैं: सात साल लंबी आग. डॉक्टर तो दूर, पीर-फकीर भी न बुझा पाए. तब सारे दृश्य कट गए थे.यह सात साल 1991-1997 के बीच के वर्ष हैं. कोर्ट मार्शल (1991) नाटक से उनकी ख्याति इस बीच फैलती चली गई पर वे बेख़बर रहे, ‘मायाविनीकी तलाश में भटकते रहे. उस मायाविनी की छाया उनकी मानसिक बीमारी के यथार्थ से जुड़ कर एक ऐसा साहित्य रच गया जो हिंदी साहित्य में अद्वितीय है.
और जब इस मृत्यु गंध की तासीर कुछ कम हुई तब हमने-मैंने मांडू नहीं देखापाया और कुछ कहानियाँ जो अब बगूगोशेसंग्रह में शामिल है. जैसा कि उनके पुत्र और पत्रकार सुकांत दीपक कहते हैं मांडू सचमुच उनके खंडित जीवन का कोलाज है.
स्वदेश दीपक हिंदी साहित्य और समाज के लिए एक किवदंती बन चुके हैं. हिंदी की चर्चित रचनाकार कृष्णा सोबती इस कहानी संग्रह के मुख्य पृष्ठ पर लिखती हैं: स्वदेश तुम कहां गुम हो गए. बगूगोशे के साथ फिर प्रकट हो जाओ.पर क्या अब वे लौटेंगे? कोई उम्मीद? सुकांत कहते हैं-बिलकुल नहीं!
अब तो स्वदेश दीपक को इस मायावी दुनिया को छोड़, घर से निकले 10 वर्ष से ज्यादा हो गए.
दूधनाथ सिंह की एक किताब है, जो उन्होंने निराला के रचनाकर्म और जीवन के इर्द-गिर्द लिखी है-आत्महंता आस्था. रचनाकार के जीवन और रचना के बीच आत्म संघर्ष को यह किताब हिंदी साहित्य के एक और किवदंती पुरुष निरालाके संदर्भ में बख़ूबी पकड़ती है. यह स्वदेश दीपक के बारे में भी सच है. स्वदेश दीपक के अंदर एक आत्महंता आस्था थी जो उनकी रचनाओं में भी दिखाई देती है. बगूगोशे कहानी में माँ अपने प्रोफेसर बेटे से कहती है: काका! कितने अंगारे हैं तेरे मुंह में. मीठे बोल भी बोल लिया कर. कभी-कभी एक चिनगारी से आग लग जाती है.
स्वभाव से बेहद गुस्सैल स्वदेश दीपक मिजाज से नक्सली थे. उनकी राजनीतिक पक्षधरता स्पष्ट थी. वे अन्याय के ख़िलाफ़ थे. जीवन में और रचना में.
मैंने मांडू नहीं देखापढ़ते हुए लगता है कि यह एक रचनाकार की सिद्धावस्था है. वह ट्रांसमें है. उसकी भाषा ऐसी है जैसे कोई hallucination की अवस्था में बोलता, बरतता है. छोटे-छोटे टुकड़ों में (epileptic language). बिना इस बात की परवाह किए कोई उसकी भाषा समझ रहा है या नहीं. बेपरवाह और बेखौफ़. अंतर्मन में ख़ुद से लड़ता
सुकांत ने पिछले साल अपने पिता के ऊपर एक लेख में लिखा: 7 जून 2006 को टहलने के लिए वे निकले और वापस लौट कर नहीं आए. जब हम (मैं, मेरी माँ और बहन) इस बात से आश्वस्त हो गए कि वे अब कभी घर लौट कर नहीं आएँगे तब हमने सुकून से गहरी साँस ली. हमारे लिए लगभग एक उत्सव की तरह यह था.
सुकांत क्या अपने पिता को मिस करते हैं? सुकांत की आवाज़ में एक टूटन सी मुझे सुनाई देती है. वे कहते हैं: वह आदमी मेरा बहुत बड़ा दोस्त था. भले मैं कुछ समझूं या नहीं वह अपनी रचना का पहला ड्राफ्ट मुझे सुनाता था.

मेडिकल साइंस की भाषा में वे बायपोलर डिसआर्डरके मरीज थे और कई बार आत्महत्या की कोशिश कर चुके थे. वह उग्रता और अति संवेदनशीलता के बीच, मानवीय संबंधों और अपनी रचनाओँ के बीच एक तालमेल की कोशिश में भी लगे थे. इस संग्रह में शामिल बनी-ठनीकी शुरुआत इन पंक्तियों से होती है: जिस दिन डॉक्टर मेजर मुक्ता शर्मा से पहली बार मिला, वह गरमियों की शाम थी. जिस दिन डॉक्टर मेजर मुक्ता शर्मा से नहीं मिला, वह भी गरमियों की शाम थी. अगला दिन.पहली बार पढ़ते हुए एक बेतुकापन इनमें नज़र आता है. ऐसी पंक्तियाँ निर्मल वर्मा की कहानियों में भी ख़ूब दिखाई देती है. प्रसंगवश, सुकांत बताते हैं कि निर्मल वर्मा उनके मित्र थे और स्वदेश ने निर्मल वर्मा के साथ वर्ष 2006 में उनकी मुलाक़ात अरैंज करवाई थी
इस संग्रह में एक अधूरी कहानी है-समय खंड. इसका एक पात्र मधुमक्खियों के दंश से पीड़ित है और मरनासन्न है. वह कहती है: मुझे बिलकुल दिखाई नहीं दे रहा. मैं अंधी हो गई हूँ, क्या मैं मर जाऊँगी. आय डोंट वांट टू डाई प्लीज़!यह ठीक वैसी ही कराह है जैसी मेघे ढाका ताराफ़िल्म के आख़िर में सुनाई पड़ती है- दादा, आमि बचते चाई.
इस संग्रह की कहानियों में आधी-अधूरी ज़िंदगी को रचा गया है. और एक रचनाकार के रूप में यह हमें स्वदेश दीपक से रू-ब-रू होने का मौका देता है. रचना का कालखंड 2000-2005 के बीच है. इसी अवधि में वे मांडूभी रच रहे थे.
इस संग्रह को पढ़ते हुए लगातार यह बोध बना रहता हैजीवन है, जैसा भी है बेहतर है, ना होने से.

नोट: इस संग्रह में स्वदेश दीपक की अंतिम आठ कहानियाँ संकलित है. क़रीब दो वर्ष तक राजकमल प्रकाशन ने इसे अपने पास रखा और अब जाकर वह जगरनॉट बुक्स से प्रकाशित हुई है.

(जानकी पुल और प्रभात खबर (23 जून 2017) में प्रकाशित)

Friday, June 09, 2017

आपातकाल के 40 साल बाद: मीडिया और मोदी सरकार

मार्शल मैक्लूहन ने एक जगह लिखा है कि नेपोलियन का कहना था कि तीन ऐसे अख़बार जो विपक्ष में हो उनसे ज्यादा भयभीत होना चाहिए, बनिस्बत एक हजार संगीनों के (Three hostile newspapers are more to be feared than a thousand bayonets.)”. पिछले दिनों जब सीबीआई ने एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के घर छापा मारा तब से मुझे यह पंक्ति याद आती रही. कमियों के बावजूद एनडीटीवी निस्संदेह भारतीय टेलीविजन समाचार उद्योग में आज भी सबसे भरोसेमंद और पेशेवर पत्रकारिता का उदाहरण है.

सवाल है कि मोदी सरकार एनडीटीवी के ऊपर छापा के मार्फ़त क्या संदेश देना चाहती है? प्रथम द्ष्टया वह चाहती है कि एनडीटीवी के मालिकों की रीढ़ कमान हो जाए. याद कीजिए कि आपातकाल के दिनों में लालकृष्ण आडवाणी ने मीडिया के बारे में क्या कहा था. उनका कहना था- भारतीय प्रेस से झुकने को कहा गया तो वह रेंगने लगी!’

वर्तमान में जब कई समाचार चैनल, अख़बार सरकार के एक इशारे पर बिछने को तैयार हैं, वहीं एक हद तक एनडीटीवी पत्रकारिता के मूलधर्म को अपनाए हुए है. सत्ता से सवाल करने की ताकत अभी उसकी चुकी नहीं है. पर मोदी सरकार और उसके कारिंदे सवाल से घबराते हैं. क्या यह महज संयोग है कि सीबीआई के छापे से कुछ दिन पहले एनडीटीवी के एक प्रोग्राम में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा बार-बार एनडीटीवी केएजेंडा को एक्सपोज करने की बात कर रहे थे जब उनसे उत्तर-पूर्व में बीफ बैन के बाबत सवाल किया गया?अव्वल तो एनडीटीवी के एंकर निधि राजदान को पूछ ही लेना चाहिए था कि संबित किस एजेंडे की बात कर रहे हैं और क्या एक्सपोज करना चाहते थे?

जब ज्यादातर मीडियाकर्मी प्रधानमंत्री मोदी के साथ सेल्फी लेकर ही संतुष्ट हो जाते हो ऐसे में मोदी सरकार से सवाल पूछने की जरूरत क्या हैऔर इस बात से किसी को आश्चर्य नहीं कि ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी भले लाख भाषण देंमन की बात कहें इन तीन वर्षों में एक भी प्रेस कांफ्रेंस करने की उन्होंने जहमत मोल नहीं ली है.

जैसा कि प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस के एक लेख में लिखा है कि एनडीटीवी के तथाकथित घोटालों को सामने लाना या उसे दुरूस्त करना सीबीआई के छापे का उद्देश्य नहीं है, बल्कि मीडिया की संभावना पर ही प्रश्नचिह्न खडा करना है.’ मोदी सरकार शुरुआती दिनों से ही मीडिया की वैधता पर सवाल खड़े करती रही है. एक मजबूत विपक्षी पार्टी के अभाव में मोदी सरकार मीडिया (जिस भी स्वरूप में वह है) को ही विपक्ष मानती है. यदि इसे वह खारिज करने में सफल हुई तो फिर उसे भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं!

सरकार के मंत्री कभी पत्रकारों को प्रेस्टिटूयट कहते हैं तो किसी एंकर के कार्यक्रमों का बॉयकॉट. जबकि प्रधानमंत्री मोदी खुद पिछले साल एक इंटरव्यू के दौरान कह गए- मेरा स्पष्ट मत है कि सरकारों की, सरकार के काम-काज का, कठोर से कठोर एनालिसिस होना चाहिए, क्रिटिसिज्म होना चाहिए. वरना लोकतंत्र चल ही नहीं सकता है.

पर जैसा कि वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार और एंकर करण थापर कहते हैंइस सरकार के प्रवक्ताओं और मंत्रियों ने मेरे कार्यक्रम में आना बंद कर दिया है. एक प्रवक्ता ने स्पष्ट कहा कि पार्टी आपके सवालों को पसंद नहीं करती और आपके एटिटयूड से भी दिक्कत है.

पर यदि सरकार पत्रकारों के सवालों को पसंद करने लगे, उसकी पीठ थपथापने लगे तो किसी भी लोकतंत्र में पत्रकारों के लिए यह अच्छी ख़बर नहीं मानी जा सकती.

सीबीआई के इस छापे को सरकार की मीडिया नीति, मीडिया की अवहेलना और उसकी वैधता को खारिज करने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए. और गहरे स्तर पर इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए आसन्न संकट के रूप में पढ़ा जाना चाहिए.


Monday, May 01, 2017

नेशनल एंथम के दौर में फिल्म पत्रकारिता

(आजकल ऐसा फील गुड माहौल है कि कोई कुछ भी लिख दे कोई उसकी परवाह नहीं करता. पत्रकारिता के नाम पर जमकर पीआर किया जा रहा है किसी को कोई परवाह नहीं. ऐसे में पत्रकारिता में पीएचडी, गंभीर अध्येता और मीडियाकर्मी अरविन्द दास की यह टिपण्णी पढ़िए. देखिये कि वे कितनी गहराई से समकालीन पत्रकारिता पर नजर रखते हैं- मॉडरेटर)
.................................................................

पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता में येलो जर्नलिज्म, एमबेडेड जर्नलिज्म के अलावे एक नया टर्म भी सुनाई देने लगा है-कैलेंडर जर्नलिज्म! जिसका मतलब किसी सेलिब्रिटी के जन्म दिवस, स्मृति शेष, एनिवरसरी आदि को देख कर लेख, फीचर लिखना या कोई कार्यक्रम प्रोडूयस करना है.

जब पत्रकारिता में न्यूज का मतलब ही मनोरंजन हो गया हो तो इस तरह की पत्रकारिता पर किस पत्रकार-संपादक को भला आपत्ति होगी! लेकिन जब कोई लेखक-समीक्षक इस कैलेंडर जर्नलिज्म के मुताबिक लेख लिखे और उसे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कोई वेबसाइट प्रकाशित करे तो लेखक-संपादक से अपेक्षा होती है कि एक बार उसे पब्लिक स्फीयर में लाने से पहले देख-परख ले, संपादित कर ले. और संभव हो तो सुधार ले. पर इस भागमभाग पत्रकारिता के दौर में किसके पास फुरसत है.

बहरहाल, पिछले दिनों फिल्म समीक्षक और लेखक मिहिर पांड्या ने अपने फेसबुक वॉल पर एक अपना लिखा लेख शेयर किया (http://www.thelallantop.com/bherant/sneha-khanwalkar-music-director-of-gangs-of-wasseypur-oye-lucky-lucky-oye-and-khoobsurat-birthday-spacial/) जिसे पिछले साल लल्लन टॉप ने छापा था (इपंले भी लल्लन टॉप के लिए लेख-टिप्पणी आदि लिखता रहा है). यह लेख स्नेहा खानवलकर के फिल्मी संगीत में योगदान के बरक्स उनके जन्मदिन को ध्यान में रख कर लिखा गया है और 28 अप्रैल को मिहिर ने फिर से सेलिब्रेट करते हुए शेयर किया. निस्संदेह, स्नेहा नए दौर की उभरती हुई संगीतकार है जिन्होंने फिल्मी संगीत में लोक धुनों का जम कर इस्तेमाल किया है . हालांकि, मिहिर पांड्या ने जिस तरह से उनकी संगीत यात्रा की समीक्षा की है वह समीक्षा के नए प्रतिमान गढ़ता प्रतीत होता है.

मिहिर ने लिखा है कि गैंग्स ऑफ वासेपुरमें जब स्नेहा ने वुमनिया गाने को संगीत में पिरोया तब वुमनिया नए समय का एंथमबन गया.  पर यह एंथम कैसे बन गया यह लेख पढ़ कर स्पष्ट नहीं हो पाया. सच में ऐसा है क्या? कम से कम उत्तरी बिहार के हमारे इलाके में अभी भी शादी-विवाह या अन्य मौके पर शारदा सिन्हा या भोजपुरी गाने की ही धूम है!
मिहिर आगे लिखते हैं कि इस गीत की बदमाशी में एक पवित्रता है’. कहने को तो कुछ भी लिखा-कहा जा सकता है, पर चूँकि मिहिर जैसे सुधी समीक्षक लिख रहे हैं तो मैं सोचने लगा कि बदमाशी और पवित्रता का क्या नाता है (जैसे निष्ठा का विष्ठा के साथ)खिलंदड़ापन इस गीत के बोल में हैं (कनिया, पटनिया, चौन्निया, वूमनिया आदि), जिसे वरुण ग्रोवर ने लिखा है जो तुकबंदी के अलावे कुछ नहीं. संगीत भी सामन्य ही है, मेरी समझ में. ढोलक की थाप की प्रमुखता है.

हां, इस गीत में मुख्य गायिका रेखा झा का स्वर निस्संदेह उभर के आता है. वैसे, मिथिला में (जहाँ की रेखा झा है) आज भी लोक में गीत-संगीत की पंरपरा है और यह सामूहिकता को लिए ही होता है. मिहिर लिखते हैं-स्त्री स्वर की सामूहिकता जैसे उसे आज़ाद कर देती है.  लोक में कला सामूहिकता में ही आकार पाती है. इसमें विशिष्ट जो कुछ भी है वह सबका है. और कला तो आज़ाद ही करेगी, बांधेगी नहीं. मिथिला में नई वधूएँ आज भी जब गौने के बाद आती हैं तो उन्हें गाना गाना पड़ता है. और फिर कोरस में दियादनी-गोतनी, ननद-सास की आवाज़ शामिल होती है.

इसी तरह लेख में मिहिर एलएसडीफिल्म के गीत आई कांट होल्ड इटको गर्ल्स हॉस्टल्स का नेशनल एंथमकहते हैं. इसे स्नेहा ने गाया भी है. क्या कोई किसी गाने के लिए नेशनल एंथमविशेषण का इस्तेमाल कर सकता है. क्या कोई और विशेषण हिंदी के शब्दकोष में नहीं बचे हैं! स्नेहा के अगले शाहकार के लिए कौन सा विशेषण बचेगा फिर. ले-दे के तो एक ही नेशनल एंथम है हमारे पास!

और अंत में, इस गीत को गाने के लिए मिहिर स्नेहा को ग्रैमी, ऐमी टाइप कोई पुरस्कारदिए जाने की सिफारिश कर हैं. पता नहीं, फिर देरी क्यों हो रही है.
(जानकी पुल पर प्रकाशित)

Wednesday, April 12, 2017

चंपारण सत्याग्रह का कलमकार: पीर मुहम्मद मूनिस

पीर मुहम्मद मुनीस
आधुनिक भारत के इतिहास की तारीख़ में अप्रैल 1917 का भारी महत्व है. सौ साल पहले इसी महीने मोहनदास करमचंद गाँधी ने बिहार के चंपारण में जाकर सत्याग्रह की शुरुआत की थी. भारत की धरती पर अपने पहले अहिंसक सत्याग्रह के बारे में उन्होंने लिखा है- मैंने वहाँ ईश्वर का, अहिंसा का और सत्य का साक्षात्कार किया.भले ही गाँधी के लिए चंपारण अनजाना था, बिहार की जनता, चंपारण के लोक के लिए वे अपरिचित नहीं थे.

चंपारण के एक युवा पत्रकार, पीर मुहम्मद मूनिस (1882-1949) ने उन्हें चंपारण आने का निमंत्रण देते हुए एक पत्र में लिखा था- हमारी दुख भरी गाथा उस अफ्रीका के अत्याचार से, जो आप और आपके अनुयायी वीर सत्याग्रही भाइयों और बहनों के साथ हुआ- कहीं अधिक है.इस पत्रकार का नाम न तो गाँधी की आत्मकथा में मिलता है, न ही आधुनिक भारत के किसी इतिहास में. हाल के वर्षों में छिटपुट कुछ लेखों में गाँधी को चंपारण की धरती पर लाने में सूत्रधार की भूमिका में खड़े राजकुमार शुक्ल के साथ चलते-चलते इस पत्रकार की भी चर्चा कर दी जाती है. यहाँ तक कि बिहार की पत्रकारिता का इतिहासलिखने वालों की नज़र में भी वे नहीं समा पाते!

मेरे लिए आश्चर्य की बात है कि गाँधी, जो खुद एक पत्रकार भी थे, चंपारण सत्याग्रह के कलमकार, पत्रकार, सत्याग्रही पीर मुहम्मद मूनिस का उल्लेख करने से कैसे चूक गए!

मूनिस कानपुर से निकलने वाले पत्र प्रताप’ (संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी, 1913-31) के संवाददाता थे. वर्ष 1914 से वे नियमित रूप से प्रताप में पत्रों, लेखों, टिप्पणियों के माध्यम से नीलहों के आतंक, अत्याचार, किसानों की परेशानी, शोषण और उनके संघर्ष को दुनिया के सामने ला रहे थे. इनमें कई लेख उन्होंने छद्म नाम दुखी आत्मासे भी लिखा. गाँधी के चंपारण आने से पहले ही वे प्रताप में चंपारण में अंधेर’ (13 मार्च 1916), ‘चंपारण की दुर्दशा’ (10 अप्रैल 1917) आदि लेख लिख चुके थे. उन्होंने गाँधी की चंपारण यात्रा की रिपोर्ट भी प्रताप को भेजी थी. प्रसंगवश इसी दौर में बिहारीअखबार (1912) में संपादक बाबू महेश्वर प्रसाद ने चंपारण के रैयतों पर नीलहों के दमन की रिपोर्टों, टिप्पणियों को प्रकाशित किया जिसकी वजह से उन्हें अपने संपादक पद से हाथ धोना पड़ा था. मूनिस के लिए इस तरह की रिपोर्ट लिखना आसान नहीं था जिसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा.

मूनिस के लेखों का संकलन-संपादन करने वाले पत्रकार श्रीकांत लिखते हैं: मूनिस अरबी का शब्द है जिसका अर्थ है मददगार, साथी, कामरेड. मूनिसपीर मुहम्मद अंसारी का तखल्लुस (उपनाम) था. अपने नाम की सार्थकता उन्होंने जीवनपर्यंत सिद्ध की. जैसा नाम वैसा काम.’’
प्रभात प्रकाशन, दिल्ली  से प्रकाशित


जब देश में हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान की बात की जा रही थी तब मूनिस हिंदुस्तानी भाषा की वकालत कर रहे थे. बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का 15वां अध्यक्ष उन्हें बनाया गया था और वे इस संस्थान के संस्थापकों में शामिल थे. भाषा के प्रति उनका नजरिया एकदम स्पष्ट था. भाषा ऐसी हो जिसमें लोगों की आत्मा बोले. उन्होंने हिंदी भाषा के बारे में जो बात वर्ष 1937 में कही वह आज भी मौजूं है- कुछ लोग हिंदी-भाषा को जनता की भाषा न बनाकर पंडितों की भाषा बनाने का विफल प्रयत्न कर रहे हैंजनता के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग-लिखने और बोलने में करना चाहिए जो सरल, सुबोध और भावमय हो, जनता जिसे तुरंत समझ जाए और उसी भाषा में अपना अभिप्राय आसानी से प्रकट कर सके.भाषा के प्रति ऐसा रवैया वही अपना सकता है जिसका जुड़ाव जनता से हो. उनके लेखों में शायरों की पंक्तियाँ और रामचरित मानस के दोहे एक साथ उद्धृत मिलते हैं.

वे कलम के सिपाही होने के साथ-साथ देश के लिए लड़ने वालों के साथ खड़े थे. जब चंपारण में कांग्रेस की स्थापना वर्ष 1921 में हुई तब वे उससे जुड़े. बाद में आंदोलनों के दौरान वे जेल भी गए. जब तिनकठिया प्रथा समाप्त हो गई तो ऐसा नहीं कि वे चुप बैठ गए. उन्होंने वर्ष 1920 में चंपारण में फिर नादिरशाहीजैसे रिपोर्ताज लिखे थे. उन्होंने लिखा- कोठी के साहब बहादुर ने मोटरकार खरीदने के लिए गाँव के रैयतों पर हूबलीटैक्स लगाया.’’ वे जीवनपर्यंत गरीब किसानों, मजलूमों के साथ खड़े रहे.

मूनिस हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर थे. वर्ष 1915 में प्रताप में  हिंदू-मुस्लिम एकताशीर्षक से लिखे लेख में उनके लोकतांत्रिक विचारों की झलक मिलती है. वे लिखते हैं- ‘‘जहाँ एकता है वहाँ विरोध भी है और जहाँ विरोध है वहाँ एकता भी साथ ही साथ है. सारे जन-समुदाय का एक विचार, एक भाव और एक ख्यालात का होना सर्वथा असंभव है.इस लेख के प्रकाशन का वर्ष यदि 1915 के बदले 2015 कर दिया जाए तो ऐसा लगेगा कि वे समकालीन भारत को संबोधित कर रहे हैं!

आचार्य शिवपूजन सहाय ने मूनिस के व्यक्तित्व और कृतित्व पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि मूनिस एक निर्भीक, स्वाभिमानी, बलिदानी पत्रकार थे, पर जब विद्यार्थी जी हिंदू-मुस्लिम एकता की बलिवेदी पर शहीद हो गए तब मूनिसजी सर्वथा असहाय हो गए.जाहिर है, मूनिस, प्रताप के संपादक और स्वतंत्रता सेनानी विद्यार्थी से गहरे प्रभावित थे.

सहाय के मुताबिक मूनिस के लेखों का संग्रह जो प्रकाशक के पास था वह बिहार में 1934 में आए भूकंप में नष्ट हो गया था. मूनिस के लेखों, निजी पत्रों के अभाव में इतिहास के कई प्रश्न अनुत्तरित रह गए हैं. प्रसंगवश, 23 अप्रैल 1917 की शाम में गाँधी मूनिस की माता से मिलने बेतिया स्थित उनके घर पैदल गए. वहाँ हजारों लोग मौजूद थे, पर मूनिस की चर्चा कहीं नहीं है. क्या उस दिन मूनिस मौजूद थे? इस बात का उल्लेख न गाँधी करते हैं, न हीं राजकुमार शुक्ल? फिर वे उस दिन कहाँ थे? सवाल यह भी है कि चंपारण सत्याग्रह के इतिहास में मूनिस कहां हैं? या इसे इस तरह भी कहा जा सकता है क्या सरकार और बौद्धिक वर्ग को मूनिस की सुधि है?

Saturday, April 08, 2017

मैथिली सिनेमा को भी ‘अनारकली’ का इंतज़ार है

'अनारकली ऑफ आरा' फ़िल्म के निर्देशक अविनाश दास से एक इंटरव्यू के दौरान पूछा गया कि दरभंगा में क्या आप जानते थे कि आप फ़िल्म बनाना चाहते हैं.उनका जवाब था- हां, लेकिन तब किशोर उम्र में मैंने किसी को बताया नहीं था. मैं नहीं चाहता था कि लोग मेरे ऊपर हँसे.’ 

यह बात 80 के आख़िरी और 90 के शुरुआती वर्षों की है.
सोचिए, यदि अविनाश ने दरभंगा-मधुबनी (मिथिला इलाके) में किसी को अपनी फ़िल्म बनाने की इच्छा के बारे में बताया होता तो क्या प्रतिक्रिया होती. घर-परिवार, आस-पड़ोस के लोग हँसते और फिर दुत्कारते हुए कहतेअबारा नहितन (आवारा कही का)!
दरभंगा-मधुबनी इलाके में आज़ादी के बाद से ही फ़िल्मों के प्रति लोगों  की दीवानगी रही है (खास कर पुरुषों में), पर एक घोर वितृष्णा का भाव भी रहा है. ऐसा नहीं कि सूचना क्रांति के इस दौर में, 25-30 सालों में, इस रुख में कोई भारी बदलाव आया हो. यह दुचित्तापन आज भी कायम है. फ़िल्म निर्माण-निर्देशन या अभिनय से जुड़ना आवारगी की श्रेणी में ही आता है! फिर भी गाहे-बगाहे इस क्षेत्र से मुंबई एक्सप्रेसपकड़ने वाले लोग मिल जाते हैं. पर उनका सारा ध्यान बॉलीवुड में जोर अजमाइश में ही लगा रहा.
64 वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों से सम्मानित फ़िल्मों की सूची देख रहा था और सोच रहा था कि क्या मैथिली में बनी कोई फ़िल्म भी इस सूची में है? असल में, पिछले वर्ष मिथिला मखानको मैथिली भाषा में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार मिला था और स्मृति में यह बात थी. शायद, ‘मिथिला मखानएक मात्र मैथिली में बनी फ़िल्म है जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है. अविनाश भी गीतकार के रूप में इस फ़िल्म से जुड़े थे.
पिछले दो दशकों में भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय फ़िल्मों की धमक बढ़ी है. भूमंडलीकरण के साथ आई नई तकनीकी, मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर और कला से जुड़े नवतुरिया लेखक-निर्देशकों ने सिनेमा निर्माण-वितरण को पुनर्परिभाषित किया है. इस बार जिस फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार मिला है वह एक मराठी फ़िल्म ही है-कासव (कच्छप-कछुआ). साथ ही सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी राजेश मापुस्कर को उनकी मराठी फ़िल्म वेंटिलेटरके लिए मिला है.
जहाँ कम लागत, अपने कथ्य और सिनेमाई भाषा की विशिष्टता की वजह से मराठी फ़िल्म राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल रही है, वहीं भारतीय सिनेमा के इतिहास में फुटनोट में भी मैथिली फ़िल्मों की चर्चा नहीं मिलती.  यहाँ तक की पापुलर फ़िल्मों में भी भोजपुरी फ़िल्मों की ही चर्चा होती है, जबकि दोनों ही भाषाओँ में फ़िल्म निर्माण का काम एक साथ करीब पचास-पचपन साल पहले शुरू किया गया था. जहाँ वर्तमान में भोजपुरी सिनेमा एक उद्योग का रूप ले चुकी है, वहीं मैथिली सिनेमा अपने पैरों पर भी खड़ी नहीं हो पाई है.
ममता गाबए गीतजैसी फ़िल्म एक अपवाद है, जिसे गीत-संगीत की वजह से मिथिला के समाज में आज भी याद किया जाता है. इस फ़िल्म में महेंद्र कपूर, गीता दत्त और सुमन कल्याणपुर जैसे हिंदी फ़िल्म के शीर्ष गायकों ने आवाज़ दी थी और मैथिली के रचनाकार रविंद्र ने गीत लिखे थे. एक गीत विद्यापति का लिखा भी शामिल था और संगीत श्याम शर्मा ने दिया था.
प्रसंगवश, ‘ममता गाबए गीतके निर्माताओँ में शामिल केदार नाथ चौधरी इस फ़िल्म के मुहूर्त से जुड़े एक प्रंसग का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि जब वे फणीश्वर नाथ रेणुसे मिले (1964) तो उन्होंने मैथिली फ़िल्म के निर्माण की बात सुन कर भाव विह्वल होकर कहा था-अइ फिल्म केँ बन दिऔ. जे अहाँ मैथिली भाषाक दोसर फिल्म बनेबाक योजना बनायब तहमरा लग अबस्से आयब. राजकपूरक फिल्मक गीतकार शैलेंद्र हमर मित्र छथि (इस फ़िल्म को बनने दीजिए. यदि आप मैथिली भाषा में दूसरी फ़िल्म बनाने की योजना बनाए तो मेरे पास जरूर आइएगा. राजकपूर की फ़िल्मों के गीतकार शैलेंद्र मेरे मित्र हैं). 
इस फ़िल्म के निर्माण के आस-पास ही रेणु की चर्चित कहानी मारे गए गुलफामपर तीसरी कसमनाम से फ़िल्म बनी. इस फ़िल्म में मिथिला का लोक प्रमुखता से चित्रित है और फ़िल्म में एक जगह तो संवाद भी मैथिली में सुनाई पड़ता है!  हीरामन अनारकली ऑफ आरामें भी मौजूद है, पर उसका रूप बदला हुआ है. वह मिथिला का सीधा-साधा गाड़ीवान नहीं है, महानगर दिल्ली में एक मैनेजर है!
क्या तीसरी कसममैथिली में बन सकती थी? यदि यह फ़िल्म मैथिली में बनी होती तो शायद मैथिली सिनेमा का इतिहास कुछ और होता. आप कह सकते हैं कि यह तो ख्याम-ख्याली है. जैसे यह सोचना कि मैला आँचलउपन्यास यदि मैथिली में लिखा गया होता या नागार्जुन मैथिली को छोड़ कर हिंदी की ओर रुख नहीं करते तो मैथिली साहित्य की प्रगतिशील धारा और पुष्ट और संवृद्ध हुई होती.
ऐसा नहीं कि इन वर्षों में मैथिली में फिल्में नहीं बनी, या प्रयास नहीं किए गए. पर जो छिटपुट, इक्का-दुक्का फिल्में बनी और एक नज़र उन पर डालें तो स्पष्ट लगता है कि इन फ़िल्मों की ना कोई विशिष्ट सिनेमाई भाषा है और ना हीं इनमें कोई दृष्टि मिलती है जो मिथिला के समाज, संस्कृति को संपूर्णता में कलात्मक रूप से रच सके.
बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तरह से हिंदी सिनेमा जगत में भोजपुरी बोली-वाणी में रची-बसी अनारकली ऑफ आराको आलोचनात्मक स्वीकृति मिली है, वह अविनाश और मुंबई में रहने वाले मिथिला के कलाकारों को मैथिली में फ़िल्म बनाने को भी प्रेरित करेगी. मैथिली सिनेमा नागराज मंजुले, चैतन्य ताम्हाणे जैसे निर्देशकों का इंतज़ार बेसब्री से कर रहा है!
नोट: मैथिली के लेखक केदार नाथ चौधरी ने ममता गाबए गीतके निर्माण से जुड़ी व्यथा कथा को बेहद रोचक शैली में अपनी किताब अबारा नहितनमें चित्रित किया है.
 (जानकी पुल पर प्रकाशित) 

Sunday, March 26, 2017

बेख़ौफ़ आज़ादी-अनारकली

अविनाश दास की फिल्मअनारकलीकल देर रात देखी. अविनाश के जज्बे को सलाम. उनके संघर्ष को सलाम

अविनाश आदिम मित्र हैं. उनकी चेतना, विचार और कला प्रेम को नजदीक से जानता हूँ. उनके पत्रकारिता कर्म और साहित्य से परिचय था, पर फ़िल्म निर्देशक के रूप में पहली फ़िल्म से ही उन्होंने गहरी छाप छोड़ी है.

फिल्म एक सामूहिक कला है, लेकिन बावजूद इसके इसेडायरेक्टर्स मीडियमकहा गया है. अनारकली पर अविनाश की छाप हर सीन में है. बतौर लेखक और बतौर निर्देशक! स्वरा से जैसी बेहतरीन अदाकारी उन्होंने करवाई है, वह उनके निर्देशक रूप को हिंदी सिनेमा जगत में स्थापित करता है.

बॉलीवुड फिल्मों की भाषा हिंदी भले हो, हिंदी जगत, उसकी बोली-वाणी, बात-व्यवहार को उसने हमेशा हाशिए पर रखा है. पिछले कुछ सालों में जब दिल्ली से कुछ लेखक-कलाकार बंबई पहुँचे उन्होंने हिंदी फ़िल्म के व्याकरण को बदला है. एक नया मुहावरा गढ़ा है. ‘अनारकली ऑफ आराइस मुहावरे को नई अर्थवत्ता प्रदान करता है.

आरा जैसे छोटे शहर की ख़ुशबू, भाषा के भदेसपन (Bihari lilt) को यह फ़िल्म बखूबी पकड़ती है. कैमरा यथार्थ को, कलाकारों के मनोभावों को चित्रित करने में कामयाब रहा है. चूँकि फ़िल्म के केंद्र में नृत्य-संगीत (नौटंकी?) से जुड़ी एक लोक कलाकार और निजी संघर्ष है, इस लिहाज से फिल्म का गीत-संगीत कहानी को आगे बढ़ाने में सहायक है. जेएनयू के मेरे सीनियर डॉ सागर का गाना सबकी जबान पर है आज कल-मोरे पिया मतलब का यार!

अनारकली के गाने द्विअर्थी (innuendo) हैं. तीन साल की बेटी, कैथी की वजह से इसे ठीक से नहीं सुन पाया था. सिनेमा देखने के बाद आज फिर से फूल वाल्यूम पे स्पीकर पर सुना.

राजनीतिक चेतना किस कदर गानों में नए अर्थ भर सकते हैं इसका उदाहरण है- हमका देखे सुरती फांके/ चोर नज़र से लहंगा झांके/हटल नज़रिया... प्रतिरोध की भाषा किसी दुविधा की भाषा नहीं होती (सुविधा की तो कतई नहीं). रवींद्र रंधावा जो अनारकली ऑफ आरा के एसोशिएट डायरेक्टर भी हैं, इस गीत को लिखा है. यहां रेखांकित करना ज़रूरी है कि रवींद्र और उनके बड़े भाई प्रीतपाल रंधावा हमारे समय में जेएनयू में राजनैतिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े रहे.

'छतिया पे रख के चला दे तू बंदूकिया, अब तो गुलमिया ना ना ना...', हर कोई नहीं लिख सकता. गोरख पांडेय की परंपरा हिंदी फ़िल्मों में आए इससे बेहतर क्या हो सकता. वैसे, कैथी भी गाना सुन कर हे पिया, हे पिया...गा रही है.  रोहित शर्मा का संगीत पूरी तरह पूरबिया लोक के सुर और गंध को हमारे सामने लाने में सफल रहा है. 

आरा की अनारकली का निजी संघर्ष, उसकी लड़ाई समकालीन भारतीय समाज के स्त्री संघर्ष से जुड़ कर अखिल भारतीय हो जाता है.

क्लाइमेक्स के शॉट में अनारकली रात में बलखाती, इठलाती, अकेले सुनसान सड़क पर निकलती हुई दिखती है. मुझे इसमेंबेख़ौफ़ आज़ादीकी अनुगूंज सुनाई दी.


आइए, हिंदी फ़िल्म जगत में अविनाश का खुले दिल से स्वागत करें! अविनाश को, पूरी टीम को एक बार फिर से शुभकामनाएँ और बधाई.