Monday, July 24, 2017

कुलपति जी, आपका टैंक एक मजबूत वाहन है लेकिन...


आर्मी टैंक, बख्तरबंद गाड़ियों की ज़रूरत युद्धभूमियों में होती है. एक विश्वविद्यालय में उसकी क्या जरूरत?
पर देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश कुमार की माने तो उन्हें कैंपस में एक टैंक चाहिए. ताकि जवानों की शहादत छात्रों के मन में हमेशा बनी रहे. और उन्होंने भारत सरकार के मंत्रियों से सेना के टैंक दिलवाने की गुज़ारिश की है. ये मंत्री रविवार को कारगिल विजय दिवस मनाने जेएनयू में मौजूद थे.
भले ही जेएनयू की स्थापना के 47 वर्ष से ऊपर हो गए हो कुछ साल पहले तक जेएनयू ‘दिल्ली में होकर भी दिल्ली से अलहदा’ था. विश्वविद्यालय की चर्चा पठन-पाठन और छात्र राजनीति की सरगर्मियों के संदर्भ में होती थी, लेकिन पिछले तीन वर्षों से जबसे केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ जेएनयू की चर्चा अध्ययन-अध्यापन के प्रसंग में कम देशप्रेम, राजद्रोह की वजह से ज्यादा हो रही है. इसमें मीडिया के एक हिस्से की भी बड़ी भूमिका रही है.
पिछले साल फरवरी में जब जेएनयू के अंदर तथाकथित कुछ लोगों ने देश के खिलाफ नारे लगाए तब पहली बार प्रशासन की तरफ से छात्रों को राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाने के लिए टैंक की मांग उठी थी.
यह किसी से छिपा नहीं है कि मौजूदा सरकार और संघ से जुड़े कुछ लोगों की आँखों में जेएनयू एक किरकिरी की तरह है.
फरवरी 2016 की घटना से पहले संघ का मुखपत्र ‘पांचजन्य’ अपनी कवर स्टोरी में जेएनयू को ‘दरार का गढ़’ कह चुका था. वह कैंपस को हिंदू विरोधी, देश विरोधी करार दिया था. पर इस घटना के करीब डेढ़ साल बाद भी पुलिस आरोपियों के खिलाफ़ अभी तक चार्जशीट फाइल नहीं कर सकी है और दोषियों को पकड़ नहीं पाई है. हालांकि इस घटना के तुरंत बाद राजद्रोह (Sedition) के आरोप में जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और दो अन्य छात्रों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था, फिलहाल वे जमानत पर हैं.
फरवरी की घटना के बाद जेएनयू के छात्रों-प्रोफेसरों ने खुले मंच पर राष्ट्रवाद की अवधारणाओं पर एक लेक्चर सिरीज का आयोजन किया था जो यू ट्यूब जैसे सोशल मीडिया पर मौजूद है और अब एक मुकम्मल किताब की शक्ल में है (What the Nation Really Needs to Know: The JNU Nationalism Lectures). इस तरह का रचनात्मक हस्तक्षेप जेएनयू को विशिष्ट बनाता रहा है.
सवाल है कि जेएनयू जैसी स्वायत्त संस्थान में, जिसकी प्रतिष्ठा देश-विदेश में है, एक वीसी को राष्ट्रवाद की शिक्षा देने के लिए टैंक जैसे प्रतीकों के इस्तेमाल की जरूरत क्यों पड़ी? जाहिर है, देश में राष्ट्रवाद, देशभक्ति, राजद्रोह के इर्द-गिर्द जिस तरह का विमर्श इन दिनों चलाया जा रहा जगदीश कुमार जैसे वीसी चाहे-अनचाहे एक मोहरे के रूप में नज़र आते हैं.
जेएनयू एक उच्च अध्ययन संस्थान का केंद्र है जहाँ ज्ञान के उत्पादन पर हमेशा जोर रहा है. सवाल करने और सत्य की खोज की प्रवृत्ति को हमेशा बढ़ावा दिया जाता रहा है.
प्रतिरोध की संस्कृति और समाज के हाशिए के लोगों के प्रति संवदेनशीलता जेएनयू की पहचान रही है. पुराने छात्र याद करते हैं कि किस तरह जेएनयू के पहले वीसी जी पार्थसारथी और रेक्टर मूनिस रज़ा ने जेएनयू में वाद-विवाद की संस्कृति के निर्माण में एक बड़ी भूमिका निभाई थी.
और इस वजह से वाम रुझानों की बावजूद जेएनयू एक लोकतांत्रिक स्पेस के रूप में उभरा जहाँ विभिन्न मत, विचारधारा के लोगों के लिए हमेशा जगह रही है. लेकिन ऐसा लगता है कि केंद्र में भाजपा सरकार इसे एक ख़ास विचारधारा के रंग में रंगना चाहती है जो किसी भी विश्वविद्यालय के लिए सही नहीं है. सच तो यह है कि इस तरह की सोच विश्वविद्यालय की अवधारणा पर ही सवालिया निशान लगाती है.
कल दिन में मैं एक प्रोफेसर से मिलने जेएनयू गया था. लाइब्रेरी के पीछे, गोपालन कैंटिन के पास एक किताब गाड़ी दिखी. मन ख़ुश हो गया.
मन में सोचा कि वीसी जगदीश कुमार के प्रस्तावित टैंक, बख्तरबंद पर ये गाड़ी जब तक जेएनयू में घूमती रहेगी भारी पड़ेगी. जैसा कि ब्रेख्त ने लिखा है: जनरल, तुम्हारा टैंक एक मजबूत वाहन है/ वह मटियामेट कर डालता है जंगल को/ और रौंद डालता है सैकड़ों आदमियों को/ लेकिन उसमें एक नुक्स है/ उसे एक ड्राइवर चाहिए.../जनरल आदमी बहुत उपयोगी होता है/ वह उड़ सकता है/ और हत्या भी कर सकता है/ लेकिन उसमें एक नुक्स है/ वह सोच सकता है.
वीसी जगदीश कुमार इस ‘सोच’ पर ताला लगाना चाहते हैं!
(राजस्थान पत्रिका वेबसाइट पर प्रकाशित, 24 जुलाई 2017)

Friday, July 14, 2017

बीबीसी का प्रोपगैंडा और जॉर्ज ऑरवेल !

बीबीसी हिंदी में राजेश प्रियदर्शी के इस ब्लॉग में  अन्य बातों के अलावे प्रकारांतर से पिछले दिनों बीबीसी हिंदी पर जो स्टीरियोटाइप छवि गढ़ने, मनगढंत विश्लेषण करने का आरोप लगा, उसका जवाब दिया गया है. मैंने ‘बीबीसी सिरीज’ के तहत जेएनयू के प्रसंग में लिखे एक लेख-‘सतही हो चुकी है जेएनयू की भीतरी विचारधारा’ को लेकर बिंदुवार कुछ सवाल उठाए थे. असल में यह लेख एक प्रोपगैंडा के सिवाय कुछ भी नहीं है. पर मेरे सवालों का जवाब या उस लेख की चर्चा इस ब्लॉग में कहीं नहीं है. उलटा बीबीसी ने हाथी के दाँत से बनी मीनार में बैठ कर, गुरु ज्ञानी बन कर पूछा है: सबको चाहिए मनभावन समाचार, क्या करें पत्रकार?
इस ब्लॉग के मुताबिक बीबीसी के दिशा-निर्देश में हर तरह के विचारों को जगह देने की बात है. पर क्या इसमें प्रोपगैंडा भी शामिल है ? बीबीसी हिंदी को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए.
‘भारत में अल्पसंख्यक होना कितना तकलीफ़देह है’, क्या यह अलीगढ़ में पढ़ रही एक हिंदू लड़की और बीएचयू में पढ़ रही एक मुस्लिम लड़की के विचारों से तय होगा? संभव है ऐसा ‘जनरलाइजेशन’ बीबीसी के लिए ‘मनभावन’ हो.
जब बीबीसी का संवाददाता एक लड़की का सरनेम ‘तिवारी’ से बदल कर ‘यादव’ कर देता है (एमएमयू वाले लेख में) और लोटा को सांप्रदायिक बना देता है, तब उसके लिए यह सब ‘मनभावन’ होता है. क्या बीबीसी के दिशा-निर्देश में मुसलमानों को ओबीसी के ख़िलाफ़ खड़ा करना भी शामिल है?

किसी प्रोफेसर पर मुसलमान विरोधी होने का आरोप लगाना, स्टोरी में बिना उस प्रोफेसर का पक्ष दिए (बीएचयू वाले लेख में), क्या पेशेवर पत्रकारिता है? भले उस प्रोफेसर का नाम लेख में ना लिखा गया हो, ऑन लाइन की दुनिया में लोग चटखारे लेकर उनकी चर्चा कर रहे हैं.


इस ब्लॉग के मुताबिक: किसी ज़माने में बीबीसी में काम कर चुके जाने-माने लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने लिखा था, “पत्रकारिता उसे सामने लाना है जिसे कोई छिपाना चाहता हो, बाक़ी सब प्रचार है.”
अव्वल तो मुझे यह जानने की उत्सुकता है कि ऐसा ऑरवेल ने कहाँ और कब लिखा था? लेकिन ऑरवेल ने अपने इस्तीफा पत्र में बीबीसी को  यह जरूर लिखा था :
“पिछले कुछ समय से मुझे लग रहा था कि मैं अपना समय और सरकार का पैसा उस काम को करने में बर्बाद कर रहा हूँ जिससे कोई परिणाम सामने नहीं आ रहा. मैं मानता हूं कि मौजूदा राजनीतिक वातावरण में ब्रिटिश प्रोपगैंडा का भारत में प्रसार करना लगभग एक निराशाजनक काम (hopeless work) है. इन प्रसारणों को तनिक भी चालू रखना चाहिए या नहीं इसका निर्णय और लोगों को करना चाहिए लेकिन इस पर मैं अपना समय खर्च करना पसंद नहीं करुंगा, जबकि मैं जानता हूँ कि पत्रकारिता से खुद को जोड़ कर ऐसा काम कर सकता हूं जो कुछ ठोस प्रभाव पैदा कर सके…”
यह पत्र 1943 में ऑरवेल ने लिखा था. लगभग 75 साल बाद भी ऐसा लगता है कि बीबीसी प्रोपगैंडा ही कर रहा है, परिप्रेक्ष्य भले बदल गया हो (भूलना नहीं चाहिए कि इराक युद्ध (2003) के दौरान बीबीसी ने जिस तरह से युद्ध को कवर किया, प्रोपगैंडा में भाग लिया, उसकी काफी भर्त्सना हो चुकी है) पर बीबीसी के हिंदी पत्रकारों में यह स्वीकार करने की कूवत नहीं रही. इस्तीफा देना तो दूर की बात है!
बहरहाल, ऐसा नहीं कि मनभावन खबरों पर जोर हाल के वर्षों में (व्हाट्स एप या फेसबुक के दौर में) बढ़ा है, जैसा कि इस ब्लॉग को पढ़ने पर लगता है. पिछले दशक में मैंने अपनी पीएचडी शोध में पाया था कि हिंदी अखबारों में भूमंडलीकरण के आने के बाद किस तरह ‘ख़ुशखबर’ देने पर जोर बढ़ा है, किस तरह खबरों का विभाजन ‘अप मार्केट/डाउन मार्केट’ खबरों में किया जाने लगा है. इतना ही नहीं पाठकों की क्रय शक्ति (वर्ग) को ध्यान मे रख कर खबरों का उत्पादन किया जा रहा है. वर्ष 2007 में इसी के इर्द-गिर्द दया थुस्सु ने ‘NEWS AS ENTERTAINMENT ‘ नाम से एक किताब लिखी थी.
सवाल है कि जब बीबीसी पर बाज़ार का दबाव नहीं है तब क्यों वेबसाइट ‘मनभावन ख़बरों’ को पाठकों को परोसता है? क्यों अंग्रेजी संवाददाता की आँखों से ही हिंदी के पाठकों को ख़बर दिखाने पर जोर है? जबकि इन वर्षों में पुल के नीचे काफ़ी पानी बह चला है. अखबारों के अलावे हिंदी के कई समाचार चैनल बाज़ार में आ गए हैं, खबरों के कई वेबसाइट हैं. पर क्या बीबीसी की होड़ इन्हीं हिट बटोरू वेबसाइटों से है, जिनका काम हेडिंग में सेन्सेशनल और प्रोवोकेटिव शब्द डाल कर चल जाता है!
यदि हम बीबीसी हिंदी के वेबसाइट का ‘कंटेंट एनालिसिस’ करें तो पाते हैं कि वह हिंदी के पाठकों को अनूदित भाषा (यहाँ अंग्रेजी से हिंदी) में आधुनिकता को परोसने की कोशिश करता है, यह देशज आधुनिकता (Vernacular Modernity) कतई नहीं है. एक ‘साफ्ट पॉर्न (SOFT PORN) की पॉलिसी यहाँ भी स्पष्ट दिखती है ताकि हिट बटोरा जा सके. उदाहरण के लिए 11 जुलाई 2017 को बीबीसी के मेन पेज पर:

‘सेक्स स्लेव’ बनाई गई महिलाओं का वीडियो
सेक्स के दौरान वजाइना में ग्लिटर कैप्सूल ख़तरनाक
पत्नी के साथ सेक्स वीडियो डालता था पॉर्न साइट पर…. आदि खबरों का लिंक दिखता है.
इसी तरह बीबीसी सिरीज के तहत लिखे गए लेखों के शीर्षक भी इस बात की पुष्टि करते हैं.
बीबीसी लिखता है कि- ‘नीयत पर शक करने की हड़बड़ी ऐसी है कि लोग हेडलाइन पढ़कर फ़ैसला सुना देते हैं.’ ….बीबीसी ऑन लाइन पर फ़ैसला सुनाने का वक़्त यह भले ना हो, पर नीयत, नीति और खबरों के उत्पादन की संस्कृति पर संदेह जरूर है. पत्रकारिता की पहली शर्त (और आलोचना की भी) संदेह और सवाल उठाना ही तो है.
बीबीसी को ‘निंदक नियरे’ रखना चाहिए.
(Media Vigil पर प्रकाशित)

Saturday, July 01, 2017

प्रतिरोध वाया सोशल मीडिया

जंतर-मंतर पर क़रीब तीन-चार हज़ार लोग मौजूद थे. जितने लोग उतने ही कैमरे. प्रदर्शनकारियों में शायद ही कोई ऐसा था जो फेसबुक, ट्विटर या इंस्टाग्राम जैसे न्यू मीडियापर मौजूद नहीं हो. जो ऑन लाइन पोर्टल से जुड़े पत्रकार थे, वे वहीं से फेसबुक लाइवके जरिए इस मुहिम को बाहर लोगों के बीच ले जा रहे थे और आम नागरिक सोशल मीडिया के माध्यम से. कुछ टेलीविजन चैनलों पर भी इस विरोध प्रदर्शन को प्रसारित किया जा रहा था.

फ़िल्मकार सबा दीवान की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित होकर देश (और विदेश) के विभिन्न शहरों में एक साथ हुए इस प्रतिरोध के अगले दिन साबरमती में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा (अंतत:) कि 'गौ-भक्ति' के नाम पर लोगों की हत्या स्वीकार नहीं की जा सकती'. देखा जाए तो गौरक्षा के नाम पर गोरखधंधा करने वालों के ख़िलाफ़ यह प्रतिरोध एक हद तक सफल रहा और इसका श्रेय सोशल मीडिया (बजरिए इंटरनेट) को जाता है.

लोकतंत्र में राजनीतिक भागेदारी और राजनीतिक दलों के संचार में मीडिया की प्रमुख भूमिका रही है. साथ ही किसी भी सामाजिक आंदोलन में मीडिया की सहभागिता जरूरी है. मोदी सरकार की अघोषित नीति मेनस्ट्रीम (प्रिंट और टेलीविजन) के बदले न्यू मीडिया को तरजीह देने की है. ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ऑन लाइनमीडिया की दुनिया में सबसे ज्यादा सक्रिय रहने वाले नेताओं में से एक है. ट्विटर पर उनके 30.9 मिलियन (तीन करोड़ नौ लाख) और फेसबुक पर 41.7 मिलियन (चार करोड़ 17 लाख) फॉलोअर हैं. लेकिन इस बार नागरिक समाज के लोग उन्हीं हथियारों का इस्तेमाल सत्ता के ख़िलाफ़ करने में सफल रहे, जिसका इस्तेमाल मौजूदा सरकार करती रही है.

रिपोर्टों के मुताबिक मई 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से गौरक्षा, गौमांस के नाम पर देश के विभिन्न भागों में मुसलमानों के ऊपर क़रीब 32 हमले हुए हैं. मारे गए लोगों में मोहम्मद अखलाक, पहलू खान, जुनैद खान आदि महज नाम बन कर रह गए हैं.  साथ ही इस सांप्रदायिक भीड़ की हिंसा के शिकार (लींचिंग) दलित भी हुए हैं. निस्संदेह इस भीड़ को सत्ता की भाषा- जो श्मशान और कब्रिस्तानमें लिपटी हुई है, से बल मिला है.
मोदी सरकार के बनने के तीन साल बाद शायद पहली बार, बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के, सिर्फ सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर हिंसा के खिलाफ प्रतिरोध में नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) की आवाज़ एक वृहद स्तर पर मुखर हुई है. हालांकि जब तक ऑन लाइनप्रतिरोध को ऑफ लाइन (ज़मीनी स्तर पर)हो रहे विभिन्न प्रतिरोधों से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक इसकी सफलता संदिग्ध रहेगी.

विरोध प्रदर्शन के अगले दिन यानी 29 जुलाई की तारीख़ को दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिंदी अख़बारों- नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, हिंदुस्तान और दैनिक जागरण में किसी ने भी पहले पन्ने पर इस ख़बर को जगह नहीं दी. अंदर के स्थानीय पन्ने पर किसी कोने में एक तस्वीर या दो-तीन कॉलम की छोटी सी ख़बर देकर इस प्रदर्शन को निपटा दिया गया. वहीं, दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी अख़बारोंहिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू अख़बार के पहले पन्ने पर तस्वीर के साथ विस्तृत ख़बर भी छपी थी.

भले ही किसी राजनीतिक बैनर के तले जंतर-मंतर और अन्य शहरों में जनता नहीं जुटी हो पर ‘NotInMyName’ का जो नारा बुलंद हुआ उसकी जबान बहुसंख्यक भारतीयों की जबान नहीं है. इस ऑनलाइन मीडिया और प्रतिरोध की संस्कृतियों को दूर-दराज, छोटे शहरों-कस्बों पर पहुँचाने कि लिए इन संस्कृतियों को देशज (vernacular) होना होगा, साथ ही इन संस्कृतियों का देशजीकरण (vernacularisation of protest) करना होगा. जाहिर है भाषाई अख़बारों की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण हो सकती है.

अंग्रेजी मीडिया के बदले हमें यह देखना होगा कि हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं (regional/vernacular) में इन प्रतिरोधों की अनुगूंज किस रूप में हैजरूरत भाषाई अख़बारों में चल रहे विमर्श को बदलने की है, जिसका प्रसार देश के गाँवो, क़स्बों तक है. यहाँ इस बात का उल्लेख जरूरी है कि मंडल-कमंडल की राजनीति में भाषाई मीडिया सांप्रदायिक एजेंडे को आगे में बढ़ाने में हमेशा तत्पर रही है.


ग़ालिब ने लिखा है कि फरियाद की कोई लय नहीं है’, पर सत्ता के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की आवाज़ तो बुलंद होनी ही चाहिए जो दूर, एक बहुसंख्यक वर्ग तक पहुँचे और एक बड़े नागरिक समाज को लामबंद कर सके.

Wednesday, June 14, 2017

मृत्यु-गंध में लिपटी बगूगोशे की ख़ूशबू

मृत्यु-गंध कैसी होती है/ वह एक ऐसी खुशबू है/ जो लंबे बालों वाली/ एक औरत के ताजा धुले बालों से आती है/ तब आप उस औरत का नाम याद करने लगते हैं/ लेकिन उसका कोई नाम नहीं (कुमार विकल)
बगूगोशेकी ख़ूशबू में मृत्यु-गंध है. स्वदेश दीपक इस गंध से वर्षों परिचित रहे. इस आत्मकथात्मक कहानी में वे लिखते हैं: सात साल लंबी आग. डॉक्टर तो दूर, पीर-फकीर भी न बुझा पाए. तब सारे दृश्य कट गए थे.यह सात साल 1991-1997 के बीच के वर्ष हैं. कोर्ट मार्शल (1991) नाटक से उनकी ख्याति इस बीच फैलती चली गई पर वे बेख़बर रहे, ‘मायाविनीकी तलाश में भटकते रहे. उस मायाविनी की छाया उनकी मानसिक बीमारी के यथार्थ से जुड़ कर एक ऐसा साहित्य रच गया जो हिंदी साहित्य में अद्वितीय है.
और जब इस मृत्यु गंध की तासीर कुछ कम हुई तब हमने-मैंने मांडू नहीं देखापाया और कुछ कहानियाँ जो अब बगूगोशेसंग्रह में शामिल है. जैसा कि उनके पुत्र और पत्रकार सुकांत दीपक कहते हैं मांडू सचमुच उनके खंडित जीवन का कोलाज है.
स्वदेश दीपक हिंदी साहित्य और समाज के लिए एक किवदंती बन चुके हैं. हिंदी की चर्चित रचनाकार कृष्णा सोबती इस कहानी संग्रह के मुख्य पृष्ठ पर लिखती हैं: स्वदेश तुम कहां गुम हो गए. बगूगोशे के साथ फिर प्रकट हो जाओ.पर क्या अब वे लौटेंगे? कोई उम्मीद? सुकांत कहते हैं-बिलकुल नहीं!
अब तो स्वदेश दीपक को इस मायावी दुनिया को छोड़, घर से निकले 10 वर्ष से ज्यादा हो गए.
दूधनाथ सिंह की एक किताब है, जो उन्होंने निराला के रचनाकर्म और जीवन के इर्द-गिर्द लिखी है-आत्महंता आस्था. रचनाकार के जीवन और रचना के बीच आत्म संघर्ष को यह किताब हिंदी साहित्य के एक और किवदंती पुरुष निरालाके संदर्भ में बख़ूबी पकड़ती है. यह स्वदेश दीपक के बारे में भी सच है. स्वदेश दीपक के अंदर एक आत्महंता आस्था थी जो उनकी रचनाओं में भी दिखाई देती है. बगूगोशे कहानी में माँ अपने प्रोफेसर बेटे से कहती है: काका! कितने अंगारे हैं तेरे मुंह में. मीठे बोल भी बोल लिया कर. कभी-कभी एक चिनगारी से आग लग जाती है.
स्वभाव से बेहद गुस्सैल स्वदेश दीपक मिजाज से नक्सली थे. उनकी राजनीतिक पक्षधरता स्पष्ट थी. वे अन्याय के ख़िलाफ़ थे. जीवन में और रचना में.
मैंने मांडू नहीं देखापढ़ते हुए लगता है कि यह एक रचनाकार की सिद्धावस्था है. वह ट्रांसमें है. उसकी भाषा ऐसी है जैसे कोई hallucination की अवस्था में बोलता, बरतता है. छोटे-छोटे टुकड़ों में (epileptic language). बिना इस बात की परवाह किए कोई उसकी भाषा समझ रहा है या नहीं. बेपरवाह और बेखौफ़. अंतर्मन में ख़ुद से लड़ता
सुकांत ने पिछले साल अपने पिता के ऊपर एक लेख में लिखा: 7 जून 2006 को टहलने के लिए वे निकले और वापस लौट कर नहीं आए. जब हम (मैं, मेरी माँ और बहन) इस बात से आश्वस्त हो गए कि वे अब कभी घर लौट कर नहीं आएँगे तब हमने सुकून से गहरी साँस ली. हमारे लिए लगभग एक उत्सव की तरह यह था.
सुकांत क्या अपने पिता को मिस करते हैं? सुकांत की आवाज़ में एक टूटन सी मुझे सुनाई देती है. वे कहते हैं: वह आदमी मेरा बहुत बड़ा दोस्त था. भले मैं कुछ समझूं या नहीं वह अपनी रचना का पहला ड्राफ्ट मुझे सुनाता था.

मेडिकल साइंस की भाषा में वे बायपोलर डिसआर्डरके मरीज थे और कई बार आत्महत्या की कोशिश कर चुके थे. वह उग्रता और अति संवेदनशीलता के बीच, मानवीय संबंधों और अपनी रचनाओँ के बीच एक तालमेल की कोशिश में भी लगे थे. इस संग्रह में शामिल बनी-ठनीकी शुरुआत इन पंक्तियों से होती है: जिस दिन डॉक्टर मेजर मुक्ता शर्मा से पहली बार मिला, वह गरमियों की शाम थी. जिस दिन डॉक्टर मेजर मुक्ता शर्मा से नहीं मिला, वह भी गरमियों की शाम थी. अगला दिन.पहली बार पढ़ते हुए एक बेतुकापन इनमें नज़र आता है. ऐसी पंक्तियाँ निर्मल वर्मा की कहानियों में भी ख़ूब दिखाई देती है. प्रसंगवश, सुकांत बताते हैं कि निर्मल वर्मा उनके मित्र थे और स्वदेश ने निर्मल वर्मा के साथ वर्ष 2006 में उनकी मुलाक़ात अरैंज करवाई थी
इस संग्रह में एक अधूरी कहानी है-समय खंड. इसका एक पात्र मधुमक्खियों के दंश से पीड़ित है और मरनासन्न है. वह कहती है: मुझे बिलकुल दिखाई नहीं दे रहा. मैं अंधी हो गई हूँ, क्या मैं मर जाऊँगी. आय डोंट वांट टू डाई प्लीज़!यह ठीक वैसी ही कराह है जैसी मेघे ढाका ताराफ़िल्म के आख़िर में सुनाई पड़ती है- दादा, आमि बचते चाई.
इस संग्रह की कहानियों में आधी-अधूरी ज़िंदगी को रचा गया है. और एक रचनाकार के रूप में यह हमें स्वदेश दीपक से रू-ब-रू होने का मौका देता है. रचना का कालखंड 2000-2005 के बीच है. इसी अवधि में वे मांडूभी रच रहे थे.

इस संग्रह को पढ़ते हुए लगातार यह बोध बना रहता हैजीवन है, जैसा भी है बेहतर है, ना होने से.

नोट: इस संग्रह में स्वदेश दीपक की अंतिम आठ कहानियाँ संकलित है. क़रीब दो वर्ष तक राजकमल प्रकाशन ने इसे अपने पास रखा और अब जाकर वह जगरनॉट बुक्स से प्रकाशित हुई है.
(जानकी पुल और प्रभात खबर (23 जून 2017) में प्रकाशित)

Friday, June 09, 2017

आपातकाल के 40 साल बाद: मीडिया और मोदी सरकार

मार्शल मैक्लूहन ने एक जगह लिखा है कि नेपोलियन का कहना था कि तीन ऐसे अख़बार जो विपक्ष में हो उनसे ज्यादा भयभीत होना चाहिए, बनिस्बत एक हजार संगीनों के (Three hostile newspapers are more to be feared than a thousand bayonets.)”. पिछले दिनों जब सीबीआई ने एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के घर छापा मारा तब से मुझे यह पंक्ति याद आती रही. कमियों के बावजूद एनडीटीवी निस्संदेह भारतीय टेलीविजन समाचार उद्योग में आज भी सबसे भरोसेमंद और पेशेवर पत्रकारिता का उदाहरण है.

सवाल है कि मोदी सरकार एनडीटीवी के ऊपर छापा के मार्फ़त क्या संदेश देना चाहती है? प्रथम द्ष्टया वह चाहती है कि एनडीटीवी के मालिकों की रीढ़ कमान हो जाए. याद कीजिए कि आपातकाल के दिनों में लालकृष्ण आडवाणी ने मीडिया के बारे में क्या कहा था. उनका कहना था- भारतीय प्रेस से झुकने को कहा गया तो वह रेंगने लगी!’

वर्तमान में जब कई समाचार चैनल, अख़बार सरकार के एक इशारे पर बिछने को तैयार हैं, वहीं एक हद तक एनडीटीवी पत्रकारिता के मूलधर्म को अपनाए हुए है. सत्ता से सवाल करने की ताकत अभी उसकी चुकी नहीं है. पर मोदी सरकार और उसके कारिंदे सवाल से घबराते हैं. क्या यह महज संयोग है कि सीबीआई के छापे से कुछ दिन पहले एनडीटीवी के एक प्रोग्राम में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा बार-बार एनडीटीवी केएजेंडा को एक्सपोज करने की बात कर रहे थे जब उनसे उत्तर-पूर्व में बीफ बैन के बाबत सवाल किया गया?अव्वल तो एनडीटीवी के एंकर निधि राजदान को पूछ ही लेना चाहिए था कि संबित किस एजेंडे की बात कर रहे हैं और क्या एक्सपोज करना चाहते थे?

जब ज्यादातर मीडियाकर्मी प्रधानमंत्री मोदी के साथ सेल्फी लेकर ही संतुष्ट हो जाते हो ऐसे में मोदी सरकार से सवाल पूछने की जरूरत क्या हैऔर इस बात से किसी को आश्चर्य नहीं कि ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी भले लाख भाषण देंमन की बात कहें इन तीन वर्षों में एक भी प्रेस कांफ्रेंस करने की उन्होंने जहमत मोल नहीं ली है.

जैसा कि प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस के एक लेख में लिखा है कि एनडीटीवी के तथाकथित घोटालों को सामने लाना या उसे दुरूस्त करना सीबीआई के छापे का उद्देश्य नहीं है, बल्कि मीडिया की संभावना पर ही प्रश्नचिह्न खडा करना है.’ मोदी सरकार शुरुआती दिनों से ही मीडिया की वैधता पर सवाल खड़े करती रही है. एक मजबूत विपक्षी पार्टी के अभाव में मोदी सरकार मीडिया (जिस भी स्वरूप में वह है) को ही विपक्ष मानती है. यदि इसे वह खारिज करने में सफल हुई तो फिर उसे भयभीत होने की कोई जरूरत नहीं!

सरकार के मंत्री कभी पत्रकारों को प्रेस्टिटूयट कहते हैं तो किसी एंकर के कार्यक्रमों का बॉयकॉट. जबकि प्रधानमंत्री मोदी खुद पिछले साल एक इंटरव्यू के दौरान कह गए- मेरा स्पष्ट मत है कि सरकारों की, सरकार के काम-काज का, कठोर से कठोर एनालिसिस होना चाहिए, क्रिटिसिज्म होना चाहिए. वरना लोकतंत्र चल ही नहीं सकता है.

पर जैसा कि वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार और एंकर करण थापर कहते हैंइस सरकार के प्रवक्ताओं और मंत्रियों ने मेरे कार्यक्रम में आना बंद कर दिया है. एक प्रवक्ता ने स्पष्ट कहा कि पार्टी आपके सवालों को पसंद नहीं करती और आपके एटिटयूड से भी दिक्कत है.

पर यदि सरकार पत्रकारों के सवालों को पसंद करने लगे, उसकी पीठ थपथापने लगे तो किसी भी लोकतंत्र में पत्रकारों के लिए यह अच्छी ख़बर नहीं मानी जा सकती.

सीबीआई के इस छापे को सरकार की मीडिया नीति, मीडिया की अवहेलना और उसकी वैधता को खारिज करने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए. और गहरे स्तर पर इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए आसन्न संकट के रूप में पढ़ा जाना चाहिए.


Monday, May 01, 2017

नेशनल एंथम के दौर में फिल्म पत्रकारिता

(आजकल ऐसा फील गुड माहौल है कि कोई कुछ भी लिख दे कोई उसकी परवाह नहीं करता. पत्रकारिता के नाम पर जमकर पीआर किया जा रहा है किसी को कोई परवाह नहीं. ऐसे में पत्रकारिता में पीएचडी, गंभीर अध्येता और मीडियाकर्मी अरविन्द दास की यह टिपण्णी पढ़िए. देखिये कि वे कितनी गहराई से समकालीन पत्रकारिता पर नजर रखते हैं- मॉडरेटर)
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पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता में येलो जर्नलिज्म, एमबेडेड जर्नलिज्म के अलावे एक नया टर्म भी सुनाई देने लगा है-कैलेंडर जर्नलिज्म! जिसका मतलब किसी सेलिब्रिटी के जन्म दिवस, स्मृति शेष, एनिवरसरी आदि को देख कर लेख, फीचर लिखना या कोई कार्यक्रम प्रोडूयस करना है.

जब पत्रकारिता में न्यूज का मतलब ही मनोरंजन हो गया हो तो इस तरह की पत्रकारिता पर किस पत्रकार-संपादक को भला आपत्ति होगी! लेकिन जब कोई लेखक-समीक्षक इस कैलेंडर जर्नलिज्म के मुताबिक लेख लिखे और उसे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कोई वेबसाइट प्रकाशित करे तो लेखक-संपादक से अपेक्षा होती है कि एक बार उसे पब्लिक स्फीयर में लाने से पहले देख-परख ले, संपादित कर ले. और संभव हो तो सुधार ले. पर इस भागमभाग पत्रकारिता के दौर में किसके पास फुरसत है.

बहरहाल, पिछले दिनों फिल्म समीक्षक और लेखक मिहिर पांड्या ने अपने फेसबुक वॉल पर एक अपना लिखा लेख शेयर किया (http://www.thelallantop.com/bherant/sneha-khanwalkar-music-director-of-gangs-of-wasseypur-oye-lucky-lucky-oye-and-khoobsurat-birthday-spacial/) जिसे पिछले साल लल्लन टॉप ने छापा था (इपंले भी लल्लन टॉप के लिए लेख-टिप्पणी आदि लिखता रहा है). यह लेख स्नेहा खानवलकर के फिल्मी संगीत में योगदान के बरक्स उनके जन्मदिन को ध्यान में रख कर लिखा गया है और 28 अप्रैल को मिहिर ने फिर से सेलिब्रेट करते हुए शेयर किया. निस्संदेह, स्नेहा नए दौर की उभरती हुई संगीतकार है जिन्होंने फिल्मी संगीत में लोक धुनों का जम कर इस्तेमाल किया है . हालांकि, मिहिर पांड्या ने जिस तरह से उनकी संगीत यात्रा की समीक्षा की है वह समीक्षा के नए प्रतिमान गढ़ता प्रतीत होता है.

मिहिर ने लिखा है कि गैंग्स ऑफ वासेपुरमें जब स्नेहा ने वुमनिया गाने को संगीत में पिरोया तब वुमनिया नए समय का एंथमबन गया.  पर यह एंथम कैसे बन गया यह लेख पढ़ कर स्पष्ट नहीं हो पाया. सच में ऐसा है क्या? कम से कम उत्तरी बिहार के हमारे इलाके में अभी भी शादी-विवाह या अन्य मौके पर शारदा सिन्हा या भोजपुरी गाने की ही धूम है!
मिहिर आगे लिखते हैं कि इस गीत की बदमाशी में एक पवित्रता है’. कहने को तो कुछ भी लिखा-कहा जा सकता है, पर चूँकि मिहिर जैसे सुधी समीक्षक लिख रहे हैं तो मैं सोचने लगा कि बदमाशी और पवित्रता का क्या नाता है (जैसे निष्ठा का विष्ठा के साथ)खिलंदड़ापन इस गीत के बोल में हैं (कनिया, पटनिया, चौन्निया, वूमनिया आदि), जिसे वरुण ग्रोवर ने लिखा है जो तुकबंदी के अलावे कुछ नहीं. संगीत भी सामन्य ही है, मेरी समझ में. ढोलक की थाप की प्रमुखता है.

हां, इस गीत में मुख्य गायिका रेखा झा का स्वर निस्संदेह उभर के आता है. वैसे, मिथिला में (जहाँ की रेखा झा है) आज भी लोक में गीत-संगीत की पंरपरा है और यह सामूहिकता को लिए ही होता है. मिहिर लिखते हैं-स्त्री स्वर की सामूहिकता जैसे उसे आज़ाद कर देती है.  लोक में कला सामूहिकता में ही आकार पाती है. इसमें विशिष्ट जो कुछ भी है वह सबका है. और कला तो आज़ाद ही करेगी, बांधेगी नहीं. मिथिला में नई वधूएँ आज भी जब गौने के बाद आती हैं तो उन्हें गाना गाना पड़ता है. और फिर कोरस में दियादनी-गोतनी, ननद-सास की आवाज़ शामिल होती है.

इसी तरह लेख में मिहिर एलएसडीफिल्म के गीत आई कांट होल्ड इटको गर्ल्स हॉस्टल्स का नेशनल एंथमकहते हैं. इसे स्नेहा ने गाया भी है. क्या कोई किसी गाने के लिए नेशनल एंथमविशेषण का इस्तेमाल कर सकता है. क्या कोई और विशेषण हिंदी के शब्दकोष में नहीं बचे हैं! स्नेहा के अगले शाहकार के लिए कौन सा विशेषण बचेगा फिर. ले-दे के तो एक ही नेशनल एंथम है हमारे पास!

और अंत में, इस गीत को गाने के लिए मिहिर स्नेहा को ग्रैमी, ऐमी टाइप कोई पुरस्कारदिए जाने की सिफारिश कर हैं. पता नहीं, फिर देरी क्यों हो रही है.
(जानकी पुल पर प्रकाशित)

Wednesday, April 12, 2017

चंपारण सत्याग्रह का कलमकार: पीर मुहम्मद मूनिस

पीर मुहम्मद मुनीस
आधुनिक भारत के इतिहास की तारीख़ में अप्रैल 1917 का भारी महत्व है. सौ साल पहले इसी महीने मोहनदास करमचंद गाँधी ने बिहार के चंपारण में जाकर सत्याग्रह की शुरुआत की थी. भारत की धरती पर अपने पहले अहिंसक सत्याग्रह के बारे में उन्होंने लिखा है- मैंने वहाँ ईश्वर का, अहिंसा का और सत्य का साक्षात्कार किया.भले ही गाँधी के लिए चंपारण अनजाना था, बिहार की जनता, चंपारण के लोक के लिए वे अपरिचित नहीं थे.

चंपारण के एक युवा पत्रकार, पीर मुहम्मद मूनिस (1882-1949) ने उन्हें चंपारण आने का निमंत्रण देते हुए एक पत्र में लिखा था- हमारी दुख भरी गाथा उस अफ्रीका के अत्याचार से, जो आप और आपके अनुयायी वीर सत्याग्रही भाइयों और बहनों के साथ हुआ- कहीं अधिक है.इस पत्रकार का नाम न तो गाँधी की आत्मकथा में मिलता है, न ही आधुनिक भारत के किसी इतिहास में. हाल के वर्षों में छिटपुट कुछ लेखों में गाँधी को चंपारण की धरती पर लाने में सूत्रधार की भूमिका में खड़े राजकुमार शुक्ल के साथ चलते-चलते इस पत्रकार की भी चर्चा कर दी जाती है. यहाँ तक कि बिहार की पत्रकारिता का इतिहासलिखने वालों की नज़र में भी वे नहीं समा पाते!

मेरे लिए आश्चर्य की बात है कि गाँधी, जो खुद एक पत्रकार भी थे, चंपारण सत्याग्रह के कलमकार, पत्रकार, सत्याग्रही पीर मुहम्मद मूनिस का उल्लेख करने से कैसे चूक गए!

मूनिस कानपुर से निकलने वाले पत्र प्रताप’ (संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी, 1913-31) के संवाददाता थे. वर्ष 1914 से वे नियमित रूप से प्रताप में पत्रों, लेखों, टिप्पणियों के माध्यम से नीलहों के आतंक, अत्याचार, किसानों की परेशानी, शोषण और उनके संघर्ष को दुनिया के सामने ला रहे थे. इनमें कई लेख उन्होंने छद्म नाम दुखी आत्मासे भी लिखा. गाँधी के चंपारण आने से पहले ही वे प्रताप में चंपारण में अंधेर’ (13 मार्च 1916), ‘चंपारण की दुर्दशा’ (10 अप्रैल 1917) आदि लेख लिख चुके थे. उन्होंने गाँधी की चंपारण यात्रा की रिपोर्ट भी प्रताप को भेजी थी. प्रसंगवश इसी दौर में बिहारीअखबार (1912) में संपादक बाबू महेश्वर प्रसाद ने चंपारण के रैयतों पर नीलहों के दमन की रिपोर्टों, टिप्पणियों को प्रकाशित किया जिसकी वजह से उन्हें अपने संपादक पद से हाथ धोना पड़ा था. मूनिस के लिए इस तरह की रिपोर्ट लिखना आसान नहीं था जिसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा.

मूनिस के लेखों का संकलन-संपादन करने वाले पत्रकार श्रीकांत लिखते हैं: मूनिस अरबी का शब्द है जिसका अर्थ है मददगार, साथी, कामरेड. मूनिसपीर मुहम्मद अंसारी का तखल्लुस (उपनाम) था. अपने नाम की सार्थकता उन्होंने जीवनपर्यंत सिद्ध की. जैसा नाम वैसा काम.’’
प्रभात प्रकाशन, दिल्ली  से प्रकाशित


जब देश में हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान की बात की जा रही थी तब मूनिस हिंदुस्तानी भाषा की वकालत कर रहे थे. बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का 15वां अध्यक्ष उन्हें बनाया गया था और वे इस संस्थान के संस्थापकों में शामिल थे. भाषा के प्रति उनका नजरिया एकदम स्पष्ट था. भाषा ऐसी हो जिसमें लोगों की आत्मा बोले. उन्होंने हिंदी भाषा के बारे में जो बात वर्ष 1937 में कही वह आज भी मौजूं है- कुछ लोग हिंदी-भाषा को जनता की भाषा न बनाकर पंडितों की भाषा बनाने का विफल प्रयत्न कर रहे हैंजनता के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग-लिखने और बोलने में करना चाहिए जो सरल, सुबोध और भावमय हो, जनता जिसे तुरंत समझ जाए और उसी भाषा में अपना अभिप्राय आसानी से प्रकट कर सके.भाषा के प्रति ऐसा रवैया वही अपना सकता है जिसका जुड़ाव जनता से हो. उनके लेखों में शायरों की पंक्तियाँ और रामचरित मानस के दोहे एक साथ उद्धृत मिलते हैं.

वे कलम के सिपाही होने के साथ-साथ देश के लिए लड़ने वालों के साथ खड़े थे. जब चंपारण में कांग्रेस की स्थापना वर्ष 1921 में हुई तब वे उससे जुड़े. बाद में आंदोलनों के दौरान वे जेल भी गए. जब तिनकठिया प्रथा समाप्त हो गई तो ऐसा नहीं कि वे चुप बैठ गए. उन्होंने वर्ष 1920 में चंपारण में फिर नादिरशाहीजैसे रिपोर्ताज लिखे थे. उन्होंने लिखा- कोठी के साहब बहादुर ने मोटरकार खरीदने के लिए गाँव के रैयतों पर हूबलीटैक्स लगाया.’’ वे जीवनपर्यंत गरीब किसानों, मजलूमों के साथ खड़े रहे.

मूनिस हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर थे. वर्ष 1915 में प्रताप में  हिंदू-मुस्लिम एकताशीर्षक से लिखे लेख में उनके लोकतांत्रिक विचारों की झलक मिलती है. वे लिखते हैं- ‘‘जहाँ एकता है वहाँ विरोध भी है और जहाँ विरोध है वहाँ एकता भी साथ ही साथ है. सारे जन-समुदाय का एक विचार, एक भाव और एक ख्यालात का होना सर्वथा असंभव है.इस लेख के प्रकाशन का वर्ष यदि 1915 के बदले 2015 कर दिया जाए तो ऐसा लगेगा कि वे समकालीन भारत को संबोधित कर रहे हैं!

आचार्य शिवपूजन सहाय ने मूनिस के व्यक्तित्व और कृतित्व पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि मूनिस एक निर्भीक, स्वाभिमानी, बलिदानी पत्रकार थे, पर जब विद्यार्थी जी हिंदू-मुस्लिम एकता की बलिवेदी पर शहीद हो गए तब मूनिसजी सर्वथा असहाय हो गए.जाहिर है, मूनिस, प्रताप के संपादक और स्वतंत्रता सेनानी विद्यार्थी से गहरे प्रभावित थे.

सहाय के मुताबिक मूनिस के लेखों का संग्रह जो प्रकाशक के पास था वह बिहार में 1934 में आए भूकंप में नष्ट हो गया था. मूनिस के लेखों, निजी पत्रों के अभाव में इतिहास के कई प्रश्न अनुत्तरित रह गए हैं. प्रसंगवश, 23 अप्रैल 1917 की शाम में गाँधी मूनिस की माता से मिलने बेतिया स्थित उनके घर पैदल गए. वहाँ हजारों लोग मौजूद थे, पर मूनिस की चर्चा कहीं नहीं है. क्या उस दिन मूनिस मौजूद थे? इस बात का उल्लेख न गाँधी करते हैं, न हीं राजकुमार शुक्ल? फिर वे उस दिन कहाँ थे? सवाल यह भी है कि चंपारण सत्याग्रह के इतिहास में मूनिस कहां हैं? या इसे इस तरह भी कहा जा सकता है क्या सरकार और बौद्धिक वर्ग को मूनिस की सुधि है?