Wednesday, April 10, 2019

चुनाव मार्फत सोशल मीडिया


पिछले दिनों चुनाव विश्लेषक और चर्चित टीवी पत्रकार प्रणय राय ने एक बातचीत के दौरान लोकसभा चुनाव (2019) को व्हाॅट्सएप इलेक्शनकहा. दस वर्ष पहले लोगों के बीच आपसी संवाद के लिए व्हाॅट्सएप जैसे मैसेजिंग प्लेटफाॅर्म का इस्तेमाल शुरू हुआ और देखते ही देखेते एसएमएसके इस्तेमाल को इसने काफी पीछे छोड़ दिया.

लेकिन हाल के वर्षों में भारत में व्हाॅट्सएप जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर कई बार झूठी खबरों (ऑडियो, वीडियो और फोटोशॉप) को इस तरह परोसा व प्रसारित किया गया कि कई जगहों पर हिंसा भड़क उठी और मॉब लिंचिंगमें जानें गयीं.

अब व्हाॅट्सएप ने एक साथ मैसेज को कई समूहों में फाॅरवर्ड करने की सीमा तय कर दी है. साथ ही यदि कोई संवाद फाॅरवर्ड होकर किसी के पास पहुंचता है तो संवाद पाने वालों को इस बात की जानकारी मिल जाती है. इससे संवादों, खबरों के उत्पादन के स्रोत के बारे में अंदाजा मिल जाता है.

हालांकि, फेक न्यूज, दुष्प्रचार, प्रोपेगैंडा रोकने में ये पहल नाकाफी साबित हुए हैं. इसके मद्देनजर हाल ही में संसदीय समिति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के कर्ताधर्ताओं को तलब किया, ताकि लोकसभा चुनाव में इन प्लेटफॉर्म के माध्यम से फैलनेवाली अफवाहों और फेक न्यूज पर रोक लगे और नागरिकों के हितों और अधिकारों की रक्षा की जा सके. चुनाव आयोग ने भी सोशल मीडिया के लिए दिशा-निर्देश जारी किया है.

एक आंकड़े के मुताबिक, भारत में करीब 90 करोड़ वोटर हैं, जिसमें से करीब 50 करोड़ के पास इंटरनेट की सुविधा है. करीब 30 करोड़ फेसबुक यूजर्स हैं, जबकि 20 करोड़ व्हाॅट्सएप मैसेज सेवा का इस्तेमाल करते हैं.

लोकसभा चुनावों के दौरान हर राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया के माध्यम से ज्यादा-से-ज्यादा फायदा उठाना चाह रही है. यहां व्हाॅट्सएप के साथ-साथ शेयरचैट जैसे मैसेजिंग के देसी अवतारों पर भी राजनीतिक दलों की नजर है, पर यह समकालीन विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाया है और ज्यादातर लोगों की नजर से ओझल ही है.

केपीएमजी और गूगल के मुताबिक वर्ष 2011 में भारतीय भाषाओं में इंटरनेट इस्तेमाल करनेवालों की संख्या 4 करोड़ 20 लाख थी, जो वर्ष 2016 में बढ़कर 23 करोड़ 40 लाख हो गयी, और वर्ष 2021 में यह संख्या बढ़कर 53 करोड़ 60 लाख हो जायेगी.

साथ ही वर्तमान में करीब 96 प्रतिशत लोग इंटरनेट का इस्तेमाल मोबाइल के माध्यम से करते हैं. किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों और कार्यकर्ताओं के लिए जहां मास मीडिया आपसी संवाद का एक माध्यम होता है, वहीं पिछले कुछ वर्षों में दुनियाभर में सोशल मीडिया एक-दूसरे से संवाद करने के साथ-साथ चुनावी रणनीति का हथियार भी बनकर उभरा है.

चुनावों के दौरान हर बड़ी-छोटी राजनीतिक पार्टियों के अपने वार रूमहोते हैं, जहां से मीडिया पर निगाह रखी जाती है और इन्हें प्रभावित करने की कोशिश होती है, ताकि अपने एजेंडे को लागू किया जा सके.


(प्रभात खबर, 10 अप्रैल 2019)

Tuesday, March 19, 2019

मिथिला की लिखिया कला


पिछले दिनों राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मिथिला कला की वयोवृद्ध एवं सिद्धहस्त कलाकार गोदावरी दत्त को पद्मश्री से सम्मानित किया. राष्ट्रपति के ट्विटर हैंडल से राष्ट्रपति भवन ने गोदावरी दत्त की तस्वीर शेयर करने के साथ ही लिखा कि पारंपरिक कला को बढ़ावा देने, उभरते कलाकारों को प्रशिक्षित करने और मार्गदर्शन के लिएउन्हें यह सम्मान दिया गया.

मधुबनी जिले के रांटी गांव में रहनेवाली, शिल्प गुरु, गोदावरी दत्त की कला की विशेषता रेखाओं की स्पष्टता में है. उनके यहां रंगों का प्रयोग कम-से-कम होता है. साथ ही उनके बनाये चित्रों के विषय पारंपरिक आख्यानों से जुड़े हैं.

रामायण, महाभारत के अनेक प्रसंगों को उन्होंने अपनी कला का आधार बनाया है. भले ही उनके विषय पारंपरिक हों, पर उनके चित्र आधुनिक भाव-बोध के करीब हैं. वे खुद कहती हैं कि मेरी मां या पद्मश्री से सम्मानित जितवारपुर की जगदंबा देवी की पेंटिंग फोक टचको लिए होता था. आधुनिक शिक्षा के आने से विषय-वस्तु और शैली दोनों में बदलाव आया है.

कोहबर, सीता-राम, अर्धनारीश्वर जैसे पारंपरिक विषयों के अलावे मिथिला कला में भ्रूण हत्या, आतंकवाद, खेती जैसे विषय भी पिछले दो दशकों में चित्रित किये गये हैं. यह सैकड़ों साल पुरानी इस कला के विकसनशील होने का प्रमाण है.

पिछली सदी में जब प्रसिद्ध मिथिला कलाकार गंगा देवी ने अमेरिकी प्रवास को अपनी पेंटिंग मे चित्रित किया, आत्मकथात्मक रेखांकन किया, तब कला के पारखियों की नजर इस कला में निहित आधुनिक भाव बोध और संवेदनाओं की ओर गयी.

इसी तरह संतोष कुमार दास ने गुजरात सीरीजबनाकर गुजरात दंगों के दौरान धर्म-हिंसा के गठजोड़ को चित्रित कर इस कला को समकालीन समय और समाज से जोड़ा. आम तौर पर पारंपरिक कला में इस तरह के विषय नहीं देखे जाते.
हाल ही में शांतनु दास ने नागार्जुन की चर्चित कविता अकाल और उसके बादको एक बड़े कैनवस पर मिथिला कला की शैली में चित्रित किया है. नये युवा कलाकारों की शिक्षा-दीक्षा और माइग्रेशनने उनकी सोच और संवदेना का विस्तार किया है, जो इस कला में आज प्रमुखता से दिखायी देता है.

असल में, 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में ही आधुनिक विषय-वस्तु का इस पारंपरिक कला में प्रवेश दिखता है. अंग्रेज अधिकारी डब्ल्यूजी आर्चर ने मार्गपत्रिका में वर्ष 1949 में जब मैथिल पेंटिंगलेख लिखा, तब उन्होंने इस कला के लिए फोक (लोक) शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था.

साथ ही मिथिला क्षेत्र में वर्ष 1934 में आये भूकंप के बाद आर्चर ने जो चित्र उतारी थी, उनमें दीवारों पर मिथिला शैली में रेलगाड़ीका चित्रण मिलता है. जाहिर है, उस समय भी लोग पारंपरिक विषय-वस्तुओं से अलग आधुनिक विषयों को अपनी कलम और कूची का आधार बनाते रहे थे. प्रसंगवश, आज भी पुराने लोग मिथिला कला को लिखियाकहते हैं, पेंटिंग नहीं.


(प्रभात खबर, 19 मार्च 2019 को प्रकाशित)

Tuesday, March 05, 2019

सिनेमा के स्वरूप पर उठते सवाल


पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशक में फिल्म अध्येताओं के बीच बजरिये आंद्रे बाजां सिनेमा क्या है’, बहस के केंद्र में था. असल में सिनेमा के चर्चित आलोचक और सिंद्धांतकार बाजां की इस नाम से मूल फ्रेंच भाषा में दो भागों में लिखी किताब का अंग्रेजी अनुवाद बाजार में आया था. करीब पचास वर्ष बाद एक बार फिर से सिनेमा के सौंदर्यशास्त्र और स्वरूप को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

ऑस्कर पुरस्कार देनेवाली संस्था एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज ने पिछले दिनों निर्णय लिया कि पुरस्कार समारोह के दौरान चार पुरस्कारों को ऑफ एयरयानी विज्ञापनों के बीच ब्रेक के दौरान दिये जायेंगे. इसमें सिनेमैटोग्राफी, फिल्म एडिटिंग, लाइव-एक्शन शॉर्ट, मेकअप और हेयरस्टाइलिंग शामिल थे. बाद में, फिल्मकारों की आलोचना के बाद एकेडमी को यह निर्णय वापस लेना पड़ा.

मैक्सिको के चर्चित निर्माता-निर्देशक अल्फोंसो कुरों, जिनको एक साथ रोमाफिल्म के लिए बेस्ट डायरेक्टरऔर बेस्ट सिनेमैटोग्राफीका ऑस्कर मिला, ने लिखा था- सिनेमा के इतिहास में बिना ध्वनि, बिना रंग, बिना कहानी, बिना कलाकार और बिना संगीत के मास्टरपीस मौजूद रहे हैं, पर बिना सिनेमैटोग्राफी और संपादन के दुनिया की कोई भी फिल्म आज तक अस्तित्व में नहीं आयी है.

हॉलीवुड और बॉलीवुड में बननेवाली फिल्मों में व्यावसायिकता प्रधान कहानियोंऔर स्टारोंपर इतना जोर रहता है कि दर्शक दृश्य योजना (मीज ऑन सेन), सिनेमैटोग्राफी, संपादन या ध्वनि तत्वों पर गौर ही नहीं करता. साथ ही दर्शकों के बीच सिनेमा के एप्रिशिएसन (रसास्वादन) पर जोर नहीं रहता है.

संचार क्रांति के इस आधुनिक दौर में देशी-विदेशी सिनेमा के विभिन्न रूपों से परिचय के बाद दर्शकों में मनोरंजन से आगे सिनेमा को एक स्वतंत्र कला माध्यम और विचार के रूप में पढ़ने की गुंजाइश बढ़ी है. आशा है आगामी वर्षों में दर्शक शैली (क्राफ्ट) पर भी ध्यान देंगे.

कल्ट फिल्मका दर्जा पा चुकी कमल स्वरूप निर्देशित ओम-दर-ब-दरकी संपादक प्रिया कृष्णास्वामी कहती हैं- डी डब्लू ग्रीफिथ के समय से ही संपादन को फिल्म निर्माण में लेखन का दूसरा चरण माना जाता है.

संपादन के समय ही निर्देशक मूल स्क्रिप्ट के मुताबिक जो शूट करके लाता है उसमें से उसे क्या चाहिए, इसका निर्णय करता है.फिल्म में निर्देशक दृश्य, बिंब और ध्वनि का जिस तरह संयोजन करता है, वही उसे विशिष्ट बनाता है, लेकिन दर्शकों के ध्यान में पर्दे के पीछे बैठे तकनीशियन, आर्टिस्ट या संपादक कभी नहीं आते.

भारत की भानु अथैया को बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइनऔर रेसुल पोकुट्टी को साउंड मिक्सिंगके लिए ही ऑस्कर पुरस्कार मिला था. बाजार के दबाव में लिये गये निर्णय से स्पष्ट है कि एकेडमी की नजर में सिनेमा मनोरंजन से ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन सिनेमा के अध्येता और सिनेमाप्रेमी पूछ रहे हैं कि बिना संपादक, बिना सिनेमैटोग्राफर सिनेमा का स्वरूप क्या होगा?

(प्रभात खबर, 5 मार्च 2019 को प्रकाशित)

Tuesday, February 19, 2019

उतरे करने को उदधि-पार


पिछले दिनों देश के प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्समें समाजशास्त्र के प्रोफेसर रहे रबिंद्र रे (1948-2019) के गुजरने की खबर आयी. विश्व पुस्तक मेले में मैं मैथिली की सुपरिचित कथाकार लिली रे के उपन्यास पटाक्षेपका मैथिली संस्करण ढूंढ़ रहा था.

मेरी जानकारी में नक्सलबाड़ी आंदोलन को केंद्र में रखकर मैथिली में शायद ही कोई और उपन्यास लिखा गया है. बांग्ला की चर्चित रचनाकार महाश्वेता देवी ने भी हजार चौरासी की मांउपन्यास लिखा, बाद में इसको आधार बनाकर इसी नाम से गोविंद निहलानी ने फिल्म भी बनायी.

उपन्यास पटाक्षेपमें बिहार के पूर्णिया इलाके में दिलीप, अनिल, सुजीत जैसे पात्रों की मौजूदगी, संघर्ष और सशस्त्र क्रांति के लिए किसानों-मजदूरों को तैयार करने की कार्रवाई पढ़ने पर यह समझना मुश्किल नहीं होता कि यह रबिंद्र रे और उनके साथियों की कहानी है.

पात्र सुजीत कहता है- हमारी पार्टी का लक्ष्य है- शोषण का अंत. श्रमिक वर्ग को उसका हक दिलाना.उल्लेखनीय है कि साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लिली रे रबिंद्र रे की मां हैं, पर मानवीय मूल्यों को चित्रित करनेवाला यह उपन्यास आत्मपरक नहीं है.

नयी पीढ़ी के लिए शायद यह कल्पना करना मुश्किल हो कि पिछली सदी के 60 के दशक के आखिरी और 70 के दशक के आरंभिक वर्षों में शहरी, संभ्रांत कॉलेज के युवा-छात्रों ने किसानों-आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने, उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित करने के लिए अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़ दी और गांव-देहातों में रहने लगे. उन्होंने समतामूलक समाज का सपना देखा.

इनमें से कुछ खेत रहे और कुछ मुख्यधारा में लौट आये. हालांकि, बाद में रबिंद्र रे इस विचारधारा से न सिर्फ दूरी बना ली, बल्कि अपनी किताब द नक्सलाइट्स एंड देयर ऑडियोलॉजीमें लिखा- नक्सलाइट की अस्तित्ववादी विचारधारा मूल रूप से नाइलिस्ट है- जो आश्वस्त रहता है कि वह सब कुछ है और कुछ भी नहीं है.

सेंट स्टीफेंस कॉलेज के दिनों के उनके मित्र और नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौर में भूमिगत रहनेवाले प्रोफेसर दिलीप सिमियन ने रबिंद्र रे को याद करते हुए लिखा है कि भूमिगत रहने के दौरान में एक बार मैं साल 1971 में पूर्णिया में उससे मिला था.

सफेद गंजी, नीले रंग की लुंगी और घनी, लटकती मूंछ में पूर्णिया बस स्टैंड पर लल्लू (रबिंद्र रे का पुकारू नाम) उत्तरी बिहार का किसान लग रहा था.
युवा हमेशा स्वप्नदर्शी होता है और विद्रोही भी. लेकिन, रबिंद्र की पीढ़ी के सपने हमारी पीढ़ी से अलग थे. उस दौर में दुनियाभर में सत्ता-व्यवस्था के खिलाफ युवा-छात्रों का गुस्सा चरम पर था.

फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका आदि देशों में सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे और भारत में नक्सलबाड़ी आंदोलन में युवा-छात्रों ने भागेदारी की थी. नागार्जुन ने लिखा है- जो छोटी-सी नैया लेकर/ उतरे करने को उदधि-पार/ मन की मन में ही रही, स्वयं/ हो गये उसी में निराकार!/ उनको प्रणाम!

(प्रभात खबर, 19 फरवरी 2019 को प्रकाशित)

Sunday, February 03, 2019

बेखौफ आजादी का सवाल

प्रभात खबर
सोशल मीडिया पर युवा निर्देशक इवान अय्यर की पहली फिल्म ‘सोनी’ की इन दिनों खूब चर्चा है. फिल्म समारोहों में सुर्खियां बटोर चुकी यह फिल्म हाल ही में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई है.
ऐसा नहीं है कि भारतीय फिल्मों के इतिहास में स्त्रियों को केंद्र में रखकर फिल्में नहीं बनी हैं, या स्त्रियों की स्टीरियोटाइप छवियों से अलग छवि गढ़ने की कोशिश नहीं की गयी हो. हिंदी फिल्मों की बात करें, तो आजादी के बाद फिल्म मदर इंडिया की राधा, बंदिनी की कल्याणी से लेकर फिल्म मिर्च मसाला की सोनबाई की छवियां इसका सफल उदाहरण हैं. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अदूर गोपालकृष्णन अपनी फिल्मों में स्त्रियों की सशक्त और बहुविध रूपों के चित्रण के लिए खासतौर पर जाने जाते हैं.
इसी तरह हाल के वर्षों में ‘पीकू’, ‘मैरी कॉम’, ‘कहानी’, ‘बरेली की बर्फी’, ‘लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का’ और ‘अनारकली ऑफ आरा’ जैसी फिल्मों में नायिकाओं पर ‘भारतीय संस्कृति’ के प्रदर्शन का वैसा बोझ नहीं है, जैसा ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ या ‘परदेस’ के स्त्री पात्रों के चित्रण में दिखता है. 
उदारीकरण के दौर में आगे बढ़नेवाली और अपने हक के लिए लड़नेवाली इन स्त्रियों के रिश्ते पितृसत्ता के साथ बदले हुए दिखायी पड़ते हैं. सोनी फिल्म भी पितृसत्ता के सवालों से टकराती है, पर अलग ढंग से. यह फिल्म मुख्य किरदार सब इंस्पेक्टर सोनी और पुलिस अफसर कल्पना के इर्द-गिर्द घूमती है.

हाल में बनी पाॅपुलर हिंदी फिल्मों में पुलिस अफसर ‘दबंग’ ही होते हैं, लेकिन इस फिल्म में मुख्य किरदार पुलिस तंत्र का हिस्सा होने के बावजूद घर-परिवार और बाहर सड़कों पर पितृसत्ता की मार झेलती हैं. यह इस फिल्म की विशिष्टता है. हालांकि, यह यथार्थ सिर्फ दिल्ली शहर का ही नहीं है.
सड़क पर स्त्रियों की आजादी और हिंसा के सवाल को मलयालम फिल्म ‘एस दुर्गा’ में निर्देशक सनल ससिधरन ने भी डॉक्यूमेंट्री शैली में बखूबी दिखाया है. पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के लिए बेखौफ आजादी आज भी एक सपना है, यह फिल्म इस बात को रेखांकित करती है.

फिल्म का देशकाल शहर दिल्ली है. वर्ष 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया बलात्कार कांड ने पूरे देश को आंदोलित किया था. बातचीत में फिल्म के निर्देशक इवान कहते हैं कि ‘जब मैंने वर्ष 2014 में कहानी के ऊपर काम करना शुरू किया, तो मेरे जेहन में यह घटना थी, पर यह फिल्म आनन-फानन में तैयार नहीं हुई है. मैं स्त्रियों की आजादी, हिंसा के सवाल को पुलिस में काम करनेवाली महिलाओं के परिप्रेक्ष्य से देखना चाह रहा था.’
पाॅपुलर फिल्में हमें यथार्थ की दुनिया से फंतासी की ओर ले जाती हैं, पर मनोरंजन से इतर यथार्थ की पुनर्रचना एक कला माध्यम के रूप में सिनेमा को विशिष्ट बनाती रही है.
फिल्म ‘सोनी’ संवेदनशीलता के साथ, बिना किसी ताम-झाम और लाग-लपेट के छवियों (लांग सिंगल टेक), ध्वनियों और हल्की रोशनी में फिल्मांकन के माध्यम से एक ऐसा यथार्थ रचती है, जो लैंगिक विभेद, पात्रों के तनाव, आक्रोश, स्त्री मन के अंतर्द्वंदों को हमारे सामने लाने में सफल रही है. पुरुषवादी वर्चस्व स्त्रियों की सत्ता के सवाल को लेकर एक उलझन में हमेशा दिखता है. पुरुष पात्र पुलिस अफसर को ‘सर’ कहे या ‘मैडम’, यह तय नहीं कर पाते.
इवान अय्यर ईरानी फिल्मों, खासतौर पर चर्चित फिल्मकार जफर पनाही के मुरीद हैं. वे कहते हैं कि ‘जफर पनाही की फिल्मों को देखने पर हमें महसूस ही नहीं होता कि जो चीज हम पर्दे पर देख रहे हैं, वह ‘स्टेज्ड’ है, यथार्थ नहीं.’ वे पनाही की मशहूर फिल्म ‘ऑफ साइड’ का उदाहरण देते हैं.
प्रसंगवश, ‘ऑफ साइड’ फिल्म में फुटबाल की शौकीन कुछ लड़कियां स्टेडियम जाकर मैच का लुत्फ लेना चाहती हैं, पर ईरान में इस पर पाबंदी है. अपना भेष बदल कर, चोरी-छिपे लड़कियां किसी तरह स्टेडियम पहुंच तो जाती हैं, पर वे पुलिस की निगाहों से बच नहीं पातीं. फिल्म में स्त्रियों की स्वतंत्रता के सवाल के साथ पुलिस की दुविधा और बेबसी भी बखूबी उभर के आती है.
इस फिल्म में गीतिका विद्या ओहलान (सोनी) और सलोनी बत्रा (कल्पना) ने जिस सहजता से अपने किरदारों को जिया है, वह हमारे अनुभव को समृद्ध करता है. फिल्म एक लय में चलती है, लेकिन कहीं-कहीं धीमी हो जाती है.
एक पुलिस अफसर और सब-इंस्पेक्टर के आपसी संबंधों को दर्शाते हुए ऐसा लगता है कि समाज-प्रशासन में जो वर्गीय-संरचनात्मक विभाजन है, निर्देशक उसे नकारता है. हालांकि, दोनों के रहन-सहन और जीवन-यापन में यह अंतर स्पष्ट है. फिल्म दिल्ली के ‘अंधेरे कोने’ पर रोशनी डालने से नहीं चूकती. यहां सत्ता की धौंस की संस्कृति सर्वव्यापी है, जिस पर निर्देशक ने बहुत सधे ढंग से टिप्पणी की है. सिनेमा का एक काम सत्ता से सवाल करना भी है.
नेटफ्लिक्स को चाहिए कि जल्दी ही इस फिल्म को वह देश के सिनेमाघरों में प्रदर्शित करे, ताकि ऑनलाइन की दुनिया से बाहर भी आम दर्शक समूह तक इसकी पहुंच बढ़े. एक सशक्त मास मीडियम के रूप में ऐसी फिल्मों की सार्थकता भी इसी में सिद्ध होती है.

(प्रभात खबर, 3 फरवरी 2019)

Saturday, February 02, 2019

बिना पेंटिंग के मिथिला में विवाह पूरा नहीं होता: गोदावरी दत्त

गोदावरी दत्त से बातचीत, नवभारत टाइम्स
अनेक पुरस्कारों से सम्मानित 89 वर्ष की शिल्पगुरु, मिथिला पेंटिंग की सिद्धहस्त कलाकार गोदावरी दत्त को कला के क्षेत्र में पद्मश्री देने की घोषणा हुई है। मधुबनी के नजदीक, रांटी गांव में रहने वाली दत्त की पेंटिंग की प्रदर्शनियां देश-विदेश के कई शहरों में लगाई जा चुकी हैं। उनकी जिंदगी काफी संघर्षपूर्ण रही है। उनके जीवन पर कलाकार नमस्कारनाम से एक फिल्म भी बनी है। प्रस्तुत हैं गोदावरी दत्त से हाल ही में हुई अरविंद दास की लंबी बातचीत के मुख्य अंश:

क्या आपको पद्म पुरस्कार मिलने में देरी हुई?

मुझे पुरस्कार की घोषणा सुन कर बहुत खुशी हुई। खूब उत्साह है। पर मेरे प्रिय-परिजनों को लगता है कि मुझे पहले ही यह पुरस्कार मिल जाना चाहिए था।

अंग्रेज अधिकारी डब्लू. जी. आर्चर ने मार्गपत्रिका में वर्ष 1949 में मैथिल पेंटिंगलेख लिख कर दीवार पर उकेरी जाने वाली इस पारंपरिक कला से दुनिया का परिचय कराया, लेकिन वास्तव में यह पेंटिंग कितनी पुरानी है?

यह पेंटिंग आज की नहीं है, ये हमारी संस्कृति है। बिना पेंटिंग के मिथिला में शादी-विवाह का कोई काम पूरा नहीं हो सकता। कोहबर लिखने की कला सदियों पुरानी है। शादी के समय कोहबर, पुरहर, पातिल, दशावतार, कमलदह आदि लिखने की परंपरा रही है। पहले इसे बसहा पेपर पर लिखा जाता है। मैंने अपनी मां सुभद्रा देवी से पेंटिंग सीखी। पहले इसे लिखिया कहा जाता था। मेरी माँ, सुभद्रा देवी मेरी कलागुरु भी थीं। जब मैं पांच-छह साल की थी तभी से पेंटिंग बनाने लगी थी। 60 के दशक के आखिरी वर्षों में लोगों ने यह पेंटिंग कागज पर बनाना शुरू किया। बाहर की दुनिया के लिए कागज पर मैंने पहली पेंटिंग 1971 में बनाई थी।

अपनी कौन सी पेंटिंग बनाने में आपका मन सबसे ज्यादा रमा?

मेरे लिए यह कहना मुश्किल है कि कौन सी पेंटिंग बना कर मुझे ज्यादा खुशी मिली। मैंने बहुत ज्यादा पेंटिंग नहीं बनाई है, लेकिन जो भी बनाई वह मन से बनाई है, बहुत स्नेह से बनाई है और मेरी सारी पेंटिंग मुझे पसंद हैं।

जापान के मिथिला म्यूजियम में जो विशाल त्रिशूल आपने बनाया उसके बारे में कुछ बताइए।

(हंसते हुए) मैंने सात बार जापान की यात्रा की है। मैंने वहां पर अर्धनारीश्वर की पेंटिंग बनाई जिसमें भगवान शंकर के हाथ में त्रिशूल है, डमरू है। मिथिला म्यूजियम के टोकियो हासेगेवा को वह पेंटिंग बहुत पसंद आई, मुझे भी अच्छा लगा। हासेगेवा ने कहा कि एक त्रिशूल अलग से बना दीजिए, डमरू अलग से बना दीजिए। मन में एक संशय था कि यह कितना लंबा बनेगा। पर बाबा की कृपा थी कि 18 फुट लंबा वह त्रिशूल जब बनाना शुरू किया तो अनायास उसमें नागफनी, सूर्य-चंद्रमा, ओम डिजाइन में आ गया। बनाने के बाद मेरा मन हल्का हो गया था और उसके बाद मैंने कहा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश सबकी शक्ति इस त्रिशूल में निहित है। वह बहुत ही सुंदर बन गया।

आपकी पेंटिंग में ऐसी कौन सी विशिष्टता है जो आपको दूसरों से अलग करती है?


इस बात का जवाब मैं नहीं दे पाऊंगी। आप इसे खुद देख कर समझ सकते हैं। किसी भी कलाकार में क्या विशिष्टता है यह देखने वालों पर निर्भर करता है।

आपकी कोई नई पेंटिंग जिसके बारे में आप बताना चाहें?

एक पेंटिंग के बारे में बताना चाहूंगी। मैंने अपनी स्मृति से जापान के लोक पर्व का चित्रण किया है। जैसे अपने यहां पर्व-त्योहार होता है वैसा ही इसमें है। अमेरिकी एंथ्रापलॉजिस्ट डेविड सैनटन के कहने पर मैंने यह पेंटिंग बनाई है। काफी महंगी है यह।

पहली पेंटिंग आपकी कितने में बिकी थी?

मेरी पहली पेंटिंग 25 रुपये में बिकी थी। उस समय घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं माना जाता था, यह वर्जित था। रांटी से मैं नजदीक के शहर मधुबनी भी नहीं जा पाती थी। पुरुषों को हम लोगों से मिलने की मनाही थी। मधुबनी में जब 1971 में ललित नारायण मिश्र के सहयोग से हैंडिक्राफ्ट का कार्यालय खुला, तब उसके पहले उप निदेशक एच. पी. मिश्रा बने। वे बहुत ही भले और नेक दिल इंसान थे। वे गांव-गांव घूम कर कलाकारों को ढूंढ कर काम दिया करते थे। मैंने कागज पर बनी अपनी कुछ पेंटिंग उन्हें दी थी।

और सबसे महंगी पेटिंग कितने में बिकी?

कोलकाता स्थित बिड़ला के एक संस्थान ने लगभग पंद्रह वर्ष पहले सवा लाख में मेरी एक पेंटिंग खरीदी थी।

इन पचास वर्षों में मिथिला पेंटिंग की शैली में आपने क्या बदलाव देखा है?

बदलाव तो खूब आया है। जैसे मेरी मां या पद्म श्री से सम्मानित जितवारपुर की जगदंबा देवी की पेंटिंग फोक टचलिए होती थी। आधुनिक शिक्षा के आने से विषय-वस्तु और शैली दोनों में बदलाव आया है।

नए कलाकारों के लिए क्या संदेश आप देना चाहेंगी?

मैं तो यही कहती हूं कि साहस और धैर्य से काम कीजिए, हिम्मत मत हारिए। इस बार कोई पुरस्कार नहीं मिला, इसलिए मैं काम नहीं करूंगा, ऐसी सोच मन में नहीं आनी चाहिए।

(नवभारत टाइम्स, 2 फरवरी 2019 को प्रकाशित)

Thursday, January 17, 2019

सिनेमा के संरक्षण में उदासीन समाज


पिछले दिनों मैथिली फिल्मों की चर्चा चली, तब प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने कहा कि बहुत पहले 1972-73 में मैंने पटना में एक मैथिली फिल्म देखी थी- कन्यादान. हरिमोहन झा की कहानी थी और संवाद रेणुजी के.फणीश्वरनाथ रेणु इस फिल्म से जुड़े थे, यह मुझे नहीं पता था. मुझे बस इसकी जानकारी थी कि कन्यादानको पहली मैथिली फिल्म होने का श्रेय है.

 बहरहाल, मैंने बड़े भाई से पूछा तो उन्होंने भी कहा कि जब वे पांच साल के थे, तब यह फिल्म देखी थी, जिसकी धुंधली सी यादें हैं. मां ने कहा कि झंझारपुर (गांव का कस्बा) के बांस टॉकिजमें गांव में आयी एक नव वधू के साथ उसने भी यह फिल्म देखी थी.

 वर्ष 1965 में फणी मजूमदार ने इस फिल्म का निर्देशन किया था. ऐसा लगता है कि इस फिल्म के बेहद कम प्रिंट बने थे. मैंने इस फिल्म को खोजने की कोशिश की और इस सिलसिले में जब पुणे स्थित नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडियासे संपर्क साधा, तो उनका कहना था कि उनके डेटा बैंक में ऐसी कोई फिल्म नहीं है.

उल्लेखनीय है कि कन्यादान उपन्यास का रचनाकाल सन 1933 का है. इस फिल्म में बेमेल विवाह की समस्या को भाषा समस्या के माध्यम से चित्रित किया गया है.

इस फिल्म के गीत-संगीत में प्रसिद्ध लोक गायिका विंध्यवासिनी देवी का भी योगदान था. जाहिर है इस फिल्म की अनुपलब्धता के कारण सिनेमा, जो एक समाज को कलात्मक रूप से रचने और उसकी स्मृतियों को सुरक्षित रखने का एक जरिया है, उससे हमारी पीढ़ी वंचित रह गयी है. इस फिल्म का सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व है.

 समकालीन समय में जब भी क्षेत्रीय फिल्मों की बात होती है, तो भोजपुरी का जिक्र किया जाता है. मैथिली फिल्मों की चलते-चलते चर्चा कर दी जाती है. लेकिन, यहां इस बात का उल्लेख जरूरी है कि भोजपुरी और मैथिली फिल्मों के अतिरिक्त साठ के दशक में फणी मजूमदार के निर्देशन में ही भईयानाम से एक मगही फिल्म का भी निर्माण किया गया था.

 भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में जब भी पुरोधाओं का जिक्र किया जाता है, तब दादा साहब फाल्के के साथ हीरा लाल सेन, एसएन पाटनकर और मदन थिएटर्स की चर्चा होती है. मदन थिएटर्स के मालिक थे जेएफ मदन.

एल्फिंस्टन बायस्कोप कंपनी इन्हीं की थी. पटना स्थित एल्फिंस्टन थिएटर (1919), जो बाद में एल्फिंस्टन सिनेमा हॉल के नाम से मशहूर हुआ, में पिछली सदी के दूसरे-तीसरे दशक में मूक फिल्में दिखायी जाती थीं. आज भी यह सिनेमा हॉल नये रूप में मौजूद है.

बिहार में सिनेमा देखने की संस्कृति शुरुआती दौर से रही है. आजादी के बाद मैथिली-मगही-भोजपुरी में सिनेमा निर्माण भी हुआ, पर बाद में जहां तक सिनेमा के सरंक्षण और पोषण का सवाल है, बिहार का वृहद समाज उदासीन ही रहा है.

(प्रभात खबर, 17 जनवरी 2019 को प्रकाशित)