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Sunday, January 27, 2008

गुल, नज़ूरा और रामचंद पाकिस्तानी


गुलरुख़ ने लिखा है कि सोशल नेटवर्किंग साइट ओरकुट के एलबम में जो आपने लोदी गार्डन की तस्वीर डाल रखी है उसका क्रेडिट मुझे मिलनी चाहिए. गुल इस्लामाबाद में रहती हैं.

वर्षों से दिल्ली में रहते हुए भी लोदी गार्डन की हवा कभी नहीं खाई. जिसका मुझे मलाल भी रहा है. ऐसे में जब इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हो रहे एक वर्कशाप के बीच में हवाखोरी के लिए ख़ूबसूरत और ज़हीन गुल ने लोदी गार्डन घूमने का न्यौता दिया तो भला मैं कैसे इंकार करता!

हम जिन्हें नहीं जानते या जिनसे हमारा परिचय नहीं होता है उनके बारे में हम तरह-तरह के ख़्याल बुनते हैं. ये ख़्याल आम तौर पर ‘निगेटिव’ ही होते हैं. और यदि वह शख़्स पाकिस्तान से ताल्लुक़ रखता हो तो हमारा पूर्वाग्रह अपने चरम पर होता है.

पाकिस्तान के बारे में सामान्य ज्ञान को छोड़ कर जो कुछ भी जानकारी हमें भारतीय पॉपुलर मीडिया से मिलती है वह आधी-अधूरी होती है. पाकिस्तान की वही ख़बरें हमारे अख़बारों की सुर्खियाँ बनती हैं जो अमूमन ‘मौत की ख़बरों’ से वाबस्ता होती है या जिससे हमारे राष्ट्र और राष्ट्रीयता को प्रत्यक्षतः किसी तरह का नुकसान पहुँचने की संभावना नहीं रहती है.

पाकिस्तान के मामले में भारतीय मीडिया राज्य और सत्ता के नज़रिए से ही ख़बरों को देखने और उन्हें विश्लेषित करने को अभिशप्त लगता है. किसी भी महीने यदि आप भारतीय अख़बारों पर नज़र डालें तो इस तरह की सुर्खियाँ जो दिसंबर, 2007 में नवभारत टाइम्स, दिल्ली में छपी हैं- पाकिस्तानी क्रूज मिसाइलों का जवाब है हमारे पास , एफएम मौलाना बोला- खून बहाने को तैयार, पाक ने टेस्ट की एटमी मिसाइल आदि, आदि देखने को मिल जाएँगी. और ख़बरिया चैनलों की बात जितनी कम की जाए उतना बेहतर. वर्ष 2001 में भारत के संसद भवन पर हुए आतंकवादी हमले के बाद ‘आजतक’ जैसे चैनलों ने युद्ध का समां बाँधने और युयुत्सु मानसिकता तैयार करने में जो भूमिका अदा कि थी वह जगज़ाहिर है.

पिछले महीने दक्षिण एशिया के क्षेत्र में संघर्ष निवारण और शांति स्थापना के लिए काम कर रही दिल्ली स्थित एक संस्था विसकाम्प (Women in Security Conflict Management and Peace) के हफ़्ते भर के एक वर्कशाप में जब तक़रीबन 25 युवा पाकिस्तानी शोधार्थियों, ऐक्टिविस्टों से बात-चीत करने और उनके संग उठने-बैठने का मौक़ा मिला तो मीडिया की वज़ह से जो ‘स्टरियोटाइप’ छवि मन में बैठी हुई थी उसमें ज़बरदस्त मोड़ आया.

गुल, नज़ूरा और फ़ैजा की चितांएँ हमसे अलग कहाँ थी. सरमद और गुलाम भाई तो हमारी तरह ही यारबाश हैं. कैसे अर्शी और नबिहा रात के 10-11 बजे जेएनयू की फिजाओं में इस्लामाबाद के क़ायदे आज़म यूनिवर्सिटी की खुशबू ढूँढ रहीं थी. गुल दिल्ली हाट और ख़ान मार्केट में तो ऐसे तफ़रीह कर रहीं थी जैसे वो कराची या लाहौर में हो. संभव है कि यदि मैं भी लाहौर के बाज़ार में घूमूँ तो मुझे भी कुछ ऐसा ही लगे. कब से सुनता-पढ़ता आ रहा हूँ कि ‘जिन ने लाहौर नहीं वेख्या, वो जमया ही नहीं.’ पर यह कब संभव होगा?

इससे पहले नवंबर 2006 में एक सेमिनार में पाकिस्तान के एक शोधार्थी जवाद सैयद से आस्ट्रेलिया में मुलाक़ात हुई थी. साहित्य-संगीत में रूचि होने के नाते फ़ैज़ की शायरी और फ़रीदा ख़ानम की ग़ज़लों से इश्क तो पुराना था लेकिन किसी पाकिस्तानी नागरिक से पहली बार मेरा मुखामुखम इस तरह हुआ.

मिलते ही ऐसा लगा कि जैसे हम एक-दूसरे को वर्षों से जान रहे हो. उनकी दिलचस्पी मीर, ग़ालिब और फ़ैज में काफ़ी थी. वे कहने लगे कि मेरी उर्दू काफ़ी अच्छी है और मैं कहता रहा कि आपकी हिन्दी. बहरहाल उनसे हुई दोस्ती का सिलसिला जारी है. आजकल वे लंदन में हैं. अपनी ख़तो-किताबत उनसे होते रहती है.

सवाल है कि हम अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के बारे में कितना जानते हैं? या जो जानते हैं वो कितना सच है, कितना झूठ. ठीक इसी तरह एक आम पाकिस्तानी भारत के बारे में कितना कुछ जानता है जिसमें झूठ-सच दूध-पानी की तरह मिला होता है, जिसे अलगाना मुश्किल है.

राजनीति के अलावे सामाजिक-साँस्कृतिक एक-सी ज़मीन जो दोनों देशों के बीच है उस पर कितनी दूर हम इन साठ सालों में चल पाएँ हैं? दो देशों के बीच चली आ रही राजनीतिक लड़ाई में सबसे ज़्यादा साझी संस्कृति की जो बुनियाद है वही प्रभावित हुई है. क्योंकि राजनीतिक लड़ाई इन्हीं साँस्कृतिक हथियारों से लड़ी जाती रही है.

अमरीकी पत्रिका न्यूज़वीक कहती है कि ‘पाकिस्तान धरती पर सबसे ख़तरनाक जगह है’ और भारतीय मीडिया इस ख़बर को लपक कर कहती है कि हम तो यह कबसे कह रहे थे.

लेकिन ख़बरें और भी हैं, जो पाकिस्तानी लेखक मोहसिन हामिद की ‘रिलकटेंट फंडामेंटलिस्ट’ जैसी किताबें पढ़ने पर हमें झकझोरती हैं या पाकिस्तानी नागरिकों से रू-ब-रू होने पर हमें पता चलता है.

वर्कशाप में ही प्रसिद्ध पाकिस्तानी फिल्म निर्देशक जावेद जब्बार की अगले महीने रिलीज़ होने वाली फ़िल्म ‘रामचंद पाकिस्तानी’ की कुछ झलकियाँ देखने को मिली. यह अपने आप में पहली पाकिस्तानी फ़िल्म है जो पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है. इस फ़िल्म में अभिनेत्री नंदिता दास समेत कई भारतीय कलाकारों का योगदान है. जावेद कहते हैं कि यह फ़िल्म भारत-पाकिस्तान के लोगों में मन में जो ‘स्टरियोटाइप’ छवियाँ बैठी हुई है उन्हें तोड़ने की एक कोशिश है. साथ ही वे कहते हैं- Unfamiliarity breeds contempt. यानि यदि मेल-जोल न हो तो एक-दूसरे के प्रति तिरस्कार या अवज्ञा का भाव ही मन में जन्म लेता है.

आलोचक रामचंद्र शुक्ल ने भी तो वर्षों पहले यही कहा था कि बिना परिचय का प्रेम संभव नहीं है. भारत-पाकिस्तान संबधों के परिप्रेक्ष्य में भी यह उतना ही सच है जितना दिलों के मामले में.
(पहली तस्वीर में बाएँ से नूरअली, सरमद, अर्शी, आमिर, तारिक, फैज़ा, सहर और हूमेरा. दूसरी तस्वीर में गुलरुख़ के साथ लेखक)

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Sunday, November 25, 2007

कामगार के हाथ





पिछले बारह सालों से दिल्ली में हूँ लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला देखने, घूमने का मौका कभी नहीं मिल पाया. इस बार एक मित्र के आग्रह पर व्यापार मेला घूमा तो जरूर पर ‘बाज़ार से गुजरा हूँ लेकिन ख़रीदार नहीं हूँ’ का भाव लिए हुए ही.

मेले में घूमते हुए उत्तर आधुनिकतावादी चिंतक ज्याँ बौद्रिला का कहना, ‘पूँजीवीदी समाज में केंद्रीय स्थान उत्पादन को नहीं बल्कि उपभोग को है’ मन में कौंधता रहा.

मेले में भीड़ काफ़ी थी. मैं एक स्टॉल पर बनारसी साड़ी की बारीकियों से उलझता रहा...पर खरीदार वहाँ नहीं थे.

बनारस से आए बुनकर बिलाल के चेहरे पर माल नहीं बिकने का दर्द स्पष्ट झलकता था. कबीर की रहँटा की याद आई.

कबीर याद आए-‘सुखिया सब संसार है खावे और सोवे, दुखिया दास कबीर है जागे और रोवे.’

मित्र ने थाईलैंड के स्टॉल से लकड़ी के बने खूबसूरत एक स्त्री के दुआ में जुड़े हाथ मुझे भेंट किए. मैं उन हाथों को हाथ में लिए सोचता रहा- ‘दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए’

Saturday, November 10, 2007

इस बार जेएनयू का रंग कैसा

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में इस बार भी मार्क्स, लेनिन, भगत सिंह के नारे लगे. लेकिन...इस बार जेएनयू का रंग कैसा- आइसा, आइसा का नारा बुलंदी पर रहा.
जेएनयू छात्रसंघ में पहली बार आइसा चारों पदों (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव) पर विजयी रही. पहली बार जेएनयू के इतिहास में एसएफआई -एआईएसएफ का सफ़ाया हुआ. ज़ाहिर है नंदीग्राम, सिंगुर का मुद्दा चुनाव में हावी रहा. आरक्षण के मुद्दे ने भी अपना रंग दिखाया, दो पदों पर 'यूथ फॉर इक्वलिटी' के प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे.
पारंपरिक 'प्रेसिडेंसिल डिबेट' की रात 'राम के नाम' पर घमासान हुआ.पहली बार डिबेट पूरी नहीं हो पाई. जबकि ऐसा लग रहा था कि चुनाव स्थगित हो सकता है जेएनयू की जनता ने भारी मतों से चुनाव को सफल बनाया. लोकतंत्र फिर जीता.

Wednesday, September 19, 2007

एक संपूर्णता के लिए

घुघुआ मना उपजे घना’ गाते-झूलते हुए सुनी दादी-नानी की कहानी अब याद नहीं। याद हैं उनके जीवनानुभव जो उन्होंने भोगे थे। माँ ने कभी कहानी नहीं सुनाई। शायद उनके पास उन अनुभवों का अभाव था जो कहानी कहने के लिए जरूरी होता है, या संभव है कि अपने अनुभवों को हमसे बाँटना उचित न समझा हो। बहरहाल, कविता-कहानी से जुड़ाव छुटपन में ही हो गया था। बड़े भाई साहित्य के छात्र थे। जिस साल मैंने गाँव से दसवीं पास किया उसी साल उन्होंने हिंदी साहित्य में एम.ए करने के लिए अपना नामांकन जेएनयू में करवाया था। छुट्टीयों में घर आने पर उन्होंने जेएनयू की बहुत सी बातों के अलावा वहाँ पर पढ़ाई गई कहानियों की चर्चा की थी। वीर भारत तलवार उन्हें कहानियाँ पढ़ाते थे। वे कहते थे कि तलवार जब कहानी पढ़ाते हैं उनके चेहरे पर रसाभास स्पष्ट देखा जा सकता है। कहानी पढ़ाते समय उनका चेहरा सुर्ख हो जाता है । कभी भावुक, कभी आह्लादित तो कभी आवेशित हो उठते हैं।

जहाँ से मैं ने एम.ए किया वहाँ कहानी पढ़ाने के नाम पर लीपा-पोती का काम ज्यादा हुआ। वैसे भी कहानी के बारे में अक्सर सुनने को मिलता है कि कहानी पढ़ाने की नहीं, पढ़ने की चीज है। और छात्रों को खुद पढ़ लेने की ‘नेक’ सलाह अधिकांश शिक्षक दिया करते हैं। कुछ साल पहले जब मैं ने जेएनयू में एम. फिल हिन्दी में दाखिला लिया भाई साहब की बातें अनायास याद हो आई थी। मैं ने अनुमति लेकर एम.ए के छात्रों के संग कथा-साहित्य की कक्षाँए की।

तलवार जब कहानी पढ़ाते हैं तो पूरी नेम-टेम और नियम-निष्ठा के साथ। कहानी पढ़ाते समय वे इस बात का विशेष ख्याल रखते हैं कि छात्रों की रूचि पाठ में आद्योपांत बनी रहे । विशेषकर नई कहानी पढ़ाते समय वे कहानीकारों के छुए-अनछुए प्रसंगों की चर्चा करते चलते हैं। व्यक्तिगत संस्मरण भी इसमें शामिल रहता है। लेकिन इसके बाद वे हठात कहानी पढ़ाने नहीं लग जाते। कहानीकार की अन्य कहानियों के ताने-बाने से उस कहानी तक पहुँचते हैं, फिर उसके बरक्स कहानी की व्याख्या करते हैं। फिर भी तलवार इस बात को स्वीकार करते हैं कि कहानी कैसे और कहाँ से बताई जाए, उनके लिए हमेशा एक सवाल रहा है। कहानी पढ़ाते समय वे अपने पहनावे का भी खासा ध्यान रखते हैं। कहानी अगर प्रेम कहानी हुई तो उनका पहनावा वैसा नहीं होता जैसा अन्य कहानी पढ़ाते समय। ‘कफ़न’ और ‘रसप्रिया’ के लिए अलग-अलग पहनावा।

यहाँ पर एक कहानी ‘कोसी का घटवार’ की चर्चा प्रासांगिक होगा। अदभुत प्रेम कहानी है यह। सच है कि जैसी प्रेम कहानी नई कहानी के दौर में लिखी गई वैसी कहानी हिन्दी साहित्य में दुर्लभ हैं। हां! ‘उसने कहा था’ एक अपवाद कही जाएगी। इस प्रेम में वाचालता नहीं है। पूरी कहानी में प्रेम जैसा कोई शब्द नहीं है। पर स्थायी भाव के रूप में वह पूरी कहानी में व्याप्त है। एक पीड़ा भरी प्रतीक्षा, जिसे नामवर सिंह ने नई कहानी की एक प्रमुख विशेषता कहा है, कहानी पढ़ने-सुनने वालों को देर तक कचोटती रहती है। इस प्रेम में ईर्ष्या नहीं है। द्वेष नहीं है। कोई प्रतिशोध नहीं है। कहानी का पाठ और आलोचना के बाद सवालों का दौर चलता है। छात्रों के सवाल का जबाब आमतौर पर तलवार सीधे नहीं देते। ढूँढों! खोजो! पता लगाओ! उनका प्रिय जुमला है। इस कहानी में एक प्रसंग है –गुसाई ने गौर से लछमा के मुख की ओर देखा। वर्षों पहले ज्वार और तूफान का वहाँ कोई चिह्न नहीं था। यह पूछने पर कि लछमा के चेहरे पर विगत प्रेम प्रसंग की कोई छाप न हो, कोई छाया न उभरे, कोई हलचल न दीखे... यह कैसे संभव है ? अगर प्रेम सच्चा है तो वर्षों बाद भी, एक सीमा में रह कर ही सही, फूटेगा जरूर। कितना ही सामाजिक मान-मर्यादाओं में बँध कर रहे आदमी। तलवार का जबाब था- मैं इस सवाल का जबाब नहीं दूँगा, बेहतर है कहानी के लेखक शेखर जोशी हिन्दी विभाग बुलाये जाएँ और उनसे ही यह सवाल किया जाए।

साहित्य अपने समय और समाज से अलहदा नहीं होता । वह हमें यंत्रवत होने से बचाता है। खुद को टटोलने को मजबूर करता है। अगर यह सच है कि प्रेम करने के बाद आदमी पहले जैसा नहीं रह जाता है, तो सच यह भी है कि आदमी अगर संवेदनशील हो तो एक अच्छी कहानी या कविता पढ़ कर वही आदमी नहीं रह जाता है जो उस कविता कहानी पढ़ने के पहले था। साहित्य के अच्छे लेखक, शिक्षक-आलोचक हमारी संवेदनशीलता को बढ़ाते-बचाते हैं। सर्वग्रासी बाजार के इस दौर में विषय के नाम पर चर्चा अर्थशास्त्र, कंप्यूटर या प्रबंधन जैसे विषयों की ही की जा रही है। साहित्य के विभाग विश्वविद्यालयों में हाशिये पर धकेले जा रहे हैं । साहित्य जैसी विषयों की प्रासांगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाया जा रहा है। हिंदी-उर्दू के छात्र हीनताबोध की ग्रंथि के शिकार हुए जा रहे हैं। जबकि मानवीय संवेदनाओं को भोथरा होने से बचाने के लिए साहित्य का पठन-पाठन हर दौर में जरूरी है, वर्तमान में कहीं ज्यादा। युवा कवि पंकज चतुर्वेदी के कुछ शब्द ले कर कहें तो- समाज के शरीर में/ एपेन्डिक्स की तरह/ अनावश्यक लगते हुए हैं हम/ फिर भी/ न जाने क्यों/ जरूरी से हैं/ एक संपूर्णता के लिए/ वह अर्थ की हो या व्यर्थता की।
(20 सितम्बर 1947 को जन्मे वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार जीवन के साठ साल पूरे कर रहे हैं, चित्र में प्रो. तलवार के साथ लेखक। )

Monday, September 03, 2007

हिंदी पखवाड़े के बहाने हिंदी पर कुछ नोट्स

हिन्दी है मालिक की
तब आज़ादी से लड़ने की भाषा फिर क्या होगी?
हिन्दी की माँग
अब दलालों की अपने दास-मालिकों से
एक माँग है
बेहतर वर्ताव की
अधिकार की नहीं

कवि-पत्रकार रघुवीर सहाय ने बजरिए कविता यह बात तकरीबन पच्चीस-तीस साल पहले कही थी। तब समकालीन भूमंडलीकरण का उड़नखटोला भारत नहीं पहुँचा था। पर ये पंक्तियाँ मौजूदा समय में हिन्दी का सूरते-हाल बखूबी बयाँ करती है। करोड़ो वंचितों, दलितों, स्त्रियों के संघर्ष की भाषा होने के कारण ही महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने आजादी के आंदोलन के दौर में राष्ट्रभाषा हिन्दी के पक्ष में पुरजोर ढंग से वकालत की थी। उन्होनें हिन्दी को स्वराज से जोड़ा । आज हिन्दी संघर्ष की भाषा होने की ताक़त खोती जा रही है। आम जन से भाषा की दूरी बढ़ती जा रही है। हिन्दी पर बाजार और संचार के माध्यमों का दबाव है। दशकों से सत्ता की घोर उपेक्षा झेल रही हिन्दी को लेकर भारतीय समाज में गहरी उदासीनता है।

भूमंडलीकरण एक ऐसा कनखजूरा है जिसके बावन हाथ हैं। मानव जीवन का कोई पहलू, कोई कोना इससे अछूता नहीं है। 90 के दशक में भारत में उदारीकरण, बाजारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रकिया ने अपने साथ संचार क्रांति लेकर आया, या कहना चाहिए कि संचार माध्यमों के रथ पर चढ़ कर ही भूमंडलीकरण ने भारत में अपना पाँव फैलाया। वर्तमान में केबल, इंटरनेट, मोबाइल के माध्यम से एक नई हिंदी गढ़ी जा रही है। यह हिन्दी फिल्मों, सिरीयलों, विज्ञापनों, समाचार पत्रों और खबरिया चैनलों के माध्यम से तेजी से फैल रही है। सच है कि देश-विदेश में हिन्दी की पहुँच इससे काफी बढ़ी है। सच है कि ‘ठंडा मतलब कोका कोला ’ सहज ही लोगों के दिल में जगह बना लेता है । पर यह भाषा भूमंडलीकरण के साथ फैल रही उपभोक्ता संस्कृति की है, विमर्श की नहीं। इस भाषा में लोक-राग और रंग नहीं है जहाँ से हिंदी अपनी जीवनीशक्ति पाती रही है ।

मीडिया और हिन्दी

किसी भी भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों का विशिष्ट योगदान रहा है। हिंदी इसका अपवाद नहीं है। उन्नीसवी सदी के आखिरी तथा बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में हिन्दी भाषा, विशेष रूप से हिंदी गद्य के विकास और परिमार्जन में हिन्दी के पत्र-पत्रिकाओं के योगदान का ऐतिहासिक महत्व है। पर पिछले दशकों में हिन्दी के स्वरूप में काफी तेजी से बदलाव हुआ है। खास तौर पर हिन्दी अखबारों में, जिसकी पहुँच भारत के कोने-कोने में बढ़ती ही जा रही है। 90 के दशक में तकनीक उपलब्धता, फैलते बाजार तथा सरकार की उदारीकरण की नीतियों के कारण देश में हिन्दी के दर्जनों खबरिया चैनलों का प्रवेश हुआ। हिन्दी अखबारों की भाषा पर इन चैनलों का खासा प्रभाव दिखता है। 80 के दशक के किसी भी अखबार की सुर्खियाँ दो टूक, स्पष्ट और संक्षिप्त हुआ करती थी। आज अखबारों की सुर्खियाँ चुटीली, मुहावरेदार और अंग्रेजी से छौंकी हुई होती है। बजट और चुनाव जैसी महत्वपूर्ण खबरों को भी मनोरंजक भाषा में प्रस्तुत करने का चलन जोर पकड़ रहा है। मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी हिन्दी अखबारों की इस भाषा शैली का समर्थन करते हैं। एक लेख में वे लिखते हैं कि, “बाजार की शक्तियाँ और उनके सहयोगी माध्यम टीवी ने यह मसला सुलझा दिया है कि कौन सी भाषा जनसंचार में सक्षम है, जो सक्षम है वह बड़ी भाषा है। यह हिंदी है जिसे आप वर्णसंकर, भ्रष्ट, हिंग्रेजी कह सकते है। ” हिन्दी समाचार पत्रों के कई संपादक इस भाषा के पक्ष में दलील देते हुए मिलते हैं। पर सवाल है कि हिन्दी समाज का वह कौन सा वर्ग है जो इस हिंग्रेजी या हिंग्लिश या भ्रष्ट भाषा अपना कर गौरवान्वित हो रहा है, और जिसके प्रतिनिधित्व का दावा हिन्दी के अखबार तथा खबरिया चैनल आज कर रहे है?

भाषा महज अभिव्यक्ति का साधन ही नही है। भाषा में मनुष्य की अस्मिता स्वर पाती है। उसमें सामाजिक-साँस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति होती है। भाषा को प्रवाहमयी कहा गया है। समय के साथ होने वाले सामाजिक-साँस्कृतिक परिवर्तनों की अनुगूँज उसमें सुनाई पड़ती है। भूमण्डलीकरण के बाद हिन्दी के अखबारों में भाषा का रूप जितनी तेजी से बदला है उतनी तेजी से हिन्दी मानस की सामाजिक-साँस्कृतिक चेतना नहीं बदली है। फलतः यह बदलाव अनायास न होकर सायास है। एक खास उभर रहे उपभोक्ता वर्ग को ध्यान में रखकर इस तरह की भाषा ( हिंग्रेजी) का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह शहरी नव धनाढ्य वर्ग है जिसकी आय में अप्रत्याशित वृद्धि उदारीकरण, बाजारीकरण और भूमण्डलीकरण के दौर में हुई है। यही वर्ग खुद को इस भाषा में अभिव्यक्त कर रहा है। इस वर्ग में हिन्दी क्षेत्र के बहुसंख्यक किसान, मजदूर, स्त्री तथा दलित नहीं आते।

राजनीतिक स्वार्थपरता के दलदल में

हिंदी के साथ शुरू से ही यह विडंबना रही है कि कुछ निहित राजनीतिक स्वार्थों के चलते कभी इसे उर्दू, कभी तमिल तो कभी अंग्रेजी के बरक्स खड़ा किया जाता रहा। स्वाभाविक हिन्दी जिसे बहुसंख्य जनता बोलती-बरतती है, का विकास इससे बाधित हुआ । राजभाषा हिन्दी को वर्षों तक ठस, संस्कृतनिष्ठ, उर्दू-फारसी शब्दों से परहेज के तहत तैयार किया गया। क़ाग़ज पर भले ही राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिंदी का विशाल भवन तैयार किया जाता रहा, सच्चाई यह है कि हिन्दी की जमीन लगातार कमजोर होती गई। राजनीतिक स्वार्थपरता, सवर्ण मानसिकता तथा राष्ट्रभाषा-राजभाषा के तिकड़म में सबसे ज्यादा दुर्गति हिंदी की हुई। 1960 के दशक में उत्तर भारत में ‘अंग्रेजी हटाओ’, और दक्षिण भारत में ‘हिंदी हटाओ’ के राजनीतिक अभियान में भाषा किस कदर प्रभावित हुई इसे हिंदी कवि धूमिल ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया था-
तुम्हारा ये तमिल दुःख
मेरी यह भोजपुरी पीड़ा का
भाई है
भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है।

हिन्दी की अस्मिता विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं, बोलियों और उर्दू से मिलकर बनी हैं। कबीर से लेकर बाबा नागार्जुन की कविता इसका दृष्टांत है। जनता की इसी भाषा मे हिंदी के समकालीन रचनाकार साहित्य रच रहे हैं। हिंदी भाषा का विकास और प्रसार इन्हीं बोलियों, क्षेत्रीय भाषाओं के साथ संवाद के माध्यम से संभव है। तब कहीं जाकर सही मायनों में हिंदी अखिल भारतीय भाषा होने का दावा कर सकती है।

सरकारी संस्थानों ने, जिनका काम हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहयोग देना है, हिन्दी का प्रचार-प्रसार कम, अपकार ज्यादा किया है। आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन का गर्दो-गुबार अभी थमा नहीं है। हिन्दी के चर्चित कवि मंगलेश डबराल कहते हैं, “इन आठ सम्मलेनों में हिन्दी का क्या भला हुआ कोई नहीं जानता। ” सरकार और उसके कारिंदे हिंदी को लेकर कितना चिंतित है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल जैसे साहित्यकारों ने आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन में जाने से इंकार कर दिया। सरकार और उसकी सहयोगी संस्था हर साल बस हिन्दी दिवस मना कर अपने कर्तव्य की इति श्री समझ लेती है। असल में, हिन्दी दिवस के नाम पर सरकारी संस्थानों में हिंदी का मर्सिया पढ़ा जाता है!

शोध की निराशा जनक स्थिति

आजादी के साठ सालों के बाद भी समाज विज्ञान, विज्ञान और तकनीक जैसे विषयों पर कोई ढंग का हिंदी में मौलिक लेखन ढूढ़ने पर भी नहीं मिलता। हिंदी में कायदे की कोई शोध पत्रिका नहीं मिलती जिसमें शोध लेख छपवाया जा सके। देश के प्रतिष्ठित उच्च अध्ययन संस्थानों में सारा शोध अंग्रेजी भाषा में हो रहा है। देश की बहुसंख्यक जनता की जिसमें कोई हिस्सेदारी नहीं है। सारा शोध जिन गरीबों, पिछड़ों, दलित-आदिवासियों, स्त्रियों को केंद्र में रख कर किया जाता उसकी पहुँच उन तक कभी भी नहीं हो पाती। पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र की ‘आज भी खड़े हैं तालाब’ जैसी किताबें, जिसकी सफलता और पहुँच असंदिग्ध है, उन लोगों पर करारा व्यंग्य है जो इस बात का रोना रोते है कि हिन्दी में लोक-मन को छूने वाली भाषा में साहित्य से इतर कोई रचना संभव ही नहीं है। राजनीतिकशास्त्री रजनी कोठारी ‘भारत में राजनीति’ जैसी किताब की हिन्दी में पुनर्रचना कर एक नई पहल की शुरूआत करते हैं। कभी समाजशास्त्री के.एल शर्मा ने एन सी ई आर टी की समाजशास्त्र की किताब मूल हिन्दी में लिख कर साबित किया था कि स्कूल-कालेज की समाजविज्ञान की किताबें हिंदी में लिखना संभव है। दिक्कत यह है कि हिन्दी क्षेत्र के विद्वान अंग्रेजी और हिंदी दोनों में दक्ष होने के बावजूद हिंदी में लिखने का जहमत मोल नहीं लेते। इसकी वजह सिर्फ आर्थिक नहीं, कहीं गहरे अवचेतन में हिन्दी के प्रति हीनमन्यता बोध से ग्रस्त होना भी है।

अंग्रेजी-हिंदी का द्वंद

भूमंडलीकरण के इस दौर में अंग्रेजी का ऐसा हौव्वा खड़ा किया जा रहा है कि हिन्दी के पक्ष में की गई किसी भी बात को दकियानूसी विचार करार दिया जाता है। निहित स्वार्थ के कारण हिंदी के एजंडे को हिंदी और अंग्रजी के प्रभुवर्गों ने आपसी गठजोड़ कर हथिया लिया है।

निस्संदेह अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा है। आप इस भाषा के माध्यम से एक बड़े समूह तक अपनी बात पहुँचा सकते हैं। इस भाषा की जानकारी भूमंडलीकरण के इस दौर में हमारी जरूरत है। इस बात से शायद ही किसी को कोई गुरेज हो कि अंग्रेजी के बूते अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीयों की एक पहचान बनी हैं। पर अंग्रेजी अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधि कभी नहीं कर सकती। देश-विदेश में रह रहे भारतीयों की अस्मिता, उसकी असली पहचान निज भाषा में ही संभव है। कवि विद्यापति ने सदियों पहले इसी को लक्ष्य कर ‘ देसिल बयना सब जन मिट्ठा ’ कहा होगा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत एक बड़ा बाजार है। इस बाजार में हिन्दी में अंग्रेजी के शब्दों को ठूँस कर हिन्दी को विश्व भाषा बनाने की मुहिम आज चल रही है। कई अखबारों में हिंदी को रोमन लिपि में लिखने का प्रयोग जोर पकड़ रहा है। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि जो भाषा ठीक से ‘राष्ट्रीय’ ही नहीं बन पाई हो उसे ‘ अंतरराष्ट्रीय ’ बनाये जाने की कोशिश की जा रही है ?

20वीं सदी के आरंभिक दशकों में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद से लड़ कर हिन्दी ने सार्वजनिक दुनिया( पब्लिक स्फ़ियर) में अपनी एक भूमिका अर्जित की थी। इस दुनिया में विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक मुद्दों पर बहस-मुबाहिसा संभव था। आजादी के बाद प्रतिक्रियावादी, सवर्ण प्रभुवर्ग जिनका साठगांठ अंग्रेजी के अभिजनों के साथ था, हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया पर क़ाबिज़ होते गये। इससे हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया किस कदर सिकुड़ती और आमजन से कटती चली गई प्रो.आलोक राय ने विस्तार से अपनी पुस्तक ‘हिंदी नेशनल्जिम’ में बताया है। एक बार फिर हिन्दी को महज बोल-चाल के माध्यम तक ही सीमित रखने का कुचक्र चल रहा है।

इंटरनेट पर हिन्दी

भूमंडलीकरण का सबसे प्रभावी औजार है सूचना । यह सूचना इंटरनेट के माध्यम से पूरे भूमंडल के फासले को चंद लम्हों में नापने का माद्दा रखती है। लेकिन चूँकि सत्ता की भाषा अंग्रेजी है, इंटरनेट की भाषा भी अंग्रेजी ही है। बहरहाल, हिन्दी देर ही सही अंग्रेजी के गढ़ में सेंध लगाने में कामयाब हो रही है। इसका सबूत है विभिन्न वेव साइटों पर मौजूद हिंदी के अखबार और पत्र-पत्रिकाएँ। इससे हिंदी का प्रसार और पहुँच देश-विदेश में तेजी से हो रहा है। साथ ही हाल के दो-एक वर्षों में जिस तेजी से हिन्दी के ब्लौग( चिट्ठे) इंटरनेट पर फैलें है, एक उम्मीद बंधती है कि ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ फिर से जीवित होगा। क्योंकि यहाँ हर लेखक को अपनी भाषा में कहने-लिखने की छूट है। इसका अंदाजा विभिन्न ब्लौगों की भाषा पर एक नजर डालने पर लग जाता है। हाल ही में प्रकाशित एक लेख में प्रसिद्द भाषाकर्मी अरविंद कुमार ने ठीक ही नोट किया है कि, “ आज हिंदी में 500 से ज्यादा चिट्ठे हैं। हिंदी वाले के जोश को देखते हुए एक-दो सालों में यह संख्या 5,000 तक पहुँच जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए। ” पर कोई भी तकनीक निर्गुण नहीं सगुण होती है। तकनीक की उपयोगिता उसके इस्तेमाल करने वालों पर निर्भर करती है। सवाल है कि जिस समाज में सूचना तकनीक का इस्तेमाल एक छोटे तबके तक ही सीमित हो, जिस भाषा में कीबोर्ड तक उपलब्ध नहीं वह भाषा-समाज किस तरह इंटरनेट का इस्तेमाल कर आगे बढ़ेगी ?

बढ़ता कारवाँ

अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति है। विश्व का एक बड़ा बाजार होने के कारण सबकी निगाहें भारत पर टिकी है। ऐसे में भारत की भाषा, संस्कृति को नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए संभव नहीं है। चीन की मंदारिन के बाद हिंदी विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है (?)।

देश और विदेश में तकरीबन 49 करोड़ लोगों द्वारा हिंदी बोली-बरती जाती है। वर्षों पहले दक्षिण अफ्रिका, मॉरीशस जैसे देशों में गए गिरमिटिया अपने साथ अपनी भाषा और संस्कृति भी ले गए। इन देशों में हिन्दी पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजी गई। आज अमेरिका, इटली, जापान, चीन आदि देशों के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा एवँ साहित्य का पठन-पाठन हो रहा है। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थानों में भी हिन्दी की पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्दि हो रही है। हिंदी मीडिया में बढ़ते रोजगार के कारण इस साल दिल्ली विश्वविद्यालय के नामचीन कॉलेजों में पहले कट ऑफ लिस्ट में ही हिन्दी( आनर्स) की सीटें भर गई थी। जाहिर है कि देश-विदेश में हिंदी पढ़ने वालों की रूचि बढ़ी है। हिन्दी फिल्मों ने वर्षों से हिंदी का प्रचार-प्रसार न सिर्फ देश के अहिंदी भाषी राज्यों में, बल्कि विदेशों में भी काफी किया है। यह अपने आप में स्वतंत्र शोध का विषय है।

अंग्रेजी भले ही सत्ता की भाषा हो, पिछले दो दशकों में भारतीय राजनीति में हुए परिवर्तनों ने इसे सत्ताधारियों की भाषा के रूप में स्थापित किया है। हिंदी क्षेत्रों में बढ़ती शिक्षा, हिंदी की ताकत है। अपनी जड़ों से रस लेकर स्वाभाविक रूप से आगे बढ़े, राजनीतिक इच्छा शक्ति यदि बाज़ार की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए सही दिशा दें, तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी सचमुच एक विश्व भाषा के रूप में स्थापित होगी।

Wednesday, May 30, 2007

मधुबनी पेंटिंग का अनुपम सौंदर्य

मिथिला या मधुबनी पेटिंग के नाम से प्रसिद्ध कलाकृतियों को देख कर मन सहसा विद्यापति, बाबा नागार्जुन की कविताओं की ओर भागने लगता है। इन रंगों में मिथिला की लोक संस्कृति रची-बसी है। पिसे हुए चावल, दूध, सिंदूर, और हल्दी के रंगों से मिथिला की औरतें घर की दीवारों पर सदियों से चित्रों को उकेरती रही है। समय के साथ ये चित्र दीवारों से काग़ज पर उतर आये। पहले कोहबर, पूरइन, सामा-चकेवा और देवी-देवता ही इन चित्रों में थे। अब इनमें देश-विदेश की राजनैतिक घटनाएँ और सामाजिक चिंताएँ भी आकार लेती हुई दिखती है। पिछले दशकों में मिथिला पेंटिंग ने अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। पर भारत के कलाजगत और कलाप्रेमियों के बीच अब भी यह अपना एक मुकाम तलाश रही है।

सदियों पुराने कला के इस रूप को देश-विदेश की मुख्यधारा में लाने का श्रेय विदेशी विद्वानों और कलाप्रेमियों को जाता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के ब्रिटिश अधिकारी डब्लू. जी. आर्चर 1930 के दशक में तस्वीरों के माध्यम से मिथिला पेंटिंग को पहली बार दुनिया के सामने लाए। मिथिला क्षेत्र में 1934 में आये भीषण भूकंप के दौरान क्षतिग्रस्त मकान की दीवारों पर उन्होनें कोहबर, रेल वगैरह के चित्रों को देखा। 1970 के दशक में अमेरिकी मानवशास्त्री रेमण्ड ओएंस और जर्मनी की इरेका मोसर ने मधुबनी पेंटिंग को मिथिला जा कर देखा-परखा और शोध किया। अमेरिका स्थित एथनिक आर्टस फाउण्डेशन ने दिल्ली के इंडिया हैबीटेट सेंटर में एक प्रदर्शनी ‘मिथिला पेंटिंगः एक कला रूप का विकास’ का आयोजन पिछले महीने ( 14-26 जनवरी) किया था । यह संस्था पिछले पच्चीस सालों से मिथिला पेंटिंग का प्रचार-प्रसार कर रही है। संस्था के अध्यक्ष प्रो. डेविड सेण्टन कहते हैं, “मिथिला पेंटिंग में अपार संभावनाएँ हैं। जरूरत है प्रतिभाओं को पहचान कर उन्हें अनुकूल सुविधाएँ मुहैया कराई जाने की।” इस संस्था ने सन् 2003 में मधुबनी में ‘मिथिला कला संस्थान’ की स्थापना की। यह संस्थान हर साल बीस छात्रों को छात्रवृत्ति दे कर मिथिला पेंटिंग को प्रोत्साहित करता है।


संस्थान के निदेशक चित्रकार संतोष कुमार दास कहते हैं “गंगा देवी और सीता देवी की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के बाद जिस तरह से इस कला को प्रोत्साहन मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया। शिक्षा और मूलभूत सुविधायों के अभाव में कलाकार किसी तरह इस पुराने कला रूप को बचाए हुए हैं।” महिलाओं की विशेष उपस्थिति इस पेंटिंग की विशेषता रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी परंपरा के रूप में इन्होनें इसे बचाए रखा। राँटी की दलित कलाकार उर्मिला देवी कहती हैं “दिक्कत, सब चीजों का दिक्कत है। खेती-बारी कुछ नहीं है। सरकार कोई सहायता नहीं करती है। किसी तरह हम जी रहे है। बिचौलिए को औने-पौने दाम पर हम अपनी कला बेचने को मजबूर हैं।”

इस कला में कायस्थों और ब्राह्मणों की उपस्थिति शुरू से ही रही है पर पिछले कुछ सालों में दलित विशेषकर, दुसाधों ने निजी जीवन की धटनाओं और वीर-योद्धा राजा सलहेस की कहानियों को चित्रों में उतार कर इसे एक नई भंगिमा दी है। ब्राह्मणों की भरनी और कायस्थों की कछनी शैली से इतर दलितों ने गोदना शैली को अपनाया है।

मिथिला पेटिंग में अब प्राकृतिक रंगों के बदले एक्रिलिक रंगों का प्रयोग होने लगा है। इससे पेंटिंग के जल्दी बिखरने का खतरा नहीं रहता है। मिथिला के रीति- रिवाजों के साथ अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद , सांप्रदायिकता और भ्रूण हत्या जैसी पेंटिंग को देख कर इसके फैलाव और विकास की झलक मिलती है। पुरूषों की भागेदारी ने इस कला को एक नया तेवर दिया है। पर सवाल है कि मूलभूत सुविधाओं से वंचित कलाकार किस तरह इस कला को जीवित रख पायेंगे ।
(राजस्थान पत्रिका,जयपुर से 10 मई 2007 को प्रकाशित)


Tuesday, December 12, 2006

City of Perth

At Curtin University of Technology, Perth

With Film Director Shyam Benegal at the Seminar

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