< arvind das: गरीबी को सम्मान

Wednesday, October 18, 2006

गरीबी को सम्मान


शांति के संदर्भ में निर्धनता निवारण को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करना एक ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है। यूरोप के देशों में औधोगिक क्रांति और साम्राज्यवाद के फैलाव के बाद आई संपन्नता ने उन्हें गरीबी से उदासीन बना दिया। मध्ययुग की गरीबी की स्मृतियाँ उनके लिए आज कोई मानी नहीं रखता। उन्होंने अशांति को युद्ध से जोड़ कर अपने को मुक्त कर लिया। पर अस्तित्व की रक्षा का सवाल बुनियादी सवाल है जो अशांति का गहरा कारण है।
गरीबी का सवाल हर सभ्यताओं के अनुभवों का अहम हिस्सा रही है। टॉलस्टाय से लेकर गाँधी तक ने इसे बखूबी पहचाना। गाँधी ने संपन्नता की बजाय सादगी की तरफ ले जाने वाली नीतियों, मूल्यों पर जोर दिया। धर्म और राजनीति के साझे सरोकार से गरीबी को चुनौती देने की वकालत उन्होंने की।
मोहम्मद यूनुस ने समाज के सबसे बुनियादी सवाल गरीबी के सवाल को अपनी नीतियों का हिस्सा बनाया है। इससे पहले गुर्याड मेंडल और अर्मत्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों ने इस सवाल को सामाजिक संपन्नता के लिए जरूरी बताया था पर हमारे राजनेताओं की आँखे नहीं खुली। संपन्नता के सतही सपने- बड़े बाँध, बड़े हवाई अड्डे, महानगर आदि – वे दशकों से लोगों को दिखाते रहे हैं। साथ ही गरीबी में निहित असहायता, आक्रोश की वे अनदेखी करते रहे हैं ।
यूनुस के ग्रामीण बैंक में स्त्रियों की केंद्रीय भूमिका है। वर्तमान में बाजार को असीमित महत्व देकर समाज की असली शक्ति समुदाय को पंगु बना दिया गया है । स्त्री का सशक्तीकरण कर ही समुदाय की आधारशिला परिवार को मजबूत बनाया जा सकता है । राष्ट्र के सम्यक् और सम्रग नवनिर्माण के लिए जरूरी है कि इस तरफ ध्यान दिया जाए।
भारत और बांग्लादेश कि साझी संस्कृति और तकरीबन एक से सामाजिक और आर्थिक स्थिति के कारण युनूस की अवधारणा भारत के लिए सही बैठती है। भारत में पिछले दो दशकों से यह प्रयोग चल रहा है। भारतीय ग्रामीण बैंक, सेवा( सेल्फ इम्पलॉयड वीमेंस एसोशिऐसन) और परिवर्तन जैसे संगठन इसमें अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं ।

भूमंडलीकरण के इस दौर में गरीबी उन्मूलन तीसरी दुनिया और नवस्वाधीन राष्ट्रों के नीति निर्माताओं और सरकारों के लिए बड़ी चुनौती है। मोहम्मद यूनुस को सम्मानित करना गाँधी के उस तावीज को दुनिया के सामने लटकाने जैसा है जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा है कि जब भी तुम्हारे मन में अगले कदम के बारे में दुविधा हो उस अंतिम व्यक्ति को याद करो जो अपनी असहायता और अभाव से जुझ रहा है और खुद से सवाल करो कि तुम्हारा यह कदम उसकी सहायता कर पायेगा कि नहीं ? यदि सहायता कर पायेगा तो निस्संदेह आगे बढ़ो।

( जेएनयू में समाजविज्ञान के प्रोफेसर आनंद कुमार से अरविंद दास की बातचीत पर आधारित )

2 Comments:

Blogger priyankar said...

इस नई पहलकदमी का स्वागत होना चाहिये .

6:43 AM  
Blogger संजय बेंगाणी said...

विमर्श इस बात पर भी हो की क्यों साधन होते हुए भी कुछ राष्ट्र या फिर भारत के संदर्भ में कुछ राज्य दुसरों के मुकाबले सम्पन्न नहीं हैं.

7:52 AM  

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