Wednesday, September 06, 2006

एशियाई जीवन के सबरंग

अंत भला तो सब भला । आँठवे ओसियान – सिनेफैन एशियाई फिल्म समारोह के लिए यह बात बखूबी कही जा सकती है । बीते दिनों फुटबाल महासमर का अंत भले ही जिनेदिन जिदान के दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार और दुःखद विदाई के साथ हुआ हो , पर दिल्ली के सिरीफोर्ट सभागार में उस रविवार की रात ईरान की फुटबाल टीम के जीत का जश्न सभी ने मनाया । असल में , दस दिन तक चले इस समारोह का समापन 23 जुलाई को मनोरंजक कॉमेडी ‘आफ साइड ’ के प्रदर्शन के साथ हुआ ।

जफर पनाही निर्देशित इस फिल्म का कथानक यथार्थ से वावस्ता है । फुटबाल की शौकीन कुछ लड़कियाँ स्टेडियम जा कर मैच का लुत्फ लेना चाहती है , पर ईरान में इस पर पाबंदी है । अपना भेष बदल कर , चोरी- छिपे लड़कियाँ किसी तरह स्टेडियम पहुँच तो जाती है पर पुलिस की निगाहों से बच नही पाती । डाक्युमेंट्री शैली में बनी यह फिल्म हमें इस यथार्थ से रू-ब-रू करवाती है कि खेल की भी अपनी एक संस्कृति है । इस संस्कृति पर पुरूषवादी वर्चस्व सामंती समाज में स्त्रियों की दारूण दशा को और भी दयनीय बनाती है । पिछले दो दशको में ईरानी सिनेमा ने अंतरराष्ट्रीय जगत में एक विशिष्ट मुकाम बनाया है । अब्बास केरोस्तामी , मोहसेन मखमलबफ की कई फिल्मों को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है । गौरतलब है कि बर्लिन फिल्म समारोह में जूरी ग्रैंड पुरस्कार से सम्मानित इस फिल्म के ईरान में प्रदर्शन पर रोक लगी हुई है । मानवीय संवेदनाओ से लिपटी सीधे-सादे कथानक को बिना किसी ताम झाम के एक अनोखी सिनेमाई भाषा में कहना ईरानी सिनेमा की विशेषता है जो इसे दर्शकों के बीच काफी मकबूल बनाती है । इसी समारोह में दिखाई गई मोहसेन मखमलबफ की फिल्म ‘सेक्स ओ फलसफा ’ ( सेक्स एण्ड फिलासफी ) संगीत , नृत्य और उत्कृष्ट अभिनय के साथ – साथ कथानक की विशिष्टता के लिए याद की जाएगी । प्रेम और सेक्स के इर्द–गिर्द धूमती यह फिल्म आधुनिक समाज में सेक्स के प्रति अतिरिक्त मोह और उदारता , फलतः मानवीय संबंधो में प्रेम की कमी की ओर इशारा करती है ।

फिल्में हमें यथार्थ की दुनिया से फंतासी की ओर ले जाती है । पर इस स्वप्नलोक में भी यथार्थ की पुनर्रचना फिल्म को एक कला माध्यम के रूप में विशिष्ट बनाती है। एशियाई समाज की हलचलों, जीवन के द्वंद ,अभाव-अभियोगों को संपूर्णता में दिखाती इन फिल्मों को एक मंच पर लाने का ओसियान – सिनेफैन का यह प्रयास निस्संदेह काबिलेतारीफ है । बीजिंग फिल्म अकादमी के प्रोफेसर और फिल्म निर्देशक से फे कहते हैं कि कान – बर्लिन जैसे फिल्म समारोहो में बाजार का घटाटोप समारोह की मूल संवेदना से मेल नहीं खाता है । यह समारोह अभी इस से अछूता है । हांगकांग के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक स्टेनले क्वान का कहना है कि अपनी फिल्मों के दर्शकों से मिलने का , उनकी टीका-टिप्पणी को जनाने का इससे बेहतर मौका हमें कहाँ मिलेगा ? समारोह में जुटी दर्शकों की भीड़ इसकी गवाही दे रही थी । पर इस बार का समारोह थोड़ा महंगा था । 20 रूपये की टिकट फिल्मों के लिए रखी गई थी । इसकी मार सबसे ज्यादा झेली विश्वविद्यालय के छात्रों ने । बहरहाल यह समारोह एशियाई समाज को जानने-समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो रहा है ।

समारोह में एक तरफ समकालीन वैश्विक राजनैतिक –सामाजिक प्रश्नो को उठाती फिल्मों का प्रदर्शन हुआ , तो दूसरी ओर मानवीय मूल्यों – प्रेम , शांति और समन्वय को आत्मसात किए बौद्ध दर्शन से जुड़ी हुई फिल्मों का एक विशेष खण्ड महात्मा बुद्ध के जन्म के 2550 साल पूरे होने के अवसर पर दिखाई गई । इजराइल – फिलिस्तीनी संघर्ष को केंद्र में रख कर बनी हेनी अब्बू असद की फिल्म ‘अल जाना (पैराडाइज नाउ)’ भावपूर्ण अभिनय ,संपादन , और कसी हुई पटकथा के कारण चर्चित रही । ईराक पर अमेरिकी आक्रमण के फलस्वरूप वहाँ के लोगों के जीवन में आये भूचाल को मोहम्मद अल-दारदजी ने ‘अहलाम (द ड्रीम्स) ’ में दिखाया है जो हमारी संवेदना को गहरे झकझोरती है । सामिर नसर की फिल्म ‘सीड्स ऑफ डाउट’ 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका के वर्लड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी हमलों के बाद एक अलजिरीयाई मूल के वैज्ञानिक तारिक सीलमानी और उनकी पत्नी माया, जो जर्मनी में शांतिपूर्ण ढंग से अपना जीवन बसर कर रहे थे, के संबंधों में आए अविश्वास और उसकी परिणती को खूबसूरती से चित्रित करती है । आतंकवाद की छाया प्रेमपरक मानवीय संबंधो को भी किस कदर अपने घेरे में ले चुकी है ,यह फिल्म हमें इस भयावह यथार्थ से परिचय कराती है ।

राहुल ढोलकिया की चर्चित फिल्म ‘परजानिया’ निस्संदेह राकेश शर्मा की डाक्यूमेंट्री ‘फाइनल सोल्यूशन’ के बाद गुजरात नरसंहार पर बनी एक अतिसंवेदनशील फिल्म है । फिल्म का प्रदर्शन अभी तक भारतीय सिनेमाघरों में नही हुआ है । बौद्ध दर्शन को ले कर 1925 में बनी फिल्म ‘प्रेम संन्यास’ , और अपने दौर में काफी चर्चित रही ‘सिद्धार्थ’ को देखना पुराने जमाने की ओर लौटने जैसा था । हाल में बनी ‘द लास्ट मोंक ’ , ‘ एंग्री मोंक ’ का प्रर्दशन भी समारोह में किया गया । लद्दाख की वादियों को ‘द लास्ट मोंक’ में खूबसूरत ढंग से कैद किया गया है। पर कमजोर पटकथा फिल्म के मुक्त प्रवाह में बाधक है।

समारोह में प्रेम , सेक्स और विवाहेत्तर संबंधो को लेकर बनी कई फिल्मो का प्रदर्शन हुआ । उदघाटन फिल्म पैन नलिन निर्देशित ‘वैली ऑफ फ्लावर्स ’ प्रेम की शाश्वतता के निरूपण के लिए कम , सेक्स के अकुण्ठ चित्रण को ले कर दर्शकों के बीच काफी चर्चा में रही । फिल्म में सेक्स के कई दृश्य ऐसे थे जिनका ताल-मेल कथानक से बिठाना मुश्किल था । फ्रांस , जापान और जर्मनी के सहयोग से बनी यह फिल्म एक खास पश्चिमी दर्शक वर्ग के लिए बनाई गई प्रतीत होती है । विवाहेत्तर संबंधो को लेकर बनी हुर जीन हो निर्देशित कोरियाई फिल्म ‘अप्रैल स्नो ’ और रितुपर्णो घोष की बांग्ला फिल्म ‘ दोसर ’का कथानक अप्रत्याशित रूप से समान था । नूरी विलगे सेयलन की फिल्म ‘ क्लाइमेट्स ’ विवाहेत्तर संबंधो को लेकर बनी अन्य फिल्मों में उत्कृष्ट थी । पति-पत्नी के मनोभावों , आवेगों , तनाव और त्रासदी का निरूपण अदभुत है । संबंधों में आए ठहराव को छाया चित्रों की शैली में लिए गए शॉट्स के माध्यम से निर्देशक ने दिखाया है , जो इस फिल्म के मुख्य पात्र भी हैं ।
जेफरे जेतूरियन निर्देशित फ़िलिपींस की फ़िल्म ' द बेट कलेक्टर ' को एशियाई प्रतियोगिता खंड में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया । भारतीय प्रतियोगिता खंड में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार रामचंद्र पी एन की फिल्म ‘शुद्ध’ को मिला । ' द बेट कलेक्टर ' में एक अधेड़ महिला की विषम परिस्थतियों में अदम्य जिजीविषा का यथार्थ चित्रण है । ‘शुद्ध’ में सामंती व्यवस्था के टूटने और सामाजिक संरचना में आए बदलाव के फलस्वरूप आपसी संबंधों की पड़ताल दक्षिण भारत के एक गाँव को केन्द्र में रख कर की गई है। समारोह में चालीस देशों से आई तकरीबन 120 फिल्मों का एक बड़ा हिस्सा युवाओं के जीवन , स्वप्न और संघर्ष को लेकर था । फिलिपींस से आई मार्क मेली की फिल्म ‘ द पैशन ऑफ जेस हुसोन ’ एक युवा के सपने को करूणा मिश्रित हास्य और व्यंग्य के माध्यम से दिखाती है । जेस हुसोन का एक ही सपना है कि वह किसी भी तरह अमेरिका पहुँच जाए । इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार है । इस विषय वस्तु को नसीरूद्दीन शाह ने चार एक साथ चलने वाली कहानियों के माध्यम से अपनी फिल्म ‘यूँ होता तो क्या होता ’ में भी दिखाया है । इस फिल्म के लगभग सभी किरदार अमेरिका की ओर रूख किए हुए है । पर अंत त्रासदी में होती है । भूमंडलीकरण के इस दौर में अमेरिकी वर्चस्ववादी संस्कृति के प्रति उपेक्षा और मोहभंग भी दिखाई पड़ता है अंजन दत्त की फिल्म ‘ द बोंग कनेक्शन ’ में । समारोह में पुरस्कृत बांग्लादेश की फिल्म ‘ ओंतरजात्रा ’ विसंस्कृतिकरण के इस दौर में अपने जड़ो को तलाशती एक संवेदनशील फिल्म है । तुर्की से आई ‘टू गर्लस’ , मिश्र की ‘डाउनटाउन गर्लस’ और ‘दुनिया’ जैसी फिल्में अरब देशों में औरतों की स्थिति उनके सपने और संघर्ष से हमारा परिचय कराती है ।

समारोह की खास उपलब्धि भारतीय फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक और हांगकांग के स्टेनले क्वान को श्रद्धांजली देते हुए उनकी फिल्मों का प्रदर्शन रही । ऋत्विक घटक की सात फिल्मों के साथ- साथ निर्देशक अनूप सिंह की फिल्म एकटी नदिर नाम ,जो ऋत्विक घटक को समर्पित थी, का प्रदर्शन किया गया ।

कहते हैं प्रतिभाएँ अक्सर अराजकता लिए हुए होती है । ऋत्विक घटक एक ऐसी ही प्रतिभा थे । एक बार फिल्म निर्देशक सईद मिर्जा ने उनसे पूछा कि आपकी फिल्मों का प्रेरणास्रोत क्या है ? उनका जवाब था , एक पॉकेट में शराब की बोतल दूसरे में बच्चों की सी संवेदनशीलता । 6 फरवरी 1976 को जब उनका देहांत हुआ तब वे महज इक्यावन वर्ष के थे । अराजकता उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा भले रही हो , पर उनकी फिल्मों से वह कोसो दूर रही । अजांत्रिक , मेघे ढाका तारा , कोमल गांधार , सुवर्ण रेखा , तिताश एकटी नदिर नाम जैसी उनकी फिल्में भारतीय सिनेमा की थाती है । बंगाल के अकाल और विभाजन की त्रासदी की छाप उनके मनोमस्तिष्क पर जीवनपर्यंत रही । निर्वासन की पीड़ा उनकी फिल्मों के केंद्र में है , जिसके वे भोक्ता थे ।

सुवर्णरेखा की कथा विभाजन की त्रासदी से शुरू होती है । फिल्म के आरंभ में ही एक पात्र कहता है यहाँ कौन नही है रिफ्यूजी ? ऋत्विक घटक निर्वासन की समस्या को एक नया आयाम देते हैं । यह समस्या सिर्फ विस्थापन की ही नहीं है । आज भूमंडलीय ग्राम में जब समय और स्थान के फासले कम से कमतर होते चले जा रहे हैं हमारी अस्मिता की तलाश बढ़ती ही जा रही है । ऋत्विक की फिल्में हमारे समय और समाज के ज्यादा करीब है । प्रसंगवश, स्टेनले क्वान की एवरलास्टिंग रिग्रेट, रूज, रेड रोज व्हाईट रोज जैसी फिल्मों में स्त्री अस्मिता की तलाश और पहचान बार बार उभर कर सामने आती है । ‘ रूज ’ फिल्म में स्त्री की अस्मिता के साथ- साथ शहर की अस्मिता की तलाश भी गुँथी हुई है ।

ऋत्विक घटक ने भारतीय सिनेमा की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया । पुणे स्थित भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान में उनके छात्र रह चुके मणि कौल , कुमार साहनी , अदूर गोपालकृष्णण ,जो भारतीय न्यू वेव सिनेमा के जनक माने जाते है , खुद को ‘ ऋत्विक घटक की संतान ’ कहलाने में फक्र महसूस करते हैं । अदूर गोपालकृष्णण घटक के इप्टा की पृष्ठभूमि और संगीत के कलात्मक इस्तेमाल की ओर इशारा करते हैं । फिल्म निर्देशक मणि कौल कहते हैं कि अब भी मैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ । उन्होंने मुझे नवयथार्थवादी धारा से बाहर निकाला । अक्सर ऋत्विक घटक की फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है । मणि कौल का मानना है कि वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे । उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाये । ऋत्विक घटक की ज्यादातर फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल रही । वे ताउम्र वित्त की समस्या से जुझते रहे । समांतर सिनेमा में अपनी आस्था रखने वाले निर्देशक आज भी किसी न किसी रूप में इस समस्या से जुझते हैं

इन्हीं सवालों को लेकर समारोह में ‘ भारतीय सिनेमा में समांतर आवाजें ’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में समांतर सिनेमा से जुड़े निर्माता- निर्देशकों ने अपने विचार रखे । सामारोह में समकालीन भारतीय उत्कृष्ट सिनेमा की कमी सालती रही। सत्यजीत रे , ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों से प्रभावित भारतीय समांतर सिनेमा की धारा सूख चुकी है । क्या समांतर सिनेमा अब भी एक संभावना है ? ओसियान – सिनेफैन से हाल ही में जुड़े मणि कौल कहते हैं हमारी कोशिश है कि मुख्यधारा की फिल्मों से जुड़े लोगों और समांतर सिनेमा में अपनी आस्था रखने वालों के बीच संवाद कायम रहे । साथ ही ओसियान – सिनेफैन फिल्म निर्माण के क्षेत्र की ओर अपना कदम बढ़ा रही है , कोशिश है कि वित्त की एक ऐसी व्यवस्था की जाए कि समांतर सिनेमा की धारा को पुनर्जीवित किया जा सके ।
(चित्र में बाँए से, कुमार शाहणी, मणि कौल, मदन गोपाल सिंह, रजत कपूर और केतन मेहता)

2 comments:

रत्ना said...

तस्वीर बढ़िया है। लेख पढ़ नहीं पाई क्योंकि वाक्य रचना मेरे कम्प्यूटर की स्क्रीन पर टूटी फूटी दिखाई दे रही है। क्यों, जानती नहीं।

संजय बेंगाणी said...

लेख को लेफ्ट अलाइन कर दे. अन्यथा रत्नाजी कि तरह कईयों को तकलिफ आएगी.