Thursday, September 07, 2006

खेंचे है मुझे कुफ्र

कबूल’ एक बार फिर से देखी। दिल्ली में हाल के बर्षों में ‘मल्टीकॉमप्लेक्स’ सिनेमाघरों के बनने से फिल्म देखना आसान नहीं रहा। सौ डेढ़ सौ खर्च करने से पहले कई बार बटुआ टटोलना पड़ता है।

बहरहाल, लंबे अर्से बाद एक मुकम्मल फिल्म देखने को मिली। शेक्सपीयर के नाटक ‘मैकबेथ’ से प्रेरित इस फिल्म की कहानी मुंबई के माफिया संसार के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन इर्ष्या, द्वेष और खून-खराबे के बीच प्रेम एक शाश्वत भाव के रूप में पूरी फिल्म पर एक झीने आवरण-सा छाया रहता है। कलाकारों के अभिनय, निर्देशन, संपादन, संवाद, संगीत का सगुंफन इतनी कुशलता से हुआ है कि लगता है राष्ट्रीय नाट्य विधालय के किसी सभागार में किसी उच्च कोटि के नाटक का मंचन हो रहा है। सब कुछ आंखों के सामने जीवंत ! मुझे याद नहीं कि हाल के वर्षों में नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी, पंकज कपूर, इरफान खान और तब्बू जैसे सिद्धहस्त कलाकार एक साथ पर्दे पर आए हों।

फिल्म देखने का चस्का छुटपन में ही लग गया था। शुरू-शुरू में पहला दिन पहला शो देखने की दिवानगी सी रहती थी। उस समय छोटे शहरों में टिकट की कीमत भी कम थी। पर धीरे-धीरे बॉलीवुड की अधिकतर फिल्मों की एक-सी घीसी-पिटी फार्मूलाबद्ध कहानी, कलाकारों के कृत्रिम अभिनय,भोंडे संवाद आदि बोरियत का सबब बनने लगे।

बात शायद 1995-96 की है। तब दिल्ली विश्वविधालय में नामांकन करवाया ही था। उन दिनों अखबारों में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन एस डी) के एक ग्रेजुएट पीयूष मिश्रा की अदाकारी की खूब चर्चा थी। श्रीराम सेंटर के तलघर में एन ईवनिंग विद पीयूष मिश्रा देखने का मौका मिला। बाद में नाटकों में रूचि बढ़ती गई। नसीरूद्दीन शाह, मनोहर सिंह, सीमा विस्वास जैसे कलाकारों को भी देखा-सुना। पर पीयूष की उस अदाकारी में जाने क्या जादू था, या मेरी भावुकता कि अब भी उस कार्यक्रम की स्वर लहरियाँ कानों में गूँजती है।

मकबूल के माफिया डान अब्बाजी (पंकज कपूर) के सहयोगी काके को देखकर चौंक पड़ा। अरे! ये तो पीयूष हैं! इन वर्षों में अक्सर उस शाम की चर्चा, जो मैं ने पीयूष के संग बिताई था, मित्रों के संग करता रहता रहा था। लंबा अर्सा हो गया उन्हें मंच या पर्दे पर नहीं देखा। मणिरत्नम की फिल्म ‘दिल से’ में सीबीआई के एक इंसपेक्टर की छोटी मगर प्रभावपूर्ण भूमिका में वे जरूर दिखे थे पर खुशी से ज्यादा निराशा हुई। इतना बड़ा कलाकार और इतनी छोटी भूमिका! कुछ दिन पहले रंगमंच से जुड़े एक मित्र ने बताया कि आजकल वे फिर से मुंबई में है। अस्सी के उत्तरार्द्ध में भी वे मुंबई गए थे पर फिल्मी दुनिया उन्हें रास नहीं आई।

जब से समांतर सिनेमा का दौर मद्धिम पड़ा, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी जैसे संजीदा निर्माता-निर्देशक भी मुख्यधारा की फिल्मों की ओर रूख करने लगे। नतीजतन नाटकों की पृष्ठभूमि के कलाकारों के लिए बॉलीवुड में अजनबीपन बढ़ा है। नसीरुद्दीन शाह फिल्मी दुनिया से अपने मोहभंग को कई बार दोहरा चुके हैं।

असल में आज मुबंइया फिल्मों में जिस तरह से ग्लैमर बढ़ा है वहां पर ये कलाकार अपने को ‘अनफिट’ पाते हैं। खूबसूरत सपने बेचेने वाले, बाजार को अपना भगवान मानने वाले निर्माता-निर्देशकों के लिए इन कलाकारों की कला बेमानी है।

पंकज कपूर, इरफान खान जैसे सधे कलाकार भी वर्षों से मुबंई में हैं। करीब आठ-दस साल पहले मैंने ‘एक डॉक्टर की मौत’ में उन्हें देखा था। मकबूल ने उनकी अभिनय क्षमता को फिर से साबित किया है। पर दसेक सालो में एक-दो अच्छी भूमिका इन कलाकारों को कितनी संतुष्टि दिला पाती होगी? इस बात पर बहस की जा सकती है कि मंच के ये कलाकार यदि नाटक से जुड़े रहें तो अपनी कला का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं। व्यावसायिक सिनेमा इनकी कला का बेजा इस्तेमाल कर रहा है।

सवाल यह भी हैं कि हमारा हिन्दी समाज इन कलाकारों की कितनी कद्र करता है? सच तो यह है कि अभी भी हिन्दी समाज में नाटकों को लेकर कोई विशेष अभिरूचि नहीं दिखलाई देती है। अपवादों को छोड़ कर स्कूलों-कॉलेजों में मंचन, शिक्षण या प्रशिक्षण की कोई विधिवत व्यवस्था नहीं है।

दिल्ली की ही बात करें तो नाटक देखने वालों का एक सीमित वर्ग है जो हर नाटक में नजर आता है। अन्य जगहों की स्थिति भी निराशाजनक ही है। और फिल्मों से मिलने वाला मेहनताना, शोहरत, एक माध्यम के रूप में बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँच पाने की क्षमता को नजरअंदाज करना कलाकारों के लिए बहुत ही मुश्किल है। गालिब से शब्द उधार लेकर कहूँ तो इनकी स्थिति- 'इमां मुझे रोके है तो खेचे है मुझे कुफ्र' की है।

कुछ दिन पहले इसी स्तंभ में कवि-कथाकार उदय प्रकाश ने मुंबई में रह रहे एनएसडी के ही एक स्नातक की दुखद विक्षिप्त स्थिति के बारे में लिखा था। मुझे बरबस सुरेंद्र वर्मा के उपन्यास ‘मुझे चाँद चाहिए’ के केन्द्रीय पात्र हर्ष का चरित्र याद हो आया। सब अनुपम खेर या नसीरुद्दीन शाह की तरह ही भाग्यशाली नहीं होते। हमारे समाज को इन कलावंतो की कितनी चिंता है?

(चित्र में, पंकज कपूर और पीयूष मिश्रा)
(जनसत्ता, नई दिल्ली 16 मार्च, 2004 को दुनिया मेरे आगे कॉलम में प्रकाशित)

3 comments:

Pratyaksha said...

बढिया लेख लिखा है । मकबूल मुझे भी बहुत अच्छी लगी थी , खासकर पंकज कपूर का अभिनय

v9y said...

अरविन्द:

पीयूष मिश्रा मेरे भी पसन्दीदा कलाकारों में हुआ करते थे. मुझे याद है कि दूरदर्शन पर आठवें दशक में उन्होंने दो-एक संगीत नाटक किये थे (जो देर रात को आते थे). उन्हें फिर देखने को मैं तरस गया था. अगर आपको याद हों तो लिखें. बड़ी ही कमाल की रचनात्मकता थी. गीत, लेखन, निर्देशन, अभिनय सबमें वे बहुत प्रभावशाली थे. फिर वे ज़्यादा नहीं दिखे. जहाँ तक मुझे याद है, बाद में उन्होंने कुछ फ़िल्मों के लिए गाने लिखे थे. पर याद नहीं कौन-सी. मक़बूल में उन्हें देखकर अच्छा लगा.

Udan Tashtari said...

मकबूल का प्रथम भाग बहुत सशक्त बन पड़ा था मगर मद्यांतर के बाद थोड़ा उबाऊ लगा.
लेख अच्छा है.

-समीर लाल