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Sunday, August 12, 2018

आधुनिक मन और पुष्कर पुराण

भारत में फीचर फिल्मों का इस कदर बोलबाला है कि डॉक्यूमेंट्री फिल्में महज फिल्म समारोहों तक ही सिमट कर रह जाती हैं. न तो इन फिल्मों का ठीक से प्रदर्शन होता है और न ही समीक्षक चर्चा के लायक समझते हैं. आनंद पटवर्धन या अमर कंवर जैसे फिल्म निर्देशक अपवाद हैं, जिनकी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की चर्चा गाहे-बगाहे हो जाती है.
पिछले दिनों एक फिल्म समारोह में फिल्म निर्देशक कमल स्वरूप की डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘पुष्कर पुराण’ देखने का मौका मिला. यह फिल्म भगवान ब्रह्मा की नगरी और उससे जुड़े मिथक, किंवदंतियों के बहाने वर्तमान पुष्कर की आबोहवा में रची-बसी है. उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया में ब्रह्मा का एक मात्र मंदिर राजस्थान के पुष्कर में ही स्थित है.
कमल स्वरूप कहते हैं- ‘मैं फीचर फिल्म डॉक्यूमेंट्री की शैली में और डॉक्यूमेंट्री फीचर फिल्म की शैली में बनाता हूं.’ कमल अजमेर में पले-बढ़े हैं और आसपास के समाज, हिंदू धर्म और कर्मकांडों से बखूबी परिचित हैं. बाद में उन्होंने फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे से फिल्म निर्माण की बारीकियों को सीखा-समझा.
इस फिल्म का विचार पक्ष रॉबर्तो कलासो की बहुचर्चित किताब- ‘का : स्टोरीज ऑफ द माइंड एंड गॉड्स ऑफ इंडिया’ से प्रेरित है. हालांकि कमल कहते हैं कि उनके लिए विषय वस्तु (कंटेंट) ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि शैली (क्राफ्ट) है. यह बात इस डॉक्यूमेंट्री को देखने पर स्पष्ट भी हो जाती है. इसमें दृश्य, बिंब और ध्वनि का जिस तरह से संयोजन किया गया है, वह इसे लीक से हटकर एक सफल वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) बनाता है. विभिन्न तरह की ध्वनियों का संयोजन इसे समकालीन वृत्तचित्रों से अलग श्रेणी में ले जाता है. 
साल 1988 में बनी कमल स्वरूप की क्लासिक फीचर फिल्म ‘ओम दर-ब-दर’ की पृष्ठभूमि भी पुष्कर ही है, पर यह वृत्तचित्र उस फिल्म से अलग है. ‘पुष्कर पुराण’ में वेद, पुराण और वैदिक समाज की चर्चा के साथ ही पुष्कर के आसपास के समकालीन समाज का निरूपण है. इस तरह यह फिल्म एक साथ लोक और शास्त्र दोनों की आवाजाही करती है. कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर में लगनेवाले विशाल पशु मेले के दृश्यांकन में यह बेहद खूबसूरती से दर्शकों के सामने आता है. 
इस फिल्म में संवाद बेहद कम हैं. फिल्मकार अपनी तरफ से लोक में मौजूद विश्वास, अंधविश्वास पर टीका-टिप्पणी नहीं करता है. इसमें आये अश्वमेघ प्रसंग और घोड़े की बलि की बात आधुनिक मन को भले ही विचलित करे, पर दर्शकों को भारतीय मिथक और उसके विश्लेषण को भी बाध्य करता है. धर्म के बाजार और पिछले कुछ वर्षों में पर्यटकों की आवाजाही से स्थानीय स्तर पर जो संबंधों में तनाव आया है, उसे भी यह वृत्तचित्र संग्रहित करते चलता है. आश्चर्य नहीं कि एक घंटा चालीस मिनट लंबी इस वृत्तचित्र में ‘कालबेलिया का नृत्य’ और ‘बैले’ को निर्देशक ने एक साथ समाहित किया है.
समाजशास्त्रियों व धर्म-मिथक अध्येताओं के लिए जहां यह एक प्रमुख अध्ययन की तरह है, तो वहीं दर्शकों व फिल्म निर्माण से जुड़े छात्रों के लिए एक ‘मास्टर क्लास’ की तरह है.

(प्रभात खबर, रवि रंग,  12 अगस्त 2018)

Tuesday, January 14, 2014

ओम दर-ब-दर



सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों और न्यू मीडिया पर इन दिनों ओम दर-ब-दर की खूब चर्चा है. पिछले दिनों जब मैंने एक मित्र से इस फिल्म के बारे में बताया तो उसने हँसते हुए कहा कि यह फिल्म है भी या नहीं इस पर बहस जारी है!’ 25 वर्ष पहले नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन (एनएफडीसी) के सहयोग से बनी यह फिल्म 17 जनवरी को पहली बार रुपहले पर्दे पर आ रही है. 

असल में बॉलीवुड की मसाला फिल्मों से अलग यह फिल्म एक नए सौंदर्यबोध की माँग करती है. समांतर सिनेमा के दौर में बनी मणि कौल की उसकी रोटी या कुमार साहनी की मायादर्पण की तरह ही यह फिल्म फिल्म व्याकरण को धता बताते हुए दर्शकों के धैर्य की परीक्षा करती है. पर अंत में हम एक ऐसे अनुभव से भर उठते हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क पर वर्षों तक छाया रहता है.

भारतीय फिल्म के सौ सालों के इतिहास में भले ही आम दर्शकों के बीच यह फिल्म चर्चित नही हुई हो, लेकिन कमल स्वरुप निर्देशित इस फिल्म को बॉलीवुड और भारतीय फिल्म के अवांगार्द फिल्ममेकरों के बीच कल्ट फिल्म का दर्जा प्राप्त है. वर्तमान में अनुराग कश्यप से लेकर अमित दत्ता तक की फिल्मों पर इस फिल्म की छाया दिखती है. पुणे स्थित फिल्म और टेलीविजन संस्थान में तो इस फिल्म की चर्चा के बिना कोई बात ही पूरी नहीं होती. खुद कमल स्वरुप इस संस्थान के स्नातक रहे हैं और मणि कौल के साथ काम किया है.

पर इस फिल्म की कहानी क्या है? इस आसान से सवाल का जवाब बेहद मुश्किल है. अजमेर-पुष्कर इलाके में किशोर और युवा की वयसंधि पर खड़ा ओम और उसके आस पास के जीवन की यह कहानी है.  फिर सवाल राना टिगरीना या उस मेढ़क का बचा रह जाता है जिसके पेट में हीरा भरा है! सवाल बाबूजी, गायत्री और जगदीश के प्रेम संबंधों का भी है!

असल में इस फिल्म में कोई एक कहानी नहीं है, कई कहानियाँ हैं. यह एक साथ कई रेखाओं में यात्रा करती है. यदि फिल्म दृश्य, विंब और ध्वनि का संयोजन कर एक कला की सृष्टि करती है तो निस्संदेह इस फिल्म के माध्यम से एक अलहदा अनुभव संसार हमारे सामने दरपेश होता है.

इस फिल्म का एक सिरा एबसर्ड से जुड़ता है तो दूसरी ओर एमबिग्यूटीके सिद्धांतों से. हिंदी सिनेमा के अवांगार्द फिल्म मेकर इसे एक उत्तर आधुनिक फिल्म मानते हैं. भूमंडलीकरण के इस दौर में जिसे हम ग्लोकलकहते हैं उसकी छाया इस फिल्म में दिखती है. एक साथ इस फिल्म में विटोरियो डी सिका की बाइसिकिल थिव्स की झलक है तो दूसरी ओर मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास में आए मारगांठ की. फिल्म के संवाद भारतीय सामाजिक संरचना, राजनीतिक चेतना और अंतर्राष्ट्रीय हालात पर एक साथ टिप्पणी करते हैं. इस सार्थक-निरर्थक संवाद के बीच दर्शक व्यंग्य और हास्य बोध से भर उठता है. 

एक साथ मिथक, विज्ञान, अध्यात्म, ज्योतिष, लोक और शास्त्र के बीच जिस सहजता से यह फिल्म आवाजाही करती है वह भारतीय फिल्मों के इतिहास में मिलना दुर्लभ है. 

करीब दस साल पहले पुणे फिल्म संस्थान के कुछ स्नातकों और डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर के साथ मैंने यह फिल्म जेएनयू में देखी थी. उसके बाद सवाल-जवाब के क्रम में कमल स्वरुप अपने बेलौस अंदाज में जितनी सहजता से दर्शकों के सवाल को स्वीकार रहे थे, उसी सहजता से नकार भी रहे थे. बिलकुल कुछ देर पहले देखी फिल्म की तरह!

पर उन्होंने माना था कि ओम दर-ब-दरमेरा पासपोर्ट है... और इस बात से किसी को इंकार भी नहीं!

(जनसत्ता में समांतर स्तंभ के तहत 16 जनवरी 2014 को प्रकाशित)