Thursday, November 17, 2022

कुमार शहानी की फिल्म माया दर्पण के पचास साल


फिल्मकार कुमार शहानी की विशिष्ट पहचान है. खास कर समांतर सिनेमा (कला सिनेमा) के वे पुरोधा हैं. दुनिया भर में उनकी चर्चा एक अवां-गार्द (Avant-garde) फिल्म निर्देशक के रूप में होती रही है. पिछली सदी के साठ के दशक में जब पुणे में फिल्म संस्थान की शुरुआत हुई, उन्होंने समांतर सिनेमा के एक अन्य प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक, मणि कौल, के साथ फिल्म निर्देशन का प्रशिक्षण लिया. संस्थान में उन्हें महान फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक का साहचर्य मिला. घटक को वे अपना गुरु मानते हैं. प्रशिक्षण के बाद शहानी एक फेलोशिप पर पेरिस गए और प्रसिद्ध फ्रेंच फिल्म निर्देशक रॉबर्ट ब्रेसां की फिल्म 'उन फाम डूस (ए जेंटल वूमन,1969)' में सहायक-निर्देशक के रूप में काम किया. लौट कर जब वे भारत वापस आए अपनी पहली फिल्म-‘माया दर्पण’ को निर्देशित किया.‘माया दर्पण’ (1972) उनकी सबसे चर्चित फिल्म है, जो पचास वर्ष पूरे कर रही है. यह फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन के सहायता से बनी थी.

हिंदी के प्रतिष्ठित रचनाकार निर्मल वर्मा की इसी नाम से लिखी कहानी (माया दर्पण) पर जब फिल्म बन कर आई, सिनेमा अध्येताओं और समीक्षकों ने निर्देशक की मौलिक दृष्टि और सिनेमाई भाषा की सराहना की थी. पिछली सदी के 70-80 के दशक में उनकी और मणि कौल की फिल्मों (उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा आदि) में कहानी कहने की प्रयोगात्मक शैली की चर्चा खूब हुई. पेरिस के ला मोंद, अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में भी उनकी फिल्मों की चर्चा होती थी. बहरहाल, ‘माया दर्पण’ को हिंदी में ‘बेस्ट फिल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.
‘माया दर्पण’ की विशिष्टता की क्या वजह है? क्यों हिंदी सिनेमा में इस फिल्म को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है? इस फिल्म में रंगों और ध्वनि के इस्तेमाल से जिस सिनेमा संसार को रचा गया है, वह अलहदा है. पाकिस्तानी शायर जिया जालंधरी ने कहा है: रंग बातें करें और बातों से खुशबू आए’. कुमार शहानी बातचीत में कहते हैं ‘रंग हमारे होने की सुगंध को परिभाषित करता है.’ प्रसंगवश, शहानी अक्सर अपने जन्म स्थान लरकाना (सिंध, पाकिस्तान) की चर्चा करते हैं. साथ ही रंगों के मेल और भारतीय सभ्यता और संस्कृति में इसकी केंद्रीयता को रेखांकित करते रहे हैं.
कथानक निर्मल वर्मा की कहानी पर आधारित होने के बावजूद यह फिल्म उसका अतिक्रमण करती है. सिनेमा तकनीकी आधारित कला है, लेकिन तकनीकी यहाँ निर्देशक पर हावी नहीं है. ‘माया दर्पण’ की कहानी के केंद्र में तरन (अदिति) है, जो अपने पिता (दीवान साहब) और विधवा बुआ के साथ एक छोटे शहर में रहती है. आजादी के बाद भारतीय समाज में आ रहे सामाजिक बदलाव, औद्योगीकरण की आहट इस कहानी में प्रवासी इंजीनियर बाबू के माध्यम से आई है. इस कहानी के एक प्रसंग में बुआ कहती है: “सोचती हूँ जब आज बाबू तेरे लिए ऊंची जात और बड़े घराने की बात चलाते हैं, तो क्या यह ठीक है? वह बात आज कहाँ रही, जो वर्षों पहले थी? आज अपनी कौन इज्जत रह गई है, जो बड़े घर-घराने का लड़का मिले! लेकिन उन्हें यह बात समझाये कौन?” कहानी से अलग शहानी इस फिल्म में हाशिए पर पड़े समाज को भी लेकर आते हैं, जहाँ उनकी वर्ग-चेतन दृष्टि का पता चलता है. इंजीनियर बाबू मजदूरों के बीच ‘लिटरेसी कार्यक्रम’ चलाते हैं. तरन जाति-वर्ग भेद को तोड़ती है.
सामंती और पितृसत्तात्मक परिवेश में तरन के अकेलापन और अवसाद को निर्मल वर्मा की कहानी उकेरती है, लेकिन इस कहानी में तरन अपने अकेलेपन से छुटकारा पाने का निर्णय नहीं ले पाती. सामंती परिवेश की हदबंदियां उसे जकड़ी हुई है, जबकि उसका भाई उसे तोड़ कर निकल चुका है. फिल्म में सामंतवाद का विरोध किया गया. है, जो कहानी में नहीं है. यह सारी बातें फिल्म में कलात्मक ढंग से आई है, जहाँ निर्देशक की ‘फॉर्म’ के प्रति एकनिष्ठता दिखती है. कुछ वर्ष पहले एक इंटरव्यू में जब मैंने फिल्म में कहानी से अलग ‘ट्रीटमेंट’ के बाबत उनसे सवाल पूछा था तब उन्होंने कहा था: “मैंने ‘माया दर्पण’ में सामंतवादी उत्पीड़न दिखाने की कोशिश की है. इस फिल्म के अंत में डांस सीक्वेंस है, उसके माध्यम से मैंने इस उत्पीड़न को तोड़ने की कोशिश की है. उस डांस में जो ऊर्जा है वह सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ है. यह काली के रंग में भी है.” कुमार शहानी कहते हैं कि 'जब आप फिल्म बनाते हैं तब आप एक विशिष्ट काम करने की इच्छा रखते हैं-- खास कर जब आप स्वतंत्रता की बात करते हैं, जिसकी चाहत सबमें रहती है.' एक तरह से वैयक्तिक स्वतंत्रता इस फिल्म की मूल भावना है. कला में यह स्वतंत्रता किस रूप में आए, शहानी की यह फिल्म इस बात की खोजबीन करती है.
मणि कौल की तरह ही कुमार शहानी की फिल्मों में बिंब (इमेज) सायास रूप से भारतीय चित्रकला से प्रेरित दिखते हैं. अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह जैसे समकालीन फिल्मकारों पर इन अवांगार्द फिल्म निर्देशकों का स्पष्ट प्रभाव है, जिसे वे खुले मन से स्वीकारते भी है. खुद ‘माया दर्पण’ की तरन पर रॉबर्ट ब्रेसां की फिल्म ‘मूशेत (1967)’ के केंद्रीय पात्र का प्रभाव दिखता है, जिसकी आलोचना सत्यजीत रे ने की थी. साथ ही उनकी फिल्मों पर ऋत्विक घटक की फिल्मों का भी प्रभाव है. बावजूद सारे प्रभावों और आलोचना के कुमार शहानी की फिल्मों में कहानी कहने की जो शैली है वह उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अलग पंक्ति में खड़ा करता है.
'माया दर्पण' फिल्म में ध्वनि के प्रयोग के साथ संगीत के इस्तेमाल पर भी बातचीत की जानी चाहिए. हवेली के ‘टाइम-स्पेस’ को भास्कर चंदावरकर के संगीत और वाणी जयराम के स्वर ने खूबसूरती से उभारा है. कुमार शहानी कहते हैं, ‘जाहिर है, आप देखेंगे कि इस फिल्म के बाद जितनी मेरी फिल्में हैं वे ‘म्यूजिकल एपिक्स’ है’. 'तरंग', 'कस्बा', 'ख्याल गाथा' और 'चार अध्याय' उनकी अन्य चर्चित फिल्में हैं. उनकी फिल्मों पर हिंदी में गंभीर विवेचना की जरूरत है. ये फिल्में भारतीय सौंदर्यशास्त्र में पगी हैं, राजनीतिक विचारधारा का यहाँ समावेश है. असल में, शहानी दोनों के बीच कुशलता से आवाजाही करते रहे हैं.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

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