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Monday, February 26, 2024

कुमार शहानी: एक प्रयोगधर्मी फिल्मकार का जाना


अवांगार्द फिल्मकार और कला विचारक के रूप में कुमार शहानी (1940-2024) की दुनिया भर में एक विशिष्ट पहचान थी. वे हिंदी समांतर सिनेमा के पुरोधा थे. उनकी बहुचर्चित फिल्म माया दर्पण (1972) के पचास साल पूरे होने पर जब मैंने उनसे बातचीत किया था तब भी वे फिल्म बनाने को लेकर उत्सुक थे. उन्होंने मुझे कहा था कि फिल्म के पचास वर्ष पूरे होने पर दुनिया भर में उनकी फिल्मों के प्रति रुचि दिखाई जा रही है और भविष्य में फिल्म निर्माण को लेकर हॉलीवुड से भी पूछताछ किया जा रहा है.

अब उनकी फिल्में, लेखन, व्याख्यान और मुलाकातें ही हमारी स्मृतियों में रहेंगी. वे सहज और सौम्य व्यक्ति थे. कुछ वर्ष पहले जब एक बार बातचीत के लिए मैंने उन्हें फोन किया और परिचय देते हुए कहा कि मिलना चाहता हूँ, उन्होंने दोपहर के समय दिल्ली के आईआईसी में बुलाया. मैंने कहा कि—सर, मैं दिन में नौकरी करता हूँ, क्या फोन पर बात हो सकती है. उन्होंने शाम का समय दिया. फिर मैंने पूछा कि छह बजे के बाद यदि बात करुँ तो उन्हें दिक्कत तो नहीं होगी? उन्होंने बेहद शालीनता से कहा कि-नहीं. फिर जोड़ा-नौकरी करना जरूरी है.
‘माया दर्पण’ (1972), ‘तरंग’ (1984), ‘ख्याल गाथा’ (1989), ‘कस्बा’ (1990), ‘चार अध्याय’ (1997) आदि फिल्मों को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. वे सिनेमा के विचारक और एक कुशल शिक्षक भी थे. मुझे याद है कि करीब बीस साल पहले उन्होंने जेएनयू में कार्ल थियोडोर ड्रेयर की चर्चित फिल्म द पैशन ऑफ जॉन ऑफ आर्क (1928) पर एक व्याख्यान दिया था.
पिछली सदी के साठ के दशक में समातंर सिनेमा के अन्य चर्चित फिल्मकार मणि कौल के संग उन्होंने पुणे स्थित फिल्म संस्थान (एफटीआईआई) से फिल्म निर्देशन का प्रशिक्षण लिया था. फिल्म संस्थान में उन्हें ऋत्विक घटक जैसे गुरु मिले और ‘एपिक फार्म’ से उनका परिचय करवाया, वहीं छात्रवृत्ति लेकर जब वे पेरिस गए तब महान फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां के संग ‘उन फाम डूस (ए जेंटल वुमन, 1969)’ फिल्म में सहायक निर्देशक के रूप में जुड़े. उनकी फिल्मों पर दोनों ही निर्देशकों का असर है, लेकिन फिल्म-निर्माण की शैली उनकी निजी है.
बिंब और ध्वनि का कुशल संयोजन और फॉर्म के प्रति एकनिष्ठता उनकी फिल्मों में जैसा दिखता है, सिनेमा के इतिहास में दुर्लभ है. उन्होंने कहा था कि ‘मैं सौभाग्यशाली था कि ब्रेसां और ऋत्विक घटक जैसे गुरुओं ने मेरा लालन-पालन किया.’ जहाँ ‘माया दर्पण’ फिल्म में तरन के ऊपर ब्रेसां की चर्चित फिल्म ‘मूशेत’ (1967) के केंद्रीय चरित्र की छाप दिखती है, वही ‘मिनिमलिज्म’ का प्रभाव भी. ब्रेसां की फिल्मों में जो मोक्ष या निर्वाण की अवधारणा है, उससे भी वे प्रभावित रहे हैं. रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास ‘चार अध्याय’ पर आधारित फिल्म पर ऋत्विक घटक का असर है.
उनकी सभी फिल्मों में ‘फॉर्म’ के प्रति एक अतिरिक्त सजगता और संवेदनशीलता दिखती है. निर्मल वर्मा की कहानी पर आधारित ‘माया दर्पण’ फिल्म में हवेली को जिस तरह फिल्माया गया है वह सामंती परिवेश, केंद्रीय पात्र ‘तरन’ के मनोभावों, एकाकीपन को दर्शाने में कामयाब है. रंगों का कुशल संयोजन इस फिल्म की विशेषता है. वे कहते थे ‘रंग हमारे होने की खुशबू को परिभाषित करता है.’ ‘माया दर्पण’ से लेकर ‘चार अध्याय’ तक ध्वनि का विशिष्ट प्रयोग उल्लेखनीय है.
यह दुर्भाग्य ही है कि इस ‘अवांगार्द’ फिल्मकार को हमेशा संसाधन की कमी से जूझना पड़ा, लेकिन उपभोक्तावादी दौर में अपनी कला से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. वे सिनेमा माध्यम पर तकनीक के बढ़ते जोर को लेकर चिंतित रहते थे.
शहानी अक्सर अपने जन्म स्थान लरकाना (सिंध, पाकिस्तान) की चर्चा करते थे. साथ ही रंगों के मेल और भारतीय सभ्यता और संस्कृति में इसकी केंद्रीयता को रेखांकित करते रहे. वे खुद को घटक की तरह ही विभाजन (पार्टीशन) की संतान कहते थे.
‘माया दर्पण’ निर्मल वर्मा की कहानी पर आधारित है, पर यह फिल्म उसका अतिक्रमण करती है. शहानी मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित थे, फिल्म में सामंतवाद का विरोध है. इस फिल्म में उनकी वर्ग-चेतन दृष्टि स्पष्ट दिखती है. जब मैंने फिल्म में कहानी से अलग ‘ट्रीटमेंट’ के बाबत सवाल पूछा था तब उन्होंने कहा था: “मैंने ‘माया दर्पण’ में सामंतवादी उत्पीड़न दिखाने की कोशिश की है. इस फिल्म के अंत में डांस सीक्वेंस है, उसके माध्यम से मैंने इस उत्पीड़न को तोड़ने की कोशिश की है. उस डांस में जो ऊर्जा है वह सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ है. यह काली के रंग में भी है.”
कुमार शहानी कहते थे कि जब आप फिल्म बनाते हैं तब आप एक विशिष्ट काम करने की इच्छा रखते हैं-- खास कर जब आप स्वतंत्रता की बात करते हैं. एक तरह से वैयक्तिक स्वतंत्रता इस फिल्म की मूल भावना है. कला में यह स्वतंत्रता किस रूप में आए, शहानी की यह फिल्म इस बात की खोजबीन करती है.
कुमार शहानी की फिल्मों में बिंब (इमेज) सायास रूप से भारतीय चित्रकला से प्रेरित दिखते हैं. अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह जैसे समकालीन फिल्मकारों पर उनका स्पष्ट प्रभाव है. माया दर्पण के बाद की उनकी फिल्मों का अध्ययन संगीत से उनके जुड़ाव के आधार पर ही किया जा सकता है. उनकी फिल्मों पर हिंदी में गंभीर विवेचना की जरूरत है. ये फिल्में भारतीय सौंदर्यशास्त्र में पगी हैं, राजनीतिक विचारधारा का यहाँ समावेश है. असल में, शहानी दोनों के बीच कुशलता से आवाजाही करते रहे.

Sunday, November 27, 2022

कुमार शहानी का कला संसार


कुमार शहानी कला सिनेमा, जिसे समांतर सिनेमा भी कहा जाता है, के एक प्रतिनिधि फिल्मकार हैं. उनकी ‘माया दर्पण’ (1972), ‘तरंग’ (1984), ‘ख्याल गाथा’ (1989), ‘कस्बा’ (1990), ‘चार अध्याय’ (1997) आदि फिल्मों को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, हालांकि मुख्यधारा के मीडिया में आज उनकी चर्चा नहीं होती है. उल्लेखनीय है कि वर्ष 1972 में रिलीज हुई ‘माया दर्पण’ फिल्म इस वर्ष अपने पचास वर्ष पूरे कर रही है. इस फिल्म को हिंदी में ‘बेस्ट फिल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. इस अवसर पर उनकी फिल्मों का पुनरावलोकन (रेट्रोस्पेक्टिव) जरूरी है, ताकि हिंदी सिनेमा में उनके विशिष्ट योगदान को रेखांकित किया जा सके.

बातचीत में शहानी कहते हैं कि ‘माया दर्पण’ के पचास वर्ष पूरे होने पर दुनिया भर में उनकी फिल्मों के प्रति रूचि दिखाई जा रही है और भविष्य में फिल्म निर्माण को लेकर हॉलीवुड से भी पूछताछ किया जा रहा है. पिछली सदी के 70-80 के दशक में उनके फिल्मों की चर्चा फ्रांस और अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबारों में होती रही. असल में, पुणे फिल्म संस्थान से निर्देशन और पटकथा लेखन में प्रशिक्षित शहानी सिनेमा को उसी तरह विशिष्ट माध्यम के रूप में स्वीकार करते हैं जैसे कि कोई लेखक लेखन को या नाट्यकर्मी रंगमंच को. बिंब और ध्वनि का कुशल संयोजन जैसा उनकी फिल्मों में दिखता है, वह हिंदी सिनेमा के इतिहास में दुर्लभ है.

साठ के दशक में, फिल्म संस्थान में उन्हें फिल्मकार ऋत्विक घटक जैसे गुरु मिले और ‘एपिक फार्म’ से उनका परिचय करवाया, वहीं छात्रवृत्ति लेकर जब वे पेरिस गए तब महान फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां के संग ‘उन फाम डूस (ए जेंटल वूमन, 1969)’ फिल्म में सहायक निर्देशक के रूप में जुड़े. उनकी फिल्मों पर दोनों ही निर्देशकों का असर है, लेकिन फिल्म-निर्माण की शैली उनकी निजी है. यहाँ सौंदर्यशास्त्र और विचारधारा में विरोध नहीं है.

कुछ वर्ष पहले एक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि ‘मैं सौभाग्यशाली था कि ब्रेसां और ऋत्विक घटक जैसे गुरुओं ने मेरा लालन-पालन किया.’ जहाँ ‘माया दर्पण’ फिल्म में तरन के ऊपर ब्रेसां की चर्चित फिल्म ‘मूशेत’ (1967) के केंद्रीय चरित्र की छाप दिखती है, वही ‘मिनिमलिज्म’ का प्रभाव भी. ब्रेसां की फिल्मों में जो मोक्ष या निर्वाण की अवधारणा है, उससे भी वे प्रभावित रहे हैं. रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास ‘चार अध्याय’ पर आधारित फिल्म पर ऋत्विक घटक का असर है.

उनकी सभी फिल्मों में फॉर्म या रूप के प्रति एक अतिरिक्त सजगता और संवेदनशीलता दिखती है. निर्मल वर्मा की कहानी पर आधारित ‘माया दर्पण’ फिल्म में हवेली को जिस तरह फिल्माया गया है वह सामंती परिवेश, केंद्रीय पात्र ‘तरन’ के मनोभावों, एकाकीपन को दर्शाने में कामयाब है. रंगों का कुशल संयोजन इस फिल्म की विशेषता है. वे कहते हैं ‘रंग हमारे होने की खुशबू को परिभाषित करता है.’ ‘माया दर्पण’ से लेकर ‘चार अध्याय’ तक ध्वनि का विशिष्ट प्रयोग उल्लेखनीय है. यह दुर्भाग्य ही है कि इस ‘अवांगार्द’ फिल्मकार को हमेशा संसाधन की कमी से जूझना पड़ा, लेकिन उपभोक्तावादी दौर में अपनी कला से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया.

Thursday, November 17, 2022

कुमार शहानी की फिल्म माया दर्पण के पचास साल


फिल्मकार कुमार शहानी की विशिष्ट पहचान है. खास कर समांतर सिनेमा (कला सिनेमा) के वे पुरोधा हैं. दुनिया भर में उनकी चर्चा एक अवां-गार्द (Avant-garde) फिल्म निर्देशक के रूप में होती रही है. पिछली सदी के साठ के दशक में जब पुणे में फिल्म संस्थान की शुरुआत हुई, उन्होंने समांतर सिनेमा के एक अन्य प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक, मणि कौल, के साथ फिल्म निर्देशन का प्रशिक्षण लिया. संस्थान में उन्हें महान फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक का साहचर्य मिला. घटक को वे अपना गुरु मानते हैं. प्रशिक्षण के बाद शहानी एक फेलोशिप पर पेरिस गए और प्रसिद्ध फ्रेंच फिल्म निर्देशक रॉबर्ट ब्रेसां की फिल्म 'उन फाम डूस (ए जेंटल वूमन,1969)' में सहायक-निर्देशक के रूप में काम किया. लौट कर जब वे भारत वापस आए अपनी पहली फिल्म-‘माया दर्पण’ को निर्देशित किया.‘माया दर्पण’ (1972) उनकी सबसे चर्चित फिल्म है, जो पचास वर्ष पूरे कर रही है. यह फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन के सहायता से बनी थी.

हिंदी के प्रतिष्ठित रचनाकार निर्मल वर्मा की इसी नाम से लिखी कहानी (माया दर्पण) पर जब फिल्म बन कर आई, सिनेमा अध्येताओं और समीक्षकों ने निर्देशक की मौलिक दृष्टि और सिनेमाई भाषा की सराहना की थी. पिछली सदी के 70-80 के दशक में उनकी और मणि कौल की फिल्मों (उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा आदि) में कहानी कहने की प्रयोगात्मक शैली की चर्चा खूब हुई. पेरिस के ला मोंद, अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में भी उनकी फिल्मों की चर्चा होती थी. बहरहाल, ‘माया दर्पण’ को हिंदी में ‘बेस्ट फिल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.
‘माया दर्पण’ की विशिष्टता की क्या वजह है? क्यों हिंदी सिनेमा में इस फिल्म को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है? इस फिल्म में रंगों और ध्वनि के इस्तेमाल से जिस सिनेमा संसार को रचा गया है, वह अलहदा है. पाकिस्तानी शायर जिया जालंधरी ने कहा है: रंग बातें करें और बातों से खुशबू आए’. कुमार शहानी बातचीत में कहते हैं ‘रंग हमारे होने की सुगंध को परिभाषित करता है.’ प्रसंगवश, शहानी अक्सर अपने जन्म स्थान लरकाना (सिंध, पाकिस्तान) की चर्चा करते हैं. साथ ही रंगों के मेल और भारतीय सभ्यता और संस्कृति में इसकी केंद्रीयता को रेखांकित करते रहे हैं.
कथानक निर्मल वर्मा की कहानी पर आधारित होने के बावजूद यह फिल्म उसका अतिक्रमण करती है. सिनेमा तकनीकी आधारित कला है, लेकिन तकनीकी यहाँ निर्देशक पर हावी नहीं है. ‘माया दर्पण’ की कहानी के केंद्र में तरन (अदिति) है, जो अपने पिता (दीवान साहब) और विधवा बुआ के साथ एक छोटे शहर में रहती है. आजादी के बाद भारतीय समाज में आ रहे सामाजिक बदलाव, औद्योगीकरण की आहट इस कहानी में प्रवासी इंजीनियर बाबू के माध्यम से आई है. इस कहानी के एक प्रसंग में बुआ कहती है: “सोचती हूँ जब आज बाबू तेरे लिए ऊंची जात और बड़े घराने की बात चलाते हैं, तो क्या यह ठीक है? वह बात आज कहाँ रही, जो वर्षों पहले थी? आज अपनी कौन इज्जत रह गई है, जो बड़े घर-घराने का लड़का मिले! लेकिन उन्हें यह बात समझाये कौन?” कहानी से अलग शहानी इस फिल्म में हाशिए पर पड़े समाज को भी लेकर आते हैं, जहाँ उनकी वर्ग-चेतन दृष्टि का पता चलता है. इंजीनियर बाबू मजदूरों के बीच ‘लिटरेसी कार्यक्रम’ चलाते हैं. तरन जाति-वर्ग भेद को तोड़ती है.
सामंती और पितृसत्तात्मक परिवेश में तरन के अकेलापन और अवसाद को निर्मल वर्मा की कहानी उकेरती है, लेकिन इस कहानी में तरन अपने अकेलेपन से छुटकारा पाने का निर्णय नहीं ले पाती. सामंती परिवेश की हदबंदियां उसे जकड़ी हुई है, जबकि उसका भाई उसे तोड़ कर निकल चुका है. फिल्म में सामंतवाद का विरोध किया गया. है, जो कहानी में नहीं है. यह सारी बातें फिल्म में कलात्मक ढंग से आई है, जहाँ निर्देशक की ‘फॉर्म’ के प्रति एकनिष्ठता दिखती है. कुछ वर्ष पहले एक इंटरव्यू में जब मैंने फिल्म में कहानी से अलग ‘ट्रीटमेंट’ के बाबत उनसे सवाल पूछा था तब उन्होंने कहा था: “मैंने ‘माया दर्पण’ में सामंतवादी उत्पीड़न दिखाने की कोशिश की है. इस फिल्म के अंत में डांस सीक्वेंस है, उसके माध्यम से मैंने इस उत्पीड़न को तोड़ने की कोशिश की है. उस डांस में जो ऊर्जा है वह सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ है. यह काली के रंग में भी है.” कुमार शहानी कहते हैं कि 'जब आप फिल्म बनाते हैं तब आप एक विशिष्ट काम करने की इच्छा रखते हैं-- खास कर जब आप स्वतंत्रता की बात करते हैं, जिसकी चाहत सबमें रहती है.' एक तरह से वैयक्तिक स्वतंत्रता इस फिल्म की मूल भावना है. कला में यह स्वतंत्रता किस रूप में आए, शहानी की यह फिल्म इस बात की खोजबीन करती है.
मणि कौल की तरह ही कुमार शहानी की फिल्मों में बिंब (इमेज) सायास रूप से भारतीय चित्रकला से प्रेरित दिखते हैं. अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह जैसे समकालीन फिल्मकारों पर इन अवांगार्द फिल्म निर्देशकों का स्पष्ट प्रभाव है, जिसे वे खुले मन से स्वीकारते भी है. खुद ‘माया दर्पण’ की तरन पर रॉबर्ट ब्रेसां की फिल्म ‘मूशेत (1967)’ के केंद्रीय पात्र का प्रभाव दिखता है, जिसकी आलोचना सत्यजीत रे ने की थी. साथ ही उनकी फिल्मों पर ऋत्विक घटक की फिल्मों का भी प्रभाव है. बावजूद सारे प्रभावों और आलोचना के कुमार शहानी की फिल्मों में कहानी कहने की जो शैली है वह उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अलग पंक्ति में खड़ा करता है.
'माया दर्पण' फिल्म में ध्वनि के प्रयोग के साथ संगीत के इस्तेमाल पर भी बातचीत की जानी चाहिए. हवेली के ‘टाइम-स्पेस’ को भास्कर चंदावरकर के संगीत और वाणी जयराम के स्वर ने खूबसूरती से उभारा है. कुमार शहानी कहते हैं, ‘जाहिर है, आप देखेंगे कि इस फिल्म के बाद जितनी मेरी फिल्में हैं वे ‘म्यूजिकल एपिक्स’ है’. 'तरंग', 'कस्बा', 'ख्याल गाथा' और 'चार अध्याय' उनकी अन्य चर्चित फिल्में हैं. उनकी फिल्मों पर हिंदी में गंभीर विवेचना की जरूरत है. ये फिल्में भारतीय सौंदर्यशास्त्र में पगी हैं, राजनीतिक विचारधारा का यहाँ समावेश है. असल में, शहानी दोनों के बीच कुशलता से आवाजाही करते रहे हैं.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Saturday, September 04, 2021

समांतर सिनेमा और मणि कौल

वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्म ‘उसकी रोटी’, बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ और मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ ने भारतीय फिल्मों की एक नई धारा की शुरुआत की जिसे समांतर या न्यू वेव सिनेमा कहा गया. फिल्मकार और समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता इस धारा की फिल्मों को ‘अनपापुलर फिल्म’[i] कहते हैं. जाहिर है, भारतीय सिनेमा और खास कर बॉलीवुड की मनोरंजन प्रधान फिल्मों, जिसमें नाच-गाने पर जोर रहता है और सितारों (‘स्टारों’) की केंद्रीयता रहती है, उससे अलगाने के लिए समीक्षक इस तरह की संज्ञा देते हैं. इसे कला सिनेमा भी कहा गया. मणि कौल (1942-2011), फिल्म संस्थान, पुणे के उनके समकालीन कुमार शहानी और कैमरामैन के के महाजन की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा में मनोरंजन से अलग सामाजिक-सांस्कृतिक तत्वों को कलात्मक रूप से समाहित किया. इसके लिए हिंदी साहित्य (नयी कहानियों) की ओर उन्होंने रुख किया.

मुख्यधारा का सिनेमा हमेशा से ही बड़ी पूंजी की मांग करता है और वितरक प्रयोगशील सिनेमा पर हाथ डालने से कतराते रहते हैं. सन 1969 में ही ‘फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन’ ने प्रतिभावान और संभावनाशील फिल्मकारों की ‘ऑफ बीट’ फिल्मों को कर्ज देकर सहायता पहुँचाने का निर्देश जारी किया था. इसका लाभ मणि कौल जैसे निर्देशक उठाने में सफल रहे. इसी दौर में हिंदी के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषाओं मसलन, मलयालम, बांगला, कन्नड़ आदि में भी कई बेहतरीन फिल्मकार उभरे जिनकी फिल्में दर्शकों के सामने एक अलग भाषा और सौंदर्यबोध लेकर आई. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन फिल्मों की आज भी चर्चा होती है.
समांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों के लिए 70 और 80 का दशक मुफीद रहा. हालांकि इन फिल्मों की आलोचना एक बड़े दर्शक तक नहीं पहुँच पाने की वजह से होती रही है. उसी दौर में सत्यजीत रे (2012: 99) ने फिल्म को मास मीडिया मानते हुए एक अलहदा दर्शक वर्ग के लिए फिल्म बनाने के विचार की आलोचना की थी. उन्होंने 'भुवन सोम' के बारे में कटाक्ष करते हुए सात शब्दों में फिल्म का सार इस तरह लिखा था- ‘बिग बैड ब्यूरोक्रेट रिफार्मड बाय रस्टिक बेल’[ii]. वे कुमार शहानी की ‘माया दर्पण’ से भी बहुत प्रभावित नहीं थे. पर मृणाल सेन, मणि कौल, कुमार शहानी जैसे फिल्मकार, सत्यजीत रे से अलग रास्ता अपनाए हुए थे और अपनी फिल्मों में प्रयोग करने से कभी नहीं हिचके. वे चाहते थे कि उनकी फिल्में देखकर दर्शक सोचें, विचारें और उद्वेलित हों. पॉपुलर सिनेमा की तरह उनकी फिल्में हमारा मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि संवेदनाओं को संवृद्ध करती हैं. यहाँ नोट करना उचित होगा कि समांतर सिनेमा के बीज सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों में छुपे थे.
वर्ष 2006 में दिल्ली में हुए एक फिल्म महोत्सव के दौरान मैंने मणि कौल से उनकी फिल्मों, समांतर और मुख्यधारा की फिल्मों के बीच रिश्ते और ऋत्विक घटक के बारे में लंबी बातचीत की थी. मणि कौल ने कहा था कि उन्हें मोहन राकेश की इस कहानी में जो इंतजार और विछोह है, काफी प्रभावित किया था. ‘उसकी रोटी’ में बालो अपने पति सुच्चा सिंह के लिए रोज रोटी बना मीलों पैदल चल कर हाई वे की सड़क पर आती है, जहाँ सुच्चा सिंह बस चलाता है. हफ्ते में वह एक दिन घर आता है. इंतजार की इस चक्र की तरह बालो का जीवन बीतता है. हिंदी की नई कहानियों की तरह ही इस फिल्म में आदि, मध्य, अंत के क्रम का पालन नहीं किया है, फिल्म एक रैखिक नैरेटिव के तहत नहीं चलती है. इस फिल्म की पटकथा मोहन राकेश के साथ मिल कर लिखी थी, पर मणि कौल ने शूटिंग के दौरान उसका पालन नहीं किया. आशीष राजध्यक्षया (2012: 322-323) ने ठीक ही नोट किया है कि “यह अस्पष्ट है कि उसकी रोटी में ऐसा क्या था जिसने मणि कौल को इस तक जाने के लिए अनुशंसित (रिकॉमेंड) किया...जो भी कारण हो, तथ्य यह है कि पंजाब के एक दोपहर की इस कहानी को भारतीय सिनेमा की पूरी तरह से पहली अवांगार्द प्रयोग के असंभाव्य विषय के रूप में चुना गया.”[iii] मणि कौल ने मुझे कहा था कि ‘यह इंतजार हमें अनुभवजन्य समय से दूर ले जाता है, जहाँ एक मिनट भी एक घंटा हो सकता है.’[iv] बाद में जब वे संगीत की शिक्षा ले रहे थे (वे ध्रुपद के सिद्ध गायक थे), तब सम और विषम के अंतराल में इस बात को काफी अनुभव करते थे. ‘उसकी रोटी’ की तरह ही ‘ आषाढ़ का एक दिन’ और ‘दुविधा’ में भी स्त्रियों के द्वारा विभिन्न देश-काल में इस इंतजार का चित्रण मिलता है. इन तीनों फिल्मों की अवस्थिति साफ अलग है. पंजाब, कश्मीर (पहाड़) और राजस्थान का देश-काल इनमें उभर कर आया है. खास कर चर्चित रचनाकार विजयदान देथा की कहानी पर आधारित ‘दुविधा’ फिल्म में चटक रंगों का इस्तेमाल है. बालो, मल्लिका और लच्छी के इंतजार के साथ ही अंतर्मन की पीड़ा उभर कर आती है, जिसे हम लेख में आगे देखेंगे. इन फिल्मों में पार्श्व संगीत का मणि कौल ने बेहद सादगी से इस्तेमाल किया है. पर हिंदुस्तानी संगीत के प्रति उनका लगाव 'ध्रुपद' और 'सिद्धेश्वरी' डॉक्यूमेंट्री फिल्म में दिखता है. मणि कौल साहित्य, संगीत और चित्र कला के बीच सहजता से आवाजाही करते थे.
हिंदी के चर्चित रचनाकार उदय प्रकाश ने पिछले दिनों मुझसे एक बातचीत के दौरान मणि कौल की इसी सहजता को रेखांकित करते हुए मुक्तिबोध पर बनी उनकी फिल्म ‘सतह से उठता आदमी’ का उदाहरण दिया था और कहा था कि ‘मणि ही मुक्तिबोध को दाल-भात खाता हुआ दिखा सकते थे.’[v] सत्यजीत रे (2012) ने मणि कौल और समांतर सिनेमा के एक और प्रतिनिधि फिल्मकार कुमार शहानी की फिल्मों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि इनकी फिल्मों में ऋत्विक घटक की तरह ही ‘ह्यूमर’ नहीं मिलता. ये दोनों फिल्म संस्थान (एफटीआईआई), पुणे में घटक के शिष्य थे. पर निजी मुलाकातों में मणि कौल बेहद मजाकिया थे. बातचीत में उन्होंने हँसते हुए कहा था- ‘मुझसे ज्यादा एक्सट्रीम में बहुत कम लोग गए. जितनी फिल्में बनाई, सारी फ्लॉप!’
मणि कौल की फिल्में हिंदी सिनेमा को एक कला के रूप में स्थापित करती है. मणि कौल हालांकि एक निर्देशक के साथ-साथ सिनेमा के कुशल शिक्षक भी थे. वर्ष 2010 में जब मैं फिल्म एप्रिसिएशन का पाठ्यक्रम पूरा कर रहा था तब पुणे फिल्म संस्थान में एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने बताया कि ‘सिनेमा ध्वनि और बिंब का कुशल संयोजन होता है और उसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए.’[vi] उस व्याख्यान के बाद हमें उनकी बहुचर्चित फिल्म ‘सिद्धेश्वरी’ दिखाई गई थी. फिल्म के प्रदर्शन से पहले फिल्म की भूमिका बांधते हुए उन्होंने अपने परिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा था कि ‘अगर कुछ चीजें समझ में नहीं आए तो ज्यादा दिमाग मत लगाइएगा, यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है.’ लेकिन ‘सिद्देश्वरी’ देखते हुए ऐसे लगा कि हम एक लंबी कविता को परदे पर पढ़ रहे हैं.
सत्यजीत रे जब मणि कौल की फिल्मों की आलोचना यह कह कर करते हैं कि उनकी पहुँच बेहद सीमित तबके तक रही तो यह सच के करीब है. उनकी फिल्मों का सिनेमाघरों में प्रदर्शन नहीं हुआ. पर वे इस बात को खुद भी स्वीकार करते थे. दर्शकों के बीच अपनी फिल्म की पहुँच को लेकर उन्होंने मुझे एक वाकया सुनाया था. हिंदी सिनेमा के चर्चित अभिनेता राज कुमार उनके चाचा थे. एक फिल्म पार्टी के दौरान उन्होंने आवाज देकर मणि कौल को बुलाया और कहा, ‘जानी, मैंने सुना है कि तुमने फिल्म बनाई है..उसकी रोटी. क्या है यह? रोटी के ऊपर फिल्म! और वह भी उसकी रोटी?तुम मेरे साथ आ जाओ हम मिल कर अपनी फिल्म बनाएँगे- अपना हलवा.” बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि ‘मैं हिंदी में ही सोचता और लिखता हूँ.’ उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा, सतह से उठता आदमी और नौकर की कमीज’ हिंदी की चर्चित कृतियाँ है. मणि कौल ने हिंदी साहित्य की इन कृतियों को आधार बना कर फिल्म रची और इन्हें एक नया आयाम दिया. मुंबइया फिल्मों के कितने फिल्मकार आज हिंदी में सोचते और रचते हैं?
मणि कौल ने माना था कि उन्हें फिल्म बनाने में हमेशा वित्तीय संकट से जूझना पड़ा था. पर सृजनात्मकता से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. जीवन के अंतिम दिनों में वे विनोद कुमार शुक्ल की कृति ‘खिलेगा तो देखेंगे’ को सिनेमाई भाषा में रच रहे थे. समांतर सिनेमा के निर्देशक इस बात पर जोर देते रहे हैं कि व्यावसायिकता को लेकर मुख्याधारा और कला फिल्मों की तुलना नहीं की जा सकती. कुमार शहानी कहते हैं, “हम पूंजीवादी व्यवस्था में रहते हैं जिसमें कारोबार मुख्य होता है, हम इसे चाहें या ना चाहें. मेनस्ट्रीम फिल्में लाभ से संचालित होती हैं, बिना इसके उनका खर्च नहीं निकल सकता. उनका कला से कोई ताल्लुक नहीं होता. इस लिहाज से हमें मेनस्ट्रीम और कला सिनेमा की तुलना नहीं करनी चाहिए.”[vii]
वर्ष 1964-65 में ऋत्विक घटक उप प्राचार्य के रूप में एफटीआईआई नियुक्त हुए थे और एक पूरी पीढ़ी को सिनेमा की नई भाषा से रू-ब-रू करवाया. मणि कौल ऋत्विक घटक के शिष्य थे. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन अक्सर बातचीत में यह बताते हैं कि मणि कौल घटक के सबसे ज्यादा करीब थे. अपने गुरु ऋत्विक घटक के प्रति मणि कौल बेहद कृतज्ञ थे. उनका कहना था “मैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नव यथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.” अक्सर ऋत्विक घटक की फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है. मणि कौल का कहना था कि वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे. उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाए.
‘उसकी रोटी’ फिल्म में जिस तरह के आख्यान शैली का इस्तेमाल किया गया है, उसे आशीष राजध्यक्षया (2012) ने लिखा है, मणि कौल के शब्दों में ‘यथार्थवाद में द्रष्टा का निवेश’ के तहत ही समझा जा सकता है. यहाँ दर्शक जो ग्रहण कर रहा है, उसकी व्यक्तिनिष्ठता पर जोर है. वे कहते थे कि ‘देखने के तरीके में बहुत कुछ छुपा होता है’. यहां मणि कौल यथार्थवाद की गति को अपने प्रयोगात्मक विजुल्स से पकड़ने की कोशिश करते हैं. जाहिर है फिल्म देखने के क्रम में दर्शकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो उठती है और उसे अपने अनुभवों का निवेश फिल्म देखने के क्रम में करना पड़ता है. फिल्म के कई दृश्यों के फिल्मांकन की शैली पेंटिंग (अमृता शेरगिल) से प्रभावित है. फिल्म की गति बेहद धीमी है और बॉलीवुड की फार्मूला फिल्मों के अभ्यस्त दर्शकों के लिए यह फिल्म बहुत धैर्य की मांग करती है! यहाँ हम मणि कौल की एक अन्य फिल्म ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर एक दृष्टि डालते हैं.
जहाँ हिंदी में आधुनिक नाटक के प्रणेता मोहन राकेश के चर्चित नाट्य कृति ‘आषाढ़ का एक दिन’ की चर्चा होती रहती है, मणि कौल निर्देशित इस फिल्म की चर्चा छूट जाती है. उन्होंने वर्ष 1971 में इस फिल्म को निर्देशित किया था. ‘उसकी रोटी’, ‘दुविधा’, ‘सिद्धेश्वरी’ की तरह ही सिनेमाई दृष्टि और भाषा के लिहाज से ‘आषाढ़ का एक दिन’ हिंदी सिनेमा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. इस फिल्म में मल्लिका (रेखा सबनीस) कालिदास (अरुण खोपकर) और विलोम (ओम शिव पुरी) की प्रमुख भूमिका है. मल्लिका कालिदास की प्रेयसी है. हिमालय की वादियों में बसे एक ग्राम प्रांतर में दोनों के बीच साहचर्य से विकसित प्रेम है. कालिदास को उज्जयिनी के राजकवि बनाए जाने की खबर मिलती है. मल्लिका और राजसत्ता को लेकर उनके मन में दुचित्तापन है. वहीं मल्लिका कालिदास को सफल होते देखना चाहती है और उन्हें स्नेह डोर से मुक्त करती है. उज्जयिनी और कश्मीर जाकर कालिदास सत्ता और प्रभुता के बीच रम जाते हैं. वे मल्लिका के पास लौट कर नहीं आते और राजकन्या से शादी कर लेते हैं. और जब वापस लौटते हैं तब तक समय अपना एक चक्र पूरा कर चुका होता है. सत्ता का मोह और रचनाकार का आत्म संघर्ष ऐतिहासिकता के आवरण में इस फिल्म के कथानक को समकालीन बनाता है.
दृश्य, प्रकाश, ध्वनि के संयोजन और परिवेश (मेघ, बारिश, बिजली) के माध्यम से सिनेमा में यह सब साकार हुआ है. कोलाहल के बीच एक रागात्मक शांति पूरी फिल्म पर छाई हुई है. मोहन राकेश के नाटक से इतर एक अलग अनुभव लेकर यह फिल्म हमारे सामने आती है. फिल्म में भावों की घनीभूत व्यंजना के लिए ‘क्लोज अप’ का इस्तेमाल किया गया है. मणि कौल के सहयोगी रह चुके, चर्चित फिल्म निर्देशक कमल स्वरूप कहते हैं कि इस फिल्म में मणि कौल ने ‘विजुअल्स’ पर ज्यादा ध्यान रखा था. वे कहते हैं, “बजट कम था और उसी के हिसाब से ही फिल्म बनी है. सिंक साउंड में ज्यादा खर्च होता इसलिए नाटक के संवाद ट्रैक को पहले रिकॉर्ड कर लिया गया था. जैसे हम गाना प्ले बैक करते हैं उसी तरह फिल्म में साउंड प्ले बैक करती है. सबनीस भी पहले से सत्यदेब दुबे के प्ले में एक्टिंग करती थीं और बहुत अच्छी अदाकार थीं. मणि को बहुत कुछ रेडिमेड मिल गया था. उन्होंने आउटडोर सेट बनाया. इसमें प्रकृति और अंदर का सेट दोनों आ गया है.”[viii]
मणि कौल की फिल्में साहित्यिक कृतियों पर बनी, हालांकि सबका आस्वाद अलग है. उनकी फिल्मों में एक उत्तरोतर विकास दिखाई पड़ता है, पर पेंटिंग, स्थापत्य और संगीत का स्वर सबमें मुखर रहा है. असल में, उनकी फिल्मों में विभिन्न कला रूपों की आवाजाही सहजता से होती है. जहाँ वे भारतीय सौंदर्यशास्त्र में पगे थे और ध्रुपद संगीत के गुरु थे, वहीं वे अपनी कला में फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां और आंद्रेई तार्कोवस्की के प्रभाव को स्वीकार करते थे. ब्रेसां की फिल्मों की ‘मिनिमलिज्म’ यानी सादगी का प्रभाव उनकी फिल्मों पर है. ब्रेसां का प्रभाव कुमार शहानी की फिल्मों पर भी है, जिसे वे सहज रूप से स्वीकार भी करते हैं. बातचीत में वे अक्सर एक गधे को केंद्र पर रख कर बनाई गई उनकी फिल्म ‘बालथाजार’ की चर्चा करते हैं. प्रसंगवश, कुमार शहानी रॉबर्ट ब्रेसां के सहयोगी भी रह चुके हैं.
मणि कौल बातचीत में अक्सर ‘स्व भाव’ की बात करते थे. सारे प्रभावों के बावजूद जिस ‘स्पेस’ में वे अपनी कला रच थे वह नितांत वैयक्तिक है, जो फिल्म के हर शॉट और फ्रेम में महसूस किया जा सकता है. इस फिल्म में प्रेम पूरी गरिमा और लालित्य के साथ मौजूद है. मल्लिका की आँखें जिस तरह से अंतर्मन के भावों, अंतर्द्वंद को सामने लाती हैं बरबस वह कृष्ण के वियोग में गोपियों के कहे-‘अंखियां अति अनुरागी’ की याद दिलाती है. पर यहाँ आषाढ़ मास में जायसी के नागमती का विरह नहीं है. नागमती कहती हैं-‘मोहिं बिनु पिउ को आदर देई’. जबकि फिल्म के शुरुआत में ही मल्लिका कहती है- ‘मल्लिका का जीवन उसकी अपनी संपत्ति है. वह उसे नष्ट करना चाहती है तो किसी को उस पर आलोचना करने का क्या अधिकार है?’ इस फिल्म में मल्लिका के अपरूप रूप और सौंदर्य के साथ उसकी चेतना उभर कर सामने आई है. इस फिल्म में मणि कौल के ऊपर भारतीय सौंदर्यशास्त्र का प्रभाव स्पष्ट दिखता है. वे अपनी फिल्मों में ‘ध्वनि’ पर बहुत जोर देते थे. इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जहाँ परस्पर संवाद करते पात्रों में अजंता भित्तिचित्र और मिथिला चित्रकला शैली की झलक मिलती है. छायांकन में एक लय है. कमल स्वरूप कहते हैं कि मणि कौल देश-विदेश की पेंटिंग शैली के रेफरेंस को सामने रख कर सचेत होकर फ्रेम बनाते थे. वे सिद्धेश्वरी फिल्म के एक दृश्य का खास तौर पर उदाहरण देते हैं, जहाँ वे पिकासो की पेंटिंग-थ्री म्यूजिशियन, से प्रेरित हैं. खुद मणि कौल हेनरी मातिस के प्रभाव को स्वीकार करते थे. पर मणि की फिल्मों में संगीत, चित्र और ध्वनि मिल कर एक ऐसा कला संसार रचता है जो सिनेमा कला की महत्ता को सिद्ध करता है.
उल्लेखनीय है कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ के बाद, वर्ष 1972 में, कुमार शहानी ने निर्मल वर्मा की कहानी ‘माया दर्पण’ को निर्देशित किया था. दोनों ही फिल्मों को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था. दोनों निर्देशकों के फिल्म निर्माण की शैली मिलती जुलती भले हो (संगीत, पेंटिंग के इस्तेमाल को लेकर), विषय-वस्तु का ट्रीटमेंट काफी अलहदा है. मसलन, शहानी की तरण (माया दर्पण) फिल्म में सामंतवादी उत्पीड़न को तोड़ती है. जबकि निर्मल वर्मा की कहानी में सामंतवाद के खिलाफ विरोध नहीं दिखता है. शहानी का रुझान मार्क्सवादी विचारों की ओर रहा, जबकि मणि कौल अपनी कला में विचारधारा की सीमा का अतिक्रमण करते रहे. कमल स्वरूप कहते हैं कि मणि कौल राजनीतिक नहीं, रसिक थे.
बहरहाल, न सिर्फ मणि कौल की फिल्में, बल्कि 70 और 80 के दशक में समांतर सिनेमा के दौर में बनी अधिकांश फिल्मों का प्रदर्शन मुश्किल था. मलायमल फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन अपवाद कहें जाएँगे जिनकी फिल्में सिनेमाघरों में पहुँची. पर अधिकांश कला फिल्मकारों के दर्शकों का एक सीमित वर्ग था. ज्यादातर फिल्म समारोहों, समीक्षकों तक ही इन फिल्मों की पहुँच रही. कोई आश्चर्य नहीं कि 90 के दशक में होश संभालने वाली हमारी पीढ़ी की पहुँच से ये फिल्में बाहर थीं. जैसा कि हमने ऊपर नोट किया मणि कौल से उनकी फिल्मों के बारे में पूछने पर वह बेतकल्लुफी से बात करते थे. उनकी फिल्में भी अमूमन सिनेमा समारोहों तक ही सीमित थीं. उदयन वाजपेयी से बातचीत करते हुए (2012:45) उन्होंने 'अभेद आकाश' किताब में स्वीकारा था, “शायद हमें फिल्म देखने की नयी पद्धति विकसित करनी होगी. फिल्मकार तो हैं लेकिन देखने वाले नहीं हैं. अगर देखने वाले हों तो फिल्मो में बहुत बदलाव आएगा. बिना देखने वालों के फिल्मकार नहीं होता.”[ix]
सिनेमा को एक कला माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करने में समांतर सिनेमा के प्रयोगशील फिल्मकारों की भूमिका ऐतिहासिक है. पिछले दशकों में संचार की नई तकनीकी, इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने के बाद मणि कौल जैसे प्रयोगशील फिल्मकारों को एक नया दर्शक वर्ग मिला है. आज कई समकालीन फिल्म निर्देशकों मसलन अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह, अनूप सिंह आदि की फिल्मों में समांतर सिनेमा के पुरोधाओं की छाप स्पष्ट दिखाई देती है. युवा प्रयोगशील फिल्मकारों में एक तरह से समांतर सिनेमा की धारा का विकास देखने को मिल रहा है. मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में भी बदलाव की इस बयार को महसूस किया जा रहा है. आश्चर्य नहीं कि एफटीआईआई से निकले कई युवा फिल्मकार मणि कौल को अपना गुरु मानते हैं. वे मणि कौल की फिल्मों से प्रेरणा ग्रहण कर भीड़ और लीक से हट कर हिंदी सिनेमा का एक नया संसार रच रहे हैं. यही उनकी फिल्मों की सार्थकता है.
संदर्भ:
[i] चिदानंद दास गुप्ता (2008), सीइंग इज विलिविंग, पेंग्विन रेंडम हाउस: इंडिया
[ii] सत्यजीत रे (2012), आवर फिल्मस देयर फिल्मस, ओरियंट ब्लैक स्वान: नय़ी दिल्ली पेज, 81-99
[iii] आशीष राजाध्यक्षया (2012), इंडियन सिनेमा इन द टाइम ऑफ सेल्यूलाइड, तुलिका बुक्स: नयी दिल्ली
[iv] अरविंद दास, समांतर सिनेमा के पचास साल, प्रभात खबर, 9 जुलाई 2019
[v] निजी बातचीत
[vi] अरविंद दास (2019), बेखुदी में खोया शहर, अनुज्ञा बुक्स: नयी दिल्ली
[vii] अरविंद दास से कुमार शहानी की बातचीत, फिल्मों में तकनीकी दखल ज्यादा हो गया है, नवभारत टाइम्स, 29 जून 2019
[viii] निजी बातचीत
[ix] उदयन वाजपेयी (2012), अभेद आकाश, वाणी प्रकाशन: नयी दिल्ली

(संवाद पथ पत्रिका में प्रकाशित, जनवरी-मार्च 2020)

Saturday, June 29, 2019

फिल्मों में तकनीकी दखल ज्यादा हो गया है: कुमार शहानी


वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्म उसकी रोटीऔर मृणाल सेन की भुवन सोमने भारतीय फिल्मों की एक नई धारा की शुरुआत की जिसे समांतर या न्यू वेव सिनेमा कहा गया। कुमार शहानी इस धारा के एक प्रतिनिधि फिल्मकार हैं। उनकी माया दर्पण’, ‘तरंग’, ‘ख्याल गाथा’, ‘कस्बा’, ‘चार अध्यायआदि फिल्मों को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। समांतर सिनेमा के इस आधी सदी के सफर पर अरविंद दास ने हाल ही में कुमार शहानी से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :

न्यू वेव सिनेमा को पचास साल हो गए। मेनस्ट्रीम सिनेमा के बरक्स समांतर सिनेमा की इस यात्रा को आप किस रूप में देखते हैं?

हम पूंजीवादी व्यवस्था में रहते हैं जिसमें कारोबार मुख्य होता है, हम इसे चाहें या ना चाहें। मेनस्ट्रीम फिल्में लाभ से संचालित होती हैं, बिना इसके उनका खर्च नहीं निकल सकता। उनका कला से कोई ताल्लुक नहीं होता। इस लिहाज से हमें मेनस्ट्रीम और कला सिनेमा की तुलना नहीं करनी चाहिए।

कला सिनेमा के निर्माण में एफटीआईआई की क्या भूमिका रही?

मैं, मणि कौल और केके महाजन एफटीआईआई में थे। कुछ समय पहले ही पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट की शुरुआत हुई थी। 70 और 80 के दशक में जब हम न्यू वेव सिनेमा बना रहे थे तब न्यू यॉर्क टाइम्स, ला मोंद (पेरिस) जैसे अखबारों में एफटीआईआई की खूब चर्चा होती थी। वे मानते थे कि हम कुछ अच्छा काम कर रहे हैं। इससे एफटीआईआई की एक अंतरराष्ट्रीय पहचान बनी।

एफटीआईआई में फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक आपके गुरु थे, आपकी फिल्मों पर उनका कैसा असर रहा?

फिल्मों के प्रति उनकी जो निष्ठा थी, उस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। चार अध्यायटैगोर का आखिरी उपन्यास है जिसमें उन्होंने स्वानुभूति और आत्मनिर्णय पर जोर दिया है। आध्यात्मिक भाव के साथ राजनीतिक हिंसा का सामंजस्य बहुत मुश्किल होता है। जब आप मेरी यह फिल्म देखेंगे तो ऋत्विक दा आपको भरपूर नजर आएंगे।

आपकी फिल्मों को लेकर एपिक फॉर्मकी चर्चा होती है। क्या ऋत्विक घटक इस फॉर्म के पीछे रहे?

ऋत्विक दा ने ही इस एपिक फॉर्म से हमारा परिचय करवाया था। ब्रेख्त के नाटकों का अनुवाद उन्होंने किया है। कॉकेशियन चॉक सर्किलका उन्होंने उसी वक्त अनुवाद किया, जब हम इंस्टीट्यूट में उनके शिष्य थे। बांग्लादेश में एपिक थिएटर पर काफी काम किया गया है। वे वहीं के थे। वे विभाजन की संतान थे और मैं भी हूं।


मैं सौभाग्यशाली था कि ब्रेसां और ऋत्विक घटक जैसे गुरुओं ने मेरा लालन-पालन किया। वर्ष 1967 में मैंने फ्रांस में एक गधे को केंद्र में रख कर बनाई गई उनकी फिल्म बलथाजारदेखी थी और खूब पसंद की। मोक्ष और निर्वाण उनकी फिल्मों में जिस रूप में दिखता है, उस तरफ मैं अपने वाम विचारों के बावजूद काफी आकर्षित था। जब मैं टैगोर की रचनाओं और घटक दा की फिल्मों की ओर देखता हूं तो पाता हूं कि उनमें जो आध्यात्मिक ऊर्जा है उसका कोई सानी नहीं। इन सबसे मैंने यही चीजें विरासत में पाई हैं।

आप लोगों ने हिंदी की नई कहानी को अपनी फिल्मों के लिए चुना, पर उसका ट्रीटमेंट अलग दिखता है। जैसे निर्मल वर्मा की कहानी माया दर्पणमें सामंतवाद के खिलाफ विरोध नहीं दिखता जबकि आपकी फिल्म में यह स्पष्ट है...

निर्मल असल में एक लिरिकल राइटर थे। हालांकि निर्मल एक जमाने में कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर थे, पर जब प्राग पर सोवियत यूनियन ने कब्जा किया तब वे संदेहशील हो उठे। मैंने माया दर्पणमें सामंतवादी उत्पीड़न दिखाने की कोशिश की है। इस फिल्म के अंत में डांस सीक्वेंस है, उसके माध्यम से मैंने इस उत्पीड़न को तोड़ने की कोशिश की है। उस डांस में जो ऊर्जा है वह सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ है। यह काली के रंग में भी है।

इस फिल्म के अंत को लेकर निर्मल वर्मा की क्या प्रतिक्रिया थी?

उन्हें पसंद नहीं था। कुछ युवा लेखकों ने उनसे कहा कि वे गलत हैं और उन्हें फिल्म फिर से देखनी चाहिए। निर्मल ने अनेक बार यह फिल्म देखी, पर उन्हें पसंद नहीं आई। (हंसते हुए) यह काफी अजीब था।

भूमंडलीकरण के साथ नई तकनीक ने नए युवा फिल्मकारों को प्रयोग करने का काफी मौका दिया है। आप इसे किस रूप में देखते हैं?

थोड़ा-बहुत काम तो हो रहा है, लेकिन बलथाजारऔर मेघे ढाका ताराकी ऊंचाई तक पहुंचने में उन्हें वक्त लगेगा। एक बड़ी समस्या यह है कि तकनीक का दखल मानवीय हस्तक्षेप से कहीं ज्यादा है। युवा फिल्मकारों में सत्य और सुंदर की तलाश है, पर वे निराश हैं क्योंकि उनके पास अवसर नहीं है, कोई उनको महत्व नहीं दे रहा।

(नवभारत टाइम्स, 29 जून 2019 को प्रकाशित)