इस मराठी नाटक के केंद्र में एक अभिनेता है जो अपने जीवन, अस्तित्व, संबंधों और मृत्यु को मंच पर प्रस्तुत करता है. अभिनेता विभिन्न मुखौटों में दर्शकों के सामने आता है, पर उनका असली रूप खुद से छिपा रह जाता है. इस नाटक में अभिनेता जीवन के आखिरी क्षणों में अपने जीवन को टटोलता है और दर्शकों के सामने पेश करता है.
चर्चित निर्देशक अतुल पेठे के निर्देशन में अभय महाजन ने इस एकल नाटक को खूबसूरती से प्रस्तुत किया. अपने भाव, भंगिमाओं और संवाद के सहारे अभिनेता और निर्देशक के आपसी संबंधों, टकरावों और रचनात्मक यात्रा से महाजन हमें रू-ब-रू करवाते हैं. नाटक के मंचन के बाद उन्होंने मुझसे कहा, ‘यह एक मुश्किल नाटक है. बीस साल पहले लिखा गया है और इस बीच हमारी आंगिक और वाचिक भाषा दोनों ही बदल गई है....हमारे लिए य़ह नाटक करना एक चुनौती की तरह रहा.’ एलकुंचवार के नाटकों की विशेषता उनके प्रयोगात्मक शैली में है. सामाजिक-राजनीतिक विषयों को उठाते हुए इन नाटकों में भाषा की मितव्ययिता अलग से रेखांकित की जाती रही है. अल्पविराम, मौन भी यहाँ मुखर होकर बोलता है. इनके किरदार किसी ओढ़ी हुई भाषा में संवाद नहीं करते हैं!
इस नाटक में नाटककार ने बहुत सारे रचनाओं (नाटकों, कविताओं) के उद्धरण को समाहित किया है. इस नाटक का रूप उनके अन्य नाटकों से साफ अलग है. पिछले साल एक बातचीत में एलकुंचवार ने मुझसे कहा था: ‘मेरे सभी नाटक एक-दूसरे से अलग हैं.. हर नाटक के कंटेंट ने ही उसका रूप तय किया है.’
नाटक के शुरूआती दृश्य को बेहद कुशलता से बुना गया है जिसमें नंगे बंदन अभिनेता मृत्यु के क्षणों को रचता है. खुद महाजन का प्रशिक्षण शारीरिक संचालन में है, इस लिहाज से इस नाटक में आंगिक भाषा पर जोर रहा है. मंच पर कोई साज-सज्जा नहीं थी, बेहद कम प्रॉप्स थे. छोटे से सभागार में कहीं-कहीं भाषा मेरे भावबोध में बाधा बनी, पर महाजन का अभियन इतना सधा था कि 70 मिनट का यह नाटक मेरे लिए बोझिल नहीं बना.
मराठी में जहाँ कमर्शियल थिएटर का अपना एक दर्शक वर्ग है, वहीं प्रायोगिक नाटकों के लिए, सीमित ही सही, पुणे में स्पेस दिखता है. उसके अपने समर्पित दर्शक वर्ग भी है. छियासी वर्षीय महेश एलकुंचवार ने विजय तेंदुलकर (1928-2008) और सतीश आलेकर के साथ मिलकर मराठी रंगकर्म को नई रंगभाषा और मुहावरे दिए हैं. यदि इन तीनों नाटककारों की तुलना पारसी रंगमंच के राधेश्याम कथावाचक, नारायण प्रसाद बेताब और आगा हश्र कश्मीरी से की जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. इन नाटककारों ने पारंपरिक, महाकाव्य को आधार बना कर किए जाने वाले म्यूजिकल नाटकों से अलग सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों से मराठी रंगकर्म को जोड़ा. जिसका असर भारतीय रंगमंच पर गहरा पड़ा.

