Sunday, August 23, 2026

अपनी मृत्यु को रचता एक अभिनेता

 पिछले दिनों पुणे में बहुचर्चित नाटककार महेश एलकुंचवार का लिखा मराठी नाटक-एका नाटाचा मृत्यू (एक नाटककार की मृत्यु) का मंचन हुआ. गौरतलब है कि यह नाटक उन्होंने करीब बीस साल पहले लिखा, पर अभी तक इसे मंच पर रूपायित नहीं किया गया था. असल में नाट्यकर्मियों के बीच इस नाटक की ख्यातिएक ऐसे नाटक की बन चुकी थी जिसका मंचन मुश्किल था.  

इस मराठी नाटक के केंद्र में एक अभिनेता है जो अपने जीवन, अस्तित्व, संबंधों और मृत्यु को मंच पर प्रस्तुत करता है. अभिनेता विभिन्न मुखौटों में दर्शकों के सामने आता है, पर उनका असली रूप खुद से छिपा रह जाता है. इस नाटक में अभिनेता जीवन के आखिरी क्षणों में अपने जीवन को टटोलता है और दर्शकों के सामने पेश करता है.

चर्चित निर्देशक अतुल पेठे के निर्देशन में अभय महाजन ने इस एकल नाटक को खूबसूरती से प्रस्तुत किया. अपने भाव, भंगिमाओं और संवाद के सहारे अभिनेता और निर्देशक के आपसी संबंधों, टकरावों और रचनात्मक यात्रा से महाजन हमें रू-ब-रू करवाते हैं. नाटक के मंचन के बाद उन्होंने मुझसे कहा, यह एक मुश्किल नाटक है. बीस साल पहले लिखा गया है और इस बीच हमारी आंगिक और वाचिक भाषा दोनों ही बदल गई है....हमारे लिए य़ह नाटक करना एक चुनौती की तरह रहा. एलकुंचवार के नाटकों की विशेषता उनके प्रयोगात्मक शैली में है. सामाजिक-राजनीतिक विषयों  को उठाते हुए इन नाटकों में भाषा की मितव्ययिता अलग से रेखांकित की जाती रही है. अल्पविराम, मौन भी यहाँ मुखर होकर बोलता है. इनके किरदार किसी ओढ़ी हुई भाषा में संवाद नहीं करते हैं! 

इस नाटक में नाटककार ने बहुत सारे रचनाओं (नाटकों, कविताओं) के उद्धरण को समाहित किया है.  इस नाटक का रूप उनके अन्य नाटकों से साफ अलग है. पिछले साल एक बातचीत में एलकुंचवार ने मुझसे कहा था: ‘मेरे सभी नाटक एक-दूसरे से अलग हैं.. हर नाटक के कंटेंट ने ही उसका रूप तय किया है.’

नाटक के शुरूआती दृश्य को बेहद कुशलता से बुना गया है जिसमें नंगे बंदन अभिनेता मृत्यु के क्षणों को रचता है. खुद महाजन का प्रशिक्षण शारीरिक संचालन में है, इस लिहाज से इस नाटक में आंगिक भाषा पर जोर रहा है. मंच पर कोई साज-सज्जा नहीं थी, बेहद कम प्रॉप्स थे. छोटे से सभागार में कहीं-कहीं भाषा मेरे भावबोध में बाधा बनी, पर महाजन का अभियन इतना सधा था कि 70 मिनट का यह नाटक मेरे लिए बोझिल नहीं बना.    

मराठी में जहाँ कमर्शियल थिएटर का अपना एक दर्शक वर्ग है, वहीं प्रायोगिक नाटकों के लिए, सीमित ही सही, पुणे में स्पेस दिखता है. उसके अपने समर्पित दर्शक वर्ग भी है. छियासी वर्षीय महेश एलकुंचवार ने विजय तेंदुलकर (1928-2008) और सतीश आलेकर के साथ मिलकर मराठी रंगकर्म को नई रंगभाषा और मुहावरे दिए हैं. यदि इन तीनों नाटककारों की तुलना पारसी रंगमंच के राधेश्याम कथावाचक, नारायण प्रसाद बेताब और आगा हश्र कश्मीरी से की जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. इन नाटककारों ने पारंपरिक, महाकाव्य को आधार बना कर किए जाने वाले म्यूजिकल नाटकों से अलग सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों से मराठी रंगकर्म को जोड़ा. जिसका असर भारतीय रंगमंच पर गहरा पड़ा.

Sunday, August 02, 2026

दुख की दुनिया के भीतर सपनों का संगीत


पिछले दिनों चर्चित अदाकार नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि उन्होंने जीवन में बेहतरीन नाटक पुणे में देखे. वे श्रीराम लागू राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के शुभारंभ के अवसर पर परेश रावल के साथ बातचीत कर रहे थे. पुणे में शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ मराठी थिएटर की समृद्ध परंपरा रही है, पर यहाँ भारतीय भाषाओं के नाटकों का प्रदर्शन गाहे-बगाहे ही होता रहा है. इस मायने में भारतीय थिएटर के महान कलाकार श्रीराम लागू की याद में इस महोत्सव की शुरुआत बेहद सुखद है.


महोत्सव के दौरान मल्लिका तनेजा का बहुचर्चित सोलो नाटक- ‘डू यू नो दिस सांग’ का मंचन हुआ. यह म्यूजिकल नाटक बेहद भावपूर्ण और सधा हुआ है. इस नाटक में वे दर्शकों को अपनी सांगीतिक यात्रा का सहयात्री बनाती हैं.

‘सो जा रे गुड़िया रे, सपनों की दुनिया में खो जा रे...’, गीत पूरे नाटक का टेक है. मंच पर गुड्डे-गुड़ियों, माइक्रोफोन और हारमोनियम के साथ, अपने गीतों के माध्यम से तनेजा दर्शकों को एक ऐसी दुनिया मे ले जाती है जहाँ विगत स्मृतियाँ हैं, दुख हैं, सपने हैं और उनके खोने की कहानी है. इस नाटक को उन्होंने एक वर्ष तक बहुत सारे स्त्रियों के साथ बातचीत के बाद बुना है. मंच पर वे उस शख्स को तलाशती है, जो खो गई. उसकी आवाज खो गई. गीत गुम हो गए. पर क्यों? कैसे?

इन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश में वह अपने ही अलग-अलग रूपों में ढल जाती है और कभी स्वयं उसी स्त्री का रूप धारण कर लेती है. मल्लिका कहती है: "यह आवाज मंच की आवाज थी, इस दुनिया की आवाज थी. यह मेरे बहुत क़रीब थी, एक ऐसी आवाज जिसे मैंने बेहद प्यार किया और शायद आज भी करती हूँ."

कहानी माँ और बेटी के संवाद के माध्यम से यह मंच पर घटित होता है. यहाँ प्रीत का गीत है, सतरंगी सपने है. बालों में जगुनू सजाने की ख्वाहिश है. रातों को रास्तों पर जाने की ख्वाहिश है. पर यहाँ सदियों से घर की चौखट बड़ी दिखती है, जहाँ से टकराकर स्त्री की आवाज फिर-फिर लौट आती रही है.

गीत-संगीत इस नाटक का सशक्त पक्ष है. कुछ मौलिक रचनाओं के साथ पारंपरिक लोक गीतों का भी इस्तेमाल हुआ है. नाटक के दौरान मल्लिका दर्शकों से ‘वली तू है जमाली, तेरी ही रोशनी में दुनिया होती जमाली/वली तेरे मन में भी कोई न कोई अरमान है क्या/ बोल तू मन की गांठे खोल तू’ पढ़ने कहती है. नाटक शुरु होने से पहले दर्शकों के हाथ में एक पर्चा थमा दिया जाता है और दर्शक अदाकार के साथ-साथ इसे गाते हैं.

यह सहभागिता, सामूहिकता सोशल मीडिया के इस दौर में आभासी नहीं रह जाती है. यहाँ हमें रंगमंच की शक्ति और सौंदर्य का दर्शन एकसाथ होता है. भरे सभागार में मल्लिका अपनी सधी आवाज के सम्मोहन और संवाद अदायगी तथा अनौपचारिक अभिनय से दर्शकों को बांधे रखती है. इसके साथ ही, उनके संग संवाद भी कायम रहता है. जो समकालीन नाटकों में इसे विशिष्ट बनाता है. महोत्सव में असमिया नाटक ‘रघुनाथ’ और हिंदी नाटक ‘होम इन ए सूटकेस’ की भी काफी चर्चा हुई.