Sunday, September 22, 2019

विश्व सिनेमा में भारतीय फिल्में


ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार ‘द गार्डियन’ के लिए फिल्म समीक्षकों ने इस सदी की विश्व की बेहतरीन सौ फिल्मों की एक सूची बनायी है, जिसमें भारत से ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ को भी जगह मिली है. अनुराग कश्यप निर्देशित दो भागों में बनी इस फिल्म को दर्शकों और भारतीय सिनेमा के अध्येताओं, समीक्षकों ने भी खूब सराहा था. द गार्डियन ने इसे चर्चित गैंगस्टर फिल्म ‘द गॉडफादर’ के टक्कर का भारतीय सिनेमा कहा है.

पिछले दो दशकों में बॉलीवुड का जोर नाच-गानों, पॉपुलर फॉर्मूला से इतर एक सार्थक सिनेमा गढ़ने पर है. इसी दौर में निर्माता-निर्देशकों का एक ऐसा वर्ग उभरा है, जिनका उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक रूप से ऐसे विविध विषयों को परदे पर परोसना रहा, जो दर्शकों को उद्वेलित करे. इन फिल्मों में ‘मेलोड्रामा’ का पुट तो है, लेकिन समकालीन भारतीय समाज का यथार्थ भी साथ लिपटा हुआ परदे पर आता है. हिंदी सिनेमा में मनोरंजन के साथ यथार्थ का पुट हमेशा से ही दर्शकों और समीक्षकों को पसंद आता रहा है. पचास के दशक में बनी दो बीघा जमीन, जागते रहो, मदर इंडिया, प्यासा ऐसी ही फिल्में थीं.

इन दिनों निर्माता-निर्देशकों की एक प्रमुख प्रवृत्ति भूमंडलीकरण के इस दौर में फिल्मों में स्थानीयता का आग्रह है. स्थानीय जमीन पर विकसित होकर ही ये भारतीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच रही है. राजकुमार हिरानी, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप, दिबाकर बनर्जी, हंसल मेहता आदि ऐसे ही फिल्मकार हैं. फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में भी धनबाद के इर्द-गिर्द कोयला माफियाओं का जीवन है.

कोई भी सूची अंतिम नहीं होती. और जाहिर है, इस बात पर हमेशा बहस की गुजांइश रहती है कि कोई फिल्म छूट गयी और कौन सी जगह पायी. ऐसा नहीं है कि इन दो दशकों में हिंदी फिल्मों को ‘मिलेनियल पब्लिक’ ने नहीं सराहा है या समीक्षकों ने चर्चा नहीं की. राजकुमार हिरानी की ‘थ्री इडिएट्स’, ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’, विशाल भारद्वाज की ‘मकबूल’, ‘ओंकारा’, अनुराग कश्यप की ‘देव डी’, ‘ब्लैक फ्राइडे’, दिबाकर बनर्जी की ‘खोसला का घोंसला, ‘ओए लकी, लकी ओए’, हंसल मेहता की ‘शाहिद’, ‘अलीगढ़’ आदि ऐसी ही कुछ फिल्में हैं, जिन्होंने पिछले दो दशक में हिंदी सिनेमा को नया आयाम दिया है.

किसी भी उत्कृष्ट कला की तरह सिनेमा की पहचान भी समय के निकष पर ही होती है. सत्यजीत रे की फिल्मों की समीक्षा, आलोचना आज भी होती है. प्रसंगवश रे ने वर्ष 1948 में ‘भारतीय फिल्मों के साथ समस्या क्या है?’ लेख में लिखा था- ‘सिनेमा का उपजीव्य खुद जीवन ही है. यह अविश्वसनीय है कि जिस देश ने पेंटिंग, संगीत और कविता को इतना ज्यादा प्रेरित किया, वह सिनेमा बनानेवालों को उद्वेलित ना करे.’ इसे कुछ इस तरह से भी पूछा जा सकता है कि आजादी के 70 साल बाद भी क्या कारण है कि आर्थिक और तकनीक रूप से सक्षम भारतीय सिनेमा विश्व सिनेमा की ऊंचाई छूने में असफल है? जबकि, तथ्य यह है कि भारत में प्रति वर्ष सबसे ज्यादा फीचर फिल्मों का निर्माण होता है.

सवाल यह भी है कि पिछले दो दशकों में महज एक फिल्म ही क्यों इस लिस्ट में 59वें स्थान पर जगह बना पायी? सच तो यह है कि अनुराग कश्यप ने सिनेमा निर्माण की जिस ऊंचाई को इस फिल्म में पाया है, उसे फिर से वे दोहरा नहीं सके हैं. इस बात को खुद उन्होंने स्वीकारा भी है. विश्व स्तर पर भारतीय सिनेमा की जहां उत्कृष्ट कला के रूप में चर्चा होती है वहां सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन की फिल्मों और समांतर सिनेमा के दौर में बनी मणि कौल, कुमार साहनी, श्याम बेनेगल, अदूर गोपालकृष्णन की फिल्में ही होती हैं. बाकी बॉलीवुड की फैक्ट्री से निकली फिल्में फुटनोट में भी शामिल नहीं होतीं. ऐसा क्यों है? इस सवाल का जवाब बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशक ही दे सकते हैं, यदि वे अपनी कला के प्रति ईमानदार हैं.

(प्रभात खबर, 22 सितंबर 2019)

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