Sunday, November 14, 2021

एक बीता-रीता सा कैफे

पिछले दिनों एक मित्र के साथ कनॉट प्लेस गया. दीवाली के दौरान जो भीड़ होनी चाहिए वह गायब थी. कुछ रीता-रीता सा माहौल था. खरीदारों को देख कर ऐसा लगता था कि जैसे कि वह कह रहे हों-बाजार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ.

कुछ दुकानें भले बंद दिख रही थी, पर अधिकांश खुली थी. मैं करीब दो साल बाद वहाँ गया था. ऐसा नहीं कि इस बीच मैं बाजार नहीं गया पर सच पूछिए तो कोरोना के दौरान ऑनलाइन खरीदारी की आदत सी हो गई. घर के नजदीक मॉल जाना ज्यादा आसान लगा. यह अनायास नहीं है कि इन दिनों एक विज्ञापन में छोटे-छोटे, आस-पड़ोस के दुकानदारों से इस दीवाली खरीदारी की अपील करते हुए एक चर्चित अभिनेता दिख रहे हैं.

करीब पच्चीस साल से दिल्ली में हूँ. कॉलेज के दिनों से ही कनॉट प्लेस में खूब तफरीह किया है, लेकिन उस दिन ऐसा लग रहा था कि हम सैलानी बन कर वहाँ घूम रहे हैं. कोरोना महामारी के दौरान दिल्ली में होकर भी दिल्ली में  नहीं होने का ख्याल अधिकांश लोगों  के मन में रहा. अभी भी ऐसा लग रहा है कि लोगों में सुरक्षा को लेकर एक भय है. हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में कोरोना महामारी अब एंडेमिक फेज’ की तरफ बढ़ने लगी है. पिछले दिनों दिल्ली में बच्चों के लिए भी स्कूल खोल दिए गए हैं. एक मित्र से जब इसे लेकर बातचीत हो रही थी तब वह सशंकित दिख रही थी. लगभग दो साल बाद स्कूल में खुद को पाकर बच्चों के मन में किस तरह के भाव उठेंगे यह जानना रोचक होगा.

बहरहाल, उस दिन हमने  कनॉट प्लेस स्थित बड़े ब्रांड के चर्चित कॉफी हाउसों को छोड़, दशकों पुराने मद्रास कॉफी हाउस की ओर रुख किया. इन वर्षों में दिल्ली में बड़े-बड़े मॉल आए, आधुनिक साज-सज्जा से लैस कॉफी हाउस शहर के कोने-कोने में उभरे पर नामी रेस्तरां के बीच मद्रास कैफे अपनी ठसक के साथ आज भी मौजूद है. गौरतलब है कि दक्षिण भारत में जैसा कॉफी पीने का रिवाज रहा हैवैसा उत्तर भारत में नहीं. वैसे तो 17वीं सदी में ही कॉफी अपने हमसफर चाय के साथ भारत में दस्तक दे चुका था. 19वीं सदी के आखिर में दक्षिण भारत में इसकी खपत बढ़नी शुरू हुई. इससे पहले यह यूरोपीय लोगों का ही पेय था और 20वीं सदी के आते- आते यह दक्षिण भारतीय मध्यवर्ग का पसंदीदा पेय बन गया. हालांकिउदारीकरण के बाद उत्तर भारत में भी कॉफी की खपत ने जोर पकड़ा है. खासकर महानगरों के युवाओंकामकाजी लोगों में कॉफी पीना सांस्कृतिक दस्तूर में शामिल हो गया है.

पश्चिमी देशों में कॉफी पीने की संस्कृति आज भी कायम है और इसके ऐतिहासिक कारण है. अखबारोंपत्र-पत्रिकाओं की तरह ही सार्वजनिक जीवन (पब्लिक स्फीयर) में इन कॉफी हाउस की महत्वपूर्ण भूमिका है. लोकतंत्र में ये राज्य और नागरिक समाज के बीच एक पुल की भूमिका निभाते रहे हैं. भारत के विभिन्न शहरों में स्थित कॉफी हाउस में भी राजनीतिकों से लेकर साहित्यकारों और पत्रकारों के बीच बहस-मुबाहिसों के कई किस्से हैं.

जाहिर है वर्ष 1935 में  खुले इस औपनिवेशिक काल के कैफे के साथ कई किस्से जुड़े हैं. बिना किसी तड़क-भड़क और दिखावे के किफायती दाम पर कॉफी पीने और इडली-सांभर, मसाला-डोसा खाने का यहाँ अपना मजा है. बीते जमाने का स्वाद इससे लिपटा चला आता है. इसे शंघाई रेस्तरां के रूप में शुरु किया गया जो ब्रितानी सैनिकों का अड्डा था. ऐसा लगता है कि विदेशी सैलानियो के लिए यह अभी भी पसंदीदा जगह है.  कैफे के गेट के पास चिपके सैकड़ों छोटे-छोटे चिठ्ठे इस बात को बयां करते हैं कि क्यों तमाम कॉफी हाउस के मुकाबले पुराने फर्नीचर और मद्धिम रोशनी में डूबा यह बीता-रीता सा कैफे उनकी पसंद में शामिल है. उस दिन कैफे में भीड़ नहीं थी. कुछ युवतियाँ वहाँ सेल्फी लेती हुई दिख रही थी. बाहर की दुनिया से बेखबर ऐसा लग रहा था कि समय यहाँ ठहर गया है.

कोरोना काल में सबसे ज्यादा मार छोटे दुकानदारों पर पड़ी है. खास कर रेस्तरां और होटल उद्योग इससे खूब प्रभावित हुए. ऐसे में समय के थपेड़ों को झेल कर खड़ा मद्रास कैफे जैसी दुकानों का हमारे बीच होना सुकून देता है. ऐसा लगता है कि सब कुछ खोने के बाद भी बहुत कुछ बचा रह जाता है!

(न्यूज 18 हिंदी के लिए, 8 नवंबर 2021)


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