इस डॉक्यूमेंट्री के लिए निर्देशक लाउरा पॉयट्रैस और मार्क ओबेनहाउस पिछले बीस साल से 88 वर्षीय हर्श के पीछे पड़े थे. जैसा कि हम जानते हैं खबरों के पीछे रहने वाला खबर होने से हमेशा बचना चाहता है. हर्श के नाम कई ऐसी खबरें रही है जिसने अमेरीकी सत्ता को लोकहित के सामने झुकने को मजबूर किया है. हर्श उन घटनाओं का विवरण देते हैं.
वियतनाम युद्ध के दौरान माई लाय नरसंहार को उजागर कर हर्श ने सुर्खियाँ बटोरी थी, जिसके लिए उन्हें प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार (1970) से नवाजा गया. इस नरसंहार में अमेरिकी सेना ने बर्बर तरीके से महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया था और इसे आम लोगों की नजर से छिपा कर रखा. हर्श की रिपोर्ट के बाद अमेरिकी जनता वियतनाम युद्ध के विरोध में सड़कों पर उतर आई.
बाद में ‘वाटरगेट स्कैंडल’, इराक युद्ध के दौरान अबू गरीब जेल में अमेरीकी सेना की ज्यादतियों सहित उनके कई रिपोतार्ज ने अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों में खलबली मचा दी थी.
बहरहाल, यह डॉक्यूमेंट्री जितना हर्श के पत्रकारीय जीवन वृत्त को ऑडियो-वीडियो फुटेज के माध्यम से सामने लाती है उतनी ही अमेरिकी पत्रकारिता के एक दौर और दुरभिसंधियों को भी. एक जगह हर्श कहते हैं ‘अमेरिकी इतिहास लिखना कितना मुश्किल है’. पत्रकारिता का वर्तमान भविष्य का इतिहास बनता है यदि तथ्यों के प्रति हम जागरूक और सत्यनिष्ठ रहे. एक तरफ सूचना और संवाद करने की जिम्मेदारी पत्रकारों की है, वहीं पत्रकारिता सामाजिक-सांस्कृतिक उत्पाद भी है. हर्श कहते हैं कि ‘हमारी संस्कृति अत्यधिक हिंसक है. ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसा हमारे घर में हो और हम दूसरी तरफ नज़र फेर लें’. पर दुर्भाग्य से आज ऐसी कई खबरें हमारे सामने से गुजर जाती है जिसकी तह में जाने की जहमत मीडियाकर्मी नहीं उठाते. सत्ता के सच को ही ‘सूत्रों के हवाले’ से पाठकों, दर्शकों के सामने परोस देते हैं.
इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से हम यह भी देखते हैं कि किस तरह अमेरिकी जनता का एक हिस्सा हर्श को उनकी सच्चाई के लिए नापसंद करता रहा. पर हर्श सत्ता से बेलाग सच कहने से हिचके नहीं. पोस्ट-ट्रुथ के इस दौर में भी लोग ‘सत्य’ को तथ्य के आधार पर नहीं बल्कि अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर जाँचते-परखते हैं.
उम्र के इस पड़ाव पर भी सक्रिय, इस डॉक्यूमेंट्री में बेहद संक्षिप्त लेकिन हर्श के निजी जीवन से भी दर्शकों का साक्षात्कार होता है.

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