Sunday, September 20, 2026

मिथिला की चित्रकला

 

पिछले कुछ वर्षों से अशोक कुमार सिन्हा मिथिला चित्रकला को लेकर लगातार लेखन कर रहे हैं. हाल ही में उनकी लिखी किताब मिथिला चित्रकला: रंगो और रेखाओं का सफरप्रकाशित हुई है जिसमें वे इस कला की शैलियों, जैसे कोबहर, अरिपन, गोदना आदि का विस्तार से वर्णन करते हैं. साथ ही इस कला के इतिहास और विशेषताएँ को सहज भाषा में प्रस्तुत करते हैं.

मिथिला चित्रकला पिछले कुछ वर्षों में मधुबनी आर्ट के रूप में देश-विदेश में चर्चा में बनी रही है. मिथिला या मधुबनी चित्रकला?’ शीर्षक लेख में वे लिखते हैं कि मधुबनी सिर्फ एक जिला है, जबकि यह कला ऐतिहासिक मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी हुई है. सदियों से मिथिला की महिलाएँ  अरिपन, कोहबर, मछली, साँप, सूर्य, चंद्र आदि दीवारों पर उकेरती रही हैं. पर 1960 के दशक में (1964-65) आए अकाल ने इस कला को मिथिला से बाहर  पहुँचाया. औपचारिक शिक्षा से वंचित और बिना किसी नेटवर्क के जगदंबा देवी, गंगा देवी, सीता देवी, महासुंदरी देवी, गोदावरी दत्त, बौआ देवी जैसी कलाकार इसे देश-विदेश लेकर गईं. गंगा देवी, जगदंबा देवी और महासुंदरी देवी जहाँ कचनी (लाइन) शैली में सिद्धहस्त थीं, वहीं सीता देवी, बौआ देवी भरनी शैली में. हालांकि बाद के दशकों में दलित कलाकारों के दख़ल से इस शैली में विस्तार आया और गोदना शैली भी इससे जुड़ गई.

एक परंपरा के रूप में लोक में कोहबर और अरिपन लिखने की कला सदियों पुरानी है. पिछले दशकों में समकालीन विषय-वस्तु भी इस कला का आधार बने हैं. साथ ही पहले जहाँ लोक में उपलब्ध प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था वहीं अब एक्रेलिक रंगों का प्रयोग होने लगा है. दीवार से उतर कर ये चित्र कागज, कपड़ा और विभिन्न वस्तुओं पर अपना रूप ग्रहण करने लगे हैं. देश और विदेश के विभिन्न भागों में आज अनेक मिथिला कलाकार अपनी कूची में रंग भर रहे हैं.

इस किताब में विस्तार से कचनी, भरनी, तांत्रिक, गोदना शैली का जिक्र है. विभिन्न शैलियों को निरूपित करते हुए किताब में शामिल चित्र पाठकों को इस चित्र शैली के कला पक्ष को अच्छे से स्पष्ट करते हैं. कलाकारों के साथ-साथ जिन विभूतियों ने मिथिला कला को देश-दुनिया में प्रतिष्ठा दिलाने में योगदान दिया, मसलन, विलियम आर्चर, ललित नारायण मिश्र, भास्कर कुलकर्णी, टोकियो हासेगावा आदि पर भी लेखक ने टिप्पणी दी है.

सामान्य पाठकों के लिए लिखी गई यह किताब परिचयात्मक है. चित्रों का इस्तेमाल इसे पठनीय बनाता है, हालांकि चित्रकारों का नाम नहीं होना खटकता है.

किताब: मिथिला चित्रकला (रंगों और रेखाओं का सफर)

लेखक: अशोक कुमार सिन्हा

प्रकाशक: क्राफ्ट चौपाल, पटना

मूल्य: 500



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