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Saturday, May 08, 2021

बहुत कठिन समय है साथी

पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान टेलीविजन के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि हम उम्मीद करें कि कोई साहित्यकार हमारे समय की त्रासदी को शब्द देगा.  साहित्य शब्दों के जरिए मानवीय भावों, प्रेमहिंसा, सुख-दुखपीड़ात्रासदियों को वाणी देता रहा है. यही वजह है कि कोरोना महामारी के दौरान अल्बैर कामू के चर्चित उपन्यास-प्लेगकी बार-बार चर्चा होती रही है. लोग इस महामारी को ‘प्लेग’ के मार्फत समझने की कोशिश करते दिखे. प्रसंगवशइस उपन्यास में एक पात्र रेमंड रैंबर्ट पत्रकार के रूप में मौजूद हैं!

साहित्य भोगे हुए जीवन को रचता हैपर वह जीवन नहीं है. और कोई भी कहानी जीवन से बढ़ कर नहीं हो सकती है. हालांकि कोरोना महामारी के दौरान खबरनवीस अपनी जान पर खेल कर भी खबर दे रहे हैंहमें इस आपदा की कहानियों से रू-ब-रू करवा रहे हैं. महामारी से लड़ने में जनसंचार की अहमियत और केंद्रीयता को सब स्वीकार करते हैं. सही सूचनाएँ जहाँ आम लोगों की दुश्चिंताएँ कम करती हैंवहीं दुष्प्रचार लोगों की परेशानियाँ बढ़ाने का कारण बनते हैं. जनसंचार के माध्यमों का इस्तेमाल जिस रूप में कोरोना महामारी के दौर में हो रहा है उसका सम्यक अध्ययन अभी बाकी है.

बहरहाल, ऐसा लगता है समकालीन घटनाक्रम को संवेदनशील ढंग से सामने रखने के लिए साहित्य पर्याप्त नहीं होता. आधुनिक समय में इसके लिए मीडिया माकूल है. यहाँ पर यह जोड़ना उचित है कि पारंपरिक मीडिया के अलावे सोशल मीडिया की भी इसमें प्रमुख भूमिका है. सूचना क्रांति के बाद मीडिया के अभूतपूर्व प्रसार ने छोटे शहरोंकस्बों और गाँवों को भी केंद्र से जोड़ दिया है. आज हम सब एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हैं. साथ ही तकनीकी ने देश और काल के फासले को कम कर दिया है. यही वजह है कि दिल्ली में बैठा हुआ कोई शख्स दरभंगा में किसी जरूरतमंद को मदद पहुँचा पा रहा है. दिल्ली में बैठा हुआ कोई पत्रकार अमेरिका या लंदन में बैठे महामारी और लोक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बिना किसी दिक्कत के सलाह-मशविरा करने में कामयाब हैं. इस आपदा ने संपूर्ण मानवता को जिस तरह प्रभावित किया है और संचार तकनीकी का इस्तेमाल कर जिस रूप में इससे लड़ा जा रहा हैमीडिया गुरु मार्शल मैक्लूहन की ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा प्रासंगिक हो उठती है. इस महामारी में मानवीय त्रासदी को हम-सब एक-साथ देख रहे हैंभोग रहे हैं. एक अनिश्चितता और भय सब तरफ व्याप्त है. पर जैसा कि वीरेन डंगवाल ने लिखा हैहर दौर कभी तो खत्म हुआ ही करता है/ हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है.

कोराना महामारी की विचलित करने वाले दृश्य (तस्वीरें) हमारी संवेदना को झकझोरने में, उद्वेलित करने में प्रभावी हैं. सड़कों परअस्पतालों मेंघरों में बेबसी की तस्वीरें मुख्यधारा और सोशल मीडिया के हवाले से हमारी चेतना का अंग बनी है और हम एक-दूसरे के दुख और शोक में शरीक हैं.

इस महामारी में पिछले साल लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की जो तस्वीरें मीडिया के माध्यम से आईंवे महाकाव्यात्मक पीड़ा लिए हुए थी. इन तस्वीरों ने देखने के हमारे नजरिए को बदल कर रख दिया. यह पीड़ा के साथ-साथ मानवीय जिजीविषाकरुणा और संघर्ष की तस्वीरें भी थी. साथ ही सामूहिकता और मानवीय सहयोग की सहज तस्वीरें हम इस आपदा में देख रहे हैं. मीडिया इन दृश्यों के माध्यम से पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ रहा है.

कोरोना महामारी के दूसरे वेव में जब प्रतिदिन संक्रमित लोगों की संख्या चार लाख के करीब है और हताहतों की संख्या चार हजारकई पेशेवर पत्रकार भी इससे संक्रमित हो रहे हैं. एक आंकड़ा के मुताबिक पूरे देश में कोराना महामारी से अब तक करीब सौ पत्रकारों ने अपनी जान गंवाई है. कई पत्रकार आज इस वायरस से संक्रमित हैं. पेशे के प्रति अपनी दीवानगी में कुछ पत्रकार इस हालत में भी लोगों के लिए हरसंभव सहायता करते दिखे हैं. सत्ता को कटघरे में खड़े करने में नाकामी और सरकार से सही समय पर सवाल नहीं पूछने की वजह से मीडिया की आलोचना अपनी जगह सही हैपर निस्संदेह जब भविष्य में पत्रकारिता और इस महामारी का इतिहास लिखा जाएगा इसे भी नोट किया जाएगा.

इन सबके बीच देर से ही सही उत्तर प्रदेशबिहारपंजाबपश्चिम बंगाल जैसे अनेक राज्यों ने पत्रकारों को भी महामारी से लड़ने में फ्रंटलाइन वर्कर्स माना है. इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए.

(नेटवर्क 18 हिंदी वेबसाइट पर प्रकाशित)

Thursday, May 07, 2020

इंफोडेमिक से लड़ाई: कोरोना महामारी


कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम को लेकर दुनिया भर में युद्ध स्तर पर कोशिश की जा रही है. इस वायरस के वैक्सीन की खोज भी जारी है. हालांकि  'लॉकडाउनके  बीच समाज में सूचनाओं का जाल भी चारों ओर फैला हुआ है. सही सूचनाएँ जहाँ आम लोगों की दुश्चिंताएँ कम करती हैंवहीं इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से फैलने वाले दुष्प्रचार लोगों की परेशानियाँ बढ़ाने का कारण बनते हैं. इस महामारी से बचाव के लिए जहाँ विशेषज्ञों की टीम के माध्यम से सही सूचनाएँ लोगों तक पहुँचती है, वहीं बेबुनियाद और अवैज्ञानिक समाधान से भी सूचना संसार अंटा पड़ा है. साथ ही, हाल ही में जिस तरह से लॉकडाउन के बीच कई जगहों पर प्रवासी कामगारों की भीड़ उमड़ीवह चिंताजनक है. इसी तरह से दुष्प्रचारफेक न्यूज की वजह से लोगों में समान खरीद कर घरों में जमा करने की होड़ भी दिखी. सामाजिक सौहार्द के बदले इस महामारी को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश भी मीडिया के कुछ हिस्से में देखने को मिला है.

कोरोना महामारी के बीच इस तरह के दुष्प्रचार को इंफोडेमिक’ कहा जा रहा है. शब्दकोष में यह शब्द अभी जगह नहीं पा सका हैपर वर्ष 2002-3 में सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिन्ड्रोम (सार्स) वायरस के फैलने के दौरान पहली बार इस शब्द की चर्चा हुई थी.  शाब्दिक अर्थ में इसे सूचना महामारी’ कह सकते हैं- सूचनाओं की अधिकता जो दुष्प्रचारअफवाह की शक्ल लेती है. महामारी से लड़ने मेंसमाधान ढूंढ़ने में यह बाधा बन कर खड़ी हो जाती है.  लोगों में भय का संचार भी इससे होता है. मानवीय भय और असुरक्षा के बीच सही सूचनाएँ एकजुटता को बनाए रखती हैंजो इस महामारी से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने हाल में कहा कि हमारा साझा दुश्मन कोविड-19 हैलेकिन दुष्प्रचार के माध्यम से जो इंफोडेमिक’ फैला है वह भी दुश्मन है.’ इसी बात को डब्लूएचओ के महानिदेशक टेडरोस गेब्रेयसस ने भी कहा कि हम ना सिर्फ महामारी से लड़ रहे हैं बल्कि इंफोडेमिक से भी लड़ रहे हैं.’ असल में लोगों का विश्वास हासिल कर ही सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियाँ इस महामारी के रोकथाम का उपाय कर सकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने संबोधन में नागरिकों से सहयोग की बार-बार अपील की है.

समाज के विकास की अवस्था के साथ ही संचार की तकनीकी और माध्यम का भी विकास होता रहा है. औपनिवेशिक शासन के दौरान  रिसालेहरकारेडाकभाट आदि खबरोंसूचनाओं के प्रसार का माध्यम होते थे. फिर अखबारों की दुनिया से गुजरते हुए हमारा समाज रेडियो और टेलीविजन जैसे जनसंचार के माध्यम तक पहुँचा.  भूमंडलीकरण के साथ हम एक बड़े सूचना समाज का हिस्सा बन गए हैं. समकालीन समाज में सूचना और तकनीक हमारे जीवन का अंग है. इंटरनेट के माध्यम से फैली सोशल मीडिया हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है. पिछले दशक में जिस तेजी से सोशल मीडिया की पहुँच बढ़ी है वह अखबारटेलीविजन जैसे मीडिया के मुकाबले अप्रत्याशित कही जा सकती है.

प्रसंगवशइतिहासकार रंजीत गुहा ने एक अध्ययन में नोट किया है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान  किसान विद्रोहों और सिपाही विद्रोह को सत्ता सरकारी कागजातों में महामारी’ के रूप में देख रही थी. यहाँ महामारी सत्ता के नजरिए से एक अलग अर्थ की व्यंजना करती हैजिसमें किसानों की सामूहिक उद्यमों की नकार है. वे लिखते हैं कि इन विद्रोहों के प्रसार में अफवाहों की एक बड़ी भूमिका थी. उस समय में हमारे समाज में शिक्षा का प्रसार बेहद कम था और खबरों के प्रसार की गति बहुत ही धीमी थी. वर्तमान समय में इंटरनेट के माध्यम से पलक झपकते ही सूचनाएँ मीलों की दूरी तय कर लेती है. जाहिर है खबर की शक्ल में मनगढंत बातेंदुष्प्रचारअफवाह आदि समाज में पहले भी फैलते रहते थे. पर उनमें और आज जिसे हम फेक न्यूज समझते हैंबारीक फर्क है. 

ऐसी खबर जो तथ्य पर आधारित ना हो और जिसका दूर-दूर तक सत्य से वास्ता ना हो फेक न्यूज कहलाता है. इस तरह की खबरों की मंशा सूचना या शिक्षा नहीं होता है बल्कि समाज में वैमनस्य फैलानालोगों को भड़काना होता है. लोगों के व्यावसायिक हित के साथ-साथ राजनीतिक हित भी इससे जुड़े होते हैं. समाज में तथ्यों के सत्यापन की संस्कृति का अभाव भी इसके लिए जिम्मेदार है.

सच यह है कि  कोई भी तकनीक इस्तेमाल करने वालों पर निर्भर करती है. दुष्प्रचार फैलाने का जिम्मा भी उन्हीं लोगों पर हैजो तकनीक का इस्तेमाल संचार के लिए कर रहे हैं. 

इंफोडेमिक के लिए सोशल मीडिया जैसे माध्यमों के सिर दोष मढ़ा जा रहा है. पर  लॉकडाउन’ के बीच घर से काम करने के दौरानस्कूली शिक्षा के लिए सूचना की नई तकनीक और सोशल मीडिया मुफीद साबित हो रहे हैं. साथ ही अखबार और टेलीविजन जैसे पारंपरिक जनसंचार के माध्यमों से जुड़े पत्रकार इंटरनेट के प्लेटफार्म का इस्तेमाल खबरों के संग्रहण और प्रसारण में कर रहे हैंजो एक हद तक दुष्प्रचार को रोकने में सहायक है.

(प्रभात खबर, 7 मई 2020)