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Thursday, August 07, 2008

'ग़ैरफ़िल्मी संगीत के लिए जगह कम है'

अपने पहले एलबम 'रब्बी' और 'बुल्ला की जाणा मैं कौन' गाने से चर्चा में आए युवा गायक और संगीतकार रब्बी शेरगिल एक बार फिर से चर्चा में हैं.
एक तरफ़ साप्रंदायिक उन्माद और 'भारतीय समाज के सच' पर चोट तो दूसरी ओर प्रेम की टीस को व्यक्त करता उनका दूसरा एलबम 'आवेंगी जा नहीं' हाल ही में रिलीज़ हुआ है.
रब्बी कहते हैं कि बॉलीवुड के संगीत का इतना हो-हल्ला है कि आज उन जैसे संगीतकारों के लिए समाज में कम ही जगह बची है.
रब्बी शेरगिल से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए बातचीत का एक अंश (24 जून 2008) 
बिलक़ीस रसूल और सत्येंद्र दुबे आदि को लेकर जो एलबम में गाना है 'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है', इस गाने के विचार किस तरह आपके मन में आए?सामाजिक मुद्दों को बहुत से लोग अपनी तरह से गीत-संगीत में ढाल रहे हैं. हाल ही में एआर रहमान ने ग़रीबी को लेकर 'प्रे फॉर मी माई ब्रादर' और हंस राज हंस ने 'गर्ल चाइल्ड' को बचाने के लिए एक वीडियो बनाया है.
मैं किसी संस्था से नहीं जुड़ा हूँ. यह महज़ मेरा व्यक्तिगत नज़रिया है अपने आसपास चीज़ों को देखने का, जिसे संगीत के ज़रिए व्यक्त कर रहा हूँ. कैसे एक व्यवस्था उन लोगों को ख़त्म कर रही है जो इसे मदद पहुँचा रहा हैं. मैं इसे ख़ुद से समझना चाहता था.
एक लंबे अर्से के बाद आपका यह एलबम आया है. क्या आपको किसी तरह की परेशानी आई है इसे रिलीज़ करने में?इस तरह के एलबम के लिए बाज़ार में कम, बहुत ही कम जगह बची है. पहले सभी चैनल स्वतंत्र म्यूज़िक बजाते थे. आज के दौर में आपको प्रोमो ख़रीदने पड़ते हैं. रियलटी शो में जाना पड़ता है. आज कोई संगीतकार यदि यह चाहे कि उसके संगीत का प्रोमोशन हो या केवल उसके वीडियो बनाने से काम चल जाए तो ऐसा नहीं हो सकता है. चैनल के साथ आज बहुत से व्यावसायिक कारण जुड़ गए हैं. आज सिर्फ एक-दो लोगों के ग़ैर फ़िल्मी संगीत को जगह दी जा रही है. आज हमारे समाज का पूरी तरह से 'बॉलीवुडीकरण' हो चुका है. आज हमारी संस्कृति बॉलीवुड की संस्कृति हो चुकी है.
क्या आप हिंदी फ़िल्मों में भी संगीत दे रहे हैं?
नहीं. मेरे पास कोई ऐसा कारण नहीं है कि हिंदी फ़िल्मों में संगीत दूँ. मुझे कोई समझौता नहीं करना पड़ रहा है. जब मैं बड़ा हो रहा था तो मुझे जो प्रेरणा मिली वह ग़ैर फ़िल्मी एलबम से मिली. भले ही हिंदी फ़िल्म पॉपुलर कल्चर का बड़ा हिस्सा हो लेकिन मेरे जीवन में इसकी कोई बड़ी भूमिका नहीं रही है.
युवा वर्ग में आप इस तरह के एलबम के लिए कैसी रुचि देखते हैं. क्या उनकी रुचि इस तरह के संगीत में है?लोगों की रूचि बनती-बिगड़ती है समाजिक शक्तियों के कारण. संगीत में रुचि भी समाजिक शक्तियों की वजह से पनपती है या मरती है. पूंजी अपने हिसाब से लोगों की रुचि को अपने पक्ष में मोड़ती है. इसके लिए जनता को हम दोष नहीं दे सकते हैं. यह वही जनता है जिसे कभी बैजू बाबरा और नौशाद का शास्त्रीय संगीत पसंद आता था. आज मीडिया और बॉलीवुड की सांठगाँठ की वजह से लोगों की रुचि विकृत की जा रही है. अख़बार, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सब बॉलीवुड का प्रोमोशन कर रहे हैं. ऐसे में ग़ैर फ़िल्मी संगीतकार किस तरह ज़िंदा रह सकता है.
मैं ऐसे कई प्रतिभावन ग़ैर फ़िल्मी संगीतकारों को जानता हूँ जो किसी तरह से एक-दो शो करके गुज़र–बसर कर रहे हैं.