Showing posts with label jharkhand. Show all posts
Showing posts with label jharkhand. Show all posts

Thursday, August 26, 2021

जे नाची से बाची: रामदयाल मुंडा का मंत्र


पिछले दिनों विश्व आदिवासी दिवस मनाया गया
पर आदिवासी बुद्धिजीवियों की चर्चा कहीं नहीं दिखी. मुख्यधारा के विमर्श में वे अक्सर छूट जाते हैं. आज झारखंड के आदिवासी बुद्धिजीवी रामदयाल मुंडा का 82वां जन्मदिन है. डॉक्टर रामदयाल मुंडा (1939-2011) बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. वे झारखंड आंदोलन के अगुआ थे. उनकी पहुँच देश-विदेश के साहित्यिक- सांस्कृतिक-राजनीतिक मंचों तक सहज रूप में थी. रामदयाल मुंडा की प्रतिष्ठा गुजरातमहाराष्ट्रउत्तर-पूर्वी आदिवासी समाजों में जैसी रहीवैसी बहुत कम आदिवासी बुद्धिजीवियों की रही है. आदिवासी समाज, साहित्यकला और संस्कृति के संदर्भ में उनके योगदान का सम्यक मूल्यांकन अभी बाकी है.

वे अक्सर कहते थे- जे नाची से बाची. आदिवासी संस्कृति उनकी चिंता के केंद्र में था. ढोल-मांदर, नगाड़े के साथ, बांसुरी बजाते हुए उनकी छवि लोगों के जेहन में अभी भी हैउन्हें पद्मश्री के साथ ही संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था. नाची से बाची (2017) नाम से ही झारखंड के डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार मेघनाथ और बीजू टोप्पो ने एक वृत्तचित्र बनाई है जो उनकी जीवन यात्रा और रचनाशीलता को आत्मीयता के साथ हमारे सामने लेकर आती है. झारखंड के त्योहार सरहुल को लोकप्रिय बनाने में उनका खास योगदान रहा है. इस वृत्तचित्र की शुरुआत मुंडा की आवाज में सरहुल के मंत्र से ही होती है. इस फिल्म में राँची के पास दिउड़ी जैसे छोटे से गाँव से अमेरिका तक की उनकी यात्रा को दर्शाया गया हैजहाँ वे पीएचडी के लिए गए और मिनिसोटा विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे थे. अमेरिका से वापस आकर वे राँची विश्वविद्यालय में आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं के निदेशक के रूप में नियुक्त हुए और बाद में इस विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने. विषय-वस्तु के साथ ही फिल्म निर्माण के दृष्टिकोण से भी यह वृत्तचित्र खास है. मुंडा की इस यात्रा में दर्शक भी सहज रूप से साथ हो लेता है.

लगभग तीस साल तक मुंडा के नजदीक रहे मेघनाथ बातचीत में कहते हैं कि एक संस्कृतिकर्मी के रूप में मुंडा औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त थे. वे कहते हैं, “ रामदयाल मुंडा ने आदिवासी नृत्य को मेहमाननवाजी के रूप में किए जाने को हतोत्साहित किया. उन्होंने इसे वैल्यू से जोड़ कर देखा.”  मेघनाथ अखरा (ओपन ऑडिटोरियम) का उदाहरण देते हैं. वे कहते हैं कि आदिवासी अखरा में श्रोता और गाने वालादेखने और नाचने वाला होता है. इसमें परफार्मर और ऑब्जर्वर का सामंती दृष्टिकोण है. देखने वाला यह सोचता है कि कोई मेरे लिए नाच रहा/रही है. उनके सानिध्य में रह कर मैं यह समझा की अखरा में परफार्मर और ऑब्जर्वर की भूमिका अलग-अलग नहीं है. मेघनाथ स्वीकारते हैं कि इस फिल्म में मुंडा के राजनीतिक जीवन का चित्रण नहीं हो पाया है.

हिंदी में रामदयाल मुंडा के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन नहीं दिखता है. डॉक्टर वीर भारत तलवार की किताब झारखंड में मेरे समकालीन (2019) अपवाद हैजिसमें एक लंबा संस्मरणात्मक और विश्लेषणात्मक लेख मुंडा के ऊपर है. इस लेख के शुरुआत में ही तलवार लिखते हैंभारत के आदिवासी बुद्धिजीवों पर जब भी विचार किया जाएगारामदयाल मुंडा का नाम उनके श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों में गिना जाएगा. रामदयाल को सिर्फ आदिवासी बुद्धिजीवी के रूप में नहीं देखना चाहिए. उन्हें भारतीय बुद्धिजीवी के रूप में भी देखा जाना चाहिए. लेकिन झारखंड बुद्धिजीवियों के तो वे सिरमौर ही थे.” असल में तलवार झारखंड आंदोलन में उनके संघर्ष में साथी थे और उनके साथ लंबा संग-साथ रहा था. मुंडा जब अमेरिका में थे तब 70 के दशक में उनके साहित्य को तलवार ने ही प्रकाशित किया था.

आदिवासी भाषा और लिपि के विमर्श के बरास्ते इस लेख में मुंडा का ईमानदार एवँ लोकतांत्रिक चरित्र उभर कर सामने आता है. पर ऐसा नहीं है कि तलवार मुंडा के व्यक्तित्व से मुग्ध या आक्रांत हैं. जहाँ वैचारिक रूप से विचलन दिखता है उसे वे नोट करना नहीं भूलते. पिछले साल हेमंत सोरेन की सरकार ने झारखंड विधानसभा में 'सरना आदिवासी धर्म कोड बिलको पास किया. इसमें आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड का प्रस्ताव है. यह बिल फिलहाल मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास है. यहाँ पर इस बात का उल्लेख जरूरी है कि रामदयाल मुंडा ने आदिवासियों के धर्म के सवाल को अपनी किताबों में गंभीरता से विश्लेषित किया है. वे आदिवासियों को हिंदू नहीं मानते थे. सत्ता के द्वारा आदिवासियों के ऊपर हिंदू धर्म थोपने के खिलाफ थे.

आदिवासियों की अस्मिता के सवाल को उठाते हुए हालांकि तलवार नोट करते हैं- यह अजीब बात है कि मुंडाओं के पूर्वजों को हिंदू ऋषियों-मुनियों से जोड़ने के लिए एक ओर वे सागू मुंडा की आलोचना कर रहे थेदूसरी ओर खुद अपने लेख में यही काम कर रहे थे.’ मुंडा अमेरिका से उच्च शिक्षा प्राप्त बुद्धिजीवी और संस्कृतकर्मी थेजिनमें राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी. पर जैसा कि तलवार ने लिखा है उनका विकास एक जननेता के रूप में कभी नहीं हुआ. मुंडा आखिरी दिनों में कांग्रेस के सहयोग से राज्यसभा के सदस्य बने थे. तलवार क्षोभ के साथ लिखते हैं- राजनीतिक सत्ता हासिल करने के मोह में रामदयाल ने अपने जीवन की जितनी शक्ति और समय को खर्च कियाअगर वही शक्ति और समय उन्होंने अपने साहित्य लेखन और सांस्कृतिक क्षेत्र के कामों में लगाया होता-जिसमें वे बेजोड़ थे और सबसे ज्यादा योग्य थे-तो आज उनकी उपलब्धियाँ कुछ और ही होती. एक बुद्धिजीवी हमेशा प्रतिरोध की भूमिका में रहता है और उसकी पक्षधरता हाशिए पर रहने वाले उत्पीड़ित-शोषित जनता के प्रति रहती है. राजनीतिक सत्ता एक बुद्धिजीवी को बोझ ही समझती है और इस्तेमाल करने से नहीं चूकती. 

तलवार राम दयाल मुंडा की भाषाई संवेदना और समझ को उनके समकालीन अफ्रीकी साहित्य के चर्चित नाम न्गुगी वा थ्योंगो के बरक्स रख कर परखते हैं और पाते हैं कि जहाँ न्गुगी अंग्रेजी को छोड़ कर अपनी आदिवासी भाषा की ओर मुड़ गए थेवहीं मुंडा मुंडारी भाषा में लिखना शुरु किया, ‘धीरे धीरे अपनी भाषा छोड़कर हिंदी की ओर मुड़ते गए.’  यह बात वृहद परिप्रेक्ष्य में अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों पर भी लागू होती है जो प्रसिद्धि और पहुँच के लिए अंग्रेजी पर अपनी नजरें टिकाए रहते हैं.

आज रामदयाल मुंडा के नाम पर झारखंड में कई आयोजन रहे हैं जिसमें उनकी प्रतिमा का अनावरण भी शामिल है. इन प्रतीकात्मक आयोजनों से अलग जरूरत इस बात की है कि मुंडा ने लेखन और सांस्कृतिक कर्म के द्वारा जो अलख जगाया उसे दूर तक पहुँचाया जाए, उनके कार्य की सम्यक आलोचना हो. एक बुद्धिजीवी को याद करने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता.


(न्यूज 18 हिंदी के लिए, 23 अगस्त 2021)

Thursday, September 26, 2019

एक एक्टिविस्ट के संस्मरण



हाल ही में अनुज्ञा बुक्सदिल्ली से हिंदी के आलोचक वीर भारत तलवार की किताब प्रकाशित हुई है- झारखंड में मेरे समकालीन. जैसा कि किताब के नाम से स्पष्ट है तलवार ने इस किताब में झारखंड के उन बुद्धजीवियोंराजनीतिककर्मियों के बारे में लिखा है जिनके साथ उन्होंने काम किया थाजो उनके संघर्ष में साथी थे.

अकादमिक दुनिया में आने से पहले तलवार खुद एक राजनीतिक कार्यकर्ता थे.  70 के दशक के में वे झारखंड आंदोलन में शरीक थे. वर्ष 1978 में उनके नेतृत्व में हुआ झारखंड क्षेत्रीय बुद्धिजीवी सम्मेलन का ऐतिहासिक महत्व है. साथ ही उनका लिखा पैंफलेट- झारखंड: क्याक्यों और कैसे?’ एक तरह के अलग झारखंड राज्य आंदोलन के लिए घोषणा पत्र साबित हुआ. वर्ष 1981 में तलवार शोध करने जेएनयूदिल्ली आ गए पर जैसा कि उन्होंने अपनी चर्चित किताब झारखंड के आदिवासियों के बीच: एक एक्टीविस्ट के नोट्स’ (ज्ञानपीठ प्रकाशन2008) में लिखा है-लेकिन झारखंड को इतनी दूर छोड़ आने पर भी झारखंड मुझसे छूटा नहीं. हाथ छूटे तो भी रिश्ते नहीं छोड़े जाते!’ तलवार ने अपनी इस किताब में उन्हीं रिश्तों को याद किया है.

सहज भाषाआलोचनात्मक दृष्टि और संवेदनशीलता इस किताब को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है.  इस संस्मरण किताब में निर्मल मिंजदिनेश्वर प्रसादनागपुरी भाषा के कवि और झारखंड आंदोलन के नेता वी.पी. केशरीलेखक और प्रशासक कुमार सुरेश सिंह और बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रोफेसर डाक्टर रामदयाल मुंडा का व्यक्तित्व और कृतित्व शामिल हैं.  लेकिन यह किताब केवल व्यक्ति-विशेष के साथ बिताए पलों का लेखा-जोखा नहीं है बल्कि यादों के झरोखों से झारखंड के अतीत, वर्तमान और भविष्य की चिंताओं को भी रेखांकित करता है. जैसा कि निर्मल मिंज के ऊपर लिखे अपने लेख में तलवार ने लिखा है- झारखंड आंदोलन सिर्फ अलग राज्य का एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था. यह झारखंड प्रदेश के नव-निर्माण का आंदोलन भी था. यह झारखंडी जनता के मूल्यों और मान्यताओं के आधार पर एक नयी झारखंडी संस्कृति की रचना करने का आंदोलन भी था. यह झारखंडी भाषाओं को उनका अधिकार दिलाने और उनमें साहित्य रचना करने का आंदोलन भी था.’ इस सांस्कृतिक आंदोलन में डॉक्टर मिंज तलवार के सहयोगी बने. इस लेख में मिंज एक मानवतावादीउच्च शिक्षा प्राप्त बुद्धिजीवी के रूप में हमारे समाने आते हैं. 

इसी तरह प्रोफेसर दिनेश्वर प्रसाद को तलवार बेहद आत्मीय ढंग से याद करते हैं. राँची विश्वविद्यालय में उनके निर्देशन में तलवार ने पीएचडी में दाखिला लिया पर आंदोलनकारी व्यस्तताओं के चलते उसे पूरा नहीं कर पाए. हालांकि तलवार के साथ उनके अकादमिक संबंध जीवनपर्यंत रहे. उनकी किताब लोक साहित्य और संस्कृति की चर्चा करते हुए तलवार ने नोट किया है- मिथकों और लोक कथाओं में कल्पना की बहुत अजीबो-गरीब और ऊँची उड़ान होती है. कल्पना की इन अजीबो-गरीब संरचनाओं को समझना और उसका विश्लेषण करना दिनेश्वर जी का सबसे प्रिय विषय था.’ इस लेख के माध्यम से तलवार के व्यक्तित्व पर भी रोशनी पड़ती है. उनमें आत्मालोचन का भाव दिखता है.

इस किताब में शामिल कुमार सुरेश सिंह के ऊपर लिखा लेख बेहद महत्वपूर्ण है. 43 खंडो में प्रकाशित पीपुल ऑफ इंडिया’ प्रोजेक्ट उन्हीं की देख-रेख में संपन्न हुआ था. डॉक्टर सिंह एक कुशल प्रशासक होने के साथ साथ लेखक भी थे. बिरसा मुंडा और उनके आंदोलन पर लिखी उनकी चर्चित किताब द डस्ट स्टार्म एंड द हैंगिग मिस्ट’ को आधार बना कर ही महाश्वेता देवी ने अरण्येर ओधिकार (जंगल के दावेदार) लिखा था. तलवार ने डॉ. सिंह के साथ एक बातचीत के हवाले से लिखा है- उसे पढ़ कर लगता है जैसे किसी ने बाहर-बाहर से देख-सुनकर लिख डाला हो.’  

रामदयाल मुंडा को अमेरिका से वापस राँची विश्वविद्यालय लाने में वही सूत्रधार थे. जब उन्होंने आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं का विभाग खुलवाया तो मुंडा को निदेशक के रूप में नियुक्त किया. सिंह मुंडा को विद्यार्थी जीवन से जानते थे जब वे खूंटी में अनुमंडलाधिकारी थे और उन्होंने समारोह में उन्हें एक कविता सुनाई थी. यह कविता एक नहर पर थीजिसका उद्धाटन खुद सिंह ने किया था - मेरे राजा/कैसी है तुम्हारी यह नहर/पानी कम/और लंबाई हिसाब से बाहर/पटता है केवल एक छोर/ और बाकी/रह जाता ऊसर. तलवार ने लिखा है- डॉ. सिंह इस व्यंग्य पर तिलमिलाने के बजाए उस विद्यार्थी की प्रतिभा और साहस पर मुग्ध थे. और इस किताब में सबसे रोचक और प्रभावी लेख रामदयाल मुंडा के ऊपर  क़रीब 100 पेज का संस्मरण हैजिसमें उनके जीवन और रचनाकर्म का मूल्यांकन भी शामिल है. साथ ही तलवार इस लेख में  झारखंडी भाषासाहित्य और संस्कृति की समीक्षा भी करते चलते हैं. उन्होंने मुंडा को झारखंडी बुद्धिजीवियों का सिरमौर कहा है.  इस लेख में तलवार चर्चित फिल्मकार मेघनाथ और बीजू टोप्पो के निर्देशन में मुंडा के ऊपर बनी एक डॉक्यूमेंट्री नाची से बाची’ को खास तौर पर रेखांकित करते हैं.

तलवार ने मुंडा के साथ अपने संबंधों का काफी विस्तार से किताब में जिक्र किया है. वे मुंडा की पहली पत्नीअमेरिकी नागरिकप्रोफेसर हैजेल लुट्ज़ के साथ अपनी मुलाकात का भी उल्लेख करते हैं, जिनसे मुंडा का तलाक हो गया था. किताब से एक अन्य प्रसंग का जिक्र यहां हम करते हैं:
1983 में मैं मानुषी की संपादक मधु किश्वर के साथ झारखंड आया तो दोपहर बाद मैं और मधु उनसे मिलने मोरहाबादी आए. मधु जनजातीय भाषा विभाग के बाहर सीढ़ियों पर बैठी रही और मैं पास में ही रामदयाल के घर से उन्हें बुला लाया. रामदयालजो शायद दोपहर का भोजन करके आराम कर रहे होंगेवैसे ही सिर्फ धोती पहने नंग-धडंग बदन में जैसे गाँव में आदिवासी रहते हैं-अपने विभाग में आ गए.....उस दिन किसी बात पर मैं मधु किश्वर से नाराज था और उन दोनों की बातचीत से दूर बैठा रहा. उसी मुद्रा में मेरी एक फोटो मधु ने खींच दी जिसमें खाली बदन बैठे रामदयाल भी दिख रहे हैं. वह रामदयाल के साथ एक मात्र फोटो है अन्यथा उन दिनों किसी के साथ फोटो खिंचाने का कभी ख्याल ही नहीं आता था.’ 
लेखक: वीर भारत तलवार

इस लेख में मुंडा का चरित्र उभर से सामने आता है, पर ऐसा नहीं है कि तलवार मुंडा के व्यक्तित्व से मुग्ध या आक्रांत हैं. जहाँ वैचारिक रूप से विचलन दिखता है उसे वे नोट करना नहीं भूलते. आदिवासियों की अस्मिता के सवाल को उठाते हुए तलवार लिखते हैं- यह अजीब बात है कि मुंडाओं के पूर्वजों को हिंदू ऋषियों-मुनियों से जोड़ने के लिए एक ओर वे सागू मुंडा की आलोचना कर रहे थेदूसरी ओर खुद अपने लेख में यही काम कर रहे थे.’ मुंडा अमेरिका से उच्च शिक्षा प्राप्त बुद्धिजीवी और संस्कृतकर्मी थे, जिनमें राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी. पर जैसा कि तलवार ने लिखा है उनका विकास एक जननेता के रूप में कभी नहीं हुआ. मुंडा आखिरी दिनों में कांग्रेस के सहयोग से राज्यसभा के सदस्य बने थे. तलवार क्षोभ के साथ लिखते हैं- राजनीतिक सत्ता हासिल करने के मोह में रामदयाल ने अपने जीवन की जितनी शक्ति और समय को खर्च कियाअगर वही शक्ति और समय उन्होंने अपने साहित्य लेखन और सांस्कृतिक क्षेत्र के कामों में लगाया होता-जिसमें वे बेजोड़ थे और सबसे ज्यादा योग्य थे-तो आज उनकी उपलब्धियाँ कुछ और ही होती.’ साथ ही इसी प्रसंग में तलवार समाज में एक बुद्धिजीवी की क्या भूमिका होनी चाहिए इसे भी नोट करते हैं.

एक बुद्धिजीवी हमेशा प्रतिरोध की भूमिका में रहता है और उसकी पक्षधरता हाशिए पर रहने वाले उत्पीड़ित-शोषित जनता के प्रति रहती है. राजनीतिक सत्ता एक बुद्धिजीवी को बोझ ही समझती है और इस्तेमाल करने से नहीं चूकती. वे राम दयाल मुंडा की भाषाई संवेदना और समझ को उनके समकालनी अफ्रीकी साहित्य के चर्चित नाम न्गुगी वा थ्योंगो के बरक्स रख कर परखते हैं और पाते हैं कि जहाँ न्गुगी अंग्रेजी को छोड़ कर अपनी आदिवासी भाषा की ओर मुड़ गए थेवहीं मुंडा मुंडारी भाषा में लिखना शुरु किया, ‘धीरे धीरे अपनी भाषा छोड़कर हिंदी की ओर मुड़ते गए.’  यह बात वृहद परिप्रेक्ष्य में अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों पर भी लागू होती है जो प्रसिद्धि और पहुँच के लिए अंग्रेजी पर अपनी नजरें टिकाए रहते हैं.

तलवार इस किताब में आदिवासी भाषा और लिपि का विमर्श भी रचते हैं. साथ ही पूरी किताब में आदिवासी साहित्यसमाज पर गहन टिप्पणी भी करते चलते हैं, जो शोधार्थियोंअध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण रेफरेंस बनकर सामने आता है. इस किताब को तलवार की एक अन्य किताब-झारखंड आंदोलन के दस्तावेज (नवारुण प्रकाशन2017) के साथ रख कर पढ़नी चाहिए.

(दी लल्लनटॉप वेबसाइट पर प्रकाशित)