Sunday, February 01, 2026

सत्य की खोज में पत्रकार: सेमोर हर्श


पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई डॉक्यूमेंट्री कवर-अप बेहद प्रासंगिक है. वैसे तो यह वृत्तचित्र चर्चित अमेरिकी खोजी पत्रकार सेमोर हर्श की पत्रकारिता की यात्रा को समेटे है, पर हम इसमें अमेरिका की वर्तमान कारगुजारियों की ध्वनि भी सुन सकते हैं. वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण या ईरान पर हमले की बार-बार चेतावनी के बरक्स यदि हम कवर-अप’ में शामिल दुनिया में अमेरिकी हस्तक्षेप और हिंसा को देखे तो पाते हैं कि एक पत्रकार की नजर में पत्रकारिता लोक सेवा है जिसका काम उन तथ्यों को उजागर करना है जिसे सत्ता आम जनता से छिपाना चाहती है. इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का जुमला राजनीतिक सत्ता के हमेशा काम आता है.

इस डॉक्यूमेंट्री के लिए निर्देशक लाउरा पॉयट्रैस और मार्क ओबेनहाउस पिछले बीस साल से 88 वर्षीय हर्श के पीछे पड़े थे. जैसा कि हम जानते हैं खबरों के पीछे रहने वाला खबर होने से हमेशा बचना चाहता है. हर्श के नाम कई ऐसी खबरें रही है जिसने अमेरीकी सत्ता को लोकहित के सामने झुकने को मजबूर किया है. हर्श उन घटनाओं का विवरण देते हैं.

वियतनाम युद्ध के दौरान माई लाय नरसंहार को उजागर कर हर्श ने सुर्खियाँ बटोरी थी, जिसके लिए उन्हें प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार (1970) से नवाजा गया.  इस नरसंहार में अमेरिकी सेना ने बर्बर तरीके से महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया था और इसे आम लोगों की नजर से छिपा कर रखा. हर्श की रिपोर्ट के बाद अमेरिकी जनता वियतनाम युद्ध के विरोध में सड़कों पर उतर आई.

बाद में वाटरगेट स्कैंडल’, इराक युद्ध के दौरान अबू गरीब जेल में अमेरीकी सेना की ज्यादतियों सहित उनके कई रिपोतार्ज ने अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों में खलबली मचा दी थी.

बहरहाल, यह डॉक्यूमेंट्री जितना हर्श के पत्रकारीय जीवन वृत्त को ऑडियो-वीडियो फुटेज  के माध्यम से सामने लाती है उतनी ही अमेरिकी पत्रकारिता के एक दौर और दुरभिसंधियों को भी. एक जगह हर्श कहते हैं अमेरिकी इतिहास लिखना कितना मुश्किल है’.  पत्रकारिता का वर्तमान भविष्य का इतिहास बनता है यदि तथ्यों के प्रति हम जागरूक और सत्यनिष्ठ रहे. एक तरफ सूचना और संवाद करने की जिम्मेदारी पत्रकारों की है, वहीं पत्रकारिता सामाजिक-सांस्कृतिक उत्पाद भी है. हर्श कहते हैं कि हमारी संस्कृति अत्यधिक हिंसक है.  ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसा हमारे घर में हो और हम दूसरी तरफ नज़र फेर लें’.  पर दुर्भाग्य से आज ऐसी कई खबरें हमारे सामने से गुजर जाती है जिसकी तह में जाने की जहमत मीडियाकर्मी नहीं उठाते. सत्ता के सच को ही सूत्रों के हवाले’ से पाठकों, दर्शकों के सामने परोस देते हैं.

इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से हम यह भी देखते हैं कि किस तरह अमेरिकी जनता का एक हिस्सा हर्श को उनकी सच्चाई के लिए नापसंद करता रहा. पर हर्श सत्ता से बेलाग सच कहने से हिचके नहीं. पोस्ट-ट्रुथ के इस दौर में भी लोग सत्य’ को तथ्य के आधार पर नहीं बल्कि अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर जाँचते-परखते हैं.

उम्र के इस पड़ाव पर भी सक्रिय, इस डॉक्यूमेंट्री में बेहद संक्षिप्त लेकिन हर्श के निजी जीवन से भी दर्शकों का साक्षात्कार होता है. 

Sunday, January 11, 2026

रेडियो सीलोन के सौ साल

रील्स, मीम्स और सोशल मीडिया के इस दौर में रेडियो सीलोन (श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन) की लोकप्रियता का अंदाजा नई पीढ़ी को नहीं है, लेकिन इस स्टेशन से प्रसारित ‘बिनाका गीतमाला’ की यादें पुरानी पीढ़ी के लोगों के जेहन में आज भी है. बिनाका गीतमाला की लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण इसके होस्ट अमीन सायानी थे. आम बोलचाल की हिंदुस्तानी भाषा में उनकी उद्घोषणा: ‘बहनो और भाइयो मैं आपका दोस्त अमीन सायानी, और लेकर आया हूँ आपका पसंदीदा प्रोग्राम, बिनाका गीतमाला’, का श्रोता बेसब्री से इंतजार करते थे.


दक्षिण एशिया के पहले रेडियो स्टेशन, रेडियो सीलोन, के पिछले दिनों (16 दिसंबर) सौ साल पूरे हुए. द्वितीय विश्व यु
द्ध के दौरान ब्रिटिश हकूमत ने जर्मनी और जापान के दुष्प्रचार के खिलाफ इसका खूब इस्तेमाल किया था. बहरहाल, रजत पटल पर सिनेमा से अलग फिल्मी गीत-संगीत का स्वतंत्र अस्तित्व रहा है. इस श्रव्य संस्कृति के निर्माण में रेडियो सीलोन की भूमिका ऐतिहासिक रही. यहाँ से प्रसारित हिंदी फिल्मी गानों की दीवाने लाखों थे. इसाबेल अलोंसो ने अपनी किताब-‘रेडियो फॉर द मिलियंस’ में ठीक ही नोट किया है कि रेडियो सीलोन के माध्यम से बनने वाली ‘फिल्मी संस्कृति’ के आड़े भारत और पाकिस्तान की सरहद नहीं आई, न ही नवनिर्मित राष्ट्र-राज्य की राजनीतिक और भाषाई नीतियाँ ही कारगर हुई.

श्रीलंका की आजादी (1948) के तुरंत बाद सीलोन ने हिंदी भाषा में व्यावसायिक कार्यक्रम की शुरुआत की. श्रव्य माध्यम होने के नाते रेडियो प्रसारण में शब्द और संगीत की केंद्रीय भूमिका रहती है.

वर्ष 1952 में पहली बार ‘गीतमाला’ का प्रसारण हुआ जिसके उद्घोषक थे अमीन सयानी. ‘गीतमाला’ के साथ यहाँ से फरमाइशी गीतों के कार्यक्रम भी प्रसारित होते थे, जिसमें श्रोताओं की भागेदारी होती थी. ‘संगीत सीढ़ी’ (पायदान) के तहत हर हफ्ते गानों की लोकप्रियता तय की जाती थी. करीब चालीस वर्षों (1988 तक) तक यहाँ से ‘गीतमाला’ प्रसारित होता रहा. कई रेडियो क्लब बने, जहाँ पर प्रसारित कार्यक्रमों की चर्चा होती थी.

असल में, आजाद भारत में सरकार की एक नीति ने ऑल इंडिया रेडियो से फिल्मी गानों के प्रसारण पर ग्रहण लगा दिया था. यह ग्रहण 1952 से 1957 तक लगा रहा. अक्टूबर 1952 में जब बी वी केसकर देश के नए सूचना और प्रसारण मंत्री बने तब उन्होंने ऐलान किया कि ‘ये गाने दिनों दिनों अश्लील होते जा रहे हैं और पाश्चात्य देशों की धुनों का कॉकटेल हैं.’ उस समय हर दिन कुछ घंटे विभिन्न रेडियो स्टेशन से फिल्मी गानों का प्रसार होता था. केसकर ने निर्देश जारी किया कि रेडियो स्टेशन से हिंदी गानों का प्रसार नहीं होगा. हिंदी फिल्मी गानों की लोकप्रियता को देखते हुए सिनेमा उद्योग के लिए यह आघात से कम नहीं था. केसकर रेडियो के माध्यम से केसकर शास्त्रीय और सुगम संगीत का प्रसार करना चाहते थे. वे कहते थे कि फिल्म संगीत भारतीय संगीत परंपरा से दूर चला गया है.

इस रोक के बाद फिल्मी गीत-संगीत की तलाश में श्रोताओं ने अन्य रेडियो स्टेशन की खोज शुरू की और रेडियो सीलोन उनका ठौर बना. सरकार को हालांकि झुकना पड़ा और वर्ष 1957 में विविध भारती की स्थापना की गई, जहाँ से फिल्मी गीत-संगीत का प्रसारण ‘पंचरंगी कार्यक्रम’ के तहत शुरू हुआ. वर्ष 1989 से 1994 तक विविध भारती से अमीन सायानी ने बिनाका गीतमाला का प्रसारण किया.