पिछले दिनों कान फिल्म समारोह के क्लासिक खंड में जॉन अब्राहम की मलयालम फिल्म अम्मा अरियान (1986)’ दिखाई गई. चालीस साल पहले बनी इस फिल्म को ‘ओडेस्सा कलेक्टिव’ ने प्रोड्यूस किया था, जिसके वे संस्थापक थे. फिल्म के निर्माण के दौरान आम लोगों ने एक-दो रुपए देकर योगदान दिया था. ‘क्राउड फंडिंग’ के तहत फिल्म निर्माण का यह अनूठा प्रयोग था. ऋत्विक घटक के शिष्य, जॉन एक अवांगार्द फिल्मकार थे जिनकी महज 49 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई.
यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज नहीं हुई, लेकिन केरल के स्कूलों, सामुदायिक भवनों में दिखाई गई और काफी सराही गई थी. इस फिल्म के निगेटिव क्षतिग्रस्त हो गए थे और सिर्फ एक ही प्रिंट राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय, पुणे में बचा था. मुंबई स्थित फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन (एफएचएफ) ने इस फिल्म को फिर से संरक्षित किया है. इसी संरक्षित रूप में फिल्म कान समारोह में प्रदर्शित की गई.
यह फिल्म एक युवक पुरुषन (जॉय मैथ्यू) की यात्रा को दिखाती है जो एक युवा नक्सली की मौत (आत्महत्या) की खबर को माँ तक पहुंचाता है. इस यात्रा के क्रम में हमारा साक्षात्कार उथल-पुथल से भरे 70 के दशक के केरल, उसके इतिहास, नक्सली विचारधारा, प्रतिरोध, युवाओं की एकजुटता, हताशा, और मोहभंग से होता है.
कान समारोह में फिल्म के प्रदर्शन के दौरान फिल्म की संपादक बीना पॉल और अदाकार जॉय मैथ्यू मौजूद थे. कान में इस फिल्म की काफी सराहना हुई. बातचीत में पॉल कहती है कि उनके लिए यह अप्रत्याशित और गर्व का क्षण था. यह पूछने पर कि यह फिल्म लंबे समय से सिनेप्रेमियों और फिल्म छात्रों के बीच क्यों सराही जाती रही है, वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि फिल्म का रूप बहुत दिलचस्प है. यह एक यात्रा-वृत्तांत है. इसमें डॉक्यूमेंट्री और फिक्शन दोनों के तत्व हैं. यह चीज बहुत लोगों को आकर्षित करती है. साथ ही फिल्म का मूल विचार उस बेचैनी के बारे में है जो लोग गहरी असमानता के समय महसूस करते हैं. आज़ादी के बाद इस देश में बहुत उम्मीदें थीं. फिर वैश्वीकरण के बाद लोगों ने अपनी दिशा खो दी. आज की वैश्विक परिस्थितियों में भी लोग काफी भटके हुए महसूस करते है. इसलिए मानवीयता और मूल मानवीय प्रश्नों को उठाने की आवश्यकता दर्शकों को अपील करती है.”
इस फिल्म की कोई लिखित पटकथा नहीं थी. अलग-अलग कहानियों के कोलाज को यात्रा के साथ बुना गया है. श्वेत-श्याम में रची गई इस फिल्म के कुछ दृश्य हमेशा के लिए मन में बस जाते हैं. पंद्रह साल पहले फिल्म संस्थान पुणे में मैंने यह फिल्म देखी थी, जिसकी याद आज भी है.
जॉन के लिए यह फिल्म एक साथ निजी और राजनीतिक दोनों ही थी. पॉल कहती हैं, “जॉन बहुत बड़े मानवतावादी थे. वह किसी एक राजनीतिक दल से नहीं जुड़े थे. उनकी राजनीति कहीं अधिक गहरी थी.’ मानवतावाद जॉन को उनके गुरु घटक से जोड़ता है, जिनसे वे फिल्म निर्माण और जीवन, दोनों में ही गहरे प्रभावित थे. भारत की तरफ से अधिकारिक रूप यही एक मात्र फीचर फिल्म थी जो कान समारोह का हिस्सा बनी. उम्मीद की जानी चाहिए यह फिल्म अपने संरक्षित रूप में सिनेमाघरों प्रदर्शित की जाएगी.

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