पिछले दिनों कान फिल्म समारोह के क्लासिक खंड में जॉन अब्राहम की मलयालम फिल्म अम्मा अरियान (1986)’ दिखाई गई. चालीस साल पहले बनी इस फिल्म को ‘ओडेस्सा कलेक्टिव’ ने प्रोड्यूस किया था, जिसके वे संस्थापक थे. फिल्म के निर्माण के दौरान आम लोगों ने एक-दो रुपए देकर योगदान दिया था. ‘क्राउड फंडिंग’ के तहत फिल्म निर्माण का यह अनूठा प्रयोग था. ऋत्विक घटक के शिष्य, जॉन एक अवांगार्द फिल्मकार थे जिनकी महज 49 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई.
Sunday, June 07, 2026
पिछले दिनों कान फिल्म समारोह के क्लासिक खंड में जॉन अब्राहम की मलयालम फिल्म अम्मा अरियान (1986)’ दिखाई गई. चालीस साल पहले बनी इस फिल्म को ‘ओडेस्सा कलेक्टिव’ ने प्रोड्यूस किया था, जिसके वे संस्थापक थे. फिल्म के निर्माण के दौरान आम लोगों ने एक-दो रुपए देकर योगदान दिया था. ‘क्राउड फंडिंग’ के तहत फिल्म निर्माण का यह अनूठा प्रयोग था. ऋत्विक घटक के शिष्य, जॉन एक अवांगार्द फिल्मकार थे जिनकी महज 49 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई.
Thursday, June 04, 2026
Amma Ariyan at Cannes Classics: John Abraham’s Vision and Legacy Revisited
The restored version of John Abraham’s cult classic Malayalam film Amma Ariyan was screened under the Cannes Classics section at the 79th edition of the Cannes Film Festival recently. The film that released in 1986, a year before Abraham’s passing away at 49, was made through funding received from people as part of the Odessa Collective—an initiative of Abraham, the avant-garde filmmaker, who graduated from the Film and Television Institute of India (FTII), Pune. The film has been restored by the Film Heritage Foundation (FHF). Actor Joy Mathew and editor Bina Paul were present at the screening, along with FHF director Shivendra Singh Dungarpur. In this interview, Paul discusses Abraham’s vision, legacy and the film’s journey with Arvind Das, Director of School of Media and Communication Studies at DY Patil International University, Pune.
Sunday, June 16, 2024
कान फिल्म समारोह में 'मंथन'
इस बार प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में पायल कपाड़िया की फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ को ‘ग्रां प्री’ पुरस्कार हासिल हुआ. फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई), पुणे की छात्र रही कपाड़िया को मिला यह पुरस्कार भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ी उपलब्धि है. इससे पहले उनकी डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'ए नाइट ऑफ नोइंग नथिंग' (2021) को भी कान में पुरस्कृत किया जा चुका है. हालांकि अभी तक भारत में इसे रिलीज नहीं किया गया है. पुरस्कार मिलने के बाद कपाड़िया ने स्वतंत्र फिल्मकारों को फंडिंग और वितरण को लेकर होने वाली परेशानी का जिक्र किया.
इस समारोह में श्याम बेनेगल की चर्चित फिल्म ‘मंथन’ (1976) को भी क्लासिक खंड में दिखाया गया. इस फिल्म को ‘फिल्म हेरिटेज फाउण्डेशन’ ने निर्देशक के साथ मिल कर संरक्षित किया है. देश के चुनिंदा सिनेमा घरों में बड़े परदे पर एक बार फिर से दर्शकों के लिए भी इसे रिलीज किया गया, जहाँ दर्शकों का उत्साह देखते बना.
दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित, 89 वर्षीय बेनेगल हिंदुस्तान के सबसे वृद्ध फिल्म निर्देशक हैं, जो आज भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हैं. पिछले साल उनकी फिल्म ‘मुजीब- -द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ रिलीज हुई थी. इस फिल्म को लेकर हुई बातचीत के दौरान बेनेगल ने मुझसे कहा था- ‘मेरे लिए प्रत्येक फिल्म का निर्माण सीखने की एक सतत प्रक्रिया है. फिल्म निर्माण के माध्यम से आप अपने आस-पड़ोस, लोगों और देश में बारे में जानते-समझते हैं. फिल्म बनाते हुए आप खुद को शिक्षित करते हैं.’
मंथन (1976) फिल्म का निर्माण गुजरात के पांच लाख डेयरी किसानों ने किया था. एक तरह से ‘क्राउड सोर्सिंग’ के तहत बनी हिंदुस्तान की यह पहली फिल्म है, जो बॉक्स ऑफिस पर भी काफी सफल रही थी. यह फिल्म डेयरी सहकारी आंदोलन के इर्द-गिर्द रची गई है, जिसमें भारतीय ग्रामीण समाज में जातिगत विभेद भी उभर कर सामने आता है. भारत में दुग्ध क्रांति के जनक रहे डॉक्टर वर्गीज कुरियन इस फिल्म निर्माण के पीछे थे.
श्याम बेनेगल की फिल्मों का दायरा काफी व्यापक और विविध रहा है. सत्तर के दशक में अंकुर, निशांत, मंथन जैसी फिल्में उन्होंने बनाई, फिर बाद के दशक में मुस्लिम स्त्रियों को केंद्र में रख कर मम्मो, सरदारी बेगम और जुबैदा फिल्में आई. महात्मा गाँधी, सुभाष चंद्र बोस, शेख मुजीबुर्रहमान को लेकर जीवनीपरक फिल्में भी उन्होंने निर्देशित की है.
समांतर सिनेमा के दौर के फिल्मकारों से उनकी फिल्में काफी अलग हैं. मुख्यधारा से अलग, समीक्षकों ने उनकी फिल्मों को मध्यमार्गी कहा है. उनकी फिल्में आर्थिक रूप से भी सफल रही. साथ ही उन्होंने बॉलीवुड को कई बेहतरीन अदाकार दिए हैं. एनएसडी, एफटीआईआई से प्रशिक्षित नए अभिनेताओं के लिए उनकी फिल्मों ने एक ऐसा स्पेस मुहैया कराया जहाँ उन्हें प्रतिभा दिखाना का भरपूर मौका मिला. इस फिल्म में गिरीश कर्नाड, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, स्मिता पाटिल, मोहन अगाशे, कुलभूषण खरबंदा, अनंत नाग जैसे कलाकारों को एक साथ परदे पर देखना सुखद है. इन कलाकारों की अदाकारी और गोविंद निहलानी के कुशल फिल्मांकन की वजह से करीब पचास साल बाद भी यह फिल्म पुरानी नहीं लगती. असल में बेनेगल की फिल्में पीढ़ियों से संवाद करती है.
Friday, August 11, 2023
‘जॉयलैंड’ जहाँ पितृसत्ता प्रतिपक्ष की भूमिका में है
दक्षिण एशिया में बॉलीवुड का इतना दबदबा है कि अन्य फिल्म उद्योगों की चर्चा नहीं होती. भूटान की फिल्म ‘लुनाना: ए यॉक इन द क्लास रूम’ को 94वें ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था. यह अलग बात है कि इसे सफलता नहीं मिली पर कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में इसे सम्मानित किया गया है. इसी तरह पाकिस्तान की फिल्म ‘जॉयलैंड’ को पिछले साल, 95वें ऑस्कर पुरस्कार में, ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म’ के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था. यह फिल्म भी ऑस्कर जीतने में सफल नहीं हुई, पर प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में इसे ‘उन सर्टेन रिगार्ड’ में प्रदर्शित किया गया जहाँ ज्यूरी पुरस्कार मिला था. इस फिल्म के निर्माताओं में हैदराबाद की अमेरिका में रहने वाली भारतीय अपूर्व गुरु चरण भी शामिल हैं.
भारतीय मीडिया में पाकिस्तान की चर्चा जब भी होती है खबरें आतंकवाद या राजनीतिक उथल-पुथल से ही जुड़ी रहती है. साहित्य, संस्कृति या सिनेमा अमूमन गायब ही रहते आए हैं. फरवरी में पाकिस्तान के चर्चित अदाकार और उर्दू साहित्य को लयात्मक और अपने सस्वर पाठ से चर्चित करने वाले जिया मोहिउद्दीन की जब मौत हुई तब भारतीय मीडिया में उनकी चर्चा बेहद कम हुई जबकि हिंदुस्तान में भी उनके चाहने वाले (खास कर फैज की नज्म पढ़ने की वजह से) बहुत हैं. प्रसंगवश, पाकिस्तान के युवा निर्देशक उमर रियाज की एक डॉक्यूमेंट्री- ‘कोई आशिक किसी महबूब से’ जिया मोहिउद्दीन को लेकर बनाई है, जिसकी काफी चर्चा भी हुई.
बहरहाल, विभिन्न फिल्म समारोह में पाकिस्तानी फिल्म ‘जॉयलैंड’ ने सुर्खियाँ बटोरी लेकिन आम भारतीय दर्शकों के लिए यह फिल्म उपलब्ध नहीं थी. पिछले महीने अमेजन प्राइम (ओटीटी) पर इसे रिलीज किया गया. सैम सादिक ने इसे निर्देशित किया है. फिल्म में सलमान पीर, सरवत गिलानी, रस्ती फारूक और अली जुनैजो सहित ट्रांसजेंडर अभिनेता अलिना खान की प्रमुख भूमिका है.
भले ही यह फिल्म पाकिस्तान में रची-बसी है, लेकिन कहानी भारत समेत दक्षिण एशिया के दर्शकों के लिए जानी-पहचानी है. फिल्म के केंद्र में लाहौर में रहने वाला एक परिवार है. इस परिवार का मुखिया एक विधुर है जिसके दो बेटे और बहुएँ हैं. परिवार को एक पोते की लालसा है. बड़ी बहु की तीन बेटियाँ हैं. छोटा बेटा (हैदर) जो बेरोजगार है उसकी नौकरी एक ‘इरॉटिक थिएटर कंपनी’ में लग जाती है. वहाँ वह एक ट्रांसजेंडर डांसर (बीबा) का सहयोगी डांसर होता है. धीरे-धीरे वह उसकी तरफ वह आकर्षित होता है. घर में छोटे बेटे की बहु (मुमताज) की नौकरी छुड़वा दी जाती है. घुटन और इच्छाओं के दमन से उसका व्यक्तित्व खंडित हो जाता है.
यह फिल्म घर-परिवार के इर्द-गिर्द है, पर किरदारों की इच्छा-आकांक्षा से लिपट कर लैंगिक राजनीति, स्वतंत्रता और पहचान का सवाल उभर कर फिल्म में सामने आता है. चाहे वह घर का मुखिया हो, उसका बेटा हो, बहु हो या थिएटर कंपनी की डांसर बीबा. फिल्म में एक संवाद है-मोहब्बत का अंजाम मौत है! सामंती परिवेश में प्रेम एक दुरूह व्यापार है, बेहद संवेदनशीलता के साथ निर्देशक ने इसे फिल्म में दिखाया है.
यह फिल्म अपने विषय-वस्तु का जिस कुशलता से निर्वाह करती है उसी कुशलता से परिवेश, भावनाओं और तनाव को भी उकेरती है. ‘ट्रांसजेंडर’ की पहचान और अधिकार को लेकर मीडिया में बहस होने लगी है. सिनेमा भी इससे अछूता नहीं है. फिल्म में अलिना खान ने ट्रांसजेंडर डांसर, बीबा की भूमिका विश्वसनीय ढंग से निभाई है. सादिक की शॉर्ट फिल्म डार्लिंग (2019) में उन्होंने अभिनय किया था. 'जॉयलैंड' एक तरह से ‘डार्लिंग’ का विस्तार है. इस वर्ष मई में लाहौर में अलिना खान को ‘मिस ट्रांस पाकिस्तान’ से सम्मानित किया गया.
फिल्म में कोई विलेन नहीं है. पितृसत्ता यहाँ प्रतिपक्ष की भूमिका में है. सवाल बहुत सारे हैं, जवाब कोई नहीं. ऐसे में रास्ता नजर नहीं आता. नाम ‘जॉयलैंड’ है, पर यहाँ खुशी के क्षण रेगिस्तान में पानी की बूंद की तरह हैं- अप्राप्य. इस बोझिल वातावरण को निर्देशक ने सहजता से बुना है. इसमें उन्हें कलाकारों का काफी सहयोग मिला है.
फिल्म के कई दृश्य जेहन में रह जाते हैं. एक ऐसा ही दृश्य फ्लाईओवर पर बीवा का कट-आउट लिए, स्कूटर के पीछे सीट पर बैठे हैदर का है.
निर्देशक ने जबरन अपने विचारों को दर्शकों के ऊपर थोपा नहीं है. न ही फिल्म में किसी तरह का उपदेश या प्रवचन ही दिया गया है, जैसा कि आम तौर पर बॉलीवुड की फिल्मों में हम देखते हैं. फिल्म एक प्रवाह में आगे बढ़ती है. बिंबों के सहारे कई बातें मुखरता से कहीं गई है. युवा निर्देशक सादिक की यह पहली फिल्म है, जहाँ वे संभावनाओं से भरे नज़र आते हैं.
Sunday, May 28, 2023
कान में मणिपुरी फिल्म 'इशानो'
मणिपुर के सिनेमा की चर्चा आम तौर पर मुख्यधारा के मीडिया में नहीं होती. मणिपुरी फिल्मों का हालांकि पचास साल पुराना इतिहास है. दुर्भाग्य से पिछले दिनों मीडिया में मणिपुर में हुई जातीय हिंसा की खबरें ही छाई रही. ऐसे में प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह (16-27 मई) में मणिपुर के प्रतिष्ठित फिल्मकार अरिबम स्याम शर्मा की फिल्म ‘इशानो’ का दिखाया जाना सुखद है. इसे समारोह के ‘क्लासिक खंड’ में दिखाया गया.
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित यह फिल्म वर्ष 1991 में कान समारोह में 'उन सर्टेन रिगार्ड’ में प्रदर्शित की गई थी. ‘फिल्म हेरिटेज फाउण्डेशन’ और मणिपुर स्टेट फिल्म डेवलपमेंट सोसाइटी के सहयोग से इस फिल्म को फिर से संजोया और संरक्षित किया गया है. अरिबम स्याम शर्मा के पोते ध्रुव शर्मा कहते हैं कि ‘इस फिल्म ने खुशी मनाने की हमें एक वजह दी है’.
इस समारोह में भाग लेने अरिबम स्याम शर्मा को जाना था, पर अस्वस्थ होने की वजह से वे नहीं गए. ध्रुव कहते हैं कि इस खबर से दादाजी बहुत ही खुश हैं. इस फिल्म के मुख्य अभिनेता कंगबाम तोम्बा बॉलीवुड के अभिनेताओं, निर्देशकों के संग कान में मौजूद थे और वहाँ ‘रेड कारपेट’ पर चहलकदमी करते हुए उनकी तस्वीरें दिखाई दी.
वर्ष 1936 में इंफाल में जन्मे शर्मा मणिपुर सिनेमा के ख्यात निर्देशक के साथ कुशल अभिनेता और संगीतकार भी हैं. ‘इशानो’ के अलावा ‘इमागी निंग्थेम’, ‘ओलांगथामी वांगमदुसू’, ‘सनाबी’ आदि उनकी चर्चित फिल्में हैं. इन फिल्मों को देश-विदेश में कई पुरस्कारों से भी नवाजा गया है.
इशानो की कहानी के केंद्र में एक स्त्री थाम्फा (अनुबाम किरणमाला) है, जो मणिपुर के एक गाँव में अपने पति और बेटी के साथ रहती है. अचानक से उसके व्यक्तित्व में बदलाव दिखाई देता है. यह बदलाव उसे माइबी धार्मिक समुदाय की स्त्रियों के पास ले जाता है. वे गुरु की तलाश में अपने परिवार को छोड़ देती है. लोक में व्याप्त विश्वास, अध्यात्म के सहारे प्रेम और वियोग को खूबसूरती से यह फिल्म हमारे सामने लाती है. मैतेई भाषा में बनी इस फिल्म में मणिपुर के जीवन और संस्कृति से हम रू-ब-रू होते हैं. संगीत इस फिल्म का विशिष्ट पहलू है.
मणिपुर स्टेट फिल्म डेवलपमेंट सोसाइटी के सचिव और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार सुंजू बाचस्पतिमयूम कहते हैं कि ‘इशानो एक बेहद महत्वपूर्ण मणिपुरी फिल्म है जो मणिपुर के जीवन और जटिलताओं को सामने लाती है.’ उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिनेमा निर्माण की एक परंपरा रही है, हालांकि उनका बाजार बहुत छोटा है. वर्तमान में कई युवा फिल्मकार मणिपुरी में अच्छी फिल्में बना रहे हैं लेकिन संसाधनों के अभाव से वे जूझ रहे हैं. सुंजू बाचस्पतिमयूम कहते हैं कि ‘अत्याधुनिक तकनीक का हमारे पास अभाव है’. वे खास कर हाउबम पवन कुमार और रोमी मैतेई जैसे युवा निर्देशकों की तारीफ करते हैं. पिछले साल गोवा में हुए भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में मणिपुर की फीचर और गैर-फीचर फिल्मों का प्रदर्शन किया गया था, जिसमें ‘इशानो’ भी शामिल थी.
उम्मीद करते हैं कि कान समारोह में 'इशानो' के प्रदर्शन के बाद दर्शकों की नजर मणिपुर के सिनेमा और समकालीन फिल्मकारों पर जाएगी.
Friday, May 19, 2023
हिंसा की खबर के बीच मणिपुर के फिल्म की कान समारोह में चर्चा
पिछले दिनों मणिपुर से लगातार जातीय हिंसा की खबरें आती रही है. ऐसे में प्रतिष्ठित कान अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के ‘क्लासिक खंड’ में मणिपुर की एक फिल्म का प्रदर्शन होना सुखद है. चर्चित फिल्मकार अरिबम स्याम शर्मा की फिल्म ‘इशानो’ क्लासिक खंड में दिखाई गई. उल्लेखनीय है वर्ष 1991 में कान समारोह में इसे ‘उन सर्टेन रिगार्ड’ में प्रदर्शित की गई थी. अरिबम स्याम शर्मा के पोते ध्रुव कहते हैं कि ‘इस फिल्म ने खुशी मनाने की हमें एक वजह दी है’.
इस समारोह में भाग लेने अरिबम स्याम शर्मा को
जाना था, पर अस्वस्थ होने की वजह से वे नहीं गए.
साथ ही बात करने में भी वे असमर्थ हैं. हालांकि ध्रुव कहते हैं कि इस खबर से
दादाजी बहुत ही खुश हैं. इस फिल्म के मुख्य अभिनेता कंगबाम तोम्बा बॉलीवुड के
अभिनेताओं, निर्देशकों के संग कान में मौजूद हैं
और वहां ‘रेड कारपेट’ पर चहलकदमी करते हुए उनकी तस्वीरें
दिखाई दे रही हैं.
1936 में इंफाल में जन्मे शर्मा मणिपुर सिनेमा के
ख्यात निर्देशक के साथ एक संगीतकार भी हैं, जिनकी फिल्में दुनिया भर के फिल्म समारोहों में दिखाई जा चुकी हैं. ‘इशानो’ के अलावा ‘इमागी
निंग्थेम’, ‘ओलांगथामी वांगमदुसू’, ‘सनाबी’ आदि उनकी चर्चित फिल्में हैं. इन फिल्मों को देश-विदेश में कई
पुरस्कारों से भी नवाजा गया है.
‘इशानो’ की
कहानी के केंद्र में एक महिला थाम्फा (अनुबाम किरणमाला) है, जो मणिपुर के एक गांव में अपने पति और
बेटी के साथ रहती है. अचानक से उसके व्यक्तित्व में बदलाव दिखाई देता है. यह बदलाव
उसे माइबी धार्मिक समुदाय की स्त्रियों के पास ले जाता है. वे गुरु की तलाश में
अपने परिवार को छोड़ देती है. लोक में व्याप्त विश्वास, तंत्र-मंत्र के सहारे प्रेम और वियोग
को खूबसूरती से यह फिल्म हमारे सामने लाती है. मैतेई भाषा में बनी इस फिल्म में
मणिपुर के जीवन और संस्कृति से हम रू-ब-रू होते हैं.
‘फिल्म हेरिटेज फाउण्डेशन’ और मणिपुर स्टेट फिल्म डेवलपमेंट सोसाइटी के सहयोग से इस फिल्म को
फिर से संजोया और संरक्षित किया गया है. मणिपुर स्टेट फिल्म डेवलपमेंट सोसाइटी के
सचिव और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार सुंजू बाचस्पतिमयूम कहते
हैं कि उनकी संस्था मणिपुर की फिल्म विरासत को संभालने में लगी हैं.
बाचस्पतिमयूम कहते हैं कि ‘इशानो’ एक बेहद महत्वपूर्ण मणिपुरी फिल्म है जो मणिपुर के जीवन और जटिलताओं
को सामने लाती है.’ अभी
यह फिल्म आम दर्शकों के लिए उपलब्ध नहीं है, लेकिन बाचस्पतिमयूम कहते हैं कि कान और अन्य फिल्म समारोहों मे दिखाई
जाने के बाद यह ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी आएगी.
उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिनेमा निर्माण की एक
लंबी परंपरा रही है, हालांकि
उनका बाजार बहुत छोटा है. यह एक वजह है कि राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया में इन
फिल्मों की चर्चा नहीं हो पाती. उल्लेखनीय है कि मणिपुर सिनेमा का इतिहास पचास साल
पुराना है. वर्ष 1972 में बनी ‘मातमगी मणिपुर’ पहली फिल्म थी, जिसे देवकुमार बोस ने निर्देशित किया
था. प्रसंगवश, इस फिल्म में अरिबम स्याम शर्मा की
प्रमुख भूमिका थी. इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म समारोह में राष्ट्रपति पदक से
सम्मानित किया गया. पिछले साल मणिपुरी सिनेमा की स्वर्ण जयंती मनाई गई थी. साथ ही
गोवा में हुए भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में मणिपुर की फीचर
और गैर-फीचर फिल्मों का प्रदर्शन भी किया गया था, जिसमें ‘इशानो’ भी शामिल थी.
वर्तमान में कई युवा फिल्मकार मणिपुरी में फिल्म बना रहे हैं लेकिन संसाधन के अभाव से वे जूझ रहे हैं. सुंजू बाचस्पतिमयूम कहते हैं कि ‘हमारे फिल्म निर्देशक का ध्यान बाहर के बाजार पर नहीं है और इस वजह से वे कई बात उतनी उत्कृष्ट फिल्म नहीं बन पाते हैं. अत्याधुनिक तकनीक का भी हमारे पास अभाव है.’ फिर भी डिजिटल तकनीक के सहारे पिछले कुछ सालों में युवा फिल्मकार ने अच्छी फिल्में बनाई हैं जिसकी फिल्म समारोहों में चर्चा भी हुई है. वे खास कर हाउबम पवन कुमार (लोकटक लैरेम्बी) और रोमी मैतेई (स्नेक अंडर द बेड) जैसे निर्देशकों की तारीफ करते हैं.
सिनेमा किसी भी समाज की संस्कृति, परंपरा को बिंबो, ध्वनियों के माध्यम से संग्रिहत करने
और संजोने का काम करता है. अपवाद को छोड़ दिया जाए तो बॉलीवुड की फिल्मों में
उत्तर-पूर्व की संस्कृति नहीं दिखती है. साथ ही वहाँ के कलाकार भी गिने-चुने ही
जगह बना पाते हैं.
हम उम्मीद करते हैं कि कान अंतरराष्ट्रीय फिल्म
समारोह में ‘इशानो’ फिल्म के प्रदर्शन के बाद दर्शकों की नजर मणिपुर के सिनेमा और
समकालीन फिल्मकारों पर जाएगी.
Sunday, May 22, 2022
कान फिल्म समारोह में 'प्रतिद्वंदी'
कान फिल्म समारोह के 75वीं वर्षगांठ पर सत्यजीत रे की चर्चित फिल्म ‘प्रतिद्वंदी’ विशेष रूप से दिखाई जा रही है. वर्ष 1970 में रिलीज हुई इस फिल्म को रे की फिल्मी यात्रा में एक अलग मुकाम हासिल है. उनकी शुरुआती फिल्में पाथेर पांचाली, अपराजितो, जलसाघर, चारुलता आदि अपनी प्रगीतात्मकता और मानवीय संवेदनाओं के चित्रण के कारण सराही गई, पर बाद के दशक में समकालीन भावबोध से दूर और अराजनीतिक होने का उन पर आरोप लगा. इस फिल्म से वे अपने आलोचकों को जवाब देते प्रतीत होते हैं. यह फिल्म समकालीन वास्तविकता से सीधे मुठभेड़ करती है. सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में धृतमन चटर्जी की प्रमुख भूमिका है. अपनी पहली फिल्म में वे एक मंजे कलाकार के रूप में सामने आते हैं.
Monday, May 09, 2022
कान फिल्म समारोह और ‘नीचा नगर’ की याद
फ्रांस का प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह इस महीने (17-28 मई) 75वीं वर्षगांठ मना रहा है, वहीं भारत अपनी आजादी का अमृत महोत्सव भी मना रहा है. स्वतंत्र भारत का सांस्कृतिक इतिहास सिनेमा के बिना नहीं लिखा जा सकता है. खास कर हिंदी सिनेमा (बॉलीवुड) की इसमें बड़ी भूमिका रही है. इस साल कान समारोह में भारत को ‘ऑनर ऑफ कंट्री’ के रूप में शामिल किया गया है. यह एक नई परंपरा की शुरुआत है, जिससे कान के फिल्म बाजार में फिल्मकारों को नेटवर्किंग का मौका मिलेगा. साथ ही कई भारतीय फिल्में भी यहाँ दिखाई जाएंगी.
इन सबके बीच यह याद करना जरूरी है कि वर्ष 1946 में जब कान फिल्म समारोह की शुरुआत हुई, उसी वर्ष भारतीय फिल्मों की ‘कान यात्रा’ शुरु हो गई थी. कान में उस साल चेतन आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म ‘नीचा नगर’ को प्रतिष्ठित ‘पाम डी ओर’ पुरस्कार दिया गया था (उस समय इसे ग्रांड पिक्चर पुरस्कार कहा जाता था). ‘नीचा नगर’ भारत की एकमात्र ऐसी फिल्म है, जिसे यह सम्मान हासिल है.
वर्तमान में इस फिल्म को कोई याद नहीं करता. सिनेमा के इतिहासकारों की नजर से भी यह वर्षों ओझल ही रहा है. जबकि वर्ष 1946 में ही रिलीज हुई ख्वाजा अहमद अब्बास की बंगाल के अकाल पर बनी फिल्म ‘धरती के लाल’ और ‘नीचा नगर’ ने भारतीय सिनेमा में एक ऐसी नव-यथार्थवादी धारा की शुरुआत की जिसकी धमक देश-दुनिया में सुनी गई. बाद में जाकर विमल राय ने ‘दो बीघा जमीन’ (1953) में और सत्यजीत रे ने ‘पाथेर पांचाली’ (1955) में सामाजिक यथार्थ को संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया. उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों ने भी कान समारोह में सुर्खियाँ बटोरी थी. इस बार भी रे की फिल्म प्रतिद्वंदी (1970) (नवीनीकृत प्रिंट) कान समारोह में विशेष रूप से दिखाई जाएगी.
‘नीचा नगर’ के निर्माण के प्रसंग का जिक्र बलराज साहनी ने ‘मेरी फिल्मी आत्मकथा’ में विस्तार से किया है. उन्होंने चेतन आनंद को उद्धृत करते हुए लिखा है कि चेतन ने उनसे कहा था- “इस समय आजाद प्रोड्यूसर अस्तित्व में आया है. इस अस्थिर सी परिस्थिति की आशावादी संभावनाएँ भी हैं. इस समय अच्छे सुशिक्षित और प्रगतिशील लोग अगर हिम्मत करें तो फिल्म-इंडस्ट्री को पहले से अधिक यथार्थवादी मोड़ दे सकते हैं.” चेतन आनंद इस फिल्म के लिए बलराज साहनी को लेना चाहते थे, पर फिल्म बनाने के लिए उस वक्त ब्रिटिश सरकार से लाइसेंस मिलता था. एक लाइसेंस रफीक अनवर को मिला था और इस शर्त पर कि वे खुद इस फिल्म के हीरो होंगे उन्होंने चेतन आनंद को फिल्म निर्देशित करने का मौका दिया था. बहरहाल, यह फिल्म इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) से प्रभावित थी. उस दौर में प्रगतिशील, वामपंथी विचारधारा में आस्था रखने वाले अनेक संस्कृतिकर्मी बंबई (मुंबई) फिल्म उद्योग में मौजूद थे. मुंबई में वर्ष 1943 में भारतीय जन नाट्य संघ-‘इप्टा’ का गठन हुआ. इप्टा का उद्देश्य जन संस्कृति का प्रसार और उसके माध्यम से फासीवाद और साम्राज्यवाद से लड़ाई लड़ना था. प्रसंगवश, इप्टा नाम रोम्यां रोलां की चर्चित किताब ‘पीपुल्स थिएटर’ पर आधारित है.
‘धरती के लाल’ का निर्माण ‘इप्टा’ ने ही किया था, जिसमें बलराज साहनी की भी भूमिका थी. ‘धरती के लाल’ की तरह ही ‘नीचा नगर’ फिल्म में भी संगीत सितार वादक ‘रवि शंकर’ ने दिया था, जो इप्टा से जुड़े थे. यह उनकी पहली फिल्म थी. ‘हम रुकेंगे भी नहीं’ गाने के संगीत और फिल्मांकन में अहिंसक प्रतिरोध और स्वतंत्रता की अनुगूंज मुखर रूप से सुनाई देती है. यहाँ मशाल लिए स्त्री और पुरुष एक साथ कदमताल कर रहे हैं.
‘नीचा नगर’ फिल्म की कहानी एक उद्योगपति सरकार (रफी पीर), जो ऊंचा नगर में रहता है और नीचा नगर में रहने वाले गरीबों के इर्द-गिर्द घूमती है. सरकार चाहता है कि एक नाला नीचा नगर की ओर मोड़ दिया जाए. गाँव के लोगों के जमीन पर उसकी नजर है. गाँव के लोग इसके विरोध में उठ खड़े होते हैं. नाला की वजह से बीमारी फैलती है और महामारी का रूप ले लेती है. गाँव वाले सरकार के बनाए अस्पताल में जाने को मजबूर होते हैं, पर बलराज की बहन रूपा उस अस्पताल में जाने से मना कर देती है और दम तोड़ देती है. गाँव वालों के इस संघर्ष में सरकार की बेटी माया भी साथ देती है. फिल्म में नीचा नगर के लोगों का ‘जालिम सरकार हाय हाय’ का नारा दोअर्थी है. सरकार एक पात्र नहीं, प्रतीक है यहाँ. ध्यान रहे यह फिल्म ब्रिटिश हुकूमत के दौर में बनी थी! फिल्म की विषय-वस्तु आज भी प्रासंगिक है.
बकौल बलराज साहनी, चेतन आनंद ‘नीचा नगर के माध्यम से आर्थिक वर्गों की मुठभेड़ की कहानी कहना चाहते थे'. इस फिल्म में उनकी समाजवादी चेतना दिखाई देती है. चेतन आनंद सिनेमा को ‘जन माध्यम मानते हुए इसमें जन समुदाय को शामिल करने पर जोर देते थे’. फिल्म निर्माण के दौरान देश में आजादी के लिए उथल-पुथल मचा था. महात्मा गाँधी पटल पर छाए हुए थे. फिल्म में गाँधी टोपी पहने बलराज (अनवर) और चरखा चलाती रूपा (कामिनी कौशल) दिखाई देती हैं.
आजादी के बाद हिंदी सिनेमा उद्योग में सामाजिक यथार्थ की इस धारा पर बड़ी पूंजी हावी रही, मनोरंजन का तत्व केंद्र में रहा. साथ ही व्यावसायिक सिनेमा में बलराज साहनी जैसे अदाकारों पर ‘स्टार’ भारी पड़े, चेतन आनंद जैसे निर्देशक हाशिए पर चले गए. ‘नीचा नगर’ फिल्म की धारा ‘समांतर सिनेमा’ के रूप में हालांकि आज भी जारी है. ऐसे में कान समारोह के 75वीं वर्षगांठ पर इस फिल्म की ऐतिहासिक भूमिका रेखांकित की जानी चाहिए. कान फिल्म समारोह में भले ही ‘नीचा नगर’ पुरस्कृत हुई, दुर्भाग्य ऐसा रहा कि भारत में व्यावसायिक रूप से यह रिलीज नहीं हो पाई थी. फिल्म को कोई वितरक नहीं मिला था.
(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)








