विनोद कौल की पुस्तक ‘अवतार कौल: द (इन) कम्प्लीट स्टोरी’ के बहाने अरविंद दास ने चर्चित फ़िल्म ‘27 डाउन’ को याद किया है और इस फ़िल्म के नायक एम. के. रैना से बातचीत भी की है. यह फ़िल्म हिंदी के लेखक रमेश बक्षी के उपन्यास ‘अठारह सूरज के पौधे’ पर आधारित है. समानांतर सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा साहित्यिक कृतियों से अपना रिश्ता बनाता था. कम साधनों और सीमित तकनीक के बावजूद उस दौर में ऐसी फ़िल्में बनीं, जिन्हें आज भी देखना सिनेमा देखने के सुख से भर देता है. क्या दौर था. पैसे कम थे, तकनीक सीमित लेकिन सिनेमा के लिए जुनून भरपूर. प्रस्तुत है यह आलेख.
एक
समांतर सिनेमा की हिंदी में जब भी बात होती है, मणि कौल, कुमार शहानी की फिल्मों का नाम ऊपर आता है. उनकी फिल्में मसलन, उसकी रोटी, माया दर्पण साहित्यिक कृतियों पर आधारित रही. हिंदी उपन्यास, अठारह सूरज के पौधे, पर आधारित और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित एक फिल्म ‘27 डाउन’ (1973) की चर्चा अक्सर छूट जाती है. इस फिल्म के निर्देशक अवतार कौल (1939-1974) थे. जिस दिन इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई, उसी दिन बॉम्बे में डूबने से उनकी मौत हो गई और उनके नाम बतौर निर्देशक यही एक मुकम्मल फिल्म है. इस फिल्म को प्रतिष्ठित लोकार्नो और मैनहाइम अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में भी पुरस्कृत किया गया.
हाल ही में प्रकाशित किताब ‘अवतार कौल: द (इन) कंप्लीट स्टोरी’ में विनोद कौल (राज्य सभा टीवी के पूर्व कार्यकारी निदेशक और निर्देशक के भांजे) ने निर्देशक के जीवन, परिवार, यात्रा और इस फिल्म के बारे में लिखा है. साथ ही फिल्म से जुड़े सिनेमैटोग्राफर, साउंड रिकॉर्डिस्ट और कुछ फिल्म समीक्षकों की टिप्पणियाँ भी शामिल की है. किताब में उन्होंने एक जगह नोट किया है, “यह सोचकर एक अजीब-सी कसक होती है कि यह फिल्म इतनी सारी दूसरी फिल्मों की शुरुआत थी और अवतार की यात्रा का अंत भी. वह हमें और कितना कुछ दे सकते थे.”
मणि कौल और शहानी की तरह ही अवतार ने सिनेमा का विधिवत प्रशिक्षण लिया था. वे 60 के दशक में न्यूयॉर्क के सिटी यूनिवर्सिटी में फिल्म निर्माण के छात्र थे. वर्ष 1969 में मणि कौल ने मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ पर फिल्म बनाई. साथ ही इसी साल मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ और बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ फिल्म भी आई. कम बजट की इन फिल्मों में सितारों या ‘स्टार’ पर जोर नहीं था. फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों को कथा के लिए चुना. बिंब और ध्वनि के सुरूचिपूर्ण इस्तेमाल ने इन फिल्मों को व्यावसायिक सिनेमा से अलग एक खास पंक्ति में ले जाकर खड़ा किया. यहीं से हिंदी में 'न्यू वेब सिनेमा' या समांतर सिनेमा की शुरुआत मानी गई.
यहाँ पर यह नोट करना उचित होगा कि मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ और बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ के बाद फिल्म वित्त निगम से मणि कौल, कुमार शहानी और अवतार कौल को फिल्म बनाने के लिए ऋण मिला था. ‘27 डाउन’ फिल्म महज दो लाख के बजट पर बनी थी. राखी उस दौर में कमर्शियल फिल्मों की सफल अभिनेत्री थी, फिर भी बिना पैसे लिए, बिना मेकअप के, सादे साड़ी में (जो वह अपने घर से लेकर आती थी) उन्होंने इस फिल्म में काम करना चाहा. एक जगह किताब में विनोद कौल ने एक वाकया का जिक्र किया है कि राखी को शूटिंग के दौरान एक जगह लगा कि शॉट दृश्यात्मक रूप से जम नहीं रहा और यह बात उन्होंने अवतार से कही कि पेड़ फ्रेम में बाधा बन रहा है और इससे कंपोजिशन बिगड़ रहा है, जिस पर बहुत ही शांत और दृढ़ता से उन्होंने जवाब दिया कि ‘यह पेड़ मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है.’ राखी को ये बात पसंद नहीं आई पर उन्हें पता था कि सिनेमा निर्देशक का माध्यम है.
जहाँ ‘उसकी रोटी’ या ‘माया दर्पण’ आम दर्शकों के लिए बोधगम्य नहीं रही, वहीं ‘27 डाउन’ आसानी से दर्शकों के भाव बोध का हिस्सा बन जाती है. बहरहाल, सिनेमा के अध्येता मनमोहन चड्ढा ने ‘हिंदी सिनेमा का इतिहास’ में ठीक ही लिखा है कि ‘सन 1968 से सन 1980 के बारह वर्षों में विश्व भर में भारत ही एक ऐसा देश था, जहाँ नए फिल्मकार के लिए अपनी पहली फिल्म बना लेना बहुत आसान था.’ क्या आज यह संभव है?
आजाद भारत में जवान हो रही पीढ़ी के सपने, कश्मकश, स्त्री-पुरुष संबंधों, सामाजिक दबाव और वैयक्तिक इच्छा के द्वंद को रेल के रूपक और प्रतीकों के माध्यम से निर्देशक ने बेहद कुशलता औऱ संवेदनशीलता के साथ श्वेत-श्याम छवियों में उकेरा है. ट्रेन कंडक्टर संजय (एम के रैना) और एलआईसी में नौकरी (टाइपिस्ट) करने वाली शालिनी (राखी) इस फिल्म के मुख्य पात्र है. शालिनी के माता-पिता नहीं है, दो छोटे भाई-बहन और दादाजी का भरण-पोषण का जिम्मा उसके सिर है. वह पुणे से दूर बॉम्बे में नौकरी करती है. उसके दादाजी नहीं चाहते कि शालिनी किसी ऐसे के साथ संबंध बनाए जो उन्हें दूर कर दे.
संजय एक ऐसा नायक है कि जिसके जीवन में कहीं ठौर नहीं है और वह रेल के डिब्बे की तरह यात्रा में हमेशा भटकने के लिए अभिशप्त है. संजय के व्यक्तित्व पर उसके रौबदार पिता (ओम शिव पुरी) की छाया हमेशा हावी रहती है.
फिल्म के शुरुआती दृश्य में संजय ट्रेन के बर्थ पर सोया है. रेल की आवाज है और वॉइस ओवर:
“फिर वही पुल है क्या, शायद पुल ही है. कितने सारे पुल आते हैं रास्ते में, लगता है शुरू से अब तक मैं बेहिसाब पुलों पर से गुजर रहा हूँ. लोग है जो एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं. मैं हूँ कि कहीं से चल कर कहीं चला रहा हूँ...” एम के रैना की यह पहली फिल्म थी. रैना ने एक ऐसे किरदार को निभाया है जो निर्णय लेने में अक्षम है, घुटता रहता है और दो पाटों के बीच पीसता रहता है.
वहीं शालिनी का किरदार उस दौर के हिंदी सिनेमा के स्त्री पात्रों से साफ अलग है. पारिवारिक बोझ से दबी, कामकाजी स्त्री के चरित्र को राखी ने बखूबी निभाया है जो अपने संबंधों को लेकर स्वतंत्र निर्णय लेती है, पहल खुद करती है.
आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में इसे अलग से रेखांकित किया जाता रहा है? फिल्म के रिलीज होने के बाद सितंबर 1974 में ‘अठारह सूरज के पौधे’ 27 डाउन के नाम से पुनर्प्रकाशित हुई. अवतार कौल को समर्पित, नई भूमिका में रमेश बक्षी ने लिखा: उपन्यास नई पीढ़ी के उस संजय की कहानी है जो पत्नी, प्रेमिका, पिता, नौकरी, अपनी महत्वाकांक्षाओं, अपनी निर्णय हीनता और आपाधापी के बीच महाभारत के अठारह दिनों का युद्ध अपने अंदर लड़ता रहता है...”
हर क्लासिक फिल्मों की तरह ही इस फिल्म के रेल, प्लेटफार्म के कुछ दृश्य हमेशा के लिए मन में रच-बस जाते हैं. चलती गाड़ी में "हैंडहेल्ड कैमरा" के सहारे इस फिल्म के अधिकांश हिस्सों को शूट किया गया था. उल्लेखनीय है कि सिनेमैटोग्राफर ए के बीर (एफटीआईआई) की यह पहली फिल्म थी और उन्हें फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. लेकिन इस फिल्म में ध्वनि के इस्तेमाल को भी अलग से परखा जाना चाहिए. हरिप्रसाद चौरसिया और भुवनेश्वर मिश्र ने इस फिल्म का संगीत दिया था. वहीं सत्यजीत रे के सहयोगी रहे बंसी चंद्रगुप्त ने प्रोडक्शन डिजाइन किया था.
वर्ष 2024 में अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोवा में इस फिल्म के पुनर्संरक्षित रूप (रिस्टोर्ड वर्जन) में प्रस्तुत किया गया. मणि कौल इस फिल्म के बड़े प्रशंसक थे. इस फिल्म के मुख्य अभिनेता, चर्चित कलाकार, रंगकर्मी एम के रैना कहते हैं कि मणि कौल ने ही अवतार को उनका नाम सजेस्ट किया था, वे एनएसडी में रिहर्सल देखने आते थे. किताब में एम के रैना के हवाले से बातें नहीं मिलती है. मैंने उनसे इस फिल्म और उसके बहाने समांतर सिनेमा को लेकर बातचीत की.
दो
अरविंद दास: 27 डाउन से आप कैसे जुड़े?
एम के रैना: जब मुझे फिल्म में अवतार कौल ने कास्ट किया, मैं ड्रामा स्कूल (एनएसडी) में ही था. वे हॉस्टल आए थे. नसीर (नसीरूद्दीन शाह) मुझसे जूनियर था तो उसने कहा कि कोई फिल्ममेकर बाहर आया है, वो तुमसे मिलना चाहता है. मैंने कहा कि बकवास न कर, बैठ के चुपचाप चाय पी ले. तो उसने कहा, नहीं, सीरियसली कह रहा हूँ, कोई बाहर है. तो वहाँ देखा दो आदमी थे. एक राइटर थे रमेश बक्षी और दूसरे अवतार. उन्होंने कहा कि तुम हमारे साथ चलो, खाना खाओ हमारे साथ. तो हम राइटर के घर गए तो वहाँ उन्होंने रिवील किया कि ऐसा प्रोजेक्ट है, हम ऐसा-ऐसा कर रहे हैं. तो तुमसे बात करेंगे. अच्छा, यह जो डायरेक्टर था, यह अमेरिका में पढ़ के आया था. ही वॉज़ ट्राइंग टू अंडरस्टैंड मैं हूँ कैसा बंदा. सीरियस काम करेगा कि नहीं. तो फिर जब बातें की, तब उसने कहा कि मैंने दुनिया का सबसे बेस्ट थिएटर देखा है न्यूयॉर्क में. सो ही वॉज़ वैरी हैप्पी कि तुम मतलब यू बिलॉन्ग टू दैट एंड उस तरह का सोच है तुम्हारा भी. तो फिर किताब दे दी पढ़ने के लिए कि तीन दिन में तुम पढ़ लो फिर बात करेंग. मैंने एक रात में ही पढ़ ली सारी किताब. फिर मैंने फोन किया. त्रिवेणी के लॉन में बैठ के हम बातें करने लगे. तो मैंने बताया किताब के बारे में कि उसमें क्या है, क्या नहीं है. क्यों संजय डी-क्लास्ड आदमी है, बिलकुल लोनली है, डायरेक्शनलेस है, ट्रैक... यू नो, सारा जो सिंबॉलिज्म उसमें है. पटरियाँ हैं, वो पैरेलल हैं, मिलती कहीं नहीं...तब उसने अपना सिनेरियो दिया मुझे कि अब यह पढ़ो. पाँच-छह दिन हम रोज़ मिलते रहे, बात करते रहे. फिर उसने कहा-ठीक है, वी आर कास्टिंग यू. हम तुम्हें बताएंगे, तुम्हें बॉम्बे कब आना है. तो कोई 6-7 महीने के बाद बॉम्बे पहुँचा मैं और स्ट्रेट शूटिंग शुरू हो गई हमारी.
अरविंद दास: यह 1973 की बात है
एम के रैना: ना ना, 1972 की बात है.
अरविंद दास: पिछले दिनों फिल्म निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने हिंदी फिल्मों में कहानी के न होने का ज़िक्र किया. ऐसा नहीं है कि हमारे आस-पास कहानी का कोई अभाव हो, बस साहित्य के तरफ आज के निर्देशक रुख नहीं करना चाहते है. इस तरह की फिल्में आज मुश्किल दिख रही है...
एम के रैना: इसके लिए हमें सरकार को क्रेडिट देना होगा, जिन्होंने फिल्म वित्त निगम (एफसीसी) बनाया. उस वक्त फिल्म वित्त निगम साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों के निर्माण पर जोर देता था. यह तो कमाल हुआ न. साहित्य हेल्पड देम ऑल, इस पर किसी ने ध्यान भी नहीं दिया. मणि ने भी यही किया, कुमार ने भी यही किया, अवतार ने भी यही किया, बासु भट्टाचार्य ने भी यही किया, बासु चटर्जी ने भी... सभी को हिंदी साहित्य की कहानियों में दम लगा. दे वेयर मॉडर्न स्टोरीज़. उस दौर में राइटर भी कुछ नया करना चाहता था, शिल्प के लेवल पे, फॉर्म के लेवल पे, कंटेंट के लेवल पे. उस वक्त आज ही तरह लल्लू-पंजू नहीं थे एफसीसी में. बी के करंजिया थे, हृषीकेश मुखर्जी थे जिनमें सिनेमा को लेकर पैशन था. जब ‘कस्बा (कुमार शहानी की फिल्म)’ रुक गई थी बीच में तब मुखर्जी ने कहा कि इस फिल्म को पूरी करनी है किसी भी सूरत में. फिर उन्होंने और पैसे दिए कुमार को.
अरविंद दास: आप किस रूप में उस दौर को याद करते हैं?
एम के रैना: एक पागलपन था, एक मस्तानगी थी. हम सब यंग थे. दिन में हमारी मंडली जमती थी समोवर (कैफे) में. फिर शाम को ये लोग दारू पीने जाते थे. इसी तरह हम मृणाल सेन से मिले. मैंने उनके साथ दो फिल्में की. माया दर्पण उसी दौर में शूट हो रही थी. मेरी सबसे अच्छी दोस्ती हो गई. हमारा एक ‘गैंग’ जैसा था..जैसे 'सतह से उठता आदमी' में आई वॉज़ एन एक्टर बट आई वॉज़ आल्सो लाइक अ मैनेजर. पैसे होते नहीं थे. मणि को कान समारोह में फिल्म भेजनी थी. दिल्ली में मंजीत बाबा ने उसका पोस्टर बनाया. प्रिंट कंधे पर उठा कर इंटरनेशनल फेस्टिवल का जो ऑफिस है खान मार्केट में वहाँ लेकर मैं गया. हम पैसे की बात नहीं करते थे. बांद्रा में एक जगह थी, मैक्स. आई थिंक गोअन, बिलकुल अमेरिकन ओरिजिनल लगता था. गली थी. गली बीइंग टर्न्ड इनटू बार इन द नाइट. वहाँ बंसी चंद्रगुप्त होता था, गोगी आनंद होता था... ऑल ऑफ देम वुड ड्रिंक फेनी...बट दैट वॉज़ वन आस्पेक्ट..दे वेल सेलिब्रेट इन द इनविंग.. बट व्हेन इट केम टू टॉकिंग अबाउट सिनेमा, टॉकिंग अबाउट लिटरेचर, टॉकिंग अबाउट आर्ट डायरेक्शन वी बिकेम वेरी सीरियस. एक जुनून, पैशन टीम के सब साथियों में था, चाहे वे कैमरामैन हो या साउंड रिकॉर्डिस्ट. एक्सपेरिमेंट्स बहुत करता था बीर (सिनेमैटोग्राफर). बिफोर शूट उन दिनों लिलीज़ बनाते थे ये लोग. एक्सपोज़र लिलीज़ करते थे कि किस एक्सपोज़र पे करूँगा इसको शूट... ऑल वेयर इक्वली इन्वॉल्व्ड. एडिटर भी ऐसे ही मिले हमें एक्चुअली. वो दौर था कि भाई कुछ बदल के, कुछ अलग काम करना है.
अरविंद दास: अवतार की फिल्म मेकिंग को मणि और कुमार शहानी से कैसे अलग देखते हैं?
एम के रैना: मणि और अवतार का आपस में जोक चलता था. मणि, तू सिने-मा बनाता है ना, मैं सिने-बाप बनाता हूँ. अवतार कहता था, तू कैमरा चलाता है ना, मैं कैमरा तेज घुमाता हूँ. सो दे वुड टॉक एंड लाफ अबाउट इट.
अरविंद दास: समांतर सिनेमा आंदोलन क्यों बिखर गया?
एम के रैना: समांतर सिनेमा में एक ज़बरदस्त मोड़ आया जब कुछ डायरेक्टरों ने फिल्म स्टार्स लेने शुरू किए. उन्होंने सोचा कि वी विल ब्रेक इनटू द बिगर मार्केट... दैट हैज बीन द डिफीटिंग पॉइंट व्हिच दे डिडेंट रियलाइज़.. गोविंद (निहलानी) ने भी लिया, केतन (मेहता) ने भी ले लिया. यदि प्रादेशिक स्तर पर वहां की सरकार नए फिल्मकारों को मदद करे तो देश में सिनेमा की सूरत बदल सकती है.
अरविंद दास: आपकी यह पहली फिल्म थी, पर आप कैमरे के सामने काफी कॉन्फिडेंट लग रहे...
एम के रैना: हमारे यहाँ ट्रेनिंग में दो चीजें बहुत इनडायरेक्टली आती थीं. एक तो हमारे पास बहुत ही छोटा इनडोर इंटीमेट थिएटर है. वहाँ पर तीन फुट पे मेरा स्पेक्टेटर होता है. तो वहाँ हम जब एक्टिंग करते थे तो यू हैव टू रिस्ट्रेन योरसेल्फ, वो ट्रेनिंग नैचुरली आती है आपको और जब ओपन एयर में करते हैं तो आपका थोड़ा सा अलग एप्रोच होता है... यू हैव ऑल दिस टेंडेंसी, हाउ टू रीच टू द ऑडियंस. तो वो ट्रेनिंग यहां बहुत काम आई. इनफैक्ट मणि ने एक दिन कहा कि, तू हमारे सिनेमा के लिए बेस्ट एक्टर है. मैंने पूछा, कैसे? उसने कहा, यार, तू सिनेमा को समझता है. तुझे यह फिक्र नहीं होता कि तेरा फोटो आया कि नहीं आया.. यू नो द फिल्म बेसिकली.
अरविंद दास: क्या संजय का किरदार 21वीं सदी के तीसरे दशक में पीछे छूट गया है या आज भी मौजूद है?
एम के रैना: संजय अभी भी है. लाखों-करोड़ों लोग उस संघर्ष में हैं अभी भी. शहर में रहने वाले जेन ज़ी को छोड़ दीजिए, वो तो थोड़ा प्रिविलेज्ड हैं, लेकिन जो जेन ज़ी कस्बे में है, जिसके घर में आमदनी नहीं है बाप के पास, जो फँसा हुआ है घर में, घर की ज़िम्मेदारी समझता है. तो वो तो संजय ही है. वो तो करोड़ों में हैं अपने यहाँ. आज भी फिल्म की रीच है. अब तो निगेटिव भी रिस्टोर किया गया है. अभी हम फिल्म मेकर्स का एक कोर्स कर रहे हैं दिल्ली में. तो मैं इस फिल्म के कुछ दृश्य दिखाता हूँ. लोग ठहर कर सोचने लगते हैं कि क्या ऐसा हुआ है? ऐसी फिल्म भी बनी है क्या?
(समालोचन वेबसाइट के लिए)

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