पिछली सदी के 70 के दशक में समांतर सिनेमा आंदोलन थिएटर से आए अदाकारों के लिए मुफीद रहा. यह दौर 80 के दशक तक चला. मराठी रंगमंच के अभिनेता नाना पाटेकर, नसीरुद्दीन शाह व ओम पुरी के हमउम्र थे. हालांकि हिंदी सिनेमा में गमन (1978) फिल्म से उन्होंने कदम रखा पर उन्हें प्रसिद्धि 90 के दशक में रिलीज हुई परिंदा, प्रहार, अग्निशाक्षी और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों से मिली.
Sunday, October 11, 2026
नटसम्राट- नाना पाटेकर
पिछली सदी के 70 के दशक में समांतर सिनेमा आंदोलन थिएटर से आए अदाकारों के लिए मुफीद रहा. यह दौर 80 के दशक तक चला. मराठी रंगमंच के अभिनेता नाना पाटेकर, नसीरुद्दीन शाह व ओम पुरी के हमउम्र थे. हालांकि हिंदी सिनेमा में गमन (1978) फिल्म से उन्होंने कदम रखा पर उन्हें प्रसिद्धि 90 के दशक में रिलीज हुई परिंदा, प्रहार, अग्निशाक्षी और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों से मिली.
Saturday, October 03, 2026
फिल्म-27 डाउन की याद, जिसकी चर्चा अक्सर छूट जाती है
समांतर सिनेमा की हिंदी में जब भी बात होती है, मणि कौल, कुमार शहानी की फिल्मों का नाम ऊपर आता है. उनकी फिल्में मसलन, उसकी रोटी, माया दर्पण साहित्यिक कृतियों पर आधारित रही. हिंदी उपन्यास, अठारह सूरज के पौधे (रमेश बक्षी), पर आधारित और राष्ट्रीय पुस्कार से सम्मानित एक फिल्म ‘27 डाउन’ की चर्चा अक्सर छूट जाती है. इस फिल्म के निर्देशक अवतार कौल थे, जिनका आज (27 सितंबर) जन्मदिन है. महज 35 वर्ष की आयु में डूबने से उनकी मौत हो गई और उनके नाम बतौर निर्देशक यही एक मुकम्मल फिल्म है.
हाल ही में प्रकाशित किताब ‘अवतार कौल: द (इन) कंप्लीट स्टोरी’ में विनोद कौल ने नोट किया है कि, “यह सोचकर एक अजीब-सी कसक होती है कि यह फिल्म इतनी सारी दूसरी फिल्मों की शुरुआत थी, और अवतार की यात्रा का अंत भी. वह हमें और कितना कुछ दे सकते थे.” मणि कौल इस फिल्म के बड़े प्रशंसक थे. मणि कौल और शहानी की तरह ही अवतार ने सिनेमा का विधिवत प्रशिक्षण लिया था. वे 60 के दशक में न्यूयॉर्क के सिटी यूनिवर्सिटी में फिल्म निर्माण के छात्र थे.
आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में इसे रेखांकित किया जाता रहा है? जहाँ ‘उसकी रोटी’ या ‘माया दर्पण’ आम दर्शकों के लिए बोधगम्य नहीं रही, वहीं 27 डाउन आसानी से दर्शकों के भाव बोध का हिस्सा बन जाती है.
आजाद भारत में जवान हो रही पीढ़ी के सपने, कश्मकश, स्त्री-पुरुष संबंधो, सामाजिक दबाब और वैयक्तिक इच्छा के द्वंद को रेल के रूपक के माध्यम से निर्देशक ने बेहद कुशलता औऱ संवेदनशीलता के साथ श्वेत-श्याम छवियों में उकेरा है. ट्रेन कंडक्टर संजय (एम के रैना) और एलआईसी में नौकरी करने वाली शालिनी (राखी) इस फिल्म के मुख्य पात्र है.
प्रसंगवश, एनएसडी से प्रशिक्षित एम के रैना की यह पहली फिल्म थी. जहाँ रैना ने एक ऐसा किरदार को निभाया है जो निर्णय लेने में अक्षम है, घुटता रहता है और दो पाटों के बीच पीसता रहता है. संजय एक ऐसा नायक है कि जिसके जीवन में कहीं ठौर नहीं है और वह रेल के डिब्बे की तरह यात्रा में हमेशा भटकने के लिए अभिशप्त है. वहीं शालिनी का किरदार उस दौर में स्त्री पात्रों से साफ अलग है. एक काम-काजी स्त्री के चरित्र को राखी ने बखूबी निभाया है. संजय के व्यक्तिव पर उसके रौबदार पिता (ओम शिव पुरी) की छाया हमेशा हावी रहती है.
इस फिल्म के रेल के कुछ दृश्य हमेशा के लिए मन में रच-बस जाते हैं. चलती गाड़ी में इस फिल्म को शूट किया गया था. उल्लेखनीय है कि सिनेमैटोग्राफर ए के बीर (एफटीआईआई) की यह पहली फिल्म थी और उन्हें राष्ट्रीय पुस्कार मिला. लेकिन इस फिल्म में ध्वनि के इस्तेमाल को भी अलग परखा जाना चाहिए. हरिप्रसाद चौरसिया और भुवनेश्वर मिश्र ने इस फिल्म का संगीत दिया था साथ सत्यजीत रे के सहयोगी रहे बंसी चंद्रगुप्त ने प्रोडक्शन डिजाइन किया था.
पिछले दिनों तिग्मांशु धूलिया ने हिंदी फिल्मों में कहानी के न होने का जिक्र किया था. ऐसा नहीं है कि कहानी का कोई अभाव हो, बस साहित्य के तरफ आज के निर्देशक रुख नहीं करना चाहते है.

