पिछली सदी के 70 के दशक में समांतर सिनेमा आंदोलन थिएटर से आए अदाकारों के लिए मुफीद रहा. यह दौर 80 के दशक तक चला. मराठी रंगमंच के अभिनेता नाना पाटेकर, नसीरुद्दीन शाह व ओम पुरी के हमउम्र थे. हालांकि हिंदी सिनेमा में गमन (1978) फिल्म से उन्होंने कदम रखा पर उन्हें प्रसिद्धि 90 के दशक में रिलीज हुई परिंदा, प्रहार, अग्निशाक्षी और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों से मिली.
पचास वर्षों में फैले करियर में विभिन्न किरदारों में उनका अभिनय निखर कर आता रहा. हर दर्शक वर्ग के अपने ‘नाना’ रहे. कुछ वर्ष पहले मैंने उनकी मराठी फिल्म 'नटसम्राट' (2016) दिल्ली के सिरीफोर्ट सभागार में देखी थी, जिसकी याद आज भी ताजा है. महेश मांजेकर निर्देशित यह फिल्म मराठी में बहुचर्चित और बहुप्रशंसित रही. कुसुमाग्रज लिखित इस नाटक को वर्षों रंगमंच पर श्रीराम लागू प्रस्तुत करते रहे, पर मराठी रंगमंच से जुड़े रहने के बावजूद नाना ने इसे मंच पर नहीं खेला. लेकिन जब इसी नाटक को रूपहले पर्दे पर नाना पाटेकर ने निभाया तब वह उनके जीवन के सर्वश्रेष्ठ किरदारों में रहा.
यह फिल्म गणपतराव बेलवलकर (नाना पाटेकर) के इर्द-गिर्द घूमती है. जीवन में वे शेक्सपियर के नाटकों के चर्चित अभिनेता रहे और उन्हें ‘नटसम्राट’ कहा जाता रहा. संवाद अदायगी ने इस किरदार को यादगार बनाया. सच तो यह है कि संवाद अदायगी और एक खास तरह की अभिनय शैली जिसमें आंगिक और वाचिक दोनों शामिल रहा, उन्हें विशिष्ट अभिनेता बनाया.
एक नाट्यकर्मी के आक्रोश, असहायता बोध और बुढ़ापे में घर-परिवार की उपेक्षा और आत्मसम्मान को पूरी शिद्दत के साथ नाना ने जिया. इसमें हास्य बोध भी शामिल है. ऐसा लगता है कि पूरे जीवन का अनुभव उनके अभिनय में रच-बस गया हो. दर्शक उनके किरदार से भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है. फिल्म के शुरुआत में यह पंक्ति आती है- असा नट होण नाही! (ऐसा अभिनेता होना आसान नहीं). प्रकारांतर से यह बात नाना पाटेकर के बारे में भी कही जा सकती है.
विधु विनोद चोपड़ा की क्लासिक फिल्म 'परिंदा' में नाना ने अन्ना (गैंगस्टर) का किरदार जिस अदा से निभाया है उसके लिए उन्हें राष्ट्रीय और फिल्मफेयर पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. इसी फिल्म से उन्हें एक बड़े दर्शक वर्ग में पहचान मिली. वहीं जब उन्होंने ‘प्रहार’ में एक सैनिक (मेजर चौहान) की भूमिका निभाई और जिस यथार्थ से दर्शकों का परिचय कराया वह आज भी झकझोरती है. फिल्म में मेजर चौहान एक जगह कहता है: “मुफ्त में मिली आजादी की वजह से देश को बहुत सस्ता समझ रहे हैं आज के लोग.” गौरतलब है कि इस फिल्म उन्होंने खुद ही लिखा और निर्देशित किया था.
अपनी आवाज के जादू से लोगों को बांधने वाले नाना ने 'खामोशी: द म्यूजिकल' में एक गूंगे का अभिनय कर लोगों को चौंकाया था. बाद के दशक में ‘अब तक छप्पन’ और ‘वैलकम’ जैसी फिल्मों में भी उन्हें काफी सराहा गया. गंभीर और अंतर्मुखी किरदारों के साथ-साथ हल्के-फुल्के मनोरंजक भूमिकाओं में भी वे उतने ही सहज और प्रभावशाली रहे.
नाना पाटेकर के फिल्मों का रेंज काफी विविध रहा. हिंदी फिल्मों के साथ-साथ मराठी फिल्मों में उनके योगदान का सम्यक मूल्यांकन किया जाना अभी बाकी है.

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