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Saturday, July 01, 2017

प्रतिरोध वाया सोशल मीडिया

जंतर-मंतर पर क़रीब तीन-चार हज़ार लोग मौजूद थे. जितने लोग उतने ही कैमरे. प्रदर्शनकारियों में शायद ही कोई ऐसा था जो फेसबुक, ट्विटर या इंस्टाग्राम जैसे ‘न्यू मीडिया’ पर मौजूद नहीं हो. जो ऑन लाइन पोर्टल से जुड़े पत्रकार थे, वे वहीं से ‘फेसबुक लाइव’ के जरिए इस मुहिम को बाहर लोगों के बीच ले जा रहे थे और आम नागरिक सोशल मीडिया के माध्यम से. कुछ टेलीविजन चैनलों पर भी इस विरोध प्रदर्शन को प्रसारित किया जा रहा था.

फ़िल्मकार सबा दीवान की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित होकर देश (और विदेश) के विभिन्न शहरों में एक साथ हुए इस प्रतिरोध के अगले दिन साबरमती में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा (अंतत:) कि 'गौ-भक्ति' के नाम पर लोगों की हत्या स्वीकार नहीं की जा सकती'. देखा जाए तो गौरक्षा के नाम पर गोरखधंधा करने वालों के ख़िलाफ़ यह प्रतिरोध एक हद तक सफल रहा और इसका श्रेय सोशल मीडिया (बजरिए इंटरनेट) को जाता है.

लोकतंत्र में राजनीतिक भागेदारी और राजनीतिक दलों के संचार में मीडिया की प्रमुख भूमिका रही है. साथ ही किसी भी सामाजिक आंदोलन में मीडिया की सहभागिता जरूरी है. मोदी सरकार की अघोषित नीति मेनस्ट्रीम (प्रिंट और टेलीविजन) के बदले न्यू मीडिया को तरजीह देने की है. ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ‘ऑन लाइन’ मीडिया की दुनिया में सबसे ज्यादा सक्रिय रहने वाले नेताओं में से एक है. ट्विटर पर उनके 30.9 मिलियन (तीन करोड़ नौ लाख) और फेसबुक पर 41.7 मिलियन (चार करोड़ 17 लाख) फॉलोअर हैं. लेकिन इस बार नागरिक समाज के लोग उन्हीं हथियारों का इस्तेमाल सत्ता के ख़िलाफ़ करने में सफल रहे, जिसका इस्तेमाल मौजूदा सरकार करती रही है.

रिपोर्टों के मुताबिक मई 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से गौरक्षा, गौमांस के नाम पर देश के विभिन्न भागों में मुसलमानों के ऊपर क़रीब 32 हमले हुए हैं. मारे गए लोगों में मोहम्मद अखलाक, पहलू खान, जुनैद खान आदि महज नाम बन कर रह गए हैं.  साथ ही इस सांप्रदायिक भीड़ की हिंसा के शिकार (लींचिंग) दलित भी हुए हैं. निस्संदेह इस भीड़ को सत्ता की भाषा- जो ‘श्मशान और कब्रिस्तान’ में लिपटी हुई है, से बल मिला है.
मोदी सरकार के बनने के तीन साल बाद शायद पहली बार, बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के, सिर्फ सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर हिंसा के खिलाफ प्रतिरोध में नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) की आवाज़ एक वृहद स्तर पर मुखर हुई है. हालांकि जब तक ‘ऑन लाइन’ प्रतिरोध को ‘ऑफ लाइन (ज़मीनी स्तर पर)’ हो रहे विभिन्न प्रतिरोधों से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक इसकी सफलता संदिग्ध रहेगी.

विरोध प्रदर्शन के अगले दिन यानी 29 जुलाई की तारीख़ को दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिंदी अख़बारों- नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, हिंदुस्तान और दैनिक जागरण में किसी ने भी पहले पन्ने पर इस ख़बर को जगह नहीं दी. अंदर के स्थानीय पन्ने पर किसी कोने में एक तस्वीर या दो-तीन कॉलम की छोटी सी ख़बर देकर इस प्रदर्शन को निपटा दिया गया. वहीं, दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी अख़बारों—हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू अख़बार के पहले पन्ने पर तस्वीर के साथ विस्तृत ख़बर भी छपी थी.

भले ही किसी राजनीतिक बैनर के तले जंतर-मंतर और अन्य शहरों में जनता नहीं जुटी हो पर ‘NotInMyName’ का जो नारा बुलंद हुआ उसकी जबान बहुसंख्यक भारतीयों की जबान नहीं है. इस ऑनलाइन मीडिया और प्रतिरोध की संस्कृतियों को दूर-दराज, छोटे शहरों-कस्बों पर पहुँचाने कि लिए इन संस्कृतियों को देशज (vernacular) होना होगा, साथ ही इन संस्कृतियों का देशजीकरण (vernacularisation of protest) करना होगा. जाहिर है भाषाई अख़बारों की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण हो सकती है.

अंग्रेजी मीडिया के बदले हमें यह देखना होगा कि हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं (regional/vernacular) में इन प्रतिरोधों की अनुगूंज किस रूप में है?  जरूरत भाषाई अख़बारों में चल रहे विमर्श को बदलने की है, जिसका प्रसार देश के गाँवो, क़स्बों तक है. यहाँ इस बात का उल्लेख जरूरी है कि मंडल-कमंडल की राजनीति में भाषाई मीडिया सांप्रदायिक एजेंडे को आगे में बढ़ाने में हमेशा तत्पर रही है.


ग़ालिब ने लिखा है कि ‘फरियाद की कोई लय नहीं है’, पर सत्ता के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की आवाज़ तो बुलंद होनी ही चाहिए जो दूर, एक बहुसंख्यक वर्ग तक पहुँचे और एक बड़े नागरिक समाज को लामबंद कर सके.

Tuesday, March 01, 2016

सरकार का नहीं, सस्ती सिगेरट का साथ

हिंदुस्तान टाइम्स में एक ख़बर पढ़ी कि उमर खालिद ने हिरासत में पुलिस से सिगरेट और अख़बारों की मांग की. पता नहीं इस ख़बर में कितनी सच्चाई है, पर मुझे हिंदी के चर्चित कवि आलोकधन्वा की कविता की पंक्तियाँ याद हो आई:
'सरकार ने नहीं--इस देश की सबसे
सस्ती सिगरेट ने मेरा साथ दिया'

आलोकधन्वा ने जब 1972 में इन पंक्तियों को लिखा, वह दौर अलग था. आजादी के बाद जवान हुई उस पीढ़ी के कुछ सपने थे. युवाओं मेंराज्य और सत्ता के प्रति आक्रोश था. समाज के प्रति एक प्रतिबद्धता थी. खुद आलोकधन्वा नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़े हुए थे.

सपने तो उदारवाद के दौर में पली-बढ़ी हमारी पीढ़ी के भी हैं, समझदारी भी है, पर प्रतिबद्धता खो गई है. हम सब अपनी दुनिया, ईएमआई की किस्तों और शबो रोज़ हो रहे तमाशे में उलझे हुए हैं.

बहरहाल, उमर का साथ सरकार तो नहीं ही दे रही है, उसे सिगेरट भी मयस्सर नहीं!  जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया, उमर खालिद और अन्य छात्रों पर देशद्रोह का आरोप है. वे पुलिस हिरासत में हैं. 

60 के दशक के आखिरी सालों में जब जेएनयू की स्थापना हुई थी, तब पेरिस और यूरोप के अन्य देशों के विश्वविद्यालय के युवा छात्र राज्य और सरकार की नीतियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे. वियतनाम के खिलाफ अमेरिकी सरकार के युद्ध के विरोध में छात्र सड़कों पर थे. एक तरह से जेएनयू की जन्मकुंडली में संघर्ष, समाज के हाशिए के प्रति एक न्यूनतम सरोकार और सक्रियता लिखी हुई थी. इन वर्षों में जेएनयू के छात्रों ने कैंपस के अंदर और बाहर इस परंपरा को एक हद तक निभाया भी है.

शुक्रवार को संसद में हुए बहस के दौरान जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष सीताराम येचुरी और देवी प्रसाद त्रिपाठी ने बखूबी याद किया कि किस तरह आपातकाल के दौरान जेएनयू का छात्रसंघ भूमिगत रहते हुए भी इंदिरा गाँधी की दमनकारी नीतियों और सत्ता के बरक्स प्रतिरोध का एक प्रमुख केंद्र बना रहा. छात्रसंघ अध्यक्ष त्रिपाठी समेत कई छात्र मीसा के तहत गिरफ्तार किए गए थे.

प्रसंगवश, वर्ष 2012 में निर्भया के बलात्कारियों के खिलाफ कैंपस के बाहर सड़कों पर जेएनयू के छात्र इस लड़ाई को लेकर उतरे. धीरे-धीरे दिल्ली और फिर मीडिया के मार्फत पूरे देश में यह लड़ाई फैली. शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि एक जघन्य बलात्कार के खिलाफ रोष और आंदोलन में छात्रों ने अग्रणी भूमिका निभाई. बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के उन्होंने अपनी आवाज़ देश और देश के बाहर पहुँचाई थी.


जेएनयू देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में से एक है. नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रीडेशन कौंसिल (NACC) ने इसे देश के विश्वविदयालयों में सबसे उत्कृष्ट ग्रेड से नवाजा है.

हालांकि, इन दिनों कैंपस में लगे तथाकथित देश विरोधी नारों की वजह से जेएनयू चर्चा में है. चारो तरफ सत्य और अर्ध सत्य से भरी जानकारियाँ फैली हुई है. यह महज सोशल नेटवर्किंग साइट पर ही नहीं है, बल्कि कई ज्ञानी, बुद्धिजीवी, नेता भी इस तरह के कुप्रचार में सलंग्न है.

सरकार और उसकी मशीनरी, जिसमें कुछ मीडिया घराने भी हैं, इस आग को हवा देन में लगी है. गृहमंत्री एक फर्जी ट्विट के आधार परजेएनयू के छात्रों का संबंध आतंकवाद से जोड़ते हैं, देशद्रोही कहते हैं. शिक्षामंत्री झूठ का पुलिंदा संसद में लहराती है और भावुक होकरगलतबयानी करती हैं. प्रधानमंत्री रात में इस झूठी तकरीर को ट्विटर पर शेयर करते हैं. 'सत्यमेव जयते' लिखते हैं. यहाँ तथ्य और सत्यके बीच कोई संबंध नहीं होता. सरकार झूठ गढ़ती है. मीडिया उसका प्रसार करती है. भक्त वाह, वाह करते हैं!

युवा वर्ग हर दौर में स्वप्नजीवी होता है. उनके सपने होते हैं. समाज, व्यवस्था और खुद से लड़ने का जज्बा किसी से भी ज्यादा होता है. आदर्श और यर्थाथ के बीच लड़ाई भी इसी दौर में चलती रहती है. विश्वविद्यालय का कैंपस इन सपनों, संघर्षों और शिक्षा के लिए एक आदर्श भूमि होती है. जाहिर है, छात्रों को विश्वविदयालयों में सीखने (जिनमें उनकी मूर्खताएँ भी शामिल हैं), विचारों को एक सान देने, वाद-विवाद-संवाद की एक प्रक्रिया से गुज़रने का मौका मिलना ही चाहिए. बिना इसके विश्वविद्यालय ज्ञान सृजन का केंद्र बने नहीं रह सकते हैं. जेएनयू कैंपस विचारों के इस खुलेपन और लोकतांत्रिक स्पेस के कारण ही देश-दुनिया में अपनी पहचान बना पाया है.   

संभव है कि युवाओं के सपनों में कुछ भ्रांतियाँ भी हो. पर राज्य उस पर अपनी सारी शक्तियों के साथ दमन नहीं करता.  जेएनयू में लगे तथाकथित नारों (इसमें कुछ बाहरी लोग भी शामिल थे जिनकी शिनाख्त अभी तक नहीं हो पाई है) की निंदा कैंपस, कैंपस के बाहर और संसद में हुई. छात्रसंघ ने भी अगले दिन ही पर्चा निकाल खुद को इस कार्यक्रम से दूर कर इन नारों की भर्त्सना की थी.  हालांकि देश के सभी जाने माने न्यायविद इस बात पर एक मत हैं कि जेएनयू में लगाए गए तथाकथित नारे देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आते.


यहाँ पर इस वाकये का जिक्र जरूरी है, प्रसंग और वर्ष भले ही सुदूर इतिहास के हो.  वर्ष 1933 में ऑक्सफोर्ड यूनियन, अंडर ग्रेजुएट डिबेटिंग सोसाइटी,  ने एक प्रस्ताव पास किया कि ‘सदन किसी भी सूरत में राजा और देश के लिए लडाई नहीं लड़ेगा.’ इसी दौर में हिटलर की सत्ता उभार पर थी.  ब्रिटेन में सदन के इस प्रस्ताव की व्यापक आलोचना और अवहेलना हुई.  पर गौरतलब है कि जब 1939 में हिटलर ने ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध घोष किया तब इन्हीं छात्रों ने, जो इस वाद-विवाद में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था, देश के लिए प्राणों की आहूति भी दी थी!

                                                         ( द लल्लन टॉप पर प्रकाशित)