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Sunday, June 26, 2022

संकट में टेलीविजन समाचार चैनल


टेलीविजन चैनलों पर आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर टेलीविजन समाचार चैनलों की संस्कृति अक्सर सवालों के घेरे में रहती है. उदारीकरण के बाद देश में सेटेलाइट टेलीविजन चैनलों का अभूतपूर्व विकास हुआ और आज करीब चार सौ समाचार चैनल विभिन्न भाषाओं में मौजूद हैं. सवाल है कि पिछले दशकों में टेलीविजन समाचार चैनल की प्रमुख प्रवृत्ति क्या रही है? क्या ये चैनल लोकतंत्र में खबरों, बहस-मुबाहिसा के माध्यम से गुणात्मक परिवर्तन लाने में सफल रहे हैं?

टेलीविजन स्क्रीन पर वही दिखता है जिसे कैमरा रिकॉर्ड कर सकता है. यहाँ तकनीकी की प्रधानता है, लेकिन कैमरा के पीछे और उसे निर्देशित करने वालों की भूमिका साथ-साथ चलती है. भारत में टेलीविजन समाचार संस्कृति का विकास जिस रूप में हुआ है उसमें खबरों के संग्रहण-प्रसारण से ज्यादा जोर स्टूडियो में होने वाले बहस-मुबाहिसा पर है. इसमें जो विषय-वस्तु शामिल होते हैं वे सम-सामयिक मुद्दों से जुड़े होते हैं जिनका ज्यादातर हिस्सा राजनीतिक बहसों को समर्पित होता है.
यहाँ पर एंकरों की भूमिका प्रमुख हो उठती है, हालांकि एंकर और प्रोड्यूसर का ध्यान ऐसे मुद्दों पर बहस करवाना होता है जिससे कि स्टूडियो में एक नाटकीयता का संचार हो. इनका उद्देश्य दर्शकों की सोच-विचार में इजाफा करना नहीं होता, बल्कि उनके चित-वृत्तियों के निम्नतम भावों को जागृत करना होता है. ऐसे में एंकरों-प्रोड्यूसरों की तलाश उन मुद्दों की तरफ ज्यादा रहती है जिसमें सनसनी का भाव हो. यह बाजार के भी हित में है. अपवादों को छोड़ दें तो अधिकांश समाचार चैनलों के सरोकार जनता से नहीं जुड़े हैं. इनका ध्यान सूचनाओं, विमर्शों के मार्फत ‘लोक’ को सशक्त करने में नहीं है, जिससे कि वे लोकतंत्र में एक सजग नागरिक की भूमिका निभा सके.
यह सच है कि टेलीविजन की वजह से देश में खबरों की पहुँच गाँव-कस्बों, झुग्गी-झोपड़ियों तक हुई और इससे लोकवृत्त का विस्तार हुआ है. साथ ही एक ऐसा नेटवर्क बना है जिसमें जो केंद्र से दूर थे वे नजदीक आए है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों के समाचार चैनलों की विषय-वस्तु और भाषा-शैली का विश्लेषण करने से स्पष्ट है कि यहाँ एंकरों, जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं, में एक उग्रता,एक आक्रमता दिखती है जो जनसंचार में सहायक नहीं है. जब बात राष्ट्रवाद, धार्मिक सौहार्द या अल्पसंख्यकों के हितों की हो टेलीविजन चैनलों की प्रतिबद्धता नागरिक समाज और लोकतंत्र के प्रति नहीं दिखती है. इनमें एक पेशेवर रवैये का सर्वथा अभाव दिखता है.
बीस साल पहले जब मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था, तब कहा जा रहा था कि टेलीविजन मीडिया अभी शैशव अवस्था में है. यह संक्रमण काल है और कुछ वर्षों में ठीक हो जाएगा. लेकिन पिछले कुछ सालों की प्रवृत्ति पर गौर करें तो लगता है कि यह संक्रमण फैलता ही गया. पहले मुख्य रूप से हिंदी के समाचार चैनल इससे ग्रसित थे, अब अंग्रेजी के चैनल भी इसकी चपेट में आ गए हैं. पहले खबरों के उत्पादन और प्रसारण में भाषाई और अंग्रेजी समाचार चैनलों में एक विभाजक रेखा स्पष्ट दिखती थी, जो तेजी से मिट रही है. ऐसे में टेलीविजन समाचार चैनलों पर विश्वसनीयता का भारी संकट है, जो लोकतंत्र के हित में नहीं है.