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Thursday, November 08, 2018

बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स

मेरी किताब बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स' की प्री बुकिंग हो रही है।  अमेज़न से आप ख़रीद सकते हैं। किताब अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली से छपी है।

https://www.amazon.in/dp/B07K3CDC5J

किताब के बारे में: 


यह किताब वैचारिक लेखन में बहुआयामी है। लेखक की संवेदनशील दृष्टि, विषय-वस्तु का दायरा, मार्मिक अंदाज़ और सहज भाषा एक अलग आस्वाद लिए है जिसे लेखन की किसी एक विधा में अंटाया नहीं जा सकता।

संकलित लेखों में निजीपन, व्यक्ति विशेष, लोक-शहर के प्रति अनुराग एकाधिक बार है। लंदन, पेरिस, वियना, शंघाई, कोलंबो, दिल्ली, बंगलुरु, पुणे, श्रीनगर के साथ-साथ मैकलोडगंज, मगध, मिथिला व बेलारही, तिलोनिया, तरौनी जैसे गाँव भी हैं। जेएनयू और जिगन विश्वविद्यालय भी है। ग्लोबलऔर लोकलकी इस घुमक्कड़ी में जहाँ कुछ पहचाने चेहरे हैं, वहीं कुछ अनजाने राही। समंदर की आवाज़ के साथ-साथ डबरा, चहबच्चा की अनुगूंज भी है। होटल-रेस्तरां के साथ-साथ ढाबा भी।

इन पन्नों में समंदर पार से लहराती आती रेडियो की आवाज़ है। उदारीकरण के बाद अख़बार के पन्नों पर फैली ख़ुश ख़बरहै। न्यूज़रूम नेशनलिज्मकी आहट भी। बॉलीवुड का स्थानीय रंग है, हिंदुस्तानी और लोक संगीत की मधुर धुन है, साथ ही नौटंकी का शोक गीत भी। मिट्टी पर बने कोहबर की ख़ुशबू एक तरफ़ है, हवेलियों में बिखरते भित्तिचित्र दूसरी तरफ़।

उदास गिरगिट से बात करता हुआ एक विद्रोही कवि है। हाथ पकड़ कर सिखाने वाला एक कबीरा पत्रकार है। स्वभाव के विपरीत नहीं जाने की सलाह देने वाला एक फक्कड़ फ़िल्मकार भी। एक तरफ़ नॉस्टेल्जिया, स्मृति और विस्मृति के गह्वर हैं, दूसरी तरफ़ वर्तमान का यथार्थ है और भविष्य के रोशनदान भी।

उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में, 21वीं सदी के दो दशकों के बीच, लिखे गए इन लेखों में एक पत्रकार और शोधार्थी का साझा अनुभव है। वादी स्वर एक ब्लॉगर का है। शैली-मैंऔर टोका-टोकीकी है।

किताब अंश: 

https://satyagrah.scroll.in/article/122229/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-writer-arvind-das

https://www.thelallantop.com/bherant/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-by-arvind-das/

https://www.jankipul.com/2018/11/special-write-up-on-baba-nagarjun.html