विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-संवारा.
Saturday, March 14, 2026
त्रिवेणी कला संगम के 75 साल
विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-संवारा.
Tuesday, January 11, 2022
पुस्तक मेले की यादें यानी किताबों से बातें
वर्ष 1972 में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले की शुरुआत
की गई और इस वर्ष स्वर्ण जयंती मनाने की तैयारी थी. वर्ष 1988 में ‘दिल्ली’ शीर्षक से लिखी एक कविता में मंगलेश डबराल ने हताशा भरे स्वर में लिखा था- ‘सड़कों पर बसों में
बैठकघरों में इतनी बड़ी भीड़ में कोई नहीं कहता आज मुझे निराला की कुछ पंक्तियाँ
याद आईँ. कोई नहीं कहता मैंने नागार्जुन को पढ़ा. कोई नहीं कहता किस तरह मरे
मुक्तिबोध.’ दिल्ली भले ही
राजनीतिक सरगर्मियों का केंद्र हो, सत्ता की उठा-पटक
सुर्खियों में रहे, पिछले दशकों में साहित्य-संस्कृति की नगरी के रूप में इसकी
प्रतिष्ठा रही है. वर्तमान में यह साहित्यकारों, संस्कृति कर्मियों
का गढ़ है.
किताब के प्रति प्रेम, पठन-पाठन की संस्कृति
भले ही कोलकाता जैसी यहाँ नहीं दिखे, पर देश के
विश्वविद्यालयों के मौजूद होने से एक अकादमिक माहौल यहाँ हमेशा दिखता रहा है. ऐसे
में पुस्तक मेला किताबों के प्रति आम लोगों के प्रेम को दर्शाता है. पिछले वर्षों
में बच्चों के लिए लगने वाले स्टॉलों पर भी खूब भीड़ दिखाई देती रही है. स्कूल
जाने वाले बच्चे अपने माता-पिता के साथ यहाँ दिखते हैं. प्रसंगवश दिल्ली में स्थित ‘चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट’ जैसी जगह देश में बेहद कम है, जहाँ के पुस्तकालय
में केवल बच्चों के लिए किताबें मौजूद हों. कुछ व्यक्तिगत प्रयासों को छोड़ दें तो
पूरे देश में बच्चों के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय का सर्वथा अभाव दिखता है. यहाँ तक
कि बड़ों के लिए जो पुस्तकालय हैं, वहाँ भी बच्चों के लिए किताबों का कोई
कोना ढूंढ़ने पर ही मिल पाता है. इस बार के मेले में
बच्चों के लिए लिखने वालों का एक कोना भी पुस्तक मेले के आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट
(एनबीटी) ने प्रस्तावित किया था.
इसी तरह हिंदी के बुक स्टॉलों पर भी अंग्रेजी के
मुकाबले पाठकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. जहाँ वर्तमान समय में शहर में पुस्तक
संस्कृति और मध्यवर्ग के जीवन में किताबों की अहमियत घटती दिख रही है वहीं हर साल
पुस्तक मेले के आंकडें कुछ अलग ही तस्वीर बयां करते हैं. किताबों के पढ़ने, खरीदने और लोगों में
बांटने का एक अलग समाजशास्त्र होता है. यह सच है कि जिस अनुपात में लोगों के पास
पैसा बढ़ा है, पढ़ने की फुर्सत उतनी ही कम हुई है. पर पुस्तक मेले मे आने जाने वालों लोगों
को देख कर निसंस्देह कहा जा सकता है कि एक नया पाठक और नव शिक्षित वर्ग उभरा है, जिसमें पढ़ने की
भरपूर ललक है.
पुस्तक मेले में उन लेखकों से अनायास मिलना हो जाता
है, जिन्हें
आप किताबों में पढ़ते रहे हों. करीब दो दशक पहले हिंदी
के चर्चित कवि केदारनाथ सिंह मेले में मिले, मैंने पूछा कि आपने लिखा है कि 'यह जानते हुए भी कि लिखने से कुछ नहीं होगा, मैं लिखना चाहता हूँ'. ऐसा क्यों लिखा है आपने? केदारजी ने मुस्कुराते हुए, आत्मीयता से कहा था ‘यहाँ क्या बोलूं, घर आइए, वहीं
बैठ कर बात करेंगे.’ मेले के दौरान नवोदित, उभरते हुए रचनाकारों को भी
सहज मंच मिल जाता है. इसी तरह वर्ष 2017 में मंगलेश डबराल की ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ का संकलन मेले के आखिरी दिन मुझे
राजकमल प्रकाशन के बुक स्टॉल पर दिखी. मैंने एक प्रति ली और हॉल के बाहर कुछ
मित्रों के संग बैठे मंगलेश डबराल को दिखाया था. उन्होंने खुद भी सध: प्रकाशित किताब की
यह प्रति नहीं देखी थी. इस किताब पर प्रेम से मेरे लिए उन्होंने ‘शुभकामनाएँ’ अपनी सुंदर लिखावट में दर्ज की. अब बस इन दिवंगत कवियों की यादें हैं.
कोरोना के दौरान पठन-पाठन की संस्कृति खूब प्रभावित
हुई जिसका लेखा-जोखा मुश्किल है. महानगरों में स्थित कई किताबघर बंद हुए. ऐसे में पुस्तक मेला पढ़ने-लिखने वालों
के लिए रोशनदान की तरह है. उम्मीद की जानी चाहिए कि कोरोना की तीसरी लहर जैसे ही
कम होगी एक बार फिर से पुस्तक प्रेमी ‘किताबों से बातें
करने’ के लिए मेले में
मिलेंगे.
(न्यूज 18 हिंदी के लिए)
Thursday, September 02, 2021
सिनेमा संस्कृति की बदलती तस्वीर
मुंबई भले ही मायानगरी हो, सिनेमा की संस्कृति दिल्ली में फली-फूली. आम दर्शकों के अलावे दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कई नेता सिनेमाप्रेमी हुए हैं. पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक. पिछले दिनों मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जब दक्षिण दिल्ली में स्थित प्रिया सिनेमाहॉल के आधुनिक साज-सज्जा और तकनीक से लैस, नवीन रूप का उद्घाटन किया तो उन्होंने शिद्दत से सिनेमा के प्रति अपने प्रेम को याद किया. प्रिया में ही ‘बैल बॉटम’ फिल्म के ट्रेलर के लांच के अवसर पर अभिनेता अक्षय कुमार ने उन दिनों को याद किया जब ‘ब्लैक’ में टिकट लेकर उन्होंने दिल्ली के अम्बा सिनेमाहॉल में ‘अमर अकबर एंथोनी’ देखी थी. किसी भी शहर की संस्कृति को सिनेमा के रास्ते भी हम देख-परख सकते हैं. दिल्ली में कई पुराने सिनेमाघर आज बंद हो गए हैं, पर उन सिनेमाघरों की स्मृति लोगों के जेहन में है. मिनरवा, फिल्मिस्तान, कमल, पारस, सावित्री कुछ ऐसे ही नाम हैं. किसी भी शहर के लिए सिनेमाघर लैंडमार्क की हैसियत रखते हैं. सिनेमाघरों की रोशनी से शहर के कोने प्रकाशित होते रहे हैं.
यूँ तो किसी भी सिनेमा हॉल के नवीनीकरण की घटना सामान्य ही कही जाएगी, लेकिन दिल्ली की सिनेमा संस्कृति में प्रिया सिनेमाहॉल खास महत्व रखता है. कोरोना महामारी से पहले ही इसे नए रूप में लाने की तैयारी शुरु हुई थी. महामारी के दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेनसिंग की वजह से करीब दो साल के बाद इसे आम दर्शकों के लिए फिर से खोला गया है.
प्रसंगवश, महामारी के दूसरी लहर के बाद ‘बैल बॉटम’ बॉलीवुड की पहली बड़े बजट की फिल्म है जिसे सिनेमाघरों में रिलीज किया गया है. हालांकि सिनेमाघरों में अभी भी पचास प्रतिशत सीट ही दर्शकों के लिए उपलब्ध हैं. ऐसे में डिस्टेनसिंग का पालन करते हुए परिवार या दोस्तों के साथ सिनेमा देखने का लुत्फ नहीं उठाया जा सकता है. जाहिर है, कोरोना महामारी के दौरान ओटीटी प्लेटफार्म ने मध्यवर्गीय दर्शकों के सिनेमा देखने की संस्कृति को काफी बदल दिया है. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान जोर देकर कहा कि “अभी लोग लैपटॉप, टीवी, मोबाइल पर सिनेमा देख रहे हैं, पर सिनेमा को वापस हॉल में आना ही होगा. यह एक सामूहिक अनुभव है. छोटे परदे पर आप दृश्य, ध्वनि की बारीकियों से वंचित हो जाते हैं. घर में बहुत तरह के व्यवधान भी मौजूद रहते हैं.” महीनों बाद जब हम सिनेमाहॉल (पीवीआर प्रिया XL) में पहुँचे तो इसे बखूबी महसूस किया. हालांकि यह नोट करना उचित होगा कि अक्षय कुमार अभिनीत ‘बैल बॉटम’ हाल ही में ओटीटी पर रिलीज हुई मलयालम फिल्मों के टक्कर की नहीं कही जा सकती. कोरोना महामारी के दौरान इस फिल्म की शूटिंग हुई थी जिसका दबाव इस फिल्म के निर्माण-निर्देशन में है.
बहरहाल, उदारीकरण-भूमंडलीकरण के कारण पिछले सदी के नब्बे के दशक में समाज में आए बदलावों के साथ ही महानगरों में सिनेमा देखेने की संस्कृति भी प्रभावित हुई. सिंग्ल स्क्रीन की जगह मल्टीप्लेक्स ने ले लिया और सिंग्ल स्क्रीन थिएटर धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए. आज देश में करीब तीन हजार स्क्रीन मल्टीप्लेक्स में उपलब्ध हैं. प्रिया सिनेमा के मालिक अजय बिजली ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी विलेज रोडशो के साथ साझेदारी में प्रिया विलेज रोडशो लिमिटेड (1995), जिसे पीवीआर से नाम से हम जानते हैं, शुरु किया. इस साझेदारी को वे प्रिया के साथ ही आरंभ करना चाह रहे थे, इसलिए इसे पीवीआर नाम दिया गया, पर दक्षिण दिल्ली में स्थित अनुपम सिनेमाघर को मल्टीप्लेक्स में बदल कर वर्ष 1997 में इसकी विधिवत शुरुआत हुई, प्रिया भी वर्ष 2000 में पीवीआर प्रिया में तब्दील हुआ. इसे आज भी सिंग्ल स्क्रीन ही रखा गया है.
जेएनयू के बेहद करीब होने की वजह से कॉलेजों के छात्र-छात्राओं के मिलने-जुलने, डेटिंग का प्रिया सिनेमा एक प्रमुख अड्डा था. बदलती दिल्ली की एक छवि यहाँ आने पर मिल जाती थी. 70 के दशक में शुरु हुए इस सिनेमा हॉल के बारे में सिनेमा समीक्षक जिया उस सलाम ने ‘दिल्ली: फोर शोज’ में लिखा है, “वर्षों तक प्रिया धनी-मनी सिनेमा प्रेमियों, महिलाओं और पुरुषों के लिए ऐसी जगह रहा जिनके लिए सिनेमा का मतलब हॉलीवुड की ताजातरीन फिल्में थी. कभी-कभी यहां मध्यमार्गी हिंदी फिल्में भी दिखाई जाती थी, पर व्यावसायिक मसाला फिल्मों से निश्चित दूरी रही.” हालांकि बाद के दशक में ही बॉलीवुड की फिल्मों पर यहाँ जोर बढ़ा. इसी बीच समाज में नव मध्यमवर्ग का उभार भी हुआ, जिसे हम बॉलीवुड की फिल्मों की विषय-वस्तु में भी देखते हैं. प्रसंगवश, पीवीआर मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों की आवक से नए तरह की सिनेमा के बनने और प्रसारण का रास्ता भी निकला है. कम बजट की ऑफ बीट फिल्में, जो बॉलीवुड के स्टारों की लकदक से दूर हैं, आसानी से यहाँ दिखाई जाने लगी है.
यह तय है कि आने वाले समय में बॉलीवुड को ओटीटी पर रिलीज होने वाली फिल्मों, वेबसीरिजों से चुनौती का सामना करना पड़ेगा. सवाल है कि सिनेमाघरों तक दर्शकों को खींच लाने के लिए क्या बॉलीवुड तैयार है? सवाल यह भी है कि सिनेमाघरों तक जाने के लिए युवा दर्शक तैयार हैं या सिनेमाहॉल आने वाले समय में नॉस्टेलजिया का हिस्सा बन कर रह जाएगी?
(न्यूज 18 हिंदी के लिए)
Sunday, February 28, 2021
कामगारों के दुख की ध्वनियाँ- ‘ईब आले ऊ’
कई फिल्म समारोहों में दिखाए जाने के बाद प्रतीक वत्स के निर्देशन में बनी फिल्म ‘ईब आले ऊ’ को पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज किया गया है. एक लंबे अरसे के बाद हिंदी में कोई ऐसी फिल्म बनी है जिसमें रोजगार का सवाल, समाज में वर्गीय विभाजन और समकालीन राजनीति पर एक तीखी टिप्पणी है. हालांकि इसे ऐसे बिंबों और ध्वनियों के माध्यम से कहा गया है जिसका विश्लेषण शब्दों में मुश्किल है.
आम तौर पर हम सिनेमा में ध्वनि के इस्तेमाल पर गौर नहीं करते हैं. इस फिल्म के नाम में तीन ध्वनियाँ हैं. ईब-बंदर के लिए, आले-लंगूर के लिए और ऊ-मनुष्य के लिए. विभिन्न प्रकार के ध्वनियों को जिस कुशलता से इस फिल्म में समाहित किया गया है वह इसे विशिष्ट बनाता है. इस फिल्म का कथानक दिल्ली के रायसीना हिल के आस-पास बुना गया है. यहाँ पर सरकारी दफ्तर हैं, राजपथ पर गणतंत्र दिवस का परेड होता है. लेकिन यहाँ ‘बंदरों का वर्चस्व है’ और उनका आतंक एक सच्चाई. रायसीना हिल सत्ता का प्रतीक भी है. सत्ता को बंदरों के आतंक से बचाए रखने के लिए कुछ लोगों को बकायदा नौकरी पर रखा जाता है, जो बंदरों को भगाने में माहिर होते हैं. एक बेहतर जिंदगी की तलाश में दिल्ली आए ग्यारहवीं पास अंजनी को इस नौकरी पर उसके जीजा रखबा देते हैं. खुद जीजा और अंजनी की बहन की आर्थिक स्थिति दयनीय है और वे झुग्गी झोपड़ी में रह कर किसी तरह जीवन बसर कर रहे हैं.
गालिब की दिल्ली में अंजनी ‘वजीफाख्वार हुआ’ पर उसे ‘शाह की दुआ’ नहीं मिलती. उसे महिंद्र का साथ मिलता है जो सात पुश्तों से ‘ईब आले ऊ’ की ध्वनि निकाल कर बंदरों को भागता रहा है. महिंद्र के लिए यह ध्वनि निकालना जितना आसान है, अंजनी के लिए वह उतना ही मुश्किल साबित होता है. वह अंजनी से बंदरों की तरह सोचने की ताकिद करता है. अंजनी के लिए नौकरी निभाने और उसे बचाने की जद्दोजहद शुरू होती है. वह बार-बार अपने काम में उलझता जाता है. एक जगह वह कहता हैं- ‘कहाँ नरक में लाके फंसा दिए हैं.’ दिल्ली में रहने वाले प्रवासी कामगारों को जिस अमानवीय परिस्थितियों में नौकरी करनी होती है वह हाशिए के समाज का ऐसा सच है जो सत्ता और सुविधाभोगी वर्ग की आँखों से ओझल ही रहता है.
यह फिल्म बिना किसी मेलोड्रामा के कामगारों के संघर्ष और जिजीविषा को हमारे सामने लेकर आती है. अंजनी के किरदार में शारदुल भारद्वाज का अभिनय दोष रहित है. एक बिहारी प्रवासी की भाषा, माधुर्य, भंगिमा और क्षोभ मिश्रित हताशा के भाव को उन्होंने बखूबी पकड़ा है. वहीं महिंद्र के किरदार में महिंद्र नाथ हैं जो निजी जीवन में बंदर पकड़ने का काम करते हैं. इस फिल्म में कैमरा बंदरों के करतूतों को सहजता से कैद करता है, जो हास्य का संचार करता है. सामाजिक यथार्थ को चित्रित करते हुए फिल्म कहीं भी बोझिल नहीं होती है. बिंबों और रूपकों का इस्तेमाल कर यह फिल्म धार्मिक कट्टरता, राष्ट्रवाद और समकालीन राजनीति पर टिप्पणी करने से भी नहीं चूकती. अपनी पहली फिल्म में जिस विश्वास के साथ प्रतीक वत्स सामने आते हैं उनसे काफी उम्मीद बंधती है.
(प्रभात खबर, 28 फरवरी 2021)
Sunday, June 28, 2020
छोटी फिल्में, बातें बड़ी: अखोनी

Saturday, February 01, 2020
शाहीन बाग़ की औरतें
Tuesday, November 20, 2018
उम्मीद-ए-सहर की बात
Thursday, November 08, 2018
बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स
https://www.amazon.in/dp/B07K3CDC5J
किताब के बारे में:
इन पन्नों में समंदर पार से लहराती आती रेडियो की आवाज़ है। उदारीकरण के बाद
अख़बार के पन्नों पर फैली ‘ख़ुश ख़बर’
है। ‘न्यूज़रूम नेशनलिज्म’ की आहट भी।
बॉलीवुड का स्थानीय रंग है, हिंदुस्तानी और
लोक संगीत की मधुर धुन है, साथ ही नौटंकी का
शोक गीत भी। मिट्टी पर बने कोहबर की ख़ुशबू एक तरफ़ है, हवेलियों में बिखरते भित्तिचित्र दूसरी तरफ़।किताब अंश:
https://satyagrah.scroll.in/article/122229/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-writer-arvind-das
https://www.thelallantop.com/bherant/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-by-arvind-das/
https://www.jankipul.com/2018/11/special-write-up-on-baba-nagarjun.html
Saturday, April 16, 2016
ऑड या इवन: या इलाही ये माजरा क्या है
( द लल्लन टॉप पर प्रकाशित)







