Saturday, October 11, 2025
Tuesday, February 21, 2023
दादी की थातीः मिथिला पेपर मेसी कला की सिद्धहस्त कलाकार सुभद्रा देवी
सूरजकुंड हस्तशिल्प अंतरराष्ट्रीय मेले (3-19 फरवरी) में हर बार की तरह मिथिला या मधुबनी पेंटिंग के स्टॉल थे, पर मेरी नज़र पेपर मेसी कला पर टिकी थी. दरअसल, पिछले दिनों बिहार के मधुबनी जिले (सलेमपुर गाँव) की सुभद्रा देवी को कला के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री देने की घोषणा हुई. इस बार खुद सुभद्रा देवी अपनी कला लेकर उपस्थित भले नहीं थी, पर उनकी पोती, अनुभा कर्ण की बनाई कलाकृतियां मिथिला शैली में दिखाई दे रही थी. अपनी दादी की थाती को उन्होंने संभाल रखा है. घर-परिवार के अलावे सुभद्रा देवी ने सैकड़ों कलाकारों को पेपर मेसी कला में प्रशिक्षित किया है.
पेपर मेसी (पापिए माशे) फ्रेंच शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है मसला हुआ या कटा हुआ कागज़. इस कला में कागज को पहले पानी में भिगोया जाता है, फिर लुगदी बनाई जाती है. गोंद, फेविकोल के सहारे उसे एक आकार दिया जाता है. धूप में सुखाने के बाद उन पर विभिन्न रंगों से चित्रकारी की जाती है. सांचों (मोल्ड) का इस्तेमाल इस कला में होता रहा है, पर सुभद्रा देवी अपने कुशल हाथों से ही इस कला को दशकों से गढ़ती रही. चर्चित मिथिला कलाकार चंद्रकला देवी भी पेपर मेसी कला से जुड़ी रही, पर सही मायनों में सुभद्रा देवी ने इसे ऊंचाई पर पहुँचाया है.
मुगल काल में पेपर मेसी कला का विकास हुआ. इस कला को लोग कश्मीर से जोड़ कर देखते रहे हैं, जहाँ पर इसकी विकसित परंपरा रही है. वर्ष 2019 में कश्मीर के फैयाज अहमद जान को पेपर मेसी के लिए पद्मश्री मिल चुका है. ऐसा नहीं कि देश के अन्य भागों में इस कला का विकास नहीं हुआ हो. ओड़िशा, राजस्थान, मध्यप्रदेश,
उल्लेखनीय है कि पिछले पचास सालों में जगदंबा देवी, गंगा देवी, सीता देवी, महासुंदरी देवी, बौआ देवी, गोदावरी दत्त, दुलारी देवी को मिथिला चित्रकला के लिए पद्मश्री मिल चुका है. वर्ष 1936 में जन्मी (बलौर मधुबनी) सुभद्रा देवी गंगा देवी, महासुंदरी देवी की पीढ़ी की कलाकार हैं जिन्हें उपेंद्र महारथी ने पेपर मेसी पर मिथिला चित्रकला को उकेरने को प्रेरित किया था. इस कला को वे करीब पचास वर्षों से साध रही हैं. पद्म श्री पुरस्कार की घोषणा से वे काफी खुश हैं. बातचीत के दौरान उत्फुल्लता से वे कहती हैं कि उन्होंने बचपन में ही अपनी दादी-नानी के साथ शादी-विवाह और पर्व-त्योहार के समय कोहबर, अरिपन बनाना सीखा था.
मिथिला में शादी के बाद नवविवाहित वर-वधू जिस घर में चार दिन तक रहते हैं, उसे कोहबर कहा जाता है. कोहबर की रस्मों के साथ मिथिला कला विभिन्न रूपों लिपटी हुई चली आती हैं. गौरी पूजा के लिए हाथी जनक डाला वे वर्षों बनाती रही.
असल में, महिलाएं शादी-विवाह, पर्व-त्योहारों पर लंबे समय से दीवारों, कपड़ों और कागजों पर कोहबर, दशावतार, अरिपन, बांसपर्री और अष्टदल कमल जैसी अनुष्ठानिक चित्र बनाती रही है. इन चित्रों का लौकिक और आध्यात्मिक महत्व है. पिछली सदी के 1960 के दशक में इस क्षेत्र में आए भीषण अकाल ने इस कला को कागज के मार्फत मिथिला से बाहर पहुँचाया तब सिद्धहस्त मिथिला कलाकारों से देश और दुनिया का परिचय हुआ. समय के साथ इस पारंपरिक कला में आधुनिक विषय-वस्तुएँ भी शामिल होते गई जो इस कला के विकसनशील होने का प्रमाण है. कोहबर, पूरइन, अष्टदल कमल, बांसपर्री के अतिरिक्त मिथिला पेंटिंग में वर्तमान में सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक रंग भी दिखाई पड़ते हैं. पिछले वर्षों में पर्यावरण भी एक विषय के रूप में इसमें शामिल हुए हैं. साथ ही भ्रूण हत्या और सांप्रदायिकता जैसे विषयों को भी कलाकारों ने अपनी कला का आधार बनाया है.
जहाँ मिथिला कला की खूब चर्चा होती है वहीं पेपर मेसी का जिक्र नहीं के बराबर होता है. इसका बाजार भी विकसित नहीं हो पाया है. जबकि वर्ष 1981 में ही सुभद्रा देवी को राज्य पुरस्कार और वर्ष 1991 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इस कला को लेकर वर्ष 2004 में स्पेन भी गईं. बहरहाल, सुभद्रा देवी कहती हैं कि उन्होंने अपनी कला यात्रा की शुरुआत मिथिला चित्रकला से ही किया था और बाद में पेपर मेसी को साधा. उनकी कला में मिथिला की संस्कृति और परंपरा की झलक दिखाई देती है.
वे कहती हैं कि ‘70 के दशक में पटना में शिल्प अनुसंधान संस्थान के लिए मैंने कनिया-पुतरा (कपड़े), पेंटिंग (कागज) और सामा-चकेवा (मिट्टी) बनाया था. सामा चकेवा को काफी पसंद किया गया और मुझे पुरस्कार मिला था.’ हंसती हुई वे कहती हैं कि 90 के दशक में एक बार मद्रास गईं तब उनको एक मैडम ने कहा कि 'राजा-रानी की शादी का सीन बना दीजिए'. जिस पर उन्होंने कहा कि 'राजा-रानी की शादी का मुझे नहीं पता. रामचंद्र भगवान की शादी हुई न, वही विधि से शादी-विवाह को हम जानते हैं.’ कोहबर, कन्यादान, मंडप आदि पेपर मेसी पर बीस दिनों तक उन्होंने वहाँ बनाई थी. वे जोर देकर कहती हैं कि ‘मिथिला पेंटिंग को मैंने नहीं छोड़ा.’
उम्मीद की जानी चाहिए कि सुभद्रा देवी को मिले इस सम्मान के बाद कलाप्रेमी मिथिला की इस पारंपरिक कला रूप को परखने की कोशिश करेंगे. साथ ही इसे कला बाजार में उचित जगह मिल पाएगा.
Thursday, February 16, 2023
मिथिला कला के पेपर मेसी रूप का सम्मान
पेपर मेसी कला को आम तौर पर लोग मिथिला से जोड़ कर नहीं देखते हैं. असल में, मिथिला चित्रकला या मधुबनी कला की ख्याति देश-विदेश में ऐसी फैली कि
सांस्कृतिक रूप से संवृद्ध इस क्षेत्र की अन्य लोक कला की उपेक्षा हुई. मिथिला में
चित्रकला के अलावे पेपर मेसी, सिक्की आर्ट और टेराकोटा
शिल्प की भी विकसित परंपरा रही है. हालांकि सहयोग और संरक्षण के अभाव में कला के
ये रूप कालांतर में पिछड़ गए. पारंपरिक रूप से मिथिला कला से महिलाएँ जुड़ी रही
हैं.
पिछले दिनों मधुबनी जिले के सलेमपुर गाँव की सुभद्रा देवी को जब कला के
क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री दिए जाने की घोषणा हुई तब लोगों का ध्यान
बिहार की इस कला की ओर गया. बिहार में इस कला को स्थापित करने में 87 वर्ष की सुभद्रा देवी की प्रमुख भूमिका रही
है.
पद्म श्री पुरस्कार की घोषणा से वे काफी खुश हैं. सदियों से मिथिला की
महिलाएँ अरिपन, कोहबर, दशावतार, बांस, पुरइन, मछली आदि को
दीवारों पर उकेरती रही हैं. पिछली सदी के 60 के दशक में इस क्षेत्र में आए भीषण
अकाल ने इस कला को कागज के मार्फत मिथिला से बाहर पहुँचाया तब जाकर गंगा देवी, सीता देवी, महासुंदरी देवी, गोदावरी दत्त और बौआ
देवी जैसे सिद्धहस्त कलाकारों से देश और दुनिया का परिचय हुआ.
समय के साथ इस पारंपरिक कला में आधुनिक विषय-वस्तुएँ भी शामिल होते गईं, जो इस कला के विकसनशील होने का प्रमाण है. सुभद्रा देवी इसी पीढ़ी की
कलाकार हैं. वे कहती हैं कि उन्होंने अपनी कला यात्रा की शुरुआत मिथिला चित्रकला
से ही किया था पर बाद में पेपर मेसी को साधा. उनकी कला में मिथिला की संस्कृति और
परंपरा की झलक दिखाई देती है.
वे कहती हैं कि ‘70 के दशक में पटना में शिल्प अनुसंधान
संस्थान के लिए मैंने कनिया-पुतरा (कपड़े), पेंटिंग (कागज)
और सामा-चकेवा (मिट्टी) बनाया था. सामा चकेवा को काफी पसंद किया गया और मुझे
पुरस्कार मिला था.’ इस घटना के बाद संस्थान के
सेनगुप्ता और उपेंद्र महारथी ने उन्हें मिट्टी-कागज को छोड़ कर मिथिला कला को पेपर
मेसी पर उकेरने को प्रेरित किया.
पेपर मेसी में कागज को पानी में गलाकर पहले लुगदी बनाई जाती है, फिर कलाकार गोंद मिलाकर उसे धूप मे सुखाते हैं. विभिन्न आकृतियों में गढ़
कर उस पर रंग चढ़ाया जाता है. शुरुआत में सुभद्रा देवी कागज के साथ मिथिला इलाके
में आसानी से उपलब्ध मेथी और दर्द मैदा पेड़ के छाले के सहारे काम करती थी. लोक
में उपलब्ध प्राकृतिक रंगों से आकृतियों को रंगती थी. इसे उन्होंने अपनी दादी-नानी
को इस्तेमाल करते हुए देखा था. बचपन की स्मृतियाँ उनके काम में परिलक्षित होती रही
हैं.
बाद में जब वे बिहार से बाहर अपनी कला लेकर गईं तब मुल्तानी मिट्टी, फेविकोल जैसे अवयवों का इस्तेमाल उन्होंने शुरु किया. उनकी इस कला में
परंपरा और आधुनिक विषय-वस्तुओं दोनों का समावेश दिखता है. एक तरफ जनक डाला, गौरी पूजा के लिए हाथी, मछली जैसे मिथकीय
विषयों को वे गढ़ती रही हैं, वहीं लोक में इस्तेमाल की
जाने वाली सजावटी सामान, खिलौने को भी आकार देती हैं.
कल्पना से हाथों के सहारे विभिन्न आकृतियाँ गढ़ने में वे सिद्धहस्त हैं और उम्र के
इस पड़ाव पर भी सक्रिय हैं. वर्तमान में इस कला में ‘मोल्ड’ का इस्तेमाल बढ़ा है, पर सुभद्रा देवी इसका इस्तेमाल नहीं करती हैं. वर्ष 1981 में उन्हें राज्य
पुरस्कार और वर्ष 1991 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इस कला को
लेकर वर्ष 2004 में विदेश (स्पेन) भी गईं.
सुभद्रा देवी बताती हैं कि 90 के दशक में जब वे एक बार मद्रास गई तब उन्हें
राजा-रानी को उकेरने को कहा गया, पर उन्होंने
मिथिला की लोक परंपरा में व्याप्त सीता-राम की शादी, कोहबर, मंडप, कन्यादान के इर्द-गिर्द जो विधि-विधान के
किस्से हैं उसे कई दिनों तक विभिन्न रूपों में उकेरा था. पेपर मेसी में उन्होंने मिथिला की पारंपरिक कला रूपों को खूबसूरती से
पिरोया है. वे कहती हैं कि उन्होंने मिथिला कला को नहीं छोड़ा है. मिथिला में
कोहबर के दौरान चार दिनों तक गौरी पूजा की विधि है जिसमें हाथी के ऊपर सिंदूर डाला
जाता है. पहले हाथी मिट्टी का बना होता रहा है पर आज पेपर मेसी के बने हाथी का
इस्तेमाल भी प्रचलन में आया है.
पेपर मेसी कला का विकास मुगल काल में हुआ. कश्मीर में इस कला ने काफी ऊँचाई हासिल की. ओड़िशा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, केरल, आंध्र प्रदेश में भी इस कला के विभिन्न रूप दिखते हैं. सुभद्रा देवी ने सैकड़ों कलाकारों को इस कला में प्रशिक्षित किया है, जिनमें से कुछ को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार भी मिले हैं. हालांकि पेपर मेसी के कलाकार सिर्फ कला के सहारे जीवन-बसर नहीं कर सकते. अभी इसका बाजार विकसित नहीं हुआ है. इस कला को सरकार और लोक के सहयोग की जरूरत है.




