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Sunday, December 15, 2024

यथार्थ को नए मुहावरे में रचती फिल्म


पायल कपाड़िया की फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ इस साल की सबसे चर्चित फिल्मों में रही. एक वजह प्रतिष्ठित कान समारोह में इस फिल्म को ‘ग्रां प्री’ पुरस्कार से नवाजा जाना है. स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए सिनेमा बनाना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है. सच तो यह है कि फिल्म बनाने के बाद उसके वितरण और प्रदर्शन की समस्या फिल्मकारों के लिए हतोत्साहित करने वाली होती है. ऐसे में उम्मीद है कि ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ की सफलता नए वर्ष में स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए एक रोशनी साबित होगी.


पिछले दिनों यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई. निस्संदेह यह फिल्म समकालीन यथार्थ को दृश्य और ध्वनि के नए 'धूसर' मुहावरे में दर्शकों के सामने लाती है. फिल्मकार की दृष्टि, संवेदना और राजनीति यहाँ मुखर है. साथ ही संपादन और सिनेमेटोग्राफी भी उत्कृष्ट है.

मुंबई महानगर में हाशिए पर रहने वाली तीन कामकाजी स्त्रियाँ प्रभा, अनु और पार्वती इस फिल्म के केंद्र में है जो अपने हिस्से की रोशनी की तलाश में है. प्रभा और अनु जहाँ एक अस्पताल में नर्स है वहीं पार्वती उसी अस्पताल में रसोई संभालती है. तीनों स्त्रियों के आपसी संबंध एक वर्ग-चेतन दृष्टि से संचालित हैं. यहाँ पर क्षेत्रीयता और भाषाई राजनीति आड़े नहीं आती है. पहले हिस्से में फिल्म भावनात्मक रूप से जकड़ कर रखती है. प्रभा की भूमिका में कनी कुश्रुति का अभिनय बेहद प्रभावी है. एक लंबे अरसे के बाद परदे पर एक सशक्त स्त्री चरित्र उभर कर आया है.

प्रभा का पति लंबे अरसे से उससे अलग जर्मनी में रहता है. अपने पति से अलग रहते हुए प्रभा का एकाकीपन उसके चेहरे पर एक उदास शाम की तरह पैवस्त है, वहीं अनु सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ती हुई एक अल्हड़ नदी की तरह बहती चलती है और मुस्लिम लड़के से प्रेम करती है. हालांकि प्रेम संबंधों की परिणति के लिए सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं है. पार्वती वर्षों से मुंबई में रह रही है, पर अपने ‘घर’ को बचाने की जद्दोजहद से जूझती है.

मुंबई के फुटपाथ, अंधेरे बंद कमरे, बड़े बिल्डरों से अपने ठौर को बचाने का संघर्ष और दो युवा प्रेमियों के संबंधों के माध्यम से हम समकालीन यथार्थ से रू-ब-रू होते हैं. फिल्म अपनी तरफ से कोई जवाब नहीं देती है, महज कुछ सवाल दर्शकों के लिए छोड़ जाती है.

उल्लेखनीय है कि इससे पहले पायल की डॉक्यूमेंट्री ‘ए नाइट ऑफ नोइंग नथिंग’ भी कई पुरस्कारों को जीत चुकी है. भारतीय फिल्म टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई), पुणे की स्नातक पायल की इस फिल्म के कुछ दृश्य भी डॉक्यूमेंट्री शैली में रचे गए हैं. दर्शकों को माया नगरी की फंतासी से दूर रखते हुए फिल्मकार ने कहानी को समांतर सिनेमा की शैली में बुना पर मुहावरा अपना चुना है.

यह फिल्म कई स्तरों पर चलती है. कई मुद्दों (राजनीतिक भी), भाषाओं को साथ लेती हुई. इस अर्थ में फिल्म काफी महत्वाकांक्षी है. यह फिल्म वर्तमान समय में मौजूं है, पर इसे क्लासिक नहीं कहा जा सकता. हां, यह फिल्म पायल और युवा फिल्मकारों से काफी उम्मीदें जरूर जगाती है

Sunday, December 01, 2024

आराम नगर में चैन कहां


कहते हैं मुंबई को नींद नहीं आती. आए भी कैसे? हर दिन सैकड़ों लोग अपनी किस्मत आजमाने माया नगरी आते हैं. उनके ख्वाब मुंबई को जगाए रखते हैं, उनके संघर्ष सोने नहीं देते.


पिछले दिनों एक दोपहर वर्सोवा के नजदीक आराम नगर में बिताने का मौका मिला. यहाँ पर बीसियों कास्टिंग कंपनी है जहाँ अदाकारों की भीड़ रहती है. आँखों में सपने लिए, अदाकार, लेखक और भविष्य के फिल्म निर्देशक मिल जाते हैं. पिछले दशक में बॉलीवुड में यह नगर ऐसा अड्डा बन कर उभरा है जहाँ सैकड़ों युवा रोज आते-जाते हैं. कुछ दशक पहले जहाँ प्रोड्यूसरों के ऑफिस में अदाकार अपना ‘पोर्टफोलियो’ लेकर पहुँचते थे, वहीं अब कास्टिंग डायरेक्टर के यहाँ लंबी लाइन लगी रहती है.

दिल्ली के मुकेश छाबड़ा का नाम कास्टिंग डायरेक्टर में आज सबसे ऊपर है. आराम नगर में स्थित उनके ऑफिस के बाहर युवकों की लंबी लाइन लगी थी. उनमें ही एक 22 साल के युवा नमन भारद्वाज भी थे. नमन दिल्ली में थिएटर से जुड़े रहे और छह महीने पहले ही मुंबई आए हैं. वह कहते हैं ‘यहाँ पर आपको कैमरे के सामने अपना नाम, उम्र और एक्टिंग का अनुभव बताना होता है. यदि आपके लायक कोई काम किसी फिल्म या सीरीज में हो तो फिर कास्टिंग कंपनी आपको कॉन्टेक्ट करती है. इनके पास बहुत बड़ा डेटाबेस है.’ न सिर्फ संघर्षरत युवा बल्कि कई जाने-पहचाने नाम भी यहाँ मिल जाते हैं. ‘फैमिली मैन’ सीरीज से चर्चित हुए कुशल अभिनेता शारिब हाशमी भी यहाँ दिख गए.

आराम नगर में थिएटर के भी कई मंच उपलब्ध हैं, जहाँ पर आए दिन स्थापित और एमेच्योर थिएटर ग्रुप के नाटकों का मंचन होता रहता है. बहरहाल, जब मैंने नमन से पूछा कि क्या यहाँ पर आप किसी एक्टिंग वर्कशॉप या थिएटर से भी जुड़े हैं? उन्होंने कहा कि ‘एक्टर तो मैं हूं, पर काम नहीं है.' उन्होंने कहा कि यहां पर आपको 'मिडिल क्लास के स्ट्रगलर्स मिलेंगे, पृथ्वी थिएटर के आस-पास जो घूमते फिरते आपको मिलेंगे वे थोड़े अपर क्लास के होते हैं.’ शाम में जब पृथ्वी थिएटर फेस्टिवल में हम एक नाटक देखने गए तो नमन का कहा सच लगा.

ऐसा नहीं कि आराम नगर में सिर्फ कास्टिंग कंपनियां ही हैं. यहाँ पर कई नामी निर्माता-निर्देशकों के प्रोडक्शन हाउस भी रहे हैं. पर छाबड़ा के एक सहयोगी ने बताया कि ‘अब प्रोडक्शन हाउस कहाँ अभिनेता को काम दे पाती है, जो भी काम मिलता है कास्टिंग कंपनियों के माध्यम से ही उन्हें मिल रहा है.’

ऑफिस के केबिन के बाहर छाबड़ा का एक कथन मोटे अक्षरों में लिखा दिखता है: ‘दुनिया बदल गई है. अब हम हीरो या कद-काठी, डील-डौल से आगे बढ़ चुके हैं.’ यह सच है कि पिछले दशक में ओटीटी के उभार ने अदाकारों के लिए एक बड़ा स्पेस मुहैया कराया है. खुद छाबड़ा की पहचान अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में कास्टिंग डायरेक्टर से बनी. इस फिल्म ने कई कलाकारों को बॉलीवुड की दुनिया में स्थापित कर दिया, जो वर्षों से बॉलीवुड में समंदर के थपेड़े खा रहे थे.

Tuesday, June 11, 2024

मुंबई जाने वाले लौट कर नहीं आते



पिछले साल इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के अस्सी साल पूरे होने पर मैंने चर्चित फिल्मकारनाट्यकर्मी और इप्टा के संरक्षक एम एस सथ्यू से बातचीत की थी. बातचीत के दौरान जब इप्टा की उपलब्धि के बारे में उनसे पूछा तो उन्होंने कहा थाइप्टा देश में एमेच्योर थिएटर का एकमात्र ऐसा समूह है जिसने अस्सी साल पूरे किए हैं. एक आंदोलन और थिएटर समूह के रूप में किसी संगठन के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है.’  निस्संदेह  20वीं सदी में देश में हुए नाट्य आंदोलनों में इप्टा की ऐतिहासिक भूमिका रही है. कई नाट्य संगठन इससे प्रेरित और प्रभावित रहे हैं. जुहू थिएटर आर्ट (बलराज साहनीबंबई)नटमंडल (दीना पाठकअहमदाबाद)शीला भट्ट (दिल्ली आर्ट थिएटर) जैसे नाट्य संगठन इसके उदाहरण हैं. साथ ही इप्टा के सदस्य रहे सफदर हाश्मी की संस्था जन नाट्य मंच (1973) भी इप्टा से ही निकली और आज भी सक्रिय है.

जहाँ नाट्य आंदोलनों में इप्टा की भूमिका को रेखांकित किया जाता रहा हैवही हिंदी सिनेमा में इप्टा या अन्य नाट्य संगठनों से जुड़े रहे रंगकर्मियों के योगदान की चर्चा कम होती है. जबकि सच ये है कि भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में रंगकर्म से जुड़े कलाकारोंनिर्देशकों की फिल्मों में आवाजाही शुरु से ही रही है. 21वीं सदी में भी यह बदस्तूर जारी है. रंगमंच और सिनेमा दोनों ही इससे लाभान्वित हुआ है. असल मेंसिनेमा के ‘स्टार’ तत्व की केंद्रीयता इतनी हावी रही है कि रंगकर्म से जुड़े रहे कुशल अभिनेता अपनी सारी प्रतिभा के बावजूद हाशिए पर रहे. कुछ अपवाद हो सकते हैं. हाल के दशक में ओटीटी प्लेटफॉर्म के उभारदर्शकों की मसाला फिल्मों से इतर रुचि और सामग्री की विविधता से एक उम्मीद जरूर बंधी है.

बहरहालनाटकों के अतिरिक्त वर्ष 1946 में धरती के लाल (के ए अब्बास) और नीचा नगर (चेतन आनंद) फिल्म के निर्माण में इप्टा की महत्वपूर्ण भूमिका थी. दोनों ही फिल्मों से इप्टा के कई सदस्य जुड़े थे. इन फिल्मों की पटकथा भी मूल रूप से लिखे नाटकों (बिजोन भट्टाचार्य और मैक्सिम गोर्की) पर ही आधारित थी. भारतीय सिनेमा में इन फिल्मों ने एक ऐसी नव-यथार्थवादी धारा की शुरुआत की जिसकी धमक बाद के दशक में देश-दुनिया में सुनी गई. पिछली सदी के 70-80 के दशक में समांतर सिनेमा की फिल्में इस बात की पुष्टि करते हैं. प्रसंगवशमहान फिल्मकार ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की पृष्ठभूमि भी थिएटर (इप्टा) की ही थी.

सथ्यू ने वर्ष 1973 में देश विभाजन की त्रासदी को लेकर ‘गर्म हवा’ फिल्म बनाई जो पचास साल बाद भी अपनी संवेदनशीलता और अदाकारी को लेकर याद की जाती है. उल्लेखनीय है कि इस फिल्म में इप्टा से जुड़े रहे बलराज साहनीकैफी आज़मीइस्मत चुगताईशौकत आजमी आदि की भूमिका विभिन्न रूपों में थी. बलराज साहनी ने विस्तार से इप्टा के दौर में फिल्मों के निर्माण की चर्चा की है. उन दिनों को याद करते हुए उन्होंने ‘मेरी फिल्मी आत्मकथा (1974)’ में लिखा है: “और इस तरह अचानक ही जिंदगी का एक ऐसा दौर शुरू हुआजिसकी छाप मेरे जीवन पर अमिट है. आज भी मैं अपने आपको इप्टा का कलाकार कहने में गौरव महसूस करता हूँ.” पर आज साहनी के रंगकर्मी रूप को कौन याद करता हैआधुनिक समय में सिनेमा सभी कला रूपों पर हावी है. मनोरंजन के लिए लोग सिनेमाघरों की ओर ही रुख करते हैं. पर इसका मतलब ये नहीं कि आधुनिक समय में देश में विभिन्न नाट्य परम्परा फल-फूल नहीं रही है.

संस्कृत नाटकों की परंपरा (भासकालिदासभवभूति) के बाद देश में करीब हजार सालों तक नाटक की परंपरा गायब रही. संस्कृत नाटक जन से नहीं बल्कि अभिजन से जुड़े थे. उन्नीसवीं सदी में जब देश में पारसी थिएटर का उद्भव और विकास होता है तब सही मायनों में इसे एक व्यापक जनाधार मिला.  देश में तीन तरह के थिएटर- व्यावसायिकशौकिया और पेशेवर सक्रिय रहे हैंलेकिन जैसा कि ‘पारसी थिएटर’ किताब में रणवीर सिंह ने लिखा है कि ‘व्यावसायिक थिएटर न हिंदुस्तान में थान है और आइंदा आने की उम्मीद भी कम है.’ ऐसे में कुछ पेशेवर कलाकारों को छोड़ दिया जाए तो हिंदी थिएटर से जुड़े लोगों की उम्मीदें सिनेमा (बॉलीवुड) से ज्यादा रही हैथिएटर से कमआश्चर्य नहीं कि पिछले पचास-साठ सालों में विभिन्न नाट्य विद्यालयों से प्रशिक्षित अभिनेतानिर्देशक मुंबई की ओर रुख करते रहे हैं.

सिनेमा एक ऐसा जनमाध्यम है जिसकी पहुँच एक विशाल दर्शक वर्ग तक है. आधुनिक समय में यह मनोरंजन का सबसे प्रभावशाली माध्यम भी हैजो नाटक की तरह ही कला के अमूमन सभी शिल्पों को खुद में समेटे हुए है. भरत मुनि ने नाटक को ‘सर्वशिल्प-प्रवर्तकम’ कहा थापर यह बात शिल्प-तकनीक और दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करने की क्षमता के कारण सिनेमा के बारे में भी कही जा सकती है. इस बात का उल्लेख कई बार किया जाता रहा है कि शुरुआती दौर में हिंदी सिनेमा पर पारसी रंगमंच का काफी प्रभाव रहा है. सूजन सोंटेग ने अपने चर्चित निबंध ‘फिल्म एंड थिएटर’ में लिखा है, ‘सिनेमा एक वस्तु है (यहाँ तक कि एक उत्पाद) वहीं थिएटर एक प्रस्तुति है.’ हालांकि दोनों ही हमारी चेतना और अनुभव से संबद्ध हैं. जाहिर है भिन्नता के बावजूद दोनों कला माध्यमों की अपनी विशिष्टता है. बेशक सिनेमा तकनीक आधारित कला हैजिसमें कैमरा और संपादन की बड़ी भूमिका रहती है, लेकिन अभिनेता-निर्देशक एक ऐसी कड़ी हैं जो दोनों विधाओं को आपस में जोड़ के रखता आया है. अपवादों को छोड़ दिया जाए तो एक बार रंगकर्म से फिल्मी दुनिया की ओर बढ़े लोगों के मन में ‘दिल्ली या उज्जैन’ की दुविधा नहीं रहतीवे मुंबई के ही होकर रह जाते हैं.

पिछली सदी के सत्तर और अस्सी के दशक में समांतर सिनेमा के दौर में मणि कौलकुमार शहानी जैसे प्रयोगशील फिल्मकारों ने सिनेमा के लिए हिंदी साहित्य (नयी कहानी) की ओर रुख किया था. इसी क्रम में आषाढ़ का एक दिन (मणि कौल)चरण दास चोर (श्याम बेनेगल)पार्टी (गोविंद निहलानी) जैसी फिल्में नाटकों को आधार बना कर रची गई. यहाँ पर मणि कौल निर्देशित आषाढ़ का एक दिन की चर्चा प्रासंगिक है.  

जहाँ हिंदी में आधुनिक नाटक के प्रणेता मोहन राकेश के चर्चित नाट्य कृति ‘आषाढ़ का एक दिन’ की चर्चा होती रहती हैमणि कौल निर्देशित इस फिल्म की चर्चा छूट जाती है. उन्होंने वर्ष 1971 में इस फिल्म को निर्देशित किया था. ‘उसकी रोटी’, ‘दुविधा’, ‘सिद्धेश्वरी’ की तरह ही सिनेमाई दृष्टि और भाषा के लिहाज से ‘आषाढ़ का एक दिन’ हिंदी सिनेमा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. इस फिल्म में मल्लिका (रेखा सबनीस) कालिदास (अरुण खोपकर) और विलोम (ओम शिवपुरी) की प्रमुख भूमिका है. मल्लिका कालिदास की प्रेयसी है. हिमालय की वादियों में बसे एक ग्राम प्रांतर में दोनों के बीच साहचर्य से विकसित प्रेम है. कालिदास को उज्जयिनी के राजकवि बनाए जाने की खबर मिलती है. मल्लिका और राजसत्ता को लेकर उनके मन में दुचित्तापन है. वहीं मल्लिका कालिदास को सफल होते देखना चाहती है और उन्हें स्नेह डोर से मुक्त करती है. उज्जयिनी और कश्मीर जाकर कालिदास सत्ता और प्रभुता के बीच रम जाते हैं. वे मल्लिका के पास लौट कर नहीं आते और राजकन्या से शादी कर लेते हैं. और जब वापस लौटते हैं तब तक समय अपना एक चक्र पूरा कर चुका होता है. सत्ता का मोह और रचनाकार का आत्म संघर्ष ऐतिहासिकता के आवरण में इस फिल्म के कथानक को समकालीन बनाता है. मणि कौल ने ‘स्क्रीनप्ले’ और संवाद के लिए नाटक को ही पूरी तरह आधार बनाया है. लेकिन परदे पर बिंब (इमेज) और ध्वनि के संयोजन के माध्यम से यह सब साकार हुआ है. इस फिल्म में परिवेश (मेघबारिशबिजली) जिस तरह रचा गया है उसे स्टेज पर बंद स्पेस में रचना मुश्किल है. यहाँ पर यह जोड़ना उचित होगा कि हाल के वर्षों में नाटक में भी तकनीकमल्टी-मीडिया के इस्तेमाल का चलन बढ़ा है.

बहरहालकोलाहल के बीच एक रागात्मक शांति पूरी फिल्म पर छाई हुई है. मोहन राकेश के नाटक से इतर एक अलग अनुभव लेकर यह फिल्म हमारे सामने आती है. फिल्म में भावों की घनीभूत व्यंजना के लिए ‘क्लोज अप’ का इस्तेमाल किया गया हैजो नाटक में संभव नहीं है. रेखा सबनीस और ओम शिवपुरी थिएटर के मंजे हुए अभिनेता थेजिनके अभिनय की छाप इस फिल्म में भी है. मणि कौल ने दोनों ही अभिनेता का बेहतर इस्तेमाल इस फिल्म में किया है. साथ ही इस फिल्म में जिस तरह से आउटडोर सेट बनाया गया है उसमें प्रकृति (बाहरी) और अंदरुनी हिस्सा  दोनों आ गया है. यह सवाल उठाना उचित होगा कि मुंबई पहुँच कर क्या नाटक के कालिदास की तरह एक कुशल रंगकर्मी के मन में रचनात्मकता और प्रभुता (यश) के बीच संघर्ष चलता रहता है?

इसी प्रसंग में फिल्मकार श्याम बेनेगल की चर्चा जरूरी है, जिन्होंने 70-80 के दशक में अपनी फिल्मों में नाटक की पृष्ठभूमि से आए कलाकारों का भरपूर इस्तेमाल किया. उनकी फिल्मों ने एक ऐसा स्पेस मुहैया कराया जहाँ कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर मौका मिला. उदाहऱण के लिए हाल ही में संरक्षित और फिर से रिलीज हुई मंथन’ (1976) फिल्म का जिक्र किया जा सकता है. इस फिल्म में गिरीश कर्नाड,  नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी,  स्मिता पाटिल मोहन अगाशे,  कुलभूषण खरबंदा अनंत नाग जैसे कलाकारों को एक साथ परदे पर देखना सुखद है. इन कलाकारों की अदाकारी का ही कमाल है कि करीब पचास साल बाद भी यह फिल्म दर्शकों को बांधे रखती है. फिल्म समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता ने श्याम बेनेगल की फिल्मों पर लिखे अपने लेख में मंथन में एक अशिक्षित, गरीब, पारंपरिक ग्रामीण स्त्री की भूमिका में स्मिता पाटिल के भाव, भंगिमा और अभिनय को अलग से रेखांकित किया है.

अस्सी के दशक में जब समांतर सिनेमा का आंदोलन थम गया और नब्बे के दशक में भूमंडलीकरणउदारीकरण की बयार बही हिंदी सिनेमा में व्यावसायिक और समांतर की रेखा धुंधली हुई है. विशाल भारद्वाजअनुराग कश्यपइम्तियाज अली जैसे सिनेमा निर्देशकों की फिल्मों में इसकी झलक मिलती है. साथ ही प्रशिक्षित अभिनेताओं की नई खेप भी मुंबई पहुँची. इन सबकी पृष्ठभूमि थिएटर जगत की रही है. 21वीं सदी में बॉलीवुड में दिल्ली से गए इन कलाकारों के योगदान पर अलग से अध्ययन की जरूरत है. बहरहाल, यहाँ पर विशाल भारद्वाज की उन फिल्मों का जिक्र जरूरी है जो शेक्सपियर के नाटकों को आधार बना कर तैयार किया है. उनका ‘मैकबेथ’ कभी बंबई के माफिया संसार में ‘मकबूल’ बन करतो कभी ‘ओथेलो’  मेरठ के जाति से बंटे समाज में ‘ओंकारा’ के रूप मेंतो कभी ‘हैमलेट’ ‘हैदर’ के रूप में रक्त रंजित कश्मीर की वादियों में भटकता है. मणि कौल की फिल्म से अलग ये नाटक भारद्वाज की सिनेमा में आकर पुनर्रचित होते हैं. मनोरंजन के साथ ही हमारे भाव-बोध में नया आयाम जोड़ते हैं. इन निर्देशकों और अभिनेताओं की वजह से रंगकर्म और सिनेमा के बीच संबंध पुख्ता हुए हैं. पर मुक्तिबोध की एक काव्य पंक्ति का सहारा लेकर कहूँ तो हिंदी सिनेमा ने थिएटर से ‘लिया बहुत ही ज्यादादिया बहुत ही कम’ है.

अंत मेंदो साल पहले रिलीज हुई युवा निर्देशक अचल मिश्र की मैथिली फिल्म ‘धुइन’ का मुख्य पात्रपंकजएक रंगकर्मी है जो दरभंगा में रह कर नुक्कड़ नाटक आदि करता हैपर उसके सपने मुंबई में बसते हैं. इस फिल्म की शुरुआत भी एक नुक्कड़ नाटक से ही होती है. फिल्म में चर्चित अभिनेता पंकज त्रिपाठी पंकज के आदर्श हैंजिन्होंने छोटे कस्बे से निकल कर मुंबई की दुनिया में खूब यश कमाया है. पर वास्तविक जीवन में मुंबई में मिले पैसे और शोहरत के बाद त्रिपाठीजिनका प्रशिक्षण राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी), दिल्ली में हुआरंगमंच से दूर ही रहे हैं. याद आता है कि आठ साल पहले जब चर्चित अभिनेता मनोज बाजपेयी अपनी एक फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए जेएनयू, दिल्ली आए थे तब मैंने उनसे पूछा था कि नेटुआ (90 के दशक में मनोज बाजपेयी का प्रसिद्ध नाटक) की मंच पर वापसी कब होगीउन्होंने जवाब दिया थाजल्दी. पर इन वर्षों में उनके मंच पर आने का हम इंतज़ार ही कर रहे हैंरंगकर्म से जुड़े एक मित्र कहते हैं कि मुंबई पहुँच कर रंगमंच पर वापस कौन लौटता है

आजकल, सितंबर 2024


(समालोचन वेबसाइट के लिए)

Sunday, November 30, 2008

'है अन्याय जिधर उधर शक्ति...'

ब्द निशब्द हो गए थेसिर्फ़ गोलियों और धमाकों की आवाज़ आ रही थी. टेलिवीज़न प्रजेंटर के चेहरे थे लेकिन हमें तलाश उन चेहरों की थी जो मुंबई के ताज, ओबराय और नरीमन हाउस के 'कुंभीपाक' में फँसे थे.
दो महीने पहले दिल्ली में घात लगा कर किए गए धमाकों से हम सहम गए थे, लेकिन मुंबई के ये धमाके हमें हतप्रभ कर गए. टेलिवीज़न स्क्रीन पर आँख टिकाने के बावजूद सब कुछ अविश्वसनीय लगता रहा.
पौराणिक रामायण में जब दशरथ सुत राम समुद्र पर पुल बनाने के समय बार बार विरोध का सामना करते हैं तब वे शंकाकुल हो कह उठते हैं- 'है अन्याय जिधर उधर शक्ति.'
न जाने क्यों ये पंक्तियाँ मेरे मन में मुंबई में हुए हमलों के बाद उमड़-घुमड़ रही है...
क्या चरमपंथ से लड़ना समुद्र मंथन के समान ही नहीं है? चरमपंथ एक फूस के घर में लगी आग नहीं है कि पानी से भरा एक घड़ा लेकर हम दौड़ पड़े.
इस बात को दक्षिण एशिया के सभी देश बेहतर समझते हैं.
संभव है कि इन हमलों में शामिल आतंकवादी पाकिस्तान से आए हों, लेकिन हमें ये चौंकता नहीं है. पहले भी देश में हुए कई हमलों के तार कथित तौर पर पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठनों से जुड़ते रहे हैं.
लेकिन जब तक दुनिया के सभी देश एकजुट होकर चरमपंथ के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करते तब तक इस 'ग्लोबल टेररिज़्म' से निजात पाना मुश्किल हैं.
इस हमले में हताहत हुए लोगों के परिवार के प्रति हमारी संवेदना हैं. उन जांबाज सुरक्षाकर्मियों के प्रति हम कृतज्ञ हैं जो दूसरों की हिफ़ाजत करते हुए काल कवलित हुए.
यह सच है कि इस कठिन समय में भी वे राजनीति करने से बाज नहीं आएँगे, राजनीति करना जिनका पेशा है.
लाख बार कहे जाने के बाद भी यही सच है कि चरमपंथियों का कोई धर्म नहीं, कोई देश नहीं होता.
भारत सिर्फ़ उन राजनेताओं का ही नहीं है जो सिर्फ़ कथनी में भरोसा रखते हैं, करनी में नहीं.
दुखद है कि इन हमलों में भी वे वोट बैंक ढूंढ़ रहे हैं. लेकिन ये देश हमारा है. 'मेरी भी आभा में इसमें...'
(तस्वीर साभार- बीबीसी हिंदी डॉट कॉम, ताज होटल मुंबई के बाहर मीडियाकर्मी.)