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Monday, August 17, 2015

किताबों का सिकुड़ता कोना

फैक्ट एंड फिक्शन के मालिक अजीत विक्रम सिंह
बीस बरस पहले जब मैं देश की राजधानी में आया था, तब दक्षिणी दिल्ली के वसंत लोक स्थित प्रिया सिनेमा हॉल के इर्द-गिर्द खूब चहलकदमी रहती थी. दिल्ली के धनाढ्य लोगों, कॉलेज-विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और सैलानियों के लिए तब यह एक आधुनिक, लोक-लुभावन अड्डा हुआ करता था. दिल्ली में पहली अंगरेजी फिल्म बेसिक इंस्टिंक्टमैंने प्रिया सिनेमा हॉल में ही देखी थी. पर प्रिया हॉल के ठीक सामने एक छोटे से शीशे के गेट के पीछे किताबों से सजी रैक पर नजर बाद में पड़ी.
मेरे कॉलेज और विश्वविद्यालय चूंकि दक्षिणी दिल्ली में ही थे तो इस किताब की दुकान से जल्दी ही राब्ता कायम हो गया. गेट के खुलते ही उससे लगी घंटी की टुन-टुन बजने की ध्वनि और किताबों की पहचानी-सी गंध अपनी ओर खींचती रहती.
इस छोटे पर बेहतरीन संग्रह से भरी किताब की दुकान को इसी महीने इसके मालिक ने हमेशा के लिए बंद करने का फैसला किया है. सही है कि दिल्ली में किताबों की और भी दुकानें हैं. लेकिन इस किताब की दुकान पर अकादमिक और लोकप्रिय साहित्य का जैसा संग्रह मिल पाता था, वह दुर्लभ था. पिछले दिनों पता चलने पर जब मैं अपना आखिरी सलाम कहने इस दुकान पर पहुंचा तो किताबों से हर समय भरी रहने वाली रैक खाली पड़ी थी. कुछ ग्राहक-पाठक दुकान के अंदर मौजूद थे.
मैंने जब दुकान के मालिक अजीत विक्रम सिंह की तस्वीर खींचने से पहले उनकी इजाजत मांगी तो उन्होंने हंस दिया. वहीं मौजूद एक युवा लेखिका ने कहा कि जल्दी से तस्वीर उतार लीजिए, आजकल ये कम ही हंसते हैं.अजीत विक्रम सिंह के चेहरे पर एक विषादपूर्ण हंसी फिर से उभर आई. उन्होंने कहा कि नहीं, अब स्थितप्रज्ञ हो चला हूं.हालांकि मुझे ऐसा लगा कि अपने प्रिय से बिछुड़ने के सदमे से वे उबरे नहीं हैं.
दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक अजीत विक्रमजी अपने पुस्तक प्रेम के कारण ही इस व्यवसाय में आए थे. लेकिन वे कहते हैं कि अब न उतने निष्ठावान पाठक रहे और न इतनी आमदनी होती है कि इस महंगी जगह का किराया भी चुका सकूं. फिर आस-पड़ोस में बड़े-बड़े मॉल बन जाने के बाद अब इस जगह के प्रति लोगों का आकर्षण भी पहले जैसा नहीं रहा.
मॉल में जो बड़े व्यवसायियों की दुकानें हैं, वहां किताबों की बिक्री हो या न हो, उन्हें बहुत फर्क नहीं पड़ता. लेकिन छोटे दुकानदारों के लिए यह संकट का समय है. पाठकों के लिए भी मॉल में वही किताबें बिखरी हुई मिलती हैं जो बाजार की मांग के अनुरूप हो. क्या यह अनायास है कि आज हमें अखबारों के पूरे पेज पर आने वाले नए उपन्यासों का विज्ञापन दिखता है!
सन 2008 में इसी तरह दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित किताब की चर्चित तीस वर्ष पुरानी दुकान बुकवर्मकी अकाल मौत हुई थी. जैसे छोटे शहरों और कस्बों की दुकानों से आपका एक निजी रिश्ता रहता है, उसी तरह ग्राहकों के साथ इन छोटी दुकानों का भी एक खास संबंध रहा है. बहरहाल, इन किताब की दुकानों का बंद होना हमारे समय में शहर की बदल रही पुस्तक संस्कृति और नए मध्यवर्ग के जीवन में किताबों की घटती अहमियत पर भी एक टिप्पणी है. किताबों के पढ़ने, खरीदने और लोगों में बांटने का एक अलग समाजशास्त्र होता है. सच तो यह है कि जिस अनुपात में लोगों के पास पैसा बढ़ा है, पढ़ने की फुर्सत उतनी ही कम हुई है. लोग हलकी-फुलकी वैसी किताबें पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं, जिन्हें मेट्रो या बसों की यात्रा के दौरान निबटाया जा सके.
ऐसा भी नहीं है कि किताबों की बिक्री नहीं होती है. दिल्ली में हर साल होने वाले पुस्तक मेले में किताबों की बिक्री इस बात की ताकीद करते हैं कि एक नया पाठक और नव शिक्षित वर्ग उभरा है, जिसमें पढ़ने की भरपूर ललक है. साथ ही, पिछले कुछ वर्षों में वेबसाइट के माध्यम से किताबों की खरीद-बिक्री का एक कारोबार फला-फूला है, जहां पुस्तक प्रेमियों को मूल्य में छूट पर किताबें मिल जाती हैं.

अजीत विक्रम कहते हैं कि इंटरनेट से तो मैं भी किताबें खरीदता हूं, पर आपको वहां यह सुख तो नहीं मिलता जो किताबों के रैक के बीच भटकते हुए अचानक से ऐसी किताब पाने से मिलता है, जिसे आप अर्से से ढूंढ़ रहे थे. या ऐसी किताब जो आपकी रुचि के अनुकूल न हो, पर पढ़ने के बाद आपके जीवन का वह हिस्सा बन जाती है!अब किताबों के इस कोने पर रुकना नहीं हो पाएगा, लेकिन यहां से गुजरते हुए इसकी याद जरूर आएगी.
(जनसत्ता के दुनिया मेरे आगे कॉलम में 18 अगस्त 2015 को प्रकाशित)

Saturday, September 22, 2012

शिमला में निर्मल वर्मा

सितंबर की इस शाम बारिश की गंध और हवा में रोमांस है. बादलों का घेरा शहर को अपने आगोश में लिए हुए हैं. शर्ट में ठंड लगती है पर स्वेटर या स्वेट शर्ट पहनने का मन नहीं होता. ऊंची पहाड़ियों पर देवदार के पेड़ शांत और स्थिर खड़े हैं. जैसे वे सिर्फ आपको सुनेंगे भर, कहेंगे कुछ नहीं. एक आकाशधर्मा गुरु की तरह जिसके पास आपके विचारों, भावों को सुनने का पर्याप्त समय होता है.

रात की इस खामोशी और अंधेरे में गेस्ट हाउस में सिर्फ हमारी साँसे सुनाई दे रही है. पता नहीं बगल के कमरे में कोई है भी या नहीं. मैंने धीरे से रीना से कहा- 'भूत से डर तो नहीं लगता!

दिल्ली की भागमभग से दूर, मैदानों में पले-बढ़े हमारे लिए हिल स्टेशनों की नीरवता एक ख्याल सी लगती है. यूँ तो शिमला कई बार आया, पर शादी के बाद यह शिमला की पहली यात्रा थी. कुछ शब्द हमारी जबान पर मुश्किल से चढ़ते हैं. मेरे लिए हनीमून एक ऐसा ही शब्द है.

बहरहाल, छाता लेकर जब हम अगले दिन शहर घूमने निकले तो धूप के छोटे-छोटे टुकड़े खिले थे. आसमान पूरी तरह साफ नहीं था. कुछ दिनों से यहाँ बारिश हो रही थी. पर ऐसा क्यों लग रहा है कि शिमला से हर वर्ष शिमला छीजता जा रहा है. या यह सिर्फ मेरे मन का वहम है!

शहर तो वही है. मॉल रोड, गिरजा घर, गेयटी थियेटर, पुरानी किताबों की दुकानें और दूर  सामने की जाखू की पहाड़ी पर स्थित हनुमान की विशाल मूर्ति.  फिर ऐसा क्यों लगता है मुझे?

शाम होते ही मॉल रोड पर सैलानियों की भीड़ इतनी कि पाँव रखने की जगह नहीं. शोर-शराबा और बीयर की गंध!  रात होते ही सड़कों पर आवारा कुत्ते. पता नहीं पहाड़ पर स्थित शहरों में रोमांस होता है या उसकी ओबा-हवा में जो हमें अपनी ओर खींचती है.

अपने अंदर इतिहास की कई गाथाएँ समेटे वॉयसराय लॉज (वर्तमान में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान) एक ऐतिहासिक धरोहर (हेरिटेज ब्लिडिंग) है. पर बाहर से यह जितना भव्य दीखता है अंदर से उतना ही खोखला. छत से टप टप रिसता पानी, लकड़ियों में लगे घुन और रख-रखाव की बुरी व्यवस्था इस इमारत की बदहाली की कहानी बयां करती है. कहते हैं कि निर्मल वर्मा ने अपने चर्चित उपन्यास लाल टीन की छत यहीं रह कर लिखा था.

निर्मल वर्मा की कहानियों, यात्रा वृत्तांतों में शिमला कई बार, कई तरहों से आया है. बचपन की स्मृतियाँ किसी भी लेखक, रचनाकर के लिए बेहद कीमती होती हैं. और यदि वह रचनाकार निर्मल वर्मा की तरह प्रतिभावान हो तो रचनाकार की स्मृतियों के साथ शहर एक पाठक के मन में अपना संसार गढ़ते हैं.

शिमला जब-जब गया मन हर बार लाल टीन की छत वाले निर्मल वर्मा के उस शहर को ढूंढ़ता रहा. शाम में मॉल रोड स्थित गेयटी थिएटर में निर्मल वर्मा की दो कहानियों धूप का एक टुकड़ा और डेढ़ इंच ऊपर का मंचन है. बाहर सड़कों पर जितनी ही ज्यादा भीड़ है, इस खूबसूरत थिएटर के अंदर उतने ही कम लोग. 

नाटक खत्म होने के बाद थिएटर से निकल कर हम सामने ही एक किताब की दुकान में घुस गए. तरह तरह की किताबों से सजे इस दुकान में निर्मल वर्मा की कोई किताब नहीं मिली. मैंने दुकानदार से लगभग चिढ़ कर कहा, आपका शहर निर्मल वर्मा को याद कर रहा है और आपके यहाँ उनकी एक भी किताब क्यों नही है.

जवाब में यह चिर-परिचित जुमला सुनने को मिला- हिंदी की किताबें कहाँ बिकती हैं!

चीड़ों पर चाँदनी संस्मरण में निर्मल वर्मा ने लिखा है, क्या यह शिमला है-हमारा अपना शहर-या हम भूल से कहीं और चले आए हैं

इस बार शिमला से आने के बाद मेरे मन में यह सवाल गूँजता रहा.

(समांतर स्तंभ के तहत जनसत्ता, 26 सितंबर 2012 को प्रकाशित)