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Thursday, September 02, 2021

सिनेमा संस्कृति की बदलती तस्वीर


मुंबई भले ही मायानगरी हो, सिनेमा की संस्कृति दिल्ली में फली-फूली. आम दर्शकों के अलावे दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कई नेता सिनेमाप्रेमी हुए हैं. पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरूलालकृष्ण आडवाणी से लेकर दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक. पिछले दिनों मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जब दक्षिण दिल्ली में स्थित प्रिया सिनेमाहॉल के आधुनिक साज-सज्जा और तकनीक से लैसनवीन रूप का उद्घाटन किया तो उन्होंने शिद्दत से सिनेमा के प्रति अपने प्रेम को याद किया. प्रिया में ही बैल बॉटम’ फिल्म के ट्रेलर के लांच के अवसर पर अभिनेता अक्षय कुमार ने उन दिनों को याद किया जब ब्लैक में टिकट लेकर उन्होंने दिल्ली के अम्बा सिनेमाहॉल में अमर अकबर एंथोनी’ देखी थी. किसी भी शहर की संस्कृति को सिनेमा के रास्ते भी हम देख-परख सकते हैं.  दिल्ली में कई पुराने सिनेमाघर आज बंद हो गए हैंपर उन सिनेमाघरों की स्मृति लोगों के जेहन में है. मिनरवा, फिल्मिस्तान, कमल, पारस, सावित्री कुछ ऐसे ही नाम हैं. किसी भी शहर के लिए सिनेमाघर लैंडमार्क की हैसियत रखते हैं. सिनेमाघरों की रोशनी से शहर के कोने प्रकाशित होते रहे हैं.

यूँ तो किसी भी सिनेमा हॉल के नवीनीकरण की घटना सामान्य ही कही जाएगीलेकिन दिल्ली की सिनेमा संस्कृति में प्रिया सिनेमाहॉल खास महत्व रखता है. कोरोना महामारी से पहले ही इसे नए रूप में लाने की तैयारी शुरु हुई थी. महामारी के दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेनसिंग की वजह से करीब दो साल के बाद इसे आम दर्शकों के लिए फिर से खोला गया है.

प्रसंगवश, महामारी के दूसरी लहर के बाद बैल बॉटम’ बॉलीवुड की पहली बड़े बजट की फिल्म है जिसे सिनेमाघरों में रिलीज किया गया है. हालांकि सिनेमाघरों में अभी भी पचास प्रतिशत सीट ही दर्शकों के लिए उपलब्ध हैं. ऐसे में डिस्टेनसिंग का पालन करते हुए परिवार या दोस्तों के साथ सिनेमा देखने का लुत्फ नहीं उठाया जा सकता है. जाहिर है, कोरोना महामारी के दौरान ओटीटी प्लेटफार्म ने मध्यवर्गीय दर्शकों के सिनेमा देखने की संस्कृति को काफी बदल दिया है. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान जोर देकर कहा कि अभी लोग लैपटॉपटीवीमोबाइल पर सिनेमा देख रहे हैंपर सिनेमा को वापस हॉल में आना ही होगा. यह एक सामूहिक अनुभव है. छोटे परदे पर आप दृश्यध्वनि की बारीकियों से वंचित हो जाते हैं. घर में बहुत तरह के व्यवधान भी मौजूद रहते हैं. महीनों बाद जब हम सिनेमाहॉल (पीवीआर प्रिया XL) में पहुँचे तो इसे बखूबी महसूस किया. हालांकि यह नोट करना उचित होगा कि अक्षय कुमार अभिनीत बैल बॉटम’ हाल ही में ओटीटी पर रिलीज हुई मलयालम फिल्मों के टक्कर की नहीं कही जा सकती. कोरोना महामारी के दौरान इस फिल्म की शूटिंग हुई थी जिसका दबाव इस फिल्म के निर्माण-निर्देशन में है.

बहरहालउदारीकरण-भूमंडलीकरण के कारण पिछले सदी के नब्बे के दशक में समाज में आए बदलावों के साथ ही महानगरों में सिनेमा देखेने की संस्कृति भी प्रभावित हुई. सिंग्ल स्क्रीन की जगह मल्टीप्लेक्स ने ले लिया और सिंग्ल स्क्रीन थिएटर धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए. आज देश में करीब तीन हजार स्क्रीन मल्टीप्लेक्स में उपलब्ध हैं. प्रिया सिनेमा के मालिक अजय बिजली ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी विलेज रोडशो के साथ साझेदारी में प्रिया विलेज रोडशो लिमिटेड (1995)जिसे पीवीआर से नाम से हम जानते हैंशुरु किया.  इस साझेदारी को वे प्रिया के साथ ही आरंभ करना चाह रहे थेइसलिए इसे पीवीआर नाम दिया गया, पर दक्षिण दिल्ली में स्थित अनुपम सिनेमाघर को मल्टीप्लेक्स में बदल कर वर्ष 1997 में इसकी विधिवत शुरुआत हुईप्रिया भी वर्ष 2000 में पीवीआर प्रिया में तब्दील हुआ. इसे आज भी सिंग्ल स्क्रीन ही रखा गया है.

जेएनयू के बेहद करीब होने की वजह से  कॉलेजों के छात्र-छात्राओं के मिलने-जुलनेडेटिंग का प्रिया सिनेमा एक प्रमुख अड्डा था. बदलती दिल्ली की एक छवि यहाँ आने पर मिल जाती थी. 70 के दशक में शुरु हुए इस सिनेमा हॉल के बारे में सिनेमा समीक्षक जिया उस सलाम ने दिल्लीफोर शोज में लिखा है, वर्षों तक प्रिया धनी-मनी सिनेमा प्रेमियोंमहिलाओं और पुरुषों के लिए ऐसी जगह रहा जिनके लिए सिनेमा का मतलब हॉलीवुड की ताजातरीन फिल्में थी. कभी-कभी यहां मध्यमार्गी हिंदी फिल्में भी दिखाई जाती थीपर व्यावसायिक मसाला फिल्मों से निश्चित दूरी रही. हालांकि बाद के दशक में ही बॉलीवुड की फिल्मों पर यहाँ जोर बढ़ा. इसी बीच समाज में नव मध्यमवर्ग का उभार भी हुआजिसे हम बॉलीवुड की फिल्मों की विषय-वस्तु में भी देखते हैं. प्रसंगवश, पीवीआर मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों की आवक से नए तरह की सिनेमा के बनने और प्रसारण का रास्ता भी निकला है. कम बजट की ऑफ बीट फिल्मेंजो बॉलीवुड के स्टारों की लकदक से दूर हैं, आसानी से यहाँ दिखाई जाने लगी है.

यह तय है कि आने वाले समय में बॉलीवुड को ओटीटी पर रिलीज होने वाली फिल्मोंवेबसीरिजों से चुनौती का सामना करना पड़ेगा. सवाल है कि सिनेमाघरों तक दर्शकों को खींच लाने के लिए क्या बॉलीवुड तैयार है? सवाल यह भी है कि सिनेमाघरों तक जाने के लिए युवा दर्शक तैयार हैं या सिनेमाहॉल आने वाले समय में नॉस्टेलजिया का हिस्सा बन कर रह जाएगी?

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Monday, August 17, 2015

किताबों का सिकुड़ता कोना

फैक्ट एंड फिक्शन के मालिक अजीत विक्रम सिंह
बीस बरस पहले जब मैं देश की राजधानी में आया था, तब दक्षिणी दिल्ली के वसंत लोक स्थित प्रिया सिनेमा हॉल के इर्द-गिर्द खूब चहलकदमी रहती थी. दिल्ली के धनाढ्य लोगों, कॉलेज-विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और सैलानियों के लिए तब यह एक आधुनिक, लोक-लुभावन अड्डा हुआ करता था. दिल्ली में पहली अंगरेजी फिल्म बेसिक इंस्टिंक्टमैंने प्रिया सिनेमा हॉल में ही देखी थी. पर प्रिया हॉल के ठीक सामने एक छोटे से शीशे के गेट के पीछे किताबों से सजी रैक पर नजर बाद में पड़ी.
मेरे कॉलेज और विश्वविद्यालय चूंकि दक्षिणी दिल्ली में ही थे तो इस किताब की दुकान से जल्दी ही राब्ता कायम हो गया. गेट के खुलते ही उससे लगी घंटी की टुन-टुन बजने की ध्वनि और किताबों की पहचानी-सी गंध अपनी ओर खींचती रहती.
इस छोटे पर बेहतरीन संग्रह से भरी किताब की दुकान को इसी महीने इसके मालिक ने हमेशा के लिए बंद करने का फैसला किया है. सही है कि दिल्ली में किताबों की और भी दुकानें हैं. लेकिन इस किताब की दुकान पर अकादमिक और लोकप्रिय साहित्य का जैसा संग्रह मिल पाता था, वह दुर्लभ था. पिछले दिनों पता चलने पर जब मैं अपना आखिरी सलाम कहने इस दुकान पर पहुंचा तो किताबों से हर समय भरी रहने वाली रैक खाली पड़ी थी. कुछ ग्राहक-पाठक दुकान के अंदर मौजूद थे.
मैंने जब दुकान के मालिक अजीत विक्रम सिंह की तस्वीर खींचने से पहले उनकी इजाजत मांगी तो उन्होंने हंस दिया. वहीं मौजूद एक युवा लेखिका ने कहा कि जल्दी से तस्वीर उतार लीजिए, आजकल ये कम ही हंसते हैं.अजीत विक्रम सिंह के चेहरे पर एक विषादपूर्ण हंसी फिर से उभर आई. उन्होंने कहा कि नहीं, अब स्थितप्रज्ञ हो चला हूं.हालांकि मुझे ऐसा लगा कि अपने प्रिय से बिछुड़ने के सदमे से वे उबरे नहीं हैं.
दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक अजीत विक्रमजी अपने पुस्तक प्रेम के कारण ही इस व्यवसाय में आए थे. लेकिन वे कहते हैं कि अब न उतने निष्ठावान पाठक रहे और न इतनी आमदनी होती है कि इस महंगी जगह का किराया भी चुका सकूं. फिर आस-पड़ोस में बड़े-बड़े मॉल बन जाने के बाद अब इस जगह के प्रति लोगों का आकर्षण भी पहले जैसा नहीं रहा.
मॉल में जो बड़े व्यवसायियों की दुकानें हैं, वहां किताबों की बिक्री हो या न हो, उन्हें बहुत फर्क नहीं पड़ता. लेकिन छोटे दुकानदारों के लिए यह संकट का समय है. पाठकों के लिए भी मॉल में वही किताबें बिखरी हुई मिलती हैं जो बाजार की मांग के अनुरूप हो. क्या यह अनायास है कि आज हमें अखबारों के पूरे पेज पर आने वाले नए उपन्यासों का विज्ञापन दिखता है!
सन 2008 में इसी तरह दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित किताब की चर्चित तीस वर्ष पुरानी दुकान बुकवर्मकी अकाल मौत हुई थी. जैसे छोटे शहरों और कस्बों की दुकानों से आपका एक निजी रिश्ता रहता है, उसी तरह ग्राहकों के साथ इन छोटी दुकानों का भी एक खास संबंध रहा है. बहरहाल, इन किताब की दुकानों का बंद होना हमारे समय में शहर की बदल रही पुस्तक संस्कृति और नए मध्यवर्ग के जीवन में किताबों की घटती अहमियत पर भी एक टिप्पणी है. किताबों के पढ़ने, खरीदने और लोगों में बांटने का एक अलग समाजशास्त्र होता है. सच तो यह है कि जिस अनुपात में लोगों के पास पैसा बढ़ा है, पढ़ने की फुर्सत उतनी ही कम हुई है. लोग हलकी-फुलकी वैसी किताबें पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं, जिन्हें मेट्रो या बसों की यात्रा के दौरान निबटाया जा सके.
ऐसा भी नहीं है कि किताबों की बिक्री नहीं होती है. दिल्ली में हर साल होने वाले पुस्तक मेले में किताबों की बिक्री इस बात की ताकीद करते हैं कि एक नया पाठक और नव शिक्षित वर्ग उभरा है, जिसमें पढ़ने की भरपूर ललक है. साथ ही, पिछले कुछ वर्षों में वेबसाइट के माध्यम से किताबों की खरीद-बिक्री का एक कारोबार फला-फूला है, जहां पुस्तक प्रेमियों को मूल्य में छूट पर किताबें मिल जाती हैं.

अजीत विक्रम कहते हैं कि इंटरनेट से तो मैं भी किताबें खरीदता हूं, पर आपको वहां यह सुख तो नहीं मिलता जो किताबों के रैक के बीच भटकते हुए अचानक से ऐसी किताब पाने से मिलता है, जिसे आप अर्से से ढूंढ़ रहे थे. या ऐसी किताब जो आपकी रुचि के अनुकूल न हो, पर पढ़ने के बाद आपके जीवन का वह हिस्सा बन जाती है!अब किताबों के इस कोने पर रुकना नहीं हो पाएगा, लेकिन यहां से गुजरते हुए इसकी याद जरूर आएगी.
(जनसत्ता के दुनिया मेरे आगे कॉलम में 18 अगस्त 2015 को प्रकाशित)