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Saturday, January 27, 2024

मिथिला पेंटिंग ही मेरी खेती-बाड़ी है: शांति देवी

 


मिथिला चित्र शैली अपने अनोखेपन और बारीकी के लिए देश-दुनिया में प्रतिष्ठित है, और कलाजगत में खास महत्व रखती है। इस पारंपरिक कला में 70 के दशक से मैथिल समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों का दखल बढ़ा, जिसने इसे एक अलग तेवर दिया। ब्राह्मणों और कायस्थों से इतर इन समुदायों के निजी-जीवन, आस-पड़ोस की जिंदगी की झलक इन चित्रों में देखी जा सकती है। खास तौर पर दुसाध कलाकारों ने गोदना शैली को अपनाया, जिसमें समांतर रेखाओं, वृत्तों और आयातों में गोदना को ज्यामितीय ढंग से सजाया जाता है। इनमें उनके लोक देवता वीर योद्धा राजा सहलेस का जीवन वृत्त मिलता है। साथ ही काम-काज और पेशे का चित्रण भी है। शांति देवी के चित्र भरनी शैली से मिलते-जुलते हैं। शांति देवी और उनके पति शिवन पासवान को मिथिला कला में योगदान के लिए पद्मश्री देने की घोषणा हुई है। पिछले दिनों अरविंद दास ने शांति देवी से उनकी कला यात्रा और गोदना शैली को लेकर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंशः


अरविंद दास: अपनी लंबी मिथिला कला यात्रा के उतार-चढ़ावों के बारे में बताइए...

शांति देवी: चालीस साल से ज्यादा समय से मैं इस कला से जुड़ी हूं। यह तो हमारी परंपरा है, धरोहर है, जो हमने अपनी दादी-नानी से सीखी है। मेरी मां (कौशल्या देवी) और सास (कुसमा देवी) दोनों को ही मिथिला कला में राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वर्ष 1976 में मेरी शादी शिवन से हुई। बहुत संघर्ष और गरीबी से गुजरी हूं। मैं अब लोगों से यही कहती हूं कि मिथिला पेंटिंग ही मेरी खेती-बाड़ी है। शादी के बाद हम दोनों ने मिलकर पेंटिंग बनाई है।


अरविंद दास: आप दोनों पति-पत्नी की प्रसिद्धि गोदना शैली को लेकर है। इससे पहले जितवारपुर (मधुबनी) की चानो देवी, रौदी पासवान भी गोदना पेंटिंग जुड़े रहे हैं...

शांति देवी: सत्तर के दशक के आखिर में रौदी पासवान भाई और चानो देवी के साथ ही हमने पेंटिंग बनानी शुरू की। राजा सहलेस की कहानी को हमने पेंटिंग में उतारना शुरू किया। चानो देवी शांत स्वभाव की विशुद्ध कलाकार थीं।

अरविंद दास: मिथिला के कायस्थों और ब्राह्मणों की पेंटिंग चर्चित रही है। कछनी (कायस्थ), भरनी (ब्राह्मण) शैली से आपकी पेंटिंग किस रूप में अलग है?

शांति देवी: असल में मेरी पेंटिंग मिथिला पेंटिंग है। राजा सलहेस की कहानी भी पेंटिंग में मैंने बनाई है। मेरे पति गोदना शैली में पेंटिंग करते रहे हैं। जब मैंने दुर्गा, सीता की पेंटिंग (रामायण-महाभारत) बनाई तो काफी विरोध हुआ। मुझसे कहा गया कि मैं अपने देवता को चित्रित करूं। मैंने कहा कि कलाकार की कोई जाति नहीं होती। कलाकारों की ओर से मुझे किसी तरह के विभेद का सामना नहीं करना पड़ा। बौआ देवी के साथ मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं, उनकी बेटी जैसी हूं। गंगा देवी (मिथिला पेंटिंग की प्रसिद्ध कलाकार) के साथ भी मेरी मुलाकात रही है, उनके साथ दो महीने अहमदाबाद में रही। मैंने किसी की शैली कॉपी नहीं की है।

अरविंद दास: अभी आपने चंद्रयान-तीन को लेकर एक पेंटिंग बनाई, जिसकी खूब चर्चा भी हुई...

शांति देवी: हां, बिलकुल। मुझसे जब G20 के लिए पेंटिंग बनाने को कहा गया तब मैंने कहा कि राजा सलहेस, गीता-रामायण जिंदगी भर बनाई है। कुछ नया बनाने की इच्छा है। मैंने कहा कि पोता-पोती के संग टीवी पर मैंने चंद्रयान को देखा है, उसे ही बनाना चाहती हूं। मैंने रॉकेट को उड़ते देखा था, कल्पना चावला के बारे में सुना था। उसी सब को अपनी पेंटिंग में उतारा। प्रधानमंत्री मोदी से भी मेरी मुलाकात हुई और मैंने उन्हें अपनी पेंटिंग के बारे में विस्तार से बताया था।

अरविंद दास: हमने सुना है प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ भी आप एक बार अपनी पेंटिंग लेकर डेनमार्क प्रतिनिधिमंडल के संग गई थीं, उस अनुभव के बारे में कुछ बताएं...

शांति देवी: हां, दस बाय दस की एक पेंटिंग (फूल-पत्ती के संग) राजा सहलेस को लेकर बनाई थी। उसी को लेकर 1983 में मैं डेनमार्क गई। वह मेरी पहली विदेश यात्रा थी। बाद में जापान, जर्मनी, नॉर्वे, मलेशिया, दुबई आदि जगहों पर भी गई। पुपुल जयकर, मनु पारेख की प्रेरणा से मैं डेनमार्क गई थी। मेरी अमेरिका जाने की इच्छा है अब। वैसे मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूँ. मेरी पढ़ाई बस नौवीं कक्षा तक हुई है।



अरविंद दास: आप बच्चों के संग भी वर्कशॉप करती रही हैं, नई पीढ़ी की इस पेंटिंग में कैसी रुचि है?

शांति देवी: जी, बहुत वर्कशॉप मैंने किए हैं। अभी हाल ही में मैंने कानपुर में पांच सौ बच्चों के संग वर्कशॉप किया। मिथिला के घर-परिवार के बच्चों में इस पेंटिंग के प्रति रुचि तो है ही, आजकल राज्य से बाहर भी लोगों में इस पेंटिंग को लेकर आकर्षण बढ़ा है और काफी लोग उत्साह से सीख रहे हैं। आपको बताऊँ कि पांच-छह साल के बच्चों को भी मैंने पेंटिंग बनाते देखा है

अरविंद दास: गोदना शैली में नए कलाकारों के बारे में आपका क्या कहना है?

शांति देवी: बहुत प्रतिभावान कलाकार आज हैं। शिवन खुद गोदना शैली में बनाते रहे हैं। उर्मिला देवी, महामना देवी, दिलीप कुमार पासवान गोदना के अच्छे कलाकार हैं, जिनसे काफी उम्मीदें हैं।


अरविंद दास: अपनी कला यात्रा का कोई ऐसा अनुभव जो आप शेयर करना चाहें...

शांति देवी: मैं देश-विदेश में अपनी पेंटिंग लेकर लोगों के बीच कई बार गई हूं। चार बार जापान (हासेगावा मिथिला आर्ट इंस्टिट्यूट) गई। एक बार नब्बे साल के एक बुजुर्ग वहां मुझे मिले, जो मुझसे और बौआ देवी से मिथिला पेंटिंग सीखना चाहते थे। मैंने उनसे पूछ दिया कि बाबूजी अब आपको यह सीखने की क्या जरूरत है। उन्होंने मुझसे कहा कि जब मैं ऊपर जाऊंगा तो यही न लेकर जाऊंगा! मेरा दिमाग खुल गया और अपनी परंपरा पर गर्व भी हुआ।

(नवभारत टाइम्स, 27.01.24) 


Tuesday, March 31, 2015

कोहबर रचती औरतें

कोहबर 
अपनी चर्चित आत्मकथा मुर्दहियामें प्रोफेसर तुलसी राम ने लिखा है कि शादी के दौरान दीवार पर गेरू तथा हल्दी से जो पेंटिंग की जाती थी, उसे कोहबर कहा जाता थाअशिक्षा के कारण लिपि का ज्ञान न होने के कारण दलित लोग संभवत: भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अभिव्यक्ति के लिए कोहबर पेंटिंग का सहारा लिया था.अपने क्षेत्र मिथिला की बात करूं तो वहाँ कोहबर की परंपरा आमतौर पर सवर्ण परिवारों में दिखती है. इसमें महिलाओं की विशेष भागीदारी होती है. कायस्थ और ब्राह्मण घरों में कोहबर लिखने की परंपरा कई सदी से जारी है. लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस कला मे दलितों की उपस्थिति रेखांकित करने योग्य है. जाहिर है, इस कला की उत्पत्ति की तारीख ठीक-ठीक बताना मुश्किल है.

दिल्ली स्थित शिल्प संग्रहालय की दीवारों पर पद्मश्री गंगा देवी ने 1989 में बेहद खूबसूरत कोहबर पेंटिंग चित्रित किया था. पिछले दिनों जब मैं संग्रहालय में गंगा देवी की बनाए इस कोहबर को देखने पहुंचा तो निराशा हाथ लगी. जिस दीवार पर उसे चित्रित किया गया था उसे तोड़ कर वहाँ एक नए भवन का निर्माण किया जा रहा है. ज्योंतिद्र जैन की चर्चित किताब गंगा देवी: ट्रेडिशन एंड एक्सप्रेशन इन मिथिला पेंटिंग के आवरण पर उसी कोहबर का अंकन है.

बहरहाल, शोध के सिलसिले में मिथिला पेंटिंग के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त, शिल्प गुरु गोदावरी दत्त से मिलने उनके गाँव रांटी पहुँचा तो उनके ड्राइंग रूम की अंदरूनी दीवार पर मिथिला पेंटिंग की शैली में उकेरे गए एक वृहद कोहबर को देख कर सुकून मिला. वे मिथिला पेंटिंग की सबसे प्रसिद्ध जीवित कलाकार हैं.  जापान स्थित मिथिला म्यूजियम के सिलसिले में गोदावरी दत्त ने सात बार जापान की यात्रा की है. देश-विदेश में उनकी कलाकृतियों की अनेक प्रदर्शनियाँ लगाई गई हैं. उन्होंने बताया कि मिथिला पेंटिंग की शैली में उन्होंने जापान स्थित संग्रहालय में 18 फुट लंबा एक त्रिशूल बनाया था, जिसे बनाने में उन्हें छह महीने का वक्त लगा. हालांकि 80 वर्ष की उम्र में वह  मिथिला पेंटिंग को लेकर देश-विदेश की यात्रा अब नहीं करती हैं और ज्यादातर गाँव में ही रहती हैं. प्रसंगवश, मिथिला पेंटिंग की एक अन्य प्रसिद्ध कलाकार पद्मश्री महासुंदरी देवी भी रांटी की हीं थी.

यों दरभंगा, मधुबनी जिले के लगभग हर गाँव और नेपाल के तराई इलाके में घर की दीवारों और फर्श पर शादी-ब्याह, पर्व-त्योहारों के दिनों में पारंपरिक रूप से मिथिला पेंटिंग बनाई जाती हैं. पर हाल के वर्षों में मधुबनी के करीब स्थित रांटी और जितवारपुर गाँव इस कला के दो मुख्य केंद्र के रूप में उभरे हैं.
गोदावरी दत्त अपनी पेंटिंग के साथ

गोदावरी दत्त कहती हैं कि एक परंपरा के रूप में कोहबर लिखने की कला सदियों पुरानी है. मिथिला में शादी के बाद नव विवाहित वर-वधू  जिस घर में चार दिन तक रहते हैं, उसे कोहबर कहा जाता है. इस घर में दीवार, कागज या कपड़े पर कोहबर बनाया जाता है.  मिथिला में कायस्थ परिवारों में शादी के अवसर पर जिस कागज में भर कर सिंदूर वर पक्ष की तरफ से वधू के यहाँ भेजा जाता है, उसमें से दो कोहबर, एक दशावतार, एक कमलदह और एक बांस लिखे होने का रिवाज परंपरा से चला आ रहा है.  पूर्व में इसे लिखिया कहा जाता था.  गोदावरी दत्त ने बताया कि उन्होंने मिथिला पेंटिंग अपनी माँ सुभद्रा देवी से सीखा था, जो खुद एक चर्चित कलाकार थीं. हालांकि बाहरी दुनिया में कागज पर लिखे मिथिला पेंटिंग का प्रचलन 60 के दशक में दिखाया गया है पर वर्षों से इसे दीवारों के अलावे कागज पर भी चित्रित किया जाता रहा है.  पहले इसे बसहा पेपरपर लिखा जाता था.

कोहबर की कला स्त्री-पुरुष के सुखद दांपत्य की कामना को जीव-जगत के साथ संपूर्णता और एकमेक रूप में चित्रित करती है.  प्रतीक रूप में कोहबर में बांस, पूरइन, केले का थम्म, कमल, कछुआ, साँप, मछली, लटपटिया सुग्गा, सूर्य और शिव-पार्वती का चित्रण होता है. ऐसा नहीं कि मिथिला पेंटिंग में महज कोहबर का ही चित्रण होता है. इसमें पारंपरिक के साथ-साथ सामयिक विषय वस्तुओं को भी कलाकारों की कल्पना की तूलिका से यथार्थपरक ढंग से रंगा जाता है.  हाल ही में चर्चित कलाकार शांति देवी ने मिथिला पेंटिंग की शैली में कथा प्रकाशन से बच्चों के लिए बाइस्कोप नाम से एक किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने अपने जीवन-वृत्त को उकेरा है.

मैंने गोदावरी दत्त से पूछा कि मिथिला पेंटिंग में ऐसी क्या विशेषता है जो अन्य आधुनिक या पारंपरिक कला रूपों में नहीं मिलती. हँसते हुए उन्होंने जवाब दिया--मुझे तो ऐसी कोई विशेष बात इसमें नहीं दिखती है! माँ सीता का आशीर्वाद हमें मिला है, बस मैं इतना ही कहूँगी.


असल में, मिथिला पेंटिंग जीवन-यापन और लोक से गहरे से जुड़ी हुई है. आम तौर पर चटक रंग और लोक जीवन का चित्रण इसकी विशेषता है.  मिथिला के सामंती समाज में स्त्रियों के जीवन का कटु यथार्थ उनकी कल्पना से जुड़ कर इस कला को असाधारण बनाता है. 

(दुनिया मेरे आगे, जनसत्ता, 31.03.2015 में प्रकाशित)