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Friday, July 22, 2022

‘पापुलर’ के रास्ते पर आगे बढ़ती दक्षिण भारतीय फिल्में

आज पापुलर मीडिया में दक्षिण भारतीय सिनेमा की चर्चा हर तरफ है. कहा तो यह भी जा रहा है कि दक्षिण की तरफ से आ रही इस तेज बयार में कहीं बॉलीवुड बिखर न जाए. वैसे हाल के वर्षों में बाहुबलीपुष्पाआरआरआरकेजीएफ जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर जो धूम मचाई है और हिंदी क्षेत्र में अल्लू अर्जुनरश्मिका मंदानाएनटीआर जूनियरसाई पल्लवी जैसे कलाकारों की जो लोकप्रियता हैवह आश्चर्यचकित करता है. इन फिल्मों को अखिल भारतीय (पैन इंडियन) सिनेमा कहा जा रहा है. इस बात से किसी को इंकार भी नहीं कि जिस तरह पुष्पाद राइज ने लटके-झटकेचरित्र-चित्रण, एक्शनगानों और संवाद से लोगों का मनोरंजन कियाइस फिल्म के दूसरे भाग का दर्शक बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

पर क्या भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि क्षेत्रीय और तेलुगुतमिलकन्नड़मलयालम के भाषाई इलाके से बाहर निकल कर ये फिल्में राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियाँ बटोर रही हैं पिछले दिनों जब मैंने कन्नड़ सिनेमा के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित निर्देशक गिरीश कसारावल्ली से एक बातचीत के दौरान यही सवाल किया तो उनका कहना था कि यह सही है कि इन फिल्मों ने सबका ध्यान दक्षिण भारतीय सिनेमा की तरफ खींचा है और दर्शकों से बड़ी मान्यता पाई है. लेकिन दक्षिण भारतीय सिनेमा बहुत पहले से लोगों का ध्यान खींचता आ रहा है. यह कोई हाल की बात नहीं हैअडूर गोपालकृष्णन की बात हो या पट्टाभिरामा रेड्डी की संस्कार (1970)बीवी कारांत की चोमाना डुडी (1975) की. अन्य फिल्मों को भी उनकी सामग्री और कला के लिए अखिल भारतीय पहचान मिली थी. चूंकि इन फिल्मों को कभी बहुत बड़े स्तर पर रिलीज नहीं किया गयाइसलिए उन्हें दर्शकों से इतनी मान्यता नहीं मिलीजितनी आज की फिल्मों को मिल रही है. पिछली सदी के  सत्तर-अस्सी के दशक में खुद कसारावल्ली की घाटश्रद्धा (1977), तबराना कथे (1986) जैसी फिल्मों ने कन्नड़ सिनेमा को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया था. पर अडूरशाजी करुण या कसारावल्ली की फिल्में पापुलर सिनेमा के फ्रेम में नहीं बनाई गई थी. ये फिल्में कला या समांतर सिनेमा के दौर में बनी जिसकी पहुँच एक खास दर्शक वर्ग तक सीमित रही. आज भी हिंदी भाषा में इनकी फिल्में बमुश्किल मिलती हैजबकि दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनी जिन फिल्मों की आज चर्चा हो रही हैवे हिंदी भाषा में भी साथ-साथ डब की गई. इन्हें इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म का भी सहयोग मिला है.

बहरहालपिछली सदी में जब तकनीक और मीडिया का विस्फोट नहीं हुआ था तब भी एनटी रामाराव और एम जी रामचंद्रन जैसे अभिनेता-राजनेता की लोकप्रियता अखिल भारतीय स्तर पर थी. प्रसंगवश तेलुगु सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता एनटीआर की इस साल जन्मशती मनाई जा रही है, जहाँ उनके सिनेमा और राजनीतिक जीवन को प्रमुखता से याद किया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि सत्तर साल पहलेवर्ष 1952 में जब भारत के चार महानगरों में पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया (यह एशिया का भी पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव था) तब इसमें राज कपूर की फिल्म आवाराके साथ एनटी रामाराव अभिनीत पाताल भैरवी (तेलुगू)वी शांताराम की अमर भूपाली (मराठी)और अग्रदूत की बाबला (बांग्ला)दिखाई गई थी. इसी तरह रजनीकांतकमल हासनचिरंजीवीममूटी जैसे अभिनेता और मणि रत्नम जैसे निर्देशक हिंदी दर्शकों के दिलों पर राज करते रहे हैं. यह बॉलीवुड का दुर्भाग्य है कि वह इन कलाकारों की प्रतिभा का समुचित इस्तेमाल नहीं कर पाया. यहाँ जोड़ना उचित है कि मणि रत्नम की फिल्में जैसेनायकन (1987)रोजा (1992)बाम्बे (1995) अखिल भारतीय स्तर पर काफी सफल रही थी.

गिरीश कसारावल्ली हालांकि कहते हैं कि व्यक्तिगत तौर पर मुझे इन फिल्मों की सामग्री और कला पक्ष को लेकर चिंता है. इन्हें व्यापक स्तर पर दर्शकों की मान्यता मिलती है और ये बॉक्स ऑफिस पर भी सफल हैंलेकिन ना तो आपको और ना ही मुझे इससे फायदा होता है. अगर सौंदर्यशास्त्र के नजरिए से कोई फिल्म अच्छी तरह गढ़ी गई है और कुछ सामाजिक मुद्दों को संबोधित करती है (जिन्हें नज़रंदाज किया जा रहा है)तभी मुझे लगता है कि हमें उससे कुछ हासिल होगा.’ ऐसा भी नहीं कि दक्षिण भारतीय सिनेमा पापुलर फ्रेम में ही अवस्थित है. मलयालम में बनी जलीकट्टू’, द ग्रेट इंडियन किचेन तमिल में बनी काला’, ‘ जय भीम और हाल ही में तेलुगु में रिलीज हुई विराट पर्वम’ जैसी फिल्में उदाहरण है कि कलात्मकता और सामाजिक यथार्थ का संयोजन एक साथ संभव है.

पर क्या यह सच नहीं कि दशकों से दर्शक बॉलीवुड की फिल्मों की तरफ इसलिए भागते रहे हैं कि उन्हें रोजमर्रा की कश्मकश और दौड़-भाग से छुटकारा मिले और उनका मनोरंजन हो. पुष्पा क्या हमें बॉलीवुड के 70 और 80 के दशक में बनी व्यावसायिक फिल्मों की याद नहीं दिलाताऐसे में पापुलर’ के रास्ते, तकनीक के सहयोग से आगे बढ़ती हुई ये फिल्में यदि सफल हो रही है तो आश्चर्य कैसा

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)