समांतर सिनेमा आंदोलन से निकले फिल्मकार और लेखक सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘अफवाह’ इन दिनों चर्चा में है. ‘ये वो मंजिल तो नहीं’, ‘धारावी’, ‘इस रात की सुबह नहीं’, ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ आदि उनकी चर्चित फिल्में है जिन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. मिश्रा ने फिल्मी करियर के चालीस साल पूरे किए हैं. हाल ही में अरविंद दास ने उनसे बातचीत की. प्रस्तुत है संपादित अंश:
Tuesday, July 11, 2023
सुधीर मिश्रा: सवाल पूछना सिनेमा की भूमिका है, जरूरी नहीं है कि वह राजनीतिक हो
Thursday, July 06, 2023
सुधीर मिश्रा की राजनीतिक फिल्मों का सौंदर्यशास्त्र
कुछ वर्ष पहले दिल्ली में एक फिल्म समारोह के दौरान मैंने फिल्म निर्देशक सुधीर मिश्रा से पूछा कि समांतर सिनेमा के फिल्मकार मुख्यधारा में क्यों चले गए? लगभग चिढ़ते हुए उन्होंने कहा था: ‘यह सवाल मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? मैं तो वैसी ही फिल्में बना रहा हूँ, उनसे पूछिए जो उधर चले गए’. 80 के दशक में 'जाने भी दो यारो (1983)' के साथ उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत एक लेखक के रूप में की थी. 'ये वो मंजिल तो नहीं', 'धारावी' जैसी फिल्मों के निर्देशन से उनकी एक अलग पहचान बनी. राष्ट्रीय पुरस्कारों से उन्हें सम्मानित भी किया गया. समांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों के लिए राजनीतिक विषय अछूते नहीं थे. उनका ध्येय संवेदनाओं के विस्तार के साथ-साथ दर्शकों को उद्वेलित करना भी था. गोविंद निहलानी की फिल्में इसका बेहतरीन उदाहरण है.
सुधीर मिश्रा बातचीत में अक्सर अपनी राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा का जिक्र करते हैं. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्रा उनके नाना थे. उनके पिता को लखनऊ फिल्म सोसाइटी की स्थापना का श्रेय जाता है. दिल्ली विश्वविद्यालय से अध्ययन करने के बाद उन्होंने एफटीआईआई, पुणे में काफी वक्त गुजारा जहाँ उनके भाई पढ़ाई करते थे.
नक्सलबाड़ी आंदोलन और आपातकाल की पृष्ठभूमि में बनी ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ (2003) उनकी बहुचर्चित फिल्म है, जो बीस साल पहले रिलीज हुई थी. 70 के दशक की देश की राजनीति, नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़े संभ्रांत और शिक्षित वर्ग के युवाओं के सपने, हताशा को इस फिल्म से बेहतर चित्रित करने वाला हिंदी में शायद कोई अन्य फिल्म नहीं है. प्रेम कहानी के रूप में बुनी गई यह फिल्म एक साथ शहर (दिल्ली) और गाँव (भोजपुर) की यात्रा करती है.
नयी सदी में समांतर सिनेमा का स्वरूप काफी बदल गया है. मुख्यधारा की फिल्मों में गाहे-बगाहे समांतर सिनेमा की अनुगूंज सुनाई पड़ती है. सुधीर मिश्रा, अनुराग कश्यप, अनुभव सिन्हा आदि ऐसे ही फिल्मकार हैं. और कहा जा सकता है कि ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ वह फिल्म है, जिसने इस धारा की शुरुआत की. इन फिल्मों का सौंदर्यशास्त्र पिछली सदी के समांतर सिनेमा से अलहदा है. नई तकनीक की भी एक बड़ी भूमिका है यहां.
बहरहाल, इन दिनों नेटफ्लिक्स पर सुधीर मिश्रा के लेखन-निर्देशन में बनी ‘अफवाह’ फिल्म स्ट्रीम हो रही है. ‘अफवाह’ फिल्म का सिनेमाघरों में बहुत ही सीमित प्रदर्शन हुआ और वह जल्दी ही उतर भी गईं. जाहिर है, इस फिल्म की चर्चा उस रूप में नहीं हो पाई जिसकी अपेक्षा थी.
‘अफवाह’ फिल्म में एक बार फिर से सुधीर मिश्रा अपने उसी तेवर और राजनीतिक संवेदना के साथ मौजूद हैं. राजनीति एक विषय के रूप में उनके सिनेमा में शुरू से मौजूद रही है. इस फिल्म में राजनीति का विस्तार ‘हजारों ख्वाहिशें जैसी’ हालांकि नहीं है, लेकिन सच को सच की तरह दिखाने का उनमें साहस दिखता है, जो इन दिनों मुश्किल है: न सिर्फ सिनेमा बल्कि साहित्य में भी! हां, फिल्म में साहित्य समारोहों (लिट फेस्ट) पर भी कटाक्ष किया गया है. जहाँ साहित्य कम, तमाशे ज्यादा दिखते हैं.
ऐसी सूचना या खबर जो तथ्य पर आधारित ना हो और जिसका दूर-दूर तक सत्य से वास्ता न हो अफवाह है. ऐसा नहीं है कि खबर की शक्ल में दुष्प्रचार, अफवाह आदि समाज में पहले नहीं फैलते थे. वर्तमान में देश की राजनीतिक पार्टियां राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल करती हैं. उनके पास एक पूरी टीम है जो अफवाह और फेक न्यूज के उत्पादन, प्रसारण, वायरल करने में रात-दिन जुटी रहती है. पिछले दशक में सोशल मीडिया और इंटरनेट के उभार ने भी समाज में अफवाह फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई है. यह यथार्थ इस फिल्म का मूल विषय है. फिल्म सधे ढंग से बेहद कुशलता से दिखाती है कि किस तरह अफवाह व्यक्ति की जिंदगी पर असर डालती है और तबाह कर देती है. साथ ही समकालीन समाज में चर्चा के जो विषय हैं- सांप्रदायिकता, लव जिहाद, लिंचिंग आदि लिपटा चला आता है.
ऐसा लगता है कि निर्देशक ‘अफवाह’ के विस्तार के साथ मीडिया की भूमिका और फेक न्यूज की तरफ भी कैमरा मोड़ते तो ज्यादा अच्छा रहता. साथ ही इस फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी या भूमि पेडेनकर के लिए के के मेनन, शाइनी आहूजा या चित्रांगदा सिंह की तरह अभिनय कौशल दिखाने के लिए कोई खास मौका नहीं है.
मिश्रा की ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ की तरह भले ही ‘अफवाह’ का वितान फैला नहीं दिखता, बावजूद इसके यह फिल्म समकालीन उत्तर भारतीय राजनीति का एक ठोस दस्तावेज है. विषय-वस्तु के स्तर पर यह हमें गहरे झकझोरती है.
Sunday, July 02, 2023
जाने भी दो यारो के चालीस साल
पिछली सदी के 80 का दशक बॉलीवुड के लिए विरोधाभासों से भरा रहा है. एक तरफ मुख्यधारा के फिल्मकारों की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर पिट रही थी, वहीं समांतर सिनेमा के फिल्मकारों, अदाकारों, फिल्मों की चर्चा देश-दुनिया में हो रही थी.
हिंदी की ‘कल्ट क्लासिक’ फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ का यह चालीसवां साल है. हिंदी सिनेमा के इतिहास में हास्य को लेकर अनेक फिल्में बनी, लेकिन ‘जाने भी दो यारो’ जैसी कोई नहीं. यह फिल्म दो संघर्षशील, ईमानदार फोटोग्राफर विनोद (नसीरुद्दीन शाह) और सुधीर (रवि बासवानी) की कहानी है, जो एक बिल्डर के भ्रष्टाचार को पर्दाफाश करते हैं. 'हम होंगे कामयाब' के विश्वास के साथ जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं, हम एक ऐसा समाज देखते हैं जिसमें सब कुछ काला है. हास्य-व्यंग्य को आधार बनाते हुए यह फिल्म निर्ममता से सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था, सत्ता के साथ मीडिया के गठजोड़ को उधेड़ती है. चुटीले संवाद से यह दर्शकों का मनोरंजन करती है. यह फिल्म न तो पापुलर सिनेमा का रास्ता अख्तियार करती है, न हीं सत्तर के दशक में बनी समांतर सिनेमा की अन्य फिल्मों की तरह नीरस ही है. सिनेमा निर्माण को लेकर जो प्रयोग यहाँ है, उसे खुद कुंदन आगे जारी नहीं रख पाए. उन्होंने जो टीवी सीरियल निर्देशित किया (ये जो है जिंदगी, नुक्कड़, वागले की दुनिया) हालांकि उसकी याद लोगों को अब भी है.
फिल्म के आखिर में महाभारत का प्रसंग आज भी गुदगुदाता है, लेकिन कुछ समय बाद दृष्टिहीन ‘घृतराष्ट्र’ के इस सवाल से हम नज़र नहीं चुरा पाते कि-‘ये क्या हो रहा है’. इस फिल्म में कई ऐसे प्रसंग है जिसका कोई 'लॉजिक' नहीं है, एबसर्ड है. हमारा समय भी तो ऐसा ही है, जिसमें कई चीजें बिना लॉजिक के चलती जा रही हैं और हम उसे चुपचाप देखते रहते हैं. हमें पता ही नहीं चलता है कि हंसना है या रोना!
हाल ही में समांतर सिनेमा के प्रमुख फिल्मकार, पुणे फिल्म संस्थान (एफटीआईआई) में कुंदन शाह के सहपाठी रहे सईद मिर्जा ने एक किताब लिखी है- ‘आई नो द साइकोलॉजी ऑफ रैट्स’, जिसके केंद्र में कुंदन शाह (1947-2017) हैं. यह किताब असल में सईद-कुंदन की यारी की दास्तान है, जो स्मृतियों के सहारे लिखी गई है. इसके संग हमारा समय और समाज भी लिपटा चला आता है.
इस किताब से गुजरते हुए हम कुंदन शाह के मानसिक बनावट, उनकी वैचारिक दृष्टि से परिचित होते हैं. कुंदन ने एफटीआईआई और एनएसडी के कलाकारों के संग मिलकर एनएफडीसी के सहयोग से महज सात लाख रुपए में यह फिल्म बनाई थी. नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, पंकज कपूर, भक्ति बर्वे, नीना गुप्ता, रवि बासवानी, सतीश कौशिक, सतीश शाह जैसे मंजे कलाकार एक साथ कम ही फिल्म में दिखे हैं. साथ ही परदे के पीछे रंजीत कपूर, पवन मल्होत्रा, सुधीर मिश्रा, विनोद चोपड़ा (उनकी फिल्म में भी छोटी भूमिका थी), रेणु सलूजा (संपादक) की भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं थी. यह फिल्म एक बेहतरीन ‘टीम वर्क’ और काम के प्रति लगन, समर्पण की भी मिसाल है. असल में, यारों की यारी ने ‘जाने भी दो यारो’ को 'कल्ट क्लासिक' बनाया.
Saturday, July 01, 2023
आलोकधन्वा से बातचीत: कवि नहीं होते तो नेता तो हम कभी नहीं होते
हिंदी के चर्चित और विशिष्ट कवि आलोकधन्वा दो जुलाई को जीवन के 75 साल
पूरे कर रहे हैं. हिंदी में कम ऐसे रचनाकार हुए हैं जिन्होंने बहुत कम लिख कर
पाठकों की बीच उनके जैसी मकबूलियत पाई हो. पचास वर्षों से आलोकधन्वा रचनाकर्म में
लिप्त हैं, पर अभी तक महज एक कविता संग्रह- ‘दुनिया
रोज बनती है’ प्रकाशित है. इस किताब को छपे भी
पच्चीस साल हो गए. उनकी छिटपुट कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती
रही हैं. उम्मीद है कि इस साल उनका दूसरा कविता संग्रह प्रकाशित होगा.
वर्ष 1972 में ‘फिलहाल’ और ‘वाम’ पत्रिका में उनकी कविता ‘गोली
दागो पोस्टर’ और ‘जनता का आदमी’ प्रकाशित
हुई थी. उस दौर में देश में नक्सलबाड़ी आंदोलन की अनुगूंज थी. लोगों ने एक अलग
भाषा-शैली, प्रतिरोध की चेतना उनकी कविताओं में
पाया. बाद में उनकी ‘भागी हुई लड़कियाँ’,’ ब्रूनो
की बेटियाँ’, ‘कपड़े के जूते’, ‘सफेद
रात’ जैसी कविताएँ काफी चर्चित रही. कॉलेज
के दिनों से ही मैं आलोकधन्वा की कविता का पाठक रहा हूँ. इन वर्षों में गाहे-बगाहे
उनसे बात-मुलाकात होती रही है. उनसे हुई बातचीत का एक संपादित अंश प्रस्तुत है:
# आपकी शुरुआती कविताएं जब छपी उस समय
देश में वाम आंदोलनों का जोर था. क्या आपकी कविता इन आंदोलनों की उपज है?
हां, हम लोग उस समय वाम आंदोलन में थे. जब
फिलहाल में मेरी कविता छपी उस वक्त जय प्रकाश नारायण पटना आए थे. उनकी पहली मीटिंग
जो पटना यूनिवर्सिटी में हुई उसमें मैं वहाँ मौजूद था. जय प्रकाश नारायण बड़े
देशभक्त थे. जेपी, लोहिया, नेहरू सब बहुत विद्वान लोग थे. आजादी
की लड़ाई के दौरान जो मूल्य थे, उन्हीं से हम नैतिक रूप से संपन्न हुए.
हमारे लिए पार्टी से ज्यादा वैल्यू महत्वपूर्ण था. मैंने वर्ष 1973 में
पटना छोड़ दिया था. 1974 में जेपी का आंदोलन शुरु हो गया.
# आपने मीर के ऊपर कविता लिखी है (मीर पर
बातें करो/तो वे बातें भी उतनी ही अच्छी लगती हैं/ जितने मीर). मीर के अलावे कौन
आपके प्रिय कवि रहे हैं?
कवि के व्यक्तित्व के अनुरूप ही अन्य कवि उसके प्रिय होते हैं. मीर हमारे
प्रिय कवि हैं. कबीर भक्तिकालीन कवियों में बहुत उच्च कवि हैं. यदि आप पूछेंगे कि
सूरदास कैसे थे, तो मैं कहूंगा कि अद्भुत थे. इसी तरह
संत तुकाराम, चंडीदास बड़े कवि थे.
यह कहना बड़ा मुश्किल है, कौन बड़े और प्रिय कवि हैं. आजकल तुलसी
की दो पंक्तियों को लेकर उनकी आलोचना होती है, जिससे मैं सहमत नहीं हूँ. जो यह लिखता
है- ‘परहित सरिस धरम नहीं कोऊ’, उसकी
अच्छाई को हम साथ क्यों नहीं लें? आजकल लोग प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ पर भी
सवाल उठाते हैं. उन पर हमला करते हैं. जो लोग हमला करते हैं असल में वे पढ़ते नहीं
हैं. लोग नेहरू, जेपी पर भी हमला बोलते हैं.
# आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा
है. देश में सांस्कृतिक-राजनीतिक माहौल के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
आज के वातावरण के ऊपर मुझे कुछ नहीं कहना, आप बेहतर जानते हैं. मेरा सिर्फ यह
कहना है कि भारत ने अपने अस्तित्व के लिए जो संघर्ष किया उसमें जो सबसे अच्छा
रास्ता है उसे चुने. उस रास्ते में बहुत बड़े नेता हुए हैं, उन्हें
छोड़ कर अमृत महोत्सव मनाने का क्या मतलब? आप गाँधी, नेहरू, मौलाना
आजाद, सुभाष चंद्र बोस, पटेल को
छोड़ नहीं सकते. भारत में लोकतंत्र की ऊंचाई किसी के चाहने से नष्ट नहीं होगी.
# आपने हाल ही में एक कविता में लिखा है
कि ‘अगर भारत का विभाजन नहीं होता तो हम
बेहतर कवि होते’...
हां, मैं विभाजन से सहमत नहीं हूँ. मैं
मानता हूँ कि वह एक जख्म है. मैंने बलराज साहनी पर एक कविता लिखी है. वह रेखाचित्र
है. इसमें रे हैं, ऋत्विक घटक हैं. ये सब विभाजन से
प्रभावित थे.
# आपकी बाद की कविताओं में स्मृति, नॉस्टेलजिया
की एक बड़ी भूमिका है. जैसे ‘एक जमाने की कविता’ में
आपने अपनी माँ को याद किया है. इसे पढ़कर मैं अक्सर भावुक हो जाता हूँ. क्या
लिखते हुए आप भी भावुक हुए थे?
स्वाभाविक है. कविता अंदर से आती है. मेरी माँ 1995 में चली
गई थी, जिसके बाद मैंने यह कविता लिखी. माँ तो
सिर्फ एक मेरी नहीं है. जो आदमी माँ से नहीं जुड़ा है, अपने
नेटिव से नहीं जुड़ा है वह इसे महसूस नहीं कर सकता है. वह इस संवेदना को नहीं समझ
सकता है.
# एक और कविता का जिक्र करना चाहूँगा.
आपने लिखा है-हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर की ओर जाती है/ सीटी
बजाती हुई/ धुआं उड़ाती हुई...
रेल मेरे बचपन की स्मृतियों में है और मेरी संवेदनाओं का हिस्सा है. मैं
बिहार से गहरे जुड़ा हूँ. मुंगेर से जमालपुर को जो ट्रेन जाती थी- कुली गाड़ी, तो
उसमें हम सफर करते थे. वह सीटी बजाती और धुआं उड़ाती जाती थी. अपने नेटिव से
जुड़ाव हर बड़े कवि के यहाँ पाया जाता है.
चाहे वह विद्यापति हो, रिल्के हो या नेरुदा.
# आपकी कविताओं में सिनेमा के बिंब अक्सर
आते हैं, इसका स्रोत क्या है?
नाटक और सिनेमा हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा है. सिनेमा का प्रभाव एक बहुत
बड़े समुदाय पर पड़ता है. फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ हमारे गुरु थे. सिनेमा हमारे जीवन का
अभिन्न अंग है. सिनेमा ने कथा-कहानी सबको समाहित किया है. आधुनिक काल में बड़ी
साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनी. सिनेमा एक डायनेमिक मीडियम है. सत्यजीत रे ने
विभूति भूषण के साहित्य पर फिल्म बनाई.
# यदि आप कवि नहीं होते तो क्या होते?
(हँसते हुए) यदि कवि नहीं होते तो नेता तो हम कभी नहीं होते. नेता का गुण नहीं है मुझमें. कवि का गुण है मुझमें थोड़ा. हिंदी में कविता के पाठकों का विशाल वर्ग है. जिन पाठकों ने निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, रघुवीर सहाय को पढ़ा वे मुझे भी पढ़ते हैं.
(मधुमती पत्रिका के अगस्त अंक में प्रकाशित, 68-69 पेज)




