हिंदी पखवाड़े के बहाने हिंदी पर कुछ नोट्स
हिन्दी है मालिक की
तब आज़ादी से लड़ने की भाषा फिर क्या होगी?
हिन्दी की माँग
अब दलालों की अपने दास-मालिकों से
एक माँग है
बेहतर वर्ताव की
अधिकार की नहीं
कवि-पत्रकार रघुवीर सहाय ने बजरिए कविता यह बात तकरीबन पच्चीस-तीस साल पहले कही थी। तब समकालीन भूमंडलीकरण का उड़नखटोला भारत नहीं पहुँचा था। पर ये पंक्तियाँ मौजूदा समय में हिन्दी का सूरते-हाल बखूबी बयाँ करती है। करोड़ो वंचितों, दलितों, स्त्रियों के संघर्ष की भाषा होने के कारण ही महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने आजादी के आंदोलन के दौर में राष्ट्रभाषा हिन्दी के पक्ष में पुरजोर ढंग से वकालत की थी। उन्होनें हिन्दी को स्वराज से जोड़ा । आज हिन्दी संघर्ष की भाषा होने की ताक़त खोती जा रही है। आम जन से भाषा की दूरी बढ़ती जा रही है। हिन्दी पर बाजार और संचार के माध्यमों का दबाव है। दशकों से सत्ता की घोर उपेक्षा झेल रही हिन्दी को लेकर भारतीय समाज में गहरी उदासीनता है।
भूमंडलीकरण एक ऐसा कनखजूरा है जिसके बावन हाथ हैं। मानव जीवन का कोई पहलू, कोई कोना इससे अछूता नहीं है। 90 के दशक में भारत में उदारीकरण, बाजारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रकिया ने अपने साथ संचार क्रांति लेकर आया, या कहना चाहिए कि संचार माध्यमों के रथ पर चढ़ कर ही भूमंडलीकरण ने भारत में अपना पाँव फैलाया। वर्तमान में केबल, इंटरनेट, मोबाइल के माध्यम से एक नई हिंदी गढ़ी जा रही है। यह हिन्दी फिल्मों, सिरीयलों, विज्ञापनों, समाचार पत्रों और खबरिया चैनलों के माध्यम से तेजी से फैल रही है। सच है कि देश-विदेश में हिन्दी की पहुँच इससे काफी बढ़ी है। सच है कि ‘ठंडा मतलब कोका कोला ’ सहज ही लोगों के दिल में जगह बना लेता है । पर यह भाषा भूमंडलीकरण के साथ फैल रही उपभोक्ता संस्कृति की है, विमर्श की नहीं। इस भाषा में लोक-राग और रंग नहीं है जहाँ से हिंदी अपनी जीवनीशक्ति पाती रही है ।
मीडिया और हिन्दी
किसी भी भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों का विशिष्ट योगदान रहा है। हिंदी इसका अपवाद नहीं है। उन्नीसवी सदी के आखिरी तथा बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में हिन्दी भाषा, विशेष रूप से हिंदी गद्य के विकास और परिमार्जन में हिन्दी के पत्र-पत्रिकाओं के योगदान का ऐतिहासिक महत्व है। पर पिछले दशकों में हिन्दी के स्वरूप में काफी तेजी से बदलाव हुआ है। खास तौर पर हिन्दी अखबारों में, जिसकी पहुँच भारत के कोने-कोने में बढ़ती ही जा रही है। 90 के दशक में तकनीक उपलब्धता, फैलते बाजार तथा सरकार की उदारीकरण की नीतियों के कारण देश में हिन्दी के दर्जनों खबरिया चैनलों का प्रवेश हुआ। हिन्दी अखबारों की भाषा पर इन चैनलों का खासा प्रभाव दिखता है। 80 के दशक के किसी भी अखबार की सुर्खियाँ दो टूक, स्पष्ट और संक्षिप्त हुआ करती थी। आज अखबारों की सुर्खियाँ चुटीली, मुहावरेदार और अंग्रेजी से छौंकी हुई होती है। बजट और चुनाव जैसी महत्वपूर्ण खबरों को भी मनोरंजक भाषा में प्रस्तुत करने का चलन जोर पकड़ रहा है। मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी हिन्दी अखबारों की इस भाषा शैली का समर्थन करते हैं। एक लेख में वे लिखते हैं कि, “बाजार की शक्तियाँ और उनके सहयोगी माध्यम टीवी ने यह मसला सुलझा दिया है कि कौन सी भाषा जनसंचार में सक्षम है, जो सक्षम है वह बड़ी भाषा है। यह हिंदी है जिसे आप वर्णसंकर, भ्रष्ट, हिंग्रेजी कह सकते है। ” हिन्दी समाचार पत्रों के कई संपादक इस भाषा के पक्ष में दलील देते हुए मिलते हैं। पर सवाल है कि हिन्दी समाज का वह कौन सा वर्ग है जो इस हिंग्रेजी या हिंग्लिश या भ्रष्ट भाषा अपना कर गौरवान्वित हो रहा है, और जिसके प्रतिनिधित्व का दावा हिन्दी के अखबार तथा खबरिया चैनल आज कर रहे है?
तब आज़ादी से लड़ने की भाषा फिर क्या होगी?
हिन्दी की माँग
अब दलालों की अपने दास-मालिकों से
एक माँग है
बेहतर वर्ताव की
अधिकार की नहीं
कवि-पत्रकार रघुवीर सहाय ने बजरिए कविता यह बात तकरीबन पच्चीस-तीस साल पहले कही थी। तब समकालीन भूमंडलीकरण का उड़नखटोला भारत नहीं पहुँचा था। पर ये पंक्तियाँ मौजूदा समय में हिन्दी का सूरते-हाल बखूबी बयाँ करती है। करोड़ो वंचितों, दलितों, स्त्रियों के संघर्ष की भाषा होने के कारण ही महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने आजादी के आंदोलन के दौर में राष्ट्रभाषा हिन्दी के पक्ष में पुरजोर ढंग से वकालत की थी। उन्होनें हिन्दी को स्वराज से जोड़ा । आज हिन्दी संघर्ष की भाषा होने की ताक़त खोती जा रही है। आम जन से भाषा की दूरी बढ़ती जा रही है। हिन्दी पर बाजार और संचार के माध्यमों का दबाव है। दशकों से सत्ता की घोर उपेक्षा झेल रही हिन्दी को लेकर भारतीय समाज में गहरी उदासीनता है।
भूमंडलीकरण एक ऐसा कनखजूरा है जिसके बावन हाथ हैं। मानव जीवन का कोई पहलू, कोई कोना इससे अछूता नहीं है। 90 के दशक में भारत में उदारीकरण, बाजारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रकिया ने अपने साथ संचार क्रांति लेकर आया, या कहना चाहिए कि संचार माध्यमों के रथ पर चढ़ कर ही भूमंडलीकरण ने भारत में अपना पाँव फैलाया। वर्तमान में केबल, इंटरनेट, मोबाइल के माध्यम से एक नई हिंदी गढ़ी जा रही है। यह हिन्दी फिल्मों, सिरीयलों, विज्ञापनों, समाचार पत्रों और खबरिया चैनलों के माध्यम से तेजी से फैल रही है। सच है कि देश-विदेश में हिन्दी की पहुँच इससे काफी बढ़ी है। सच है कि ‘ठंडा मतलब कोका कोला ’ सहज ही लोगों के दिल में जगह बना लेता है । पर यह भाषा भूमंडलीकरण के साथ फैल रही उपभोक्ता संस्कृति की है, विमर्श की नहीं। इस भाषा में लोक-राग और रंग नहीं है जहाँ से हिंदी अपनी जीवनीशक्ति पाती रही है ।
मीडिया और हिन्दी
किसी भी भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों का विशिष्ट योगदान रहा है। हिंदी इसका अपवाद नहीं है। उन्नीसवी सदी के आखिरी तथा बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में हिन्दी भाषा, विशेष रूप से हिंदी गद्य के विकास और परिमार्जन में हिन्दी के पत्र-पत्रिकाओं के योगदान का ऐतिहासिक महत्व है। पर पिछले दशकों में हिन्दी के स्वरूप में काफी तेजी से बदलाव हुआ है। खास तौर पर हिन्दी अखबारों में, जिसकी पहुँच भारत के कोने-कोने में बढ़ती ही जा रही है। 90 के दशक में तकनीक उपलब्धता, फैलते बाजार तथा सरकार की उदारीकरण की नीतियों के कारण देश में हिन्दी के दर्जनों खबरिया चैनलों का प्रवेश हुआ। हिन्दी अखबारों की भाषा पर इन चैनलों का खासा प्रभाव दिखता है। 80 के दशक के किसी भी अखबार की सुर्खियाँ दो टूक, स्पष्ट और संक्षिप्त हुआ करती थी। आज अखबारों की सुर्खियाँ चुटीली, मुहावरेदार और अंग्रेजी से छौंकी हुई होती है। बजट और चुनाव जैसी महत्वपूर्ण खबरों को भी मनोरंजक भाषा में प्रस्तुत करने का चलन जोर पकड़ रहा है। मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी हिन्दी अखबारों की इस भाषा शैली का समर्थन करते हैं। एक लेख में वे लिखते हैं कि, “बाजार की शक्तियाँ और उनके सहयोगी माध्यम टीवी ने यह मसला सुलझा दिया है कि कौन सी भाषा जनसंचार में सक्षम है, जो सक्षम है वह बड़ी भाषा है। यह हिंदी है जिसे आप वर्णसंकर, भ्रष्ट, हिंग्रेजी कह सकते है। ” हिन्दी समाचार पत्रों के कई संपादक इस भाषा के पक्ष में दलील देते हुए मिलते हैं। पर सवाल है कि हिन्दी समाज का वह कौन सा वर्ग है जो इस हिंग्रेजी या हिंग्लिश या भ्रष्ट भाषा अपना कर गौरवान्वित हो रहा है, और जिसके प्रतिनिधित्व का दावा हिन्दी के अखबार तथा खबरिया चैनल आज कर रहे है?
भाषा महज अभिव्यक्ति का साधन ही नही है। भाषा में मनुष्य की अस्मिता स्वर पाती है। उसमें सामाजिक-साँस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति होती है। भाषा को प्रवाहमयी कहा गया है। समय के साथ होने वाले सामाजिक-साँस्कृतिक परिवर्तनों की अनुगूँज उसमें सुनाई पड़ती है। भूमण्डलीकरण के बाद हिन्दी के अखबारों में भाषा का रूप जितनी तेजी से बदला है उतनी तेजी से हिन्दी मानस की सामाजिक-साँस्कृतिक चेतना नहीं बदली है। फलतः यह बदलाव अनायास न होकर सायास है। एक खास उभर रहे उपभोक्ता वर्ग को ध्यान में रखकर इस तरह की भाषा ( हिंग्रेजी) का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह शहरी नव धनाढ्य वर्ग है जिसकी आय में अप्रत्याशित वृद्धि उदारीकरण, बाजारीकरण और भूमण्डलीकरण के दौर में हुई है। यही वर्ग खुद को इस भाषा में अभिव्यक्त कर रहा है। इस वर्ग में हिन्दी क्षेत्र के बहुसंख्यक किसान, मजदूर, स्त्री तथा दलित नहीं आते।
राजनीतिक स्वार्थपरता के दलदल में
हिंदी के साथ शुरू से ही यह विडंबना रही है कि कुछ निहित राजनीतिक स्वार्थों के चलते कभी इसे उर्दू, कभी तमिल तो कभी अंग्रेजी के बरक्स खड़ा किया जाता रहा। स्वाभाविक हिन्दी जिसे बहुसंख्य जनता बोलती-बरतती है, का विकास इससे बाधित हुआ । राजभाषा हिन्दी को वर्षों तक ठस, संस्कृतनिष्ठ, उर्दू-फारसी शब्दों से परहेज के तहत तैयार किया गया। क़ाग़ज पर भले ही राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिंदी का विशाल भवन तैयार किया जाता रहा, सच्चाई यह है कि हिन्दी की जमीन लगातार कमजोर होती गई। राजनीतिक स्वार्थपरता, सवर्ण मानसिकता तथा राष्ट्रभाषा-राजभाषा के तिकड़म में सबसे ज्यादा दुर्गति हिंदी की हुई। 1960 के दशक में उत्तर भारत में ‘अंग्रेजी हटाओ’, और दक्षिण भारत में ‘हिंदी हटाओ’ के राजनीतिक अभियान में भाषा किस कदर प्रभावित हुई इसे हिंदी कवि धूमिल ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया था-
तुम्हारा ये तमिल दुःख
मेरी यह भोजपुरी पीड़ा का
भाई है
भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है।
हिन्दी की अस्मिता विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं, बोलियों और उर्दू से मिलकर बनी हैं। कबीर से लेकर बाबा नागार्जुन की कविता इसका दृष्टांत है। जनता की इसी भाषा मे हिंदी के समकालीन रचनाकार साहित्य रच रहे हैं। हिंदी भाषा का विकास और प्रसार इन्हीं बोलियों, क्षेत्रीय भाषाओं के साथ संवाद के माध्यम से संभव है। तब कहीं जाकर सही मायनों में हिंदी अखिल भारतीय भाषा होने का दावा कर सकती है।
सरकारी संस्थानों ने, जिनका काम हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहयोग देना है, हिन्दी का प्रचार-प्रसार कम, अपकार ज्यादा किया है। आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन का गर्दो-गुबार अभी थमा नहीं है। हिन्दी के चर्चित कवि मंगलेश डबराल कहते हैं, “इन आठ सम्मलेनों में हिन्दी का क्या भला हुआ कोई नहीं जानता। ” सरकार और उसके कारिंदे हिंदी को लेकर कितना चिंतित है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल जैसे साहित्यकारों ने आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन में जाने से इंकार कर दिया। सरकार और उसकी सहयोगी संस्था हर साल बस हिन्दी दिवस मना कर अपने कर्तव्य की इति श्री समझ लेती है। असल में, हिन्दी दिवस के नाम पर सरकारी संस्थानों में हिंदी का मर्सिया पढ़ा जाता है!
शोध की निराशा जनक स्थिति
आजादी के साठ सालों के बाद भी समाज विज्ञान, विज्ञान और तकनीक जैसे विषयों पर कोई ढंग का हिंदी में मौलिक लेखन ढूढ़ने पर भी नहीं मिलता। हिंदी में कायदे की कोई शोध पत्रिका नहीं मिलती जिसमें शोध लेख छपवाया जा सके। देश के प्रतिष्ठित उच्च अध्ययन संस्थानों में सारा शोध अंग्रेजी भाषा में हो रहा है। देश की बहुसंख्यक जनता की जिसमें कोई हिस्सेदारी नहीं है। सारा शोध जिन गरीबों, पिछड़ों, दलित-आदिवासियों, स्त्रियों को केंद्र में रख कर किया जाता उसकी पहुँच उन तक कभी भी नहीं हो पाती। पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र की ‘आज भी खड़े हैं तालाब’ जैसी किताबें, जिसकी सफलता और पहुँच असंदिग्ध है, उन लोगों पर करारा व्यंग्य है जो इस बात का रोना रोते है कि हिन्दी में लोक-मन को छूने वाली भाषा में साहित्य से इतर कोई रचना संभव ही नहीं है। राजनीतिकशास्त्री रजनी कोठारी ‘भारत में राजनीति’ जैसी किताब की हिन्दी में पुनर्रचना कर एक नई पहल की शुरूआत करते हैं। कभी समाजशास्त्री के.एल शर्मा ने एन सी ई आर टी की समाजशास्त्र की किताब मूल हिन्दी में लिख कर साबित किया था कि स्कूल-कालेज की समाजविज्ञान की किताबें हिंदी में लिखना संभव है। दिक्कत यह है कि हिन्दी क्षेत्र के विद्वान अंग्रेजी और हिंदी दोनों में दक्ष होने के बावजूद हिंदी में लिखने का जहमत मोल नहीं लेते। इसकी वजह सिर्फ आर्थिक नहीं, कहीं गहरे अवचेतन में हिन्दी के प्रति हीनमन्यता बोध से ग्रस्त होना भी है।
अंग्रेजी-हिंदी का द्वंद
भूमंडलीकरण के इस दौर में अंग्रेजी का ऐसा हौव्वा खड़ा किया जा रहा है कि हिन्दी के पक्ष में की गई किसी भी बात को दकियानूसी विचार करार दिया जाता है। निहित स्वार्थ के कारण हिंदी के एजंडे को हिंदी और अंग्रजी के प्रभुवर्गों ने आपसी गठजोड़ कर हथिया लिया है।
निस्संदेह अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा है। आप इस भाषा के माध्यम से एक बड़े समूह तक अपनी बात पहुँचा सकते हैं। इस भाषा की जानकारी भूमंडलीकरण के इस दौर में हमारी जरूरत है। इस बात से शायद ही किसी को कोई गुरेज हो कि अंग्रेजी के बूते अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीयों की एक पहचान बनी हैं। पर अंग्रेजी अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधि कभी नहीं कर सकती। देश-विदेश में रह रहे भारतीयों की अस्मिता, उसकी असली पहचान निज भाषा में ही संभव है। कवि विद्यापति ने सदियों पहले इसी को लक्ष्य कर ‘ देसिल बयना सब जन मिट्ठा ’ कहा होगा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत एक बड़ा बाजार है। इस बाजार में हिन्दी में अंग्रेजी के शब्दों को ठूँस कर हिन्दी को विश्व भाषा बनाने की मुहिम आज चल रही है। कई अखबारों में हिंदी को रोमन लिपि में लिखने का प्रयोग जोर पकड़ रहा है। क्या यह हास्यास्पद नहीं कि जो भाषा ठीक से ‘राष्ट्रीय’ ही नहीं बन पाई हो उसे ‘ अंतरराष्ट्रीय ’ बनाये जाने की कोशिश की जा रही है ?
20वीं सदी के आरंभिक दशकों में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद से लड़ कर हिन्दी ने सार्वजनिक दुनिया( पब्लिक स्फ़ियर) में अपनी एक भूमिका अर्जित की थी। इस दुनिया में विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक मुद्दों पर बहस-मुबाहिसा संभव था। आजादी के बाद प्रतिक्रियावादी, सवर्ण प्रभुवर्ग जिनका साठगांठ अंग्रेजी के अभिजनों के साथ था, हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया पर क़ाबिज़ होते गये। इससे हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया किस कदर सिकुड़ती और आमजन से कटती चली गई प्रो.आलोक राय ने विस्तार से अपनी पुस्तक ‘हिंदी नेशनल्जिम’ में बताया है। एक बार फिर हिन्दी को महज बोल-चाल के माध्यम तक ही सीमित रखने का कुचक्र चल रहा है।
इंटरनेट पर हिन्दी
भूमंडलीकरण का सबसे प्रभावी औजार है सूचना । यह सूचना इंटरनेट के माध्यम से पूरे भूमंडल के फासले को चंद लम्हों में नापने का माद्दा रखती है। लेकिन चूँकि सत्ता की भाषा अंग्रेजी है, इंटरनेट की भाषा भी अंग्रेजी ही है। बहरहाल, हिन्दी देर ही सही अंग्रेजी के गढ़ में सेंध लगाने में कामयाब हो रही है। इसका सबूत है विभिन्न वेव साइटों पर मौजूद हिंदी के अखबार और पत्र-पत्रिकाएँ। इससे हिंदी का प्रसार और पहुँच देश-विदेश में तेजी से हो रहा है। साथ ही हाल के दो-एक वर्षों में जिस तेजी से हिन्दी के ब्लौग( चिट्ठे) इंटरनेट पर फैलें है, एक उम्मीद बंधती है कि ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ फिर से जीवित होगा। क्योंकि यहाँ हर लेखक को अपनी भाषा में कहने-लिखने की छूट है। इसका अंदाजा विभिन्न ब्लौगों की भाषा पर एक नजर डालने पर लग जाता है। हाल ही में प्रकाशित एक लेख में प्रसिद्द भाषाकर्मी अरविंद कुमार ने ठीक ही नोट किया है कि, “ आज हिंदी में 500 से ज्यादा चिट्ठे हैं। हिंदी वाले के जोश को देखते हुए एक-दो सालों में यह संख्या 5,000 तक पहुँच जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए। ” पर कोई भी तकनीक निर्गुण नहीं सगुण होती है। तकनीक की उपयोगिता उसके इस्तेमाल करने वालों पर निर्भर करती है। सवाल है कि जिस समाज में सूचना तकनीक का इस्तेमाल एक छोटे तबके तक ही सीमित हो, जिस भाषा में कीबोर्ड तक उपलब्ध नहीं वह भाषा-समाज किस तरह इंटरनेट का इस्तेमाल कर आगे बढ़ेगी ?
बढ़ता कारवाँ
अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति है। विश्व का एक बड़ा बाजार होने के कारण सबकी निगाहें भारत पर टिकी है। ऐसे में भारत की भाषा, संस्कृति को नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए संभव नहीं है। चीन की मंदारिन के बाद हिंदी विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है (?)।
अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति है। विश्व का एक बड़ा बाजार होने के कारण सबकी निगाहें भारत पर टिकी है। ऐसे में भारत की भाषा, संस्कृति को नजरअंदाज करना किसी भी देश के लिए संभव नहीं है। चीन की मंदारिन के बाद हिंदी विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है (?)।
देश और विदेश में तकरीबन 49 करोड़ लोगों द्वारा हिंदी बोली-बरती जाती है। वर्षों पहले दक्षिण अफ्रिका, मॉरीशस जैसे देशों में गए गिरमिटिया अपने साथ अपनी भाषा और संस्कृति भी ले गए। इन देशों में हिन्दी पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजी गई। आज अमेरिका, इटली, जापान, चीन आदि देशों के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा एवँ साहित्य का पठन-पाठन हो रहा है। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थानों में भी हिन्दी की पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्दि हो रही है। हिंदी मीडिया में बढ़ते रोजगार के कारण इस साल दिल्ली विश्वविद्यालय के नामचीन कॉलेजों में पहले कट ऑफ लिस्ट में ही हिन्दी( आनर्स) की सीटें भर गई थी। जाहिर है कि देश-विदेश में हिंदी पढ़ने वालों की रूचि बढ़ी है। हिन्दी फिल्मों ने वर्षों से हिंदी का प्रचार-प्रसार न सिर्फ देश के अहिंदी भाषी राज्यों में, बल्कि विदेशों में भी काफी किया है। यह अपने आप में स्वतंत्र शोध का विषय है।
अंग्रेजी भले ही सत्ता की भाषा हो, पिछले दो दशकों में भारतीय राजनीति में हुए परिवर्तनों ने इसे सत्ताधारियों की भाषा के रूप में स्थापित किया है। हिंदी क्षेत्रों में बढ़ती शिक्षा, हिंदी की ताकत है। अपनी जड़ों से रस लेकर स्वाभाविक रूप से आगे बढ़े, राजनीतिक इच्छा शक्ति यदि बाज़ार की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए सही दिशा दें, तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी सचमुच एक विश्व भाषा के रूप में स्थापित होगी।


3 Comments:
आपने इस लेख में इतनी सारी महत्वपूर्ण बाते कही है कि इस लेख को और अधिक लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिये -- शास्त्री जे सी फिलिप
मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार !!
बहुत अच्छा अरविंद भाई, आपको साधुवाद. एक अनुरोध करूँगा कि यदि संभव हो तो कुछ अलग पाठों के तौर पर वर्गीकृत करके लिखने का प्रयास करें. हिंदी के वेब पाठक के लिए ऐसा करना श्रेयस्कर होगा वरना रोज़मर्रा के पाठक पूरा नहीं पढ़ पाएंगे और कतराएंगे भी. मैं वेब माध्यम में हूँ इसलिए अनुभव के आधार पर सुझाव दे रहा हूँ. 500-800 शब्दों में बात पूरी कर दें. इनसे कम में निपट जाए तो और अच्छा है. मैं जानता हूँ कि ऐसा आपको और कुछ और लोगों को शायद उचित न लगे पर असल चुनौती यही है, इसे स्वीकारें.
साधुवाद सहित- पाणिनी आनंद
पाणिनी भाई, शोध की व्यस्तता के चलते ब्लौग की साम्रगी उस रूप में नहीं लिख पा रहा हूँ जिस ओर आप इशारा कर रहा हैं। सुझाव के लिए शुक्रिया।
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