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Monday, June 25, 2018

मानसून में कॉफी


पिछले दिनों मैं इतिहासकार प्रोफेसर एआर वेंकटचलापति की रोचक किताब इन दोज डेज देयर वाज नो कॉफीपढ़ रहा था. इस नाम से ही लिखे चैप्टर में लेखक ने तमिल के चर्चित लेखक-फिल्मकार एके चेट्टियार को उद्धृत किया है- कॉफी पे तो कोई पुराण लिख सकता है.

दक्षिण में जैसा कॉफी पीने का रिवाज रहा है, वैसा उत्तर भारत में नहीं. वैसे तो 17वीं सदी में ही कॉफी अपने हमसफर चाय के साथ भारत में दस्तक दे चुका था, 19वीं सदी के आखिर में दक्षिण भारत में इसकी खपत बढ़नी शुरू हुई. इससे पहले यह यूरोपीय लोगों का ही पेय था. और 20वीं सदी के आते- आते यह दक्षिण भारतीय मध्यवर्ग का पसंदीदा पेय बन गया.

हालांकि, उदारीकरण के बादउत्तर भारत में भी कॉफी की खपत ने जोर पकड़ा है. खासकर महानगरों के युवाओं, कामकाजी लोगों में कॉफी पीना सांस्कृतिक दस्तूर में शामिल हो गया है. नब्बे के दशक में जब मैं दिल्ली आया, तो मेरे जैसे गंवई पृष्ठभूमि वालों को कॉफी पीना आधुनिक होने का भान देता रहा. मेरी समझ में यह भान शराब पीने में नहीं है. 

 कॉलेज के दिनों में मेरे एक मित्र शराब की बोतल, बड़े  भाई के लिहाज या डर से, मेरे कमरे में छिपाते फिरते थे. कॉफी के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है. पश्चिमी देशों में कॉफी पीने की संस्कृति आज भी कायम है और इसके ऐतिहासिक कारण है. अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं की तरह ही सार्वजनिक जीवन (पब्लिक स्फीयर) में इन कॉफी हाउस की महत्वपूर्ण भूमिका है. लोकतंत्र में ये राज्य और नागरिक समाज के बीच एक पुल की भूमिका निभाते रहे हैं.

 मुझे याद है कि कुछ वर्ष पहले अपनी वियना यात्रा के दौरान एक कॉफी हाउस में मैंने निर्मल वर्मा की याद में बीयर का एक छोटा मग लिया, पर मेरे दोस्तों ने कॉफी पी थी. उन्होंने कहा था- कॉफी के प्यालों के साथ चीयर्स कहना अच्छा शगुन नहीं होता.उसी यात्रा में ऑस्ट्रिया के एक शहर लिंज में राह चलते एक युवा महिला को मैंने कॉफी पीने का न्यौता दिया और वह खुशी-खुशी साथ हो ली थी. सत्तर और अस्सी के दशक में पटना, इलाहाबाद, शिमला जैसे शहरों में स्थित टी-कॉफी हाउस साहित्यकारों, कलाकारों के बहस-मुबाहिसा का केंद्र थे. पर अब इनकी स्थिति बदहाल है. 

कॉलेज के ही दिनों में एक बार हम कुछ दोस्तों के साथ सिनेमा देखने गये. कॉफी का बिल मेरे एक दोस्त ने ही भरा था. उन दिनों को याद करता हुआ वह बिल का तगादा करता रहता है और मैं उसको कर्ज अदा करने के बदले साहिर लुधियानवी और जावेद अख्तर का किस्सा सुना देता हूं कि कैसे मरने के बाद भी लुधियानवी ने कर्ज वसूल लिया था. यदि आप थोड़े से भी रोमांटिक हैं, तो इस बात से शायद ही इनकार करें कि बारिश में किसी कैफे में बैठ कर कॉफी पीने का अपना सुख है, जो चाय में नहीं. यदि कोई साथी साथ हो तो फिर क्या कहने!

(प्रभात खबर, कुछ अलग कॉलम के तहत 19 जून 2018 को प्रकाशित) 

Wednesday, January 10, 2018

संवाद के ठौर

इंडियन कॉफी हाउस, जेएनयू
शहर के साहित्यकारों-पत्रकारों, राजनीतिकों, संस्कृतिकर्मियो के टी-कॉफी हाउसयानी चाय-कॉफी के बहाने मिलने-जुलने के ठिकानों से रिश्तों के बारे में पुरानी पीढ़ी के लोग अक्सर जिक्र करते हैं. पटना में सत्तर के दशक में रेणु, नागार्जुन युवा लेखकों-कलाकारों के साथ यहाँ पाए जाते थे. इलाहाबाद में चंद्रशेखर, हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे नेता और फिराक गोरखपुरी जैसे कवियों का अड्डा जमा करता था. दिल्ली के कॉफी हाउस में भी राजनीतिकों से लेकर साहित्यकारों और पत्रकारों के बीच बहस-मुबाहिसों के कई किस्से हैं. लेकिन हमारी पीढ़ी के लिए यह सब बस किस्से ही हैं, इतिहास के पन्नों में कैद. शहरों के बीच स्थित इन कॉफी हाउस के अड्डो पर कई साहित्यिक, राजनीतिक आंदोलनों के बीज अंकुरित हुए. नवतुरिया लेखको ने अपने वरिष्ठों से बहस-मुबाहिसा का अंदाज सीखा. अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं की तरह ही सार्वजनिक जीवन (पब्लिक स्फीयर) में इन टी-कॉफी हाउस की महत्वपूर्ण भूमिका है. लोकतंत्र में ये राज्य और नागरिक समाज के बीच एक पुल की भूमिका निभाते रहे हैं.

लेकिन पिछले दशकों में साफ नजर आ रहा है कि इन कॉफी हाउसों की संस्कृति शहर के बदलते मिजाज के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही है. उदारीकरण के बाद इन सस्ते कॉफी हाउस के बरक्स आधुनिक रंगों में सजे कई बड़े ब्रांड’ माने जाने वाले नामों की ऐसी दुकानें उभरीं. हालांकि दिखनो में आधुनिक और महंगे इन कॉफी हाउसों के साथ हमारा रिश्ता एक उपभोक्ता से ज्यादा नहीं, हम उससे कोई लगाव नहीं महसूस करते. बैठने-उठने के लिए यह महानगरों के युवाओं, विद्यार्थियों के बीच भले लोकप्रिय हों, सामान्य कलाकारों-संस्कृतिकर्मियों की पहुँच से दूर हैं. अपनी बात कहूँ तो छात्र जीवन में मुझे इससे ज्यादा लगाव तो जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के गंगाऔर नीलगिरीढाबा से रहा. हालांकि पिछले दिनों जेएनयू में भी इंडियन कॉफी हाउसकी शुरुआत हुई. उम्मीद की जानी चाहिए कि जेएनयू की लोकतांत्रिक संस्कृति में यह कॉफी हाउस एक नया पन्ना जोड़ने में कामयाब होगा. 

इंडियन कॉफी हाउसके करीब 400 रेस्तरां अभी भी पूरे देश के शहरों में चल रहे हैं, जिसे इंडियन कॉफी वर्कर्स कोऑपरेटिव सोसाइटीके माध्यम से चलाया जाता है. यहाँ किफायती दामों में कॉफी और इडली, डोसा, सांभर-बड़ा आदि खाने-पीने की चीजें उपलब्ध रहती हैं. लेकिन आज यह शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवियों का अड्डा नहीं रहा, ना यहाँ वह रौनक रही. बात चाहे शिमला की हो, इलाहाबाद की या दिल्ली की. दिल्ली में कनॉट प्लेस में स्थित कॉफी हाउस में आजकल छत पर बंदरों का उत्पात मचा रहता है, यहाँ भी बुद्धिजीवियों को कम ही देखा जा सकता है. रेस्तरां में गुणवत्ता के स्तर पर भी पहले के मुकाबले काफी कमी आई है. इसकी एक वजह इन कॉफी हाउस में कर्मचारियों की संख्या में आई कमी भी है. ऐसी कई स्थितियाँ सामने हैं और इसलिए अगर इनके घाटे में चलने की बात होती है तो हैरानी नहीं होती. इलाहाबाद से लेकर दिल्ली तक के कुछ गिने-चुने साहित्यकार और पत्रकार अपवाद ही कहे जाएँगे जो गाहे-बगाहे इन पुराने ठौर पर दिखाई पड़ जाते हैं. जो चीज इन कॉफी हाउस को विशिष्ट बनाती रही है, वह है यहाँ पर मौजूद अनौपचारिक माहौल और फक्कड़पन जो आधुनिक तड़क-भड़क  से कोसों दूर है.

प्रेम कोशी के साथ
बहरहाल, क्रिसमस के करीब बंगलुरु जाना हुआ. शहर के व्यस्त सेंट मार्क्स रोड पर स्थित एक कॉफी हाउस और रेस्तरां के बारे में हमने काफी कुछ सुना था. इसका इतिहास 75 साल से भी ज्यादा पुराना है. कहते हैं कि इसने नेहरू, ब्रिटेन की महरानी एलिजाबेथ द्वितीय को भी अपनी सेवाएँ दी थी. लेकिन इनका इतिहास राजा-रजवाड़ों से नहीं बना है. सूचना-तकनीक के क्षेत्र में आए उभार ने बंगलुरु की संस्कृति को बदला है, पर शहरी संस्कृति की चर्चा कोशीजकैफे की चर्चा के बिना अधूरी है. एक शाम यहाँ कॉफी पीने हम भी गए. सड़क के एक किनारे पर स्थित मकान की छत से लटके पुराने पंखों और फोम के गद्दे से बनी कुर्सी, मेज के चारों ओर विद्यार्थी, युवा लेखक और कुछ परिवार आपसी चर्चा में मशगूल थे. एक अनौपचारिकता पूरे कमरे में पसरी थी.

जब हम कॉफी पीने की तैयारी कर रहे थे, तब बेहद साधारण कपड़ों में एक सज्जन हमारी मेज पर आए और बातचीत करने लगे. फिर उन्होंने हमें क्रिसमस स्पेशल डिश- प्लम पुडिंगपेश किया. निस्संदेह वह काफ़ी लजीज था और बतौर उपहार था! वह सज्जन रेस्तरां के मालिक प्रेम कोशी थे. उन्होंने बताया कि बंगलुरु के बुद्धिजीवी, विद्यार्थियों, पत्रकारों के बीच दशकों से यह रेस्तरां लोकप्रिय है. रामचंद्र गुहा, गिरीश कर्नाड और दिवंगत पत्रकार गौरी लंकेश आदि का यह पुराना ठौर रहा है.


सेंट मार्क्स रोड के इर्द-गिर्द, अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस कॉफी हाउसों के बीच 'कोशीज' का टिका होना होना किसी आश्चर्य से कम नहीं. लेकिन यह इस बात की ताकीद भी है कि जरूरी नहीं कि जो पुराना है चलन से बाहर ही चला जाए. पुरानेपन का नएपन के साथ कोई बैर नहीं! 

(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे कॉलम में 10 जनवरी 2018 को प्रकाशित)