Showing posts with label दक्षिण. Show all posts
Showing posts with label दक्षिण. Show all posts

Friday, December 30, 2022

वर्षांत 2022: दक्षिण भाषाई फिल्मों के दबदबे में रहा बॉलीवुड


साल के आखिर में खबर आई कि ऑस्कर पुरस्कार के लिए पान नलिन की गुजराती फिल्म 'छेल्लो शो' (आखिरी शो) को शॉर्टलिस्ट किया गया है. भारत की ओर से यह फिल्म ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी’ के लिए आधिकारिक रूप से भेजी गई थी. साथ ही बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाने वाली एसएस राजामौली की ‘आरआरआर’ (तेलुगु) के गाने ‘नाटू-नाटू’ को भी ‘म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की कैटेगरी में शॉर्टलिस्ट किया गया.

नए वर्ष में ऑस्कर पुरस्कार का परिणाम चाहे जो हो, तय है कि वर्ष 2022 में भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय भाषाओं में बनी फिल्मों का दबदबा रहा. एक आंकड़ा के मुताबिक कोरोना महामारी के दो साल के बाद भारतीय सिनेमा ने बॉक्स ऑफिस पर करीब 11 हजार करोड़ का कारोबार किया. यहाँ भी हिंदी फिल्मों पर दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनी फिल्मों की बढ़त दिखी. न सिर्फ ‘आरआरआर’ बल्कि कन्नड़ भाषा में बनी ‘केजीएफ 2’ और ‘कांतारा’ ने भी सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. मणि रत्नम की ‘पोन्नियन सेल्वन (पीएस-1)’ (तमिल) के प्रति भी लोगों में उत्सुकता रही. इन फिल्मों की विषय-वस्तु और परदे पर फिल्मांकन में पर्याप्त भिन्नता है.
‘छेल्लो शो’ सौराष्ट्र के एक बच्चे की सिनेमा के प्रति दुर्निवार आकर्षण को केंद्र में रखती है. यह एक आत्मकथात्मक फिल्म है, वहीं ‘कांतारा’ एक ऐसी दंत कथा है जिसमें दक्षिण कर्नाटक के तटीय इलाकों की स्थानीय लोक-संस्कृति, परंपरा, आस्था-विश्वास, रीति-रिवाज, धार्मिक मान्यताओं और मिथक को कहानी के साथ खूबसूरती से पिरोया गया है. आरआरआर (आजादी के आंदोलन) और पीएस-1 (चोल राजवंश) इतिहास को कथा का आधार बनाती है. ‘एक्शन ड्रामा’ इन फिल्मों के केंद्र में है. बड़े बजट की इन फिल्मों में ताम-झाम, रंग-रभस, भव्यता को जिस कौशल से बुना गया वह दर्शकों को सिनेमाहॉल में खींच लाने में कामयाब रहा. देश की बदलती सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति, संचार के साधनों का विस्तार, वितरण की रणनीति का भी इन फिल्मों की सफलता में योगदान रहा है. बॉलीवुड की पापुलर फिल्मों के फ्रेमवर्क में ही ये सारी फिल्में आती है. यहाँ विचार-विमर्श के बदले तकनीक हावी है. प्रसंगवश, कन्नड़ में समांतर सिनेमा का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है, जिसकी आज चर्चा नहीं होती.
बहुसंख्यकवाद और हिंदुत्ववादी राजनीति की चहलकदमी इन फिल्मों में दिखाई दी. इस प्रसंग में बॉक्स ऑफिस पर खूब सफल रही विवेक अग्निहोत्री निर्देशित ‘ द कश्मीर फाइल्स’ की चर्चा जरूरी है. भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल (आईएफएफआई) के ज्यूरी प्रमुख, चर्चित फिल्मकार नादव लैपिड के द्वारा इस फिल्म को ‘अश्लील और प्रोपेगेंडा’ बताने से काफी विवाद हुआ, लेकिन फिल्म देखने वाले किसी भी सहृदय दर्शक और समीक्षक से यह बात छिपी नहीं थी कि फिल्मकार की मंशा सिनेमा के माध्यम से सत्य तलाशने की नहीं थी. एक बातचीत में चर्चित फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने मुझे कहा था कि ‘एक फिल्मकार के रूप में इतिहास के प्रति आपकी एक जिम्मेदारी होती है. जिस फिल्म में जितना प्रोपगेंडा होगा, उसका महत्व उतना ही कम होगा. फिल्म का इस्तेमाल प्रोपगेंडा के लिए भी होता है, पर ऐतिहासिक फिल्मों को बनाते हुए वस्तुनिष्ठता का ध्यान रखना जरूरी है. बिना वस्तुनिष्ठता के यह प्रोपगेंडा हो जाती है.’ दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में (करीब दो हजार) हिंदुस्तान में बनती है और इसे सांस्कृतिक शक्ति (सॉफ्ट पावर) के रूप में स्वीकार किया जाता है. लोकतांत्रिक भारत की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ भी चाहे-अनचाहे फिल्मों में अभिव्यक्ति होती हैं.
बहरहाल, हिंदी फिल्मों की बात करें तो बड़े-बड़े स्टार भी कोई खास करिश्मा नहीं दिखा पाए. रणबीर कपूर की ‘शमशेरा’, अक्षय कुमार की ‘रक्षाबंधन’ और ‘सम्राट पृथ्वीराज’, रणवीर सिंह की ‘जयेशभाई जोरदार’ और ‘सर्कस’, कंगना रनौत की ‘धाकड़’ आदि फिल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाने में असफल रही. आर्थिक बदहाली भी एक कारण है. ऐसे में बॉलीवुड पर काफी दबाव रहा. जाहिर है बॉलीवुड को नए विचारों, कहानियों की सख्त जरूरत है, जो दर्शकों के बदलते मिजाज के साथ तालमेल बना कर चल सके, पर डर है कि कहीं यह रास्ता दक्षिण भारतीय फिल्मों की ओर न ले जाए! पिछले दो दशक में हिंदी सिनेमा ने पापुलर और पैरलल के बीच का एक रास्ता अख्तियार कर कई बेहतरीन फिल्में दी और सही मायनों में आगे की दिशा का निर्धारण यहीं से होगा, न की घिसी-पिटी मसाला फिल्मों से.
बॉलीवुड के प्रमुख निर्देशक संजय लीला भंसाली ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ लेकर आए. एक ‘सेक्स वर्कर’ की भूमिका में आलिया भट्ट ने अपने अभिनय से सबको प्रभावित किया. इसी क्रम में आमिर खान की ‘लाल सिंह चढ्ढा’ और रणबीर कपूर की ‘ब्रह्माशस्त्र’ की चर्चा जरूरी है, जिसने ठीक-ठाक व्यवसाय भले किया हो कुछ नया गढ़ने में नाकाम रही. सिनेमा निर्माण की दृष्टि से नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई ‘डार्लिंग्स (डार्क कॉमेडी, निर्देशक जसमीत के रीन)’ और ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग (मर्डर मिस्ट्री, निर्देशक वासन बाला)’ बेहतरीन थी जिसकी चर्चा कम हुई. इन दोनों फिल्मों के निर्देशक और अभिनेता (आलिया भट्ट, विजय वर्मा, शेफाली शाह, राजकुमार राव) से नए साल में भी काफी उम्मीद रहेगी.
हिंदी फिल्मों के प्रति एक खास तबके में नकारात्मक भाव भी दिखाई दिया. मनोरंजन के साथ कोई दर्शक किस रूप में सिनेमा को ग्रहण करता है वह उसकी रूचि और सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है. एक खास विचारधारा के तहत सिनेमा को देखने-परखने पर रसास्वादन में बाधा पहुँचती है. आए दिन हिंदी फिल्मों को लेकर सोशल मीडिया पर ‘बॉयकॉट’ की ध्वनि सुनाई देती है वह कला और सिनेमा व्यवसाय दोनों के लिए चिंताजनक है. भूलना नहीं चाहिए कि सिनेमा उद्योग लाखों लोगों के लिए रोजगार का जरिया है जो भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है.
पापुलर से अलग पिछले कुछ सालों में जिन फिल्मों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पसंद किया गया उनमें स्वतंत्र फिल्मकारों की फिल्में ही रही. बजट के अभाव में इस प्रयोगधर्मी फिल्मों का प्रचार नहीं हो पाता, न हीं सिनेमाघरों में ये फिल्में रिलीज हो पाती है. ओटीटी प्लेटफॉर्म और फिल्म समारोह इनके लिए मुफीद हैं. कान फिल्म समारोह में भारत को ‘कंट्री ऑफ ऑनर’ के रूप में शामिल किया गया था. समारोह के फिल्म बाजार में ‘गामक घर’ फिल्म से चर्चित हुए अचल मिश्र की मैथिली फिल्म ‘धुइन (धुंध)’ दिखाई गई.
जहाँ ‘गामक घर’ में निर्देशक का पैतृक घर था, वहीं यह पूरी फिल्म दरभंगा में अवस्थित है. दरभंगा को मिथिला का सांस्कृतिक केंद्र कहा जाता है, पर कलाकारों की बदहाली, बेरोजगारी इस सिनेमा में मुखर है. ‘गामक घर’ की तरह ही इस फिल्म के सिनेमैटोग्राफी में एक सादगी है, जो ईरानी सिनेमा की याद दिलाता है. इन फिल्मों की सफलता ने मैथिली सिनेमा में एक युग की शुरुआत की है. इसी क्रम में प्रतीक शर्मा की ‘लोट्स ब्लूमस’ ने आईएफएफआई में शामिल होकर सुर्खियां बटोरी. अंत में, ऑस्कर में दो डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘ऑल दैट ब्रिद्स (शौनक सेन)’ और द एलीफेंट व्हिस्परर्स' (कार्तिकी गोंसाल्वेस) भी शॉर्टलिस्ट हुई है. आने वाले साल में फीचर के अलावे वृत्तचित्र पर भी लोगों की नजर रहेगी.

Monday, June 25, 2018

मानसून में कॉफी


पिछले दिनों मैं इतिहासकार प्रोफेसर एआर वेंकटचलापति की रोचक किताब ‘इन दोज डेज देयर वाज नो कॉफी’ पढ़ रहा था. इस नाम से ही लिखे चैप्टर में लेखक ने तमिल के चर्चित लेखक-फिल्मकार एके चेट्टियार को उद्धृत किया है- ‘कॉफी पे तो कोई पुराण लिख सकता है.’

दक्षिण में जैसा कॉफी पीने का रिवाज रहा है, वैसा उत्तर भारत में नहीं. वैसे तो 17वीं सदी में ही कॉफी अपने हमसफर चाय के साथ भारत में दस्तक दे चुका था, 19वीं सदी के आखिर में दक्षिण भारत में इसकी खपत बढ़नी शुरू हुई. इससे पहले यह यूरोपीय लोगों का ही पेय था. और 20वीं सदी के आते- आते यह दक्षिण भारतीय मध्यवर्ग का पसंदीदा पेय बन गया.

हालांकि, उदारीकरण के बादउत्तर भारत में भी कॉफी की खपत ने जोर पकड़ा है. खासकर महानगरों के युवाओं, कामकाजी लोगों में कॉफी पीना सांस्कृतिक दस्तूर में शामिल हो गया है. नब्बे के दशक में जब मैं दिल्ली आया, तो मेरे जैसे गंवई पृष्ठभूमि वालों को कॉफी पीना आधुनिक होने का भान देता रहा. मेरी समझ में यह भान शराब पीने में नहीं है. 

 कॉलेज के दिनों में मेरे एक मित्र शराब की बोतल, बड़े  भाई के लिहाज या डर से, मेरे कमरे में छिपाते फिरते थे. कॉफी के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है. पश्चिमी देशों में कॉफी पीने की संस्कृति आज भी कायम है और इसके ऐतिहासिक कारण है. अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं की तरह ही सार्वजनिक जीवन (पब्लिक स्फीयर) में इन कॉफी हाउस की महत्वपूर्ण भूमिका है. लोकतंत्र में ये राज्य और नागरिक समाज के बीच एक पुल की भूमिका निभाते रहे हैं.

 मुझे याद है कि कुछ वर्ष पहले अपनी वियना यात्रा के दौरान एक कॉफी हाउस में मैंने निर्मल वर्मा की याद में बीयर का एक छोटा मग लिया, पर मेरे दोस्तों ने कॉफी पी थी. उन्होंने कहा था- ‘कॉफी के प्यालों के साथ चीयर्स कहना अच्छा शगुन नहीं होता.’ उसी यात्रा में ऑस्ट्रिया के एक शहर लिंज में राह चलते एक युवा महिला को मैंने कॉफी पीने का न्यौता दिया और वह खुशी-खुशी साथ हो ली थी. सत्तर और अस्सी के दशक में पटना, इलाहाबाद, शिमला जैसे शहरों में स्थित टी-कॉफी हाउस साहित्यकारों, कलाकारों के बहस-मुबाहिसा का केंद्र थे. पर अब इनकी स्थिति बदहाल है. 

कॉलेज के ही दिनों में एक बार हम कुछ दोस्तों के साथ सिनेमा देखने गये. कॉफी का बिल मेरे एक दोस्त ने ही भरा था. उन दिनों को याद करता हुआ वह बिल का तगादा करता रहता है और मैं उसको कर्ज अदा करने के बदले साहिर लुधियानवी और जावेद अख्तर का किस्सा सुना देता हूं कि कैसे मरने के बाद भी लुधियानवी ने कर्ज वसूल लिया था. यदि आप थोड़े से भी रोमांटिक हैं, तो इस बात से शायद ही इनकार करें कि बारिश में किसी कैफे में बैठ कर कॉफी पीने का अपना सुख है, जो चाय में नहीं. यदि कोई साथी साथ हो तो फिर क्या कहने!

(प्रभात खबर, कुछ अलग कॉलम के तहत 19 जून 2018 को प्रकाशित)