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Sunday, April 05, 2026

युद्ध के बीच रंगमंच पर ‘आइंस्टीन’

 
मशहूर अदाकार नसीरुद्दीन शाह अपने सोलो नाटक ‘आइंस्टीन’ को लेकर दर्शकों के बीच करीब दस वर्षों से आते रहे हैं, पर युद्ध और विध्वंस की खबरों की बीच यह नाटक जितना आज प्रासंगिक हो उठा है शायद ही कभी रहा हो.

जीनियस भौतिक शास्त्री अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन वृत्त को समेटे, ग्रैबिएल इमैनुएल के लिखे इस नाटक का मंचन जब ‘श्रीराम लागू रंग अवकाश’, पुणे में हो रहा था, आसमान में तारों की चमक खो सी गई थी. अमेरिका को कोसते हुए आइंस्टीन जब कहते हैं-‘या तो आप युद्ध के साथ होते हैं या उसके विरुद्ध!’, ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच हो रहे जंग की अनुगूंज साफ सुनाई दे रही थी. कला या साहित्य युद्ध रोक नहीं पाता पर यथार्थ से वह हमें रोज रू-ब-रू करवाता है.
पचहत्तर वर्षीय शाह जैसे ही आइंस्टीन के किरदार में प्रवेश करते हैं हम भूल जाते हैं कि वह हमारे बीच के अदाकार हैं, एक वैज्ञानिक नहीं! साक्षेपता के सिद्धांत या गुरुत्वाकर्षण की बात करते हुए वे एक कुशल शिक्षक जैसे विश्वसनीय लगते हैं. गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को समझाते हुए एक सीन के दौरान उन्होंने दो दर्शक को भी मंच पर बुला लिया, जो कि मेरे लिए अप्रत्याशित था.
शाह इस नाटक में छिहत्तर वर्षीय आइंस्टीन (1879-1955) के व्यक्तित्व को बेहद खूबसूरती से हमारे सामने लाते हैं. अपने हाव-भाव, भंगिमा, विट से वे दर्शकों को एक ऐसे हाड़-मांस के व्यक्ति से साक्षात्कार करवाते हैं जो युदध के, एटम बम के खिलाफ था, एक पैसेफिस्ट (अमन पसंद) था. उसके सब सिद्धांत, प्रमेय मानवता के लिए थे, उसके खिलाफ नहीं. आइंस्टीन अपनी सीमाओं के बावजूद विश्वसनीय लगते हैं.
एकालाप में आइंस्टीन अपने बचपन, स्कूल, नाजी जर्मनी और अमेरिकी युद्ध लिप्सा की हमसे बातें करते हैं. इस फ्लैशबैक में मंच पर कुछ तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन यह नाटक बिना किसी ताम-झाम के हमारे सामने खुलता है. बेहद सामान्य एक कमरे का सेट (स्टडी रूम), जिसमें चारों तरफ किताबें फैली हुई है, हैंगर पर कोट टंगा है, एक मेज, ब्लैक बोर्ड, वायलिन, जूते और ऐसी ही कुछ मामूली सी चीजें. समकालीन नाटकों में म्यूजिकल का जोर बढ़ा है, जो लोगों का मनोरंजन में सहायक होता है. इसके विपरीत शाह के नाटकों मसलन, ‘इस्मत आपा के नाम’, ‘फादर’, ‘आंइस्टाइन’ जैसे में शाह का जोर संवाद और अभिनय पर रहता आया है.
शाह अपने बेहद प्रभावी और रोचक अभिनय के दम पर दर्शकों को करीब डेढ़ घंटे तक बांधे रखते हैं. कभी अपने मौजे को तलाशते, तो कभी वायलिन के ‘बो’ तलाशते आइंस्टीन बेहद सहज लगते हैं. नाटक में एक जगह वह किस्सा सुनाते हैं कि शादी की रात जब वे अपनी पत्नी के साथ घर लौटे, तब उन्हें एहसास हुआ कि वे चाबी भूल गए हैं. बीच-बीच में हास्य का पुट इस नाटक को बोझिल नहीं बनने देता.
पिछले पैतालीस वर्षों में एक साथ हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में ‘मोटले प्रोडक्शन’ ने विभिन्न प्रस्तुतियों के जरिए रंगमंच को संवृद्ध किया है. उम्र के इस पड़ाव पर आइंस्टीन का किरदार निभाते नसीरुद्दीन शाह को रंगमंच पर देखना सुकून देता है.

Sunday, June 22, 2025

रंगमंच पर नसीरुद्दीन शाह


पिछले दिनों लंबे अरसे के बाद नसीरुद्दीन शाह को रंगमंच पर देखा. श्रीराम लागू रंग अवकाश, पुणे में ‘द फादर’ का मंचन था, जिसे उन्होंने निर्देशित किया था और खुद मुख्य भूमिका में थे. असल में, यह नाटक मुंबई और आस-पास तो पिछले सात सालों से होता रहा पर मुझे याद नहीं कि दिल्ली में मोटले प्रोडक्शन ने इसका मंचन किया हो.


बहरहाल, फ्लोरियन जेलर के लिखे बहुचर्चित फ्रेंच नाटक ‘द पेरे’ पर आधारित इस नाटक के केंद्र में डिमेंशिया/अल्जाइमर से पीड़ित एक पिता (आंद्रे) हैं, जिसके बहाने मानवीय संबंधों, एक वृद्ध के अंतर्मन की व्यथा को हम देखते हैं. यह नाटक जितना इस बीमारी से प्रभावित व्यक्ति के आत्मसम्मान और असहायता बोध से उपजा है, उतना ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द रहने वाले, उसकी देखभाल करने वालों (केयर गिवर) के बारे में भी है. मानसिक बीमारी, मतिभ्रम और विगत स्मृतियों में लौटना जहाँ बीमार व्यक्ति के लिए दुखद है, वहीं परिवार के लिए यह ऐसा अनुभव होता है जिससे व्यक्ति के प्रति सारी संवेदनाओं के बावजूद पार पाना आसान नहीं.

मंच पर नसीरुद्दीन शाह के साथ रत्ना पाठक शाह भी थीं. बेटी के किरदार में रत्ना ने पिता के प्रति प्रेम, सब कुछ करके भी पिता की स्थिति को न बदल पाने की झुंझलाहट, अपने पति के साथ संबंध को बचाए रखने की जद्दोजहद और खीझ को खूबसूरती से निभाया है.

नसीरुद्दीन शाह हमारे समय के सर्वाधिक सशक्त अभिनेता हैं. हिंदी समांतर सिनेमा के दौर की कहानी बिना उनके लिखी ही नहीं जा सकती. सिनेमा के अभिनेता से पहले वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित थिएटर के कलाकार रहे हैं. उल्लेखनीय है कि फिल्म संस्थान, पुणे से एक्टिंग में प्रशिक्षण के बाद संस्थान के ही एक सहयोगी के साथ मिलकर वर्ष 1979 में उन्होंने मोटले प्रोडक्शन की स्थापना की थी. पिछले पैतालीस वर्षों में मोटले ने विभिन्न प्रस्तुतियों के जरिए रंगमंच को संवृद्ध किया है. सिनेमा में मिली प्रसिद्धि के बावजूद उन्होंने रंगमंच से अपने प्रेम को नहीं छोड़ा. रंगमंच से सिनेमा की ओर कदम बढ़ा चुके अभिनेता मुश्किल से ही पुराने प्रेम की ओर लौटते हैं, वे बॉलीवुड के ही होकर रह जाते हैं! हमारे आसपास कई ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं. नसीरुद्दीन शाह ने अपनी संस्मरण की किताब ‘एंड देन वन डे’ में लिखा है कि कैसे 11 वर्ष की उम्र में मंच पर उन्होंने ‘स्व’ को पाया और किस तरह यह उनके जीवन का निर्णायक क्षण था!

अगले महीने नसीरुद्दीन शाह 75 वर्ष के हो जाएँगे. मंच पर उन्हें देखते हुए बरबस वर्ष 2020 में रिलीज हुई और ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित ‘द फादर’ की याद आती रही. इस फिल्म में एंथनी हॉपकिंस बार-बार यह सवाल पूछते हैं-व्हाट अबाउट मी?’ यह सवाल नाटक देखने के बाद काफी कचोटता है.

यदि आप अल्जाइमर से पीड़ित किसी व्यक्ति संसर्ग में आए हैं तो पता होगा कि हिंदुस्तान में इन बीमारियों के प्रति लोगों में सूचना और संवेदना का अभाव है. जिस सहजता और मार्मिकता से नसीरुद्दीन शाह ने किरदार को निभाया है, वह अल्जाइमर पर लिखे सैकड़ों लेखों और किताबों पर भारी है