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Thursday, November 22, 2018

तथ्य और सत्य के बीच फेक न्यूज


पिछले दिनों बीबीसी ने फेक न्यूज के खिलाफ एक मुहिम शुरु किया है. इसके तहत लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि ‘जो लोग फ़ेक न्यूज़ को बढ़ावा दे रहे हैं, वो देशद्रोही हैं.’ साथ ही उन्होंने कहा कि ‘ये प्रोपेगैंडा है और कुछ लोग इसे बड़े पैमाने पर कर रहे हैं.’
ऐसी खबर जो तथ्य पर आधारित ना हो और जिसका दूर-दूर तक सत्य से वास्ता ना हो फेक न्यूज कहलाता है. ऐसा नहीं है कि खबर की शक्ल में दुष्प्रचार,  अफवाह आदि समाज में पहले नहीं फैलते थे. पर उनमें और आज जिसे हम फेक न्यूज समझते हैं, बारीक फर्क है. वर्तमान में देश की राजनीतिक पार्टियाँ राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल करती हैं. बात राष्ट्रवादियों की हो या सामाजवादियों की. उनके पास एक पूरी टीम है जो फेक न्यूज के उत्पादन, प्रसारण में रात-दिन जुटी रहती है. जाहिर है, 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए फेक न्यूज एक बड़ी चुनौती है. पर क्या राजनीतिक पार्टियों से यह उम्मीद रखनी चाहिए कि वे इस चुनौती से निपटेंगे?
फेक न्यूज मूलत: संचार क्रांति के दौर में आई नई तकनीकी से उभरी समस्या है. कंप्यूटर, स्मार्ट फोन, इंटरनेट (टूजी, थ्री जी, फोर जी) और सस्ते डाटा पैक की दूर-दराज इलाकों तक पहुँच ने मीडिया के बाजार में खबरों के परोसने, उसके उत्पादन और उपभोग की प्रक्रिया को खासा प्रभावित किया है. अब कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति चाहे तो संदेश का उत्पादन और प्रसारण कर सकता है, इसे एक खबर की शक्ल दे सकता है. कई बार फेक न्यूज की चपेट में मेनस्ट्रीम मीडिया भी आ जाता है. मेनस्ट्रीम मीडिया पर जैसे-जैसे विश्वसनीयता का संकट बढ़ा है, फेक न्यूज की समस्या भी बढ़ी है.
बीबीसी की साख हिंदी क्षेत्र में काफी है. वह खबरों को विश्वसनीय ढंग से परोसने के लिए वह जानी जाती है. पर सवाल है कि फेकन्यूज क्या महज प्रोपेगैंडा है? यदि हम प्रोपेगैंडा को फेक न्यूज मानें तो इसकी जद में बीबीसी जैसे संगठन भी आ जाएँगे.
फेक न्यूज के पीछे जो तंत्र काम करता है उसकी पड़ताल करते हुए बीबीसी के शोध में पता चला है कि लोग ‘राष्ट्र निर्माण’ की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाले फ़ेक न्यूज़ को साझा कर रहे हैं और राष्ट्रीय पहचान का प्रभाव ख़बरों से जुड़े तथ्यों की जांच की ज़रूरत पर भारी पड़ रहा है. हालांकि बीबीसी की इस शोध प्रविधि (मेथडोलॉजी) पर सवाल खड़ा किया जा रहा है. राष्ट्रवादी विचारधारा वाले,  बीबीसी के इस शोध को मोदी सरकार के खिलाफ एक प्रोपेगैंडा कह रहे हैं.  बीबीसी ने भारत में महज 40 लोगों के सैंपल साइज़ के आधार पर लोगों के सोशल मीडिया के बिहेवियर को विश्लेषित किया है. बीबीसी का यह निष्कर्ष आधा-अधूरा ही माना जाएगा. हालांकि बीबीसी का कहना है कि फेक न्यूज से जुड़े मनौवैज्ञानिक पहलूओं का अध्ययन इस शोध की विशिष्टता है. पर मीडिया के शोधार्थी हाल के वर्षों में खबरों के उत्पादन और उपभोग में भावनाओं की भूमिका अलग से रेखांकित करते रहे हैं. फेक न्यूज को इसका अपवाद नहीं माना जाना चाहिए. सच तो यह है कि भावनाएँ हर समय खबरों के प्रचार-प्रसार में प्रभावी रही है.
गौरतलब है कि भारत की आजादी के दौरान जब राष्ट्रवाद का उभार हो रहा था तब आधुनिक संचार के साधनों के अभाव में, मौखिक संचार के माध्यम से फैलने वाली अफवाहों से साम्राज्यवादियों के खिलाफ मुहिम में राष्ट्रवादियों को फायदा भी पहुँचता था. वर्ष 1857 में भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अफवाह किस तरह लोगों को एकजुट कर रहे थे, इतिहासकार रंजीत गुहा ने इस बात को नोट किया है. शाहिद अमीन ने भी चौरी-चौरा के प्रंसग में लिखा है कि किस तरह मौखिक खबरों के माध्यम से अफवाह (गोगा) तेजी से फैल रहे थे.
दूसरी तरफ साम्राज्यवादी ताकतें भी प्रोपेगैंडा से बाज नहीं आ रही थी. याद कीजिए कि बीबीसी में काम करते हुए लेखक-पत्रकार जार्ज ऑरवेल ने क्या लिखा था. उन्होंने बीबीसी के प्रोपेगैंडा से आहत होकर,  1943  में अपने इस्तीफा पत्र में लिखा था- “मैं मानता हूं कि मौजूदा राजनीतिक वातावरण में ब्रिटिश प्रोपेगैंडा का भारत में प्रसार करना लगभग एक निराशाजनक काम है. इन प्रसारणों को तनिक भी चालू रखना चाहिए या नहीं इसका निर्णय और लोगों को करना चाहिए लेकिन इस पर मैं अपना समय खर्च करना पसंद नहीं करुंगा,जबकि मैं जानता हूँ कि पत्रकारिता से खुद को जोड़ कर ऐसा काम कर सकता हूं जो कुछ ठोस प्रभाव पैदा कर सके.” साथ ही, नहीं भूलना चाहिए कि इराक युद्ध (2003) के दौरान बीबीसी ने जिस तरह से युद्ध को कवर किया, प्रोपगैंडा में भाग लिया,उसकी काफी भर्त्सना हो चुकी है.
वर्तमान में हिंदी में ऑनलाइन न्यूज मीडिया के जो वेबसाइट हैं, वहाँ क्लिकबेट (हेडिंग में भड़काऊ शब्दों का इस्तेमाल ताकि अधिकाधिक हिट मिले) और सोशल मीडिया (फेसबुक,ट्विटर आदि) पर खबरों के शेयर करने की योग्यता (शेयरेबिलिटी) पर ज्यादा जोर रहता है. निस्संदेह ऑनलाइन मीडिया की वजह से बहस-मुबाहिसा का एक नया क्षेत्र उभरा है जिससे लोकतंत्र मजबूत हुआ है, पर कई बार जल्दीबाजी में या जानबूझ कर जो असत्यापित या अपुष्ट खबरें (फेक न्यूज?)दी जाती है वह इन्हीं सोशल मीडिया के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुँचती है. ऐसे कई उदाहरण है जिसमें हाल के दिनों में बीबीसी भी इससे नहीं बच पाया है.
असल में, फेक न्यूज की वजह से फेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्विटर जैसे प्लेटफार्म की विश्वसनीयता पर भी संकट है. बड़ी पूंजी से संचालित इन न्यू मीडिया पर राष्ट्र-राज्य और नागरिक समाज की तरफ से भी काफी दबाव है. खबरों के मुताबिक गुजरात सरकार सोशल मीडिया पर फेक न्यूज की बढ़त को रोकने के लिए कानून लाने का विचार कर रही है. मीडिया पर किस तरह की कानूनी बंदिश लोकतंत्र के लिए मुफीद नहीं है. पर फेक न्यूज की समस्या और उसके स्रोत को वामपंथी और दक्षिणपंथी खांचे में बांट कर देखना, जैसा कि बीबीसी अपने शोध में करता दिख रहा है, विषय को विचारधारात्मक नजरिए से देखने का नतीजा है. इससे भारत में फेक न्यूज का सवाल राजनीतिक रंग लेता दिख रहा है. और शायद इसी वजह से सूचना एवं प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बीबीसी के फेक न्यूज पर दिल्ली में हुए कांफ्रेंस में आखिरी समय में भाग लेने से इंकार कर दिया.  ठीक इसी समय ट्विटर के सीईओ जैक डोरसे ने कहा कि फेक न्यूज और दुष्प्रचार की समस्याओं से निपटने के लिए कोई भी समाधान समुचित नहीं है. हाल-फिलहाल फेक न्यूज की समस्या का सीधा हल भले ही नहीं दिखे, यदि मुख्यधारा का मीडिया नागरिक समाज और सरकार के साथ मिल कर,एकजुट होकर इस दिशा में सार्थक पहल करे तो कोई रास्ता जरूर निकल आएगा.
(जानकी पुल पर प्रकाशित)