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Thursday, September 12, 2019

तथ्य और सत्य के बीच फेक न्यूज


समकालीन मीडिया के लिए 21वीं सदी का दूसरा दशक दुनिया भर में संभावनाओं और चुनौतियों से भरा रहा है. मेनस्ट्रीम मीडिया के बरक्स इंटरनेट जनित नया मीडिया (डिजिटल मीडिया) ने पब्लिक स्फीयर में बहस-मुबाहिसा को एक गति दी है और एक नए लोकतांत्रिक समाज का सपना भी बुना है. पर इस दशक के जाते-जाते फेक न्यूज का एक ऐसा तंत्र खड़ा हुआ जिसकी चपेट में नया मीडिया के साथ मेनस्ट्रीम मीडिया भी आ गया. वर्तमान में वैश्विक से लेकर स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक समाज के लिए फेक न्यूज की पहचान और इससे निपटने की चुनौती मीडिया और नागरिक समाज में होने वाले विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय है. पर सवाल है कि फेक न्यूज क्या है? भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए और वर्ष 2019 में होने वाले सत्रहवीं लोकसभा चुनाव के लिए यह किस रूप में चुनौती बन कर उपस्थित है? क्या इसकी जड़ में सामाजिक-राजनीतिक कारण हैं या महज संचार की नई तकनीक से उपजी हुई समस्या है? और आखिर में, इस समस्या का समाधान किन रास्तों से होकर गुजरता है?
फेक न्यूज और प्रोपेगैंडा
फेक न्यूज का इतिहास प्रिंटिंग के इतिहास जितना ही पुराना है. पहली बार 16वीं सदी में इस परिघटना से हमारा सामना होता है. पहले पैंफलेट या न्यूजबुक की प्रतियों की बिक्री बढ़ाने के लिए कपोल कल्पित खबरों का इस्तेमाल होता था, फिर बाद में अखबारों में भी बिक्री को बढ़ाने के लिए मनगढंत खबरों का इस्तेमाल किया जाने लगा. हालांकि जैसे-जैसे 19वीं सदी में वैज्ञानिकता, वस्तुनिष्ठता और निष्क्षपता पर जोर बढ़ा अखबार अपनी प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित होने लगे और साथ ही अपने पाठकों के प्रति भी उत्तरदायी होने लगे.[i] पर पिछले कुछ वर्षों में, खास कर वर्ष 2016 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव के बाद, पूरी दुनिया के मीडियाकर्मियों, अध्येताओं, समाज वैज्ञानिकों के बीच फेक न्यूज को लेकर एक बहस छिड़ गई है.
जाहिर है खबर की शक्ल में मनगढंत बातें, दुष्प्रचार,  अफवाह आदि समाज में पहले भी फैलते रहते थे. पर उनमें और आज जिसे हम फेक न्यूज समझते हैं, बारीक फर्क है. ऐसी खबर जो तथ्य पर आधारित ना हो और जिसका दूर-दूर तक सत्य से वास्ता ना हो फेक न्यूज कहलाता है. इस तरह की खबरों की मंशा सूचना, शिक्षा या मनोरंजन करना नहीं होता है बल्कि समाज में वैमनस्य फैलाना, लोगों को भड़काना होता है. लोगों के व्यावसायिक हित के साथ-साथ राजनीतिक हित भी इससे जुड़े होते हैं.
पिछले दिनों ब्रटिश ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन (बीबीसी) ने फेक न्यूज के खिलाफ वैश्विक स्तर पर एक मुहिम शुरु किया. भारत में इसी के तहत लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि ‘जो लोग फेक न्यूज़ को बढ़ावा दे रहे हैं, वो देशद्रोही हैं.’ साथ ही उन्होंने कहा कि ‘ये प्रोपेगैंडा है और कुछ लोग इसे बड़े पैमाने पर कर रहे हैं.[ii]
फेक न्यूज भूमंडलीकरण के दौर में, मूलत: संचार क्रांति के साथ समाज में जो नई तकनीकी आई है उससे उभरी समस्या है. कंप्यूटर, स्मार्ट फोन, इंटरनेट (टूजी, थ्री जी, फोर जी) और सस्ते डाटा पैक की दूर-दराज इलाकों तक पहुँच ने मीडिया के बाजार में खबरों के परोसने, उसके उत्पादन और उपभोग की प्रक्रिया को खासा प्रभावित किया है. अब कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति चाहे तो संदेश का उत्पादन और प्रसारण कर सकता है, इसे एक खबर की शक्ल दे सकता है. मेनस्ट्रीम मीडिया (अखबार, टेलीविजन समाचार चैनल, ऑन लाइन वेबसाइट आदि) पर जैसे-जैसे बाजार का दबाव बढ़ा और मनोरंजन का तत्व हावी हुआ है, खबरों की परिभाषा भी बदल गई. मीडिया उद्योग का मुख्य लक्ष्य मुनाफा कमाना, पाठकों की संख्या में बढ़ोतरी, टीआरपी बटोरना, ऑन लाइन ट्रैफिक बढ़ाना हो गया. मेनस्ट्रीम मीडिया के ऊपर विश्वसनीयता का संकट और  फेक न्यूज का जाल एक साथ फैलता गया. कई बार फेक न्यूज की चपेट में मेनस्ट्रीम मीडिया भी आ जाता है. कारण, टेलीविजन न्यूज चैनलों और अखबारों का एजेंडा सेट करने में सोशल मीडिया की एक बड़ी भूमिका उभर कर आई जो एक अलग शोध का विषय है.
पर क्या फेक न्यूज को हम महज तकनीक जनित समस्या के रूप में देखें या इसकी जड़ में सामाजिक, राजनीतिक प्रवृतियाँ हैं? सामाजिक विकास के साथ-साथ मीडिया के स्वरूप में परिवर्तन होता रहा है. किसी भी देश-काल में समाज में जो प्रवृतियाँ मौजूद रहती हैं मीडिया उससे अछूती नहीं रहती. साथ ही कोई भी तकनीक उसके इस्तेमाल करनेवालों पर आश्रित होती है. आधुनिक समय में फेक न्यूज की जड़ में असंवेदनशीलता, असुरक्षा, असहिष्णुता, समाज में व्याप्त भेद-भाव और राजनीतिक महत्वाकांक्षा है जो कई बार ‘ट्रोल (troll)’ और ‘बोट (bot)’ के रूप में सामने आती है.[iii] वर्तमान में पूरी दुनिया में- अमेरिका, ब्राजील से लेकर भारत तक- राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है. बात राष्ट्रवादियों की हो या सामाजवादियों की, उनके पास एक पूरी टीम है जो फेक न्यूज के उत्पादन, प्रसारण में रात-दिन जुटी रहती है. वर्ष 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के समय और वर्ष 2018 में ब्राजील में हुए चुनावों के समय व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के जरिए फेक न्यूज का कारोबार काफी फला-फूला. सत्रहवीं लोकसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों से देकर चुनाव आयोग तक के लिए फेक न्यूज एक बड़ी चुनौती है. पर क्या राजनीतिक पार्टियों से यह उम्मीद रखनी चाहिए कि वे इस चुनौती से निपटेंगे?
फेक न्यूज के पीछे जो तंत्र काम करता है उसकी पड़ताल करते हुए  बीबीसी के शोध में पता चला है कि लोग 'राष्ट्र निर्माण'  की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाले फेक न्यूज़ को साझा कर रहे हैं और राष्ट्रीय पहचान का प्रभाव खबरों से जुड़े तथ्यों की जांच की जरूरत पर भारी पड़ रहा है. हालांकि बीबीसी की इस शोध प्रविधि (मेथडोलॉजी) पर सवाल खड़ा किया जा रहा है. राष्ट्रवादी विचारधारा वाले,  बीबीसी के इस शोध को केंद्र में वर्तमान भारतीय जनता पार्टी सरकार के खिलाफ एक प्रोपेगैंडा कह रहे हैं.  बीबीसी ने भारत में महज 40 लोगों के सैंपल साइज़ के आधार पर लोगों के सोशल मीडिया के बिहेवियर को विश्लेषित किया है. बीबीसी का यह निष्कर्ष आधा-अधूरा ही माना जाएगा.  हालांकि जिस तरह के वातावरण में आज पत्रकारिता की जा रही है उसमें खबरों के उत्पादन में भावनाओं की भूमिका अलग से रेखांकित किए जाने की जरूरत है. गौरतलब है कि भारत की आजादी के दौरान जब राष्ट्रवाद का उभार हो रहा था तब आधुनिक संचार के साधनों के अभाव में, मौखिक संचार के माध्यम से फैलने वाली अफवाहों से साम्राज्यवादियों के खिलाफ मुहिम में राष्ट्रवादियों को फायदा भी पहुँचता था. वर्ष 1857 में हुए भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अफवाह लोगों को एकजुट कर रहे थे, इतिहासकार रंजीत गुहा (2009:31-48) ने इस बात को रेखांकित किया है.[iv] शाहिद अमीन (2006: 43-45) ने भी चौरी-चौरा के प्रंसग में लिखा है कि मौखिक खबरों के माध्यम से अफवाह (गोगा) तेजी से फैल रहे थे.[v]
दूसरी तरफ साम्राज्यवादी ताकतें भी प्रोपेगैंडा से बाज नहीं आ रही थी. याद कीजिए कि बीबीसी में काम करते हुए लेखक-पत्रकार जार्ज ऑरवेल ने क्या लिखा था. उन्होंने बीबीसी के प्रोपेगैंडा से आहत होकर अपने इस्तीफा पत्र में लिखा था- “मैं मानता हूं कि मौजूदा राजनीतिक वातावरण में ब्रिटिश प्रोपेगैंडा का भारत में प्रसार करना लगभग एक निराशाजनक काम है. इन प्रसारणों को तनिक भी चालू रखना चाहिए या नहीं इसका निर्णय और लोगों को करना चाहिए लेकिन इस पर मैं अपना समय खर्च करना पसंद नहीं करुंगा, जबकि मैं जानता हूँ कि पत्रकारिता से खुद को जोड़ कर ऐसा काम कर सकता हूं जो कुछ ठोस प्रभाव पैदा कर सके.”[vi]  साथ ही, नहीं भूलना चाहिए कि इराक युद्ध (2003) के दौरान बीबीसी ने जिस तरह से युद्ध को कवर किया, प्रोपगैंडा में भाग लिया, उसकी काफी भर्त्सना हो चुकी है.
पत्रकारिता के क्षेत्र में बीबीसी की साख वर्षों से रही है. वह खबरों को विश्वसनीय, वस्तुनिष्ठ ढंग से परोसने के लिए वह जानी जाती है. पर सवाल है कि फेक न्यूज क्या महज प्रोपेगेंडा है? यदि हम प्रोपेगेंडा को फेक न्यूज मानें तो इसकी जद में बीबीसी जैसे संगठन भी आ जाएँगे. पत्रकारिता जैसे पेशे में जहाँ ‘डेडलाइन’ का दबाव पत्रकारों पर हमेशा रहता है, वहाँ मानवीय भूल की गुंजाइश भी हमेशा रहती है. पर जल्दीबाजी में या भूलवश तथ्यों के सत्यापन में की गई गलती को हम फेक न्यूज नहीं मान सकते हैं.
दस वर्ष पहले, वर्ष 2009 में लोगों के बीच आपसी संवाद के लिए व्हाट्सएप जैसे मैंसेजिंग प्लेटफार्म का इस्तेमाल शुरु किया गया और देखते ही देखेते फोन के माध्यम से संवादों के संप्रेषण की इस प्रविधि ने ‘एसएमएस’ के इस्तेमाल को काफी पीछे छोड़ दिया. लेकिन हाल के वर्षों में भारत में व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर कई बार झूठी खबरों (ऑडियो, वीडियो और फोटोशॉप का इस्तेमाल कर) को इस तरह परोसा और प्रसारित किया गया कि कई जगहों पर हिंसा भड़की उठी और मॉब लिंचिंग में जानें गईं. इस सबके मद्देनजर व्हाट्सएप ने एक साथ मैसेज को कई समूहों में फारवर्ड करने की सीमा तय कर दी है. साथ ही यदि कोई संवाद अग्रसारित (फॉरवर्ड) होकर किसी के पास पहुँचता है तो संवाद पाने वालों को इस बात की जानकारी मिल जाती है. इससे संवादों, खबरों के उत्पादन के स्रोत के बारे में अंदाजा मिल जाता है. हालांकि फेक न्यूज को रोकने में ये पहल नाकाफी साबित हुए हैं. पिछले दिनों देश की संसदीय समिति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के कर्ताधर्ताओं को जवाबतलब किया ताकि आने वाले चुनाव में इन प्लेटफॉर्म के माध्यम से फैलने वाली अफवाहों और फेक न्यूज पर रोक लगे और नागरिकों के हितों और अधिकारों की रक्षा की जा सके.
चुनावी रणनीति में सोशल मीडिया की भूमिका
केपीएमजी और गूगल के मुताबिक वर्ष 2011 में भारतीय भाषाओं में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 4 करोड़ 20 लाख थी जो वर्ष 2016 में बढ़ कर 23 करोड़ 40 लाख हो गई, वर्ष 2021 में यह संख्या बढ़ कर 53 करोड़ 60 लाख हो जाएगी. साथ ही वर्तमान में करीब 96 प्रतिशत लोग इंटरनेट का इस्तेमाल मोबाइल के माध्यम से करते हैं. किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों और कार्यकर्ताओं के लिए जहाँ मास मीडिया संवाद पहुँचाने का एक माध्यम हुआ करता था, पिछले कुछ वर्षों में यह एक-दूसरे से संवाद करने के साथ-साथ चुनावी रणनीति का एक हथियार भी बन कर उभरा है. चुनावों के दौरान हर बड़ी-छोटी राजनीतिक पार्टियों के अपने ‘वार रूम’ होते हैं, जहाँ से मीडिया पर निगाह रखी जाती है और इन्हें प्रभावित करने की कोशिश होती है ताकि इनके राजनीतिक एजेंडे को लागू किया जा सके.

एक आंकड़ा के मुताबिक भारत में करीब 90 करोड़ वोटर हैं जिसमें से करीब 50 करोड़ के पास इंटरनेट की सुविधा है. करीब 30 करोड़ फेसबुक यूजर्स हैं जबकि 20 करोड़ व्हाट्सएप मैसेज सेवा का इस्तेमाल करते हैं. आगामी लोकसभा चुनावों के दौरान हर राजनीतिक पार्टियाँ सोशल मीडिया के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठना चाहेगी. यहाँ व्हाट्सएप के साथ-साथ शेयर चैट जैसे मैसेजिंग के देसी अवतारों पर भी सब दलों की नजर है, पर यह समकालीन मीडिया-विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाया है और ज्यादातर लोगों की नजर से ओझल ही है. छोटे शहरों-कस्बों में शेयर चैट जैसे प्लेटफॉर्म, जो भारतीय भाषाओं में मुफ्त में उपलब्ध हैं, काफी लोकप्रिय हैं. फिलहाल राजनीतिक पार्टियाँ इन देसी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का प्रोपेगैंडा के लिए खूब इस्तेमाल कर रही हैं.

असल में जैसा कि पामेला फिलिपोसे (2019: 152) ने हाल ही में प्रकाशित अपनी किताब में लिखा है:  वर्ष 2013 और वर्ष 2015 में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव और वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हमने पहली बार मीडिया जनित राजनीतिक गोलबंदी को अपने उच्चतम शिखर पर देखा और इन्हीं चुनावों में पहली बार देश में राजनीतिक संचार के लिए सोशल मीडिया के समुचित इस्तेमाल की परख एक टूल के रूप में हुई.”[vii] अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी नये मीडिया के इस्तेमाल में आगे रही पर जल्दी ही कांग्रेस, समाजवादी पार्टी आदि भी सोशल मीडिया के इस्तेमाल की पहल में तेजी से आगे बढ़ी. वर्ष 2019 के फरवरी महीने में बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने भी टविटर जैसे माध्यम को अपनाया. गौरतलब है कि मेनस्ट्रीम मीडिया पर मनुवादी होने का आरोप लगाने के साथ ही उनका कहना था कि जिस तरह की राजनीति वे करती हैं उसमें सोशल मीडिया जैसे माध्यम की उन्हें जरूरत नहीं है. स्पष्ट है कि सोशल मीडिया की भूमिका को नजरअंदाज करना अब किसी भी राजनीतिक दल के लिए संभव नहीं है.

वर्ष 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी दलों की सरकार बनने के बाद सरकार के मंत्री, राजनेता अखबारों और समाचार चैनलों से ज्यादा, नये मीडिया पर सक्रिय रहे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सभी मंत्रियों और सांसदों की सक्रियता सोशल मीडिया पर ज्यादा दिखी. टिवटर पर नरेंद्र मोदी के 44.7 मिलियन और फेसबुक पर 43.2 मिलियन फॉलोअर हैं. 2014 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गाँधी टिवटर पर आए और तेजी से उनके फॉलोअरों की संख्या बढ़ी. वर्तमान में वे सत्ताधारी नेताओं की तरह ही सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं. जहाँ फेसबुक और टविटर जैसे माध्यमों का इस्तेमाल राजेनता अपने कार्यकर्ताओं तक संदेश पहुँचाने के लिए कर रहे हैं, वहीं इसका इस्तेमाल आम जनता तक अपनी बातें पहुँचाने के लिए भी कर रहे हैं. यह प्रोपेगैंडा और फेक न्यूज फैलाने का जरिया भी साबित होता है और जाने-अजाने पक्ष और विपक्ष के नेता, सरकार में शामिल मंत्री इस कृत्य में शामिल हो जाते हैं.

निष्कर्ष
फेक न्यूज के कई आयाम है जिसमें खबरों के उत्पादन, प्रसारण, स्रोत, तथ्य प्रमुख हैं. सोशल मीडिया के दौर में सच्ची और फर्जी खबरों के बीच तथ्यों, स्रोतों की पहचान (फैक्ट चेकिंग), क्रास चेकिंग आदि आम नागरिकों के लिए मुश्किल है. फेक न्यूज की वजह से फेसबुक, व्हाट्सएप, स्नैप चैट, ट्विटर जैसे प्लेटफार्म की विश्वसनीयता पर भी संकट है. बड़ी पूंजी से संचालित नये मीडिया पर राष्ट्र-राज्य और नागरिक समाज की तरफ से काफी दबाव है. इन पर पक्षधरता और वस्तुनिष्ठ नहीं होने का आरोप भी लगा है. वर्तमान में हिंदी में ऑन लाइन न्यूज मीडिया के जो वेबसाइट हैं, वहाँ क्लिकबेट (हेडिंग में भड़काऊ शब्दों का इस्तेमाल ताकि अधिकाधिक हिट मिले) और सोशल मीडिया पर खबरों के शेयर करने की योग्यता (शेयरेबलिटी) पर ज्यादा जोर रहता है. निस्संदेह डिजिटल मीडिया की वजह से बहस-मुबाहिसा का एक नया क्षेत्र उभरा है जिससे लोकतंत्र मजबूत हुआ है, पर कई बार यहाँ पर जो असत्यापित या अपुष्ट खबरें दी जाती है वह सोशल मीडिया के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुँचती है और फेक न्यूज की शक्ल लेती है. हालांकि इसी बीच मेनस्ट्रीम अखबार और टीवी समाचार चैनलों के साथ-साथ ऑनलाइन के कई ऐसे वेबसाइट भी उभरे हैं जो फेक न्यूज के बारे में जागरुकता फैलाते हैं और इन फर्जी खबरों से आम जनता को अवगत करा रहे हैं. हाल ही में सोशल मीडिया के कर्ताधर्ता भी विभिन्न संगठनों के साथ मिल कर फेक न्यूज को फैलने से रोकने के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं, जिनमें तथ्यों की जाँच, सत्यापन पर काफी जोर है.
साथ ही, दुनिया भर की सरकारें सोशल मीडिया पर फेक न्यूज की बढ़त को रोकने के लिए कानून लाने पर विचार कर रही है. लेकिन मीडिया पर किसी तरह की कानूनी बंदिश लोकतांत्रिक समाज के लिए मुफीद नहीं है. लोकतांत्रिक समाज के लिए मीडिया की स्वतंत्रता एक जरूरी शर्त है. मास मीडिया तथ्यों के माध्यम से सत्य तक पहुँचने का एक जरिया रहा है. लेकिन ‘पोस्ट-ट्रुथ’ के इस दौर में यह स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं कि फेक न्यूज से लड़ाई लंबी है और हाल-फिलहाल फेक न्यूज की समस्या का कोई सीधा हल नहीं दिखता है. इसी को ध्यान में रखते हुए ट्विटर के सीईओ जैक डोरसे ने पिछले दिनों अपनी भारत यात्रा के दौरान कहा कि ‘फेक न्यूज और दुष्प्रचार की समस्याओं से निपटने के लिए कोई भी समाधान समुचित नहीं है.’ फिर सवाल है कि रास्ता किधर है? रास्ता संचार की नई तकनीक और इन तकनीकी के मार्फत डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले समुदायों से होकर ही जाता है. लोगों में समझबूझ और जागरुकता फैलाने से लेकर, माध्यम के प्रति शिक्षित करने, तथ्यों को सत्यापित करने, क्रास चेकिंग आदि से फेक न्यूज की समस्या से लड़ा जा सकता है.

(संवाद पथ, जनवरी-मार्च 2019 में प्रकाशित)

संदर्भ

[i] देखें,द इकॉनामिस्ट 1843 मैग्जीन, https://www.1843magazine.com/technology/rewind/the-true-history-of-fake-news

[ii] देखें, बीबीसी हिंदी, 12 नवंबर 2018, https://www.bbc.com/hindi/india-46175929

[iii] भारत में इंटरनेट ट्रोल किस तरह काम करते हैं इसके बारे में विस्तृत जानकारी के लिए देखें, स्वाति चतुर्वेदी (2016), आई एम ए ट्रोल, नयी दिल्ली: जगरनॉट. साथ ही देखें, रवीश कुमार (2018), द फ्री वॉयस, नयी दिल्ली: स्पीकिंग टाइगर.

[iv] रंजीत गुहा (2009), ट्रांसमिशन, अरविंद राजगोपाल (सं) द इंडियन पब्लिक स्फीयर में संग्रहित, नयी दिल्ली: आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस.

[v] शाहिद अमीन (2006), इवेंट, मेटाफर, मेमोरी:चौरी चौरा 1922-1992, नयी दिल्ली: पेंग्विन बुक्स.

[vi] देखें, जार्ज आरवेल का इस्तीफा पत्र (1943), http://www.bbc.co.uk/archive/orwell/7430.shtml

[vii] पामेला फिलिपोसे (2019), मीडियाज शिफ्टिंग टेरेन, नयी दिल्ली: ओरियंट ब्लैकस्वान


Wednesday, January 02, 2019

हिंदी समाचारपत्रों की ऑनलाइन दुनिया


पिछले दशक में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी आदि देशों में अखबारों के प्रसार और पाठकों की संख्या में कमी देखी गई।  भारत में टेलीविजन समाचार चैनलों के प्रसार के बावजूद अखबार के पाठक 2006-16 के दौरान बढ़े हैं, उनका प्रसार बढ़ा है। ख़ास तौर पर भारतीय भाषाओं, हिंदी के अखबारों के प्रसार और पाठकों की संख्या में वृद्धि हुई है।[i]  इन्हीं वर्षों में अन्य भारतीय भाषाओं के मुकाबले इंटरनेट पर हिंदी सामग्री के उत्पादक और उपभोक्ता (प्रोज्यूमर) की मौजूदगी भी कई गुणा बढ़ी है और अंग्रेजी का वर्चस्व टूटा है। गूगल और केपीएमजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2021 तक हिंदी में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे ज्यादा करीब 20 करोड़ हो जाएगी, जो भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों का कुल 38 प्रतिशत होगा। वर्तमान में भारत में हिंदी में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 6 करोड़ से कुछ लाख ज्यादा है।[ii]

21वीं सदी के दूसरे दशक में, ‘डिजिटल डिवाइड’ के बावजूद, हिंदी अखबारों के न्यूज रूम में ‘इंटरनेट फर्स्ट’, ‘डिजिटल फर्स्ट’ जैसे नारे सुनाई पड़ने लगे हैं। मीडिया संस्थानों के मालिक, ब्रांड मैनेजर और संपादक पत्रकारिता का भविष्य ऑनलाइन, डिजिटल पत्रकारिता को ही मान रहे हैं। यहाँ तक कि अब हिंदी मुख्यधारा के अखबारों का जोर वेबसाइटों पर सामग्री उपलब्ध करवाने पर ज्यादा है। जाहिर है ऑनलाइन खबरों का बाजार बढ़ा है। साथ ही इस बीच इंटरनेट पर खबरों की तलाश, उसमें दिलचस्पी हिंदी के उपभोक्ताओं में बढ़ी है। 

कंप्यूटर, स्मार्ट फोन, इंटरनेट (टूजी, थ्री जी, फोर जी) और सस्ते डाटा पैक की दूर-दराज इलाकों तक पहुँच ने मीडिया के बाजार में खबरों के परोसने, उसके उत्पादन और उपभोग की प्रक्रिया को खासा प्रभावित किया है। अखबारों और इंटरनेट पर प्रस्तुत समाचार के बीच एक नए संबंध बन कर उभरे हैं। सोशल मीडिया के फैलने के बाद खबरों के प्रसारण का तरीका भी बदला है। पर इस बदलाव की दशा और दिशा क्या रही है? क्या हिंदी के अखबार, इंटरनेट पर मौजूद वेबसाइटों के पूरक बन कर उभरे हैं? या इंटरनेट पर जो खबरों का बाजार है उसका संचालन एक अलग पाठक वर्ग को ध्यान में रख कर किया जा रहा है? हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में बहस-मुबाहिसे के मंच के रूप में इन वेबसाइटों की क्या पहचान है? इस लेख में हिंदी अखबारों के ऑनलाइन वेबसाइटों के काम-काज के तरीकों के लेखा-जोखा के आधार पर इन सवालों का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश की गई है।

हिंदी में ऑन लाइन पत्रकारिता:पब्लिक स्फीयर का विस्तार

हिंदी में ऑन लाइन पत्रकारिता की शुरुआत 20वीं सदी के आखिरी सालों में ‘नेट जाल डॉट कॉम’, वेब दुनिया वेबसाइट वगैरह से  होती है। वर्ष 2000 में ऑनलाइन दुनिया में ‘बबल बर्स्ट’ (इंटरनेट डॉट कॉम से जुड़ी कई कंपनियों के स्टॉक लुढक गए, इंटरनेट पर कारोबार करने वाली कई कंपनियाँ बंद हो गई) किया तो छह-सात महीने के लिए ऑन लाइन पत्रकारिता प्रभावित रही थी। हालांकि उस दौरान अखबारों की खबरों, विचारों-विश्लेषणों को ऑनलाइन पर कट-पेस्ट कर ज्यों का त्यों डाल दिया जाता था। वेबसाइट 24 घंटे तक अपडेट भी नहीं होते थे। उस दौर की ऑनलाइन पत्रकारिता के प्रसंग में इतिहासकार और मीडिया विमर्शकार रविकांत (2003: 200) ने ठीक ही नोट किया है: उम्र का एक घिसा-पिटा मुहावरा लें तो नेट के सूचना महामार्ग पर हिंदी अभी उंगली पकड़ कर चलना सीख रही है। हालाँकि सारे प्रमुख अखबारों ने खुद को वेब पर डाल दिया है, लेकिन नेट संस्करण प्रिंट की प्रतिलिपि लगते हैं, जो डिजिटल तकनीक की क्षमताओँ के दोहन की अच्छी मिसाल नहीं है।”[iii] असल में उस दौर में हिंदी अखबारों में डेस्क पर जो संपादक काम कर रहे थे उन्हें ही ऑनलाइन संस्करण के काम की देख-रेख में लगा दिया गया था। उस वक्त तकनीक ज्ञान पर संस्थानों का जोर नहीं था, हालांकि वर्तमान में तकनीक के क्षेत्र में हो रहे बदलाव की अद्यतन जानकारी बेहद जरूरी है। हिंदी के वेबसाइट मल्टी मीडिया का प्लेटफार्म बन कर उभरे हैं। 

हिंदी अखबारों में दैनिक भाष्कर, दैनिक जागरण और नवभारत टाइम्स (नभाटा) हिंदी में समाचार के अग्रणी वेबसाइट हैं। इसके बाद हिंदुस्तान, राजस्थान पत्रिका, जनसत्ता वगैरह का नंबर आता है। नवभारत टाइम्स ऑन लाइन वेबसाइट से वर्ष 2007 से जुड़े डिप्टी एडिटर प्रभाष झा कहते हैं: “यहाँ ज्वाइन करने से पहले हिंदी अखबारों के लिए पाँच साल काम किया था। चूंकि जो काम ऑनलाइन पर करना था वह डेस्क से ही जुड़ा हुआ था सो कोई परेशानी नहीं हुई। पहले संस्थान में जो कोई अनुभवी होते थे, उन्हें इस काम पर लगा दिया जाता था। तकनीक ज्ञान पर जोर नहीं था, पर अब स्थिति बदली है। वीडियो- ऑडियो संपादन, शूटिंग वैगरह की जानकारी जरूरी है।”[iv] 

नवभारत टाइम्स वेबसाइट के लिए अलग से रिपोर्टस की टीम नहीं है। अखबार के रिपोर्टर ही वेबसाइट के लिए सामग्री मुहैया कराते हैं। वेबसाइट के लिए अलग से डेस्क है, जहाँ वेबसाइट के लिए 65 पत्रकार काम करते हैं, वहीं अखबार के लिए 150-175। यही बात हिंदी के सभी अखबारों के लिए सच हैं। राजस्थान पत्रिका के दिल्ली ब्यूरो के प्रमुख मुकेश केजरीवाल कहते हैं कि “भले ही हमारे पास अलग से ऑनलाइन के लिए रिपोर्टर्स नहीं हो, पर अब हमारे रिपोर्टर्स चाहते हैं कि उनकी स्टोरी जल्दी से जल्दी ऑन लाइन पब्लिश हो जाए। इससे उनकी पहुँच ग्लोबल हो जाती है। और शब्द सीमा का भी कोई झंझट उनके सामने नहीं रहता।”[v] इंटरनेट पर भले ही किसी कहानी को कहने के लिए कोई शब्द सीमा नहीं हो, पर ऑनलाइन वेबसाइट पर काम करने के अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि कम शब्दों में, पाठकों को जानकारी मुहैया कराने पर संपादकों का जोर रहता है। माना जाता कि पाठक कई बार सिर्फ खबरों की हेडलाइन पढ़ कर निकल जाते हैं, कहानी (स्टोरी) के अंदर जाने की जहमत भी नहीं मोल लेते। इस लिहाज से टीजर, ग्राफिक्स, फोटो, विडियो के सहारे कहानी कहने पर यहाँ जोर दिया जाता है। दूसरे शब्दों में, विजुअल सामग्री परोसने पर इन वेबसाइटों का ध्यान लगा रहता है। ऐसा भी नहीं है कि शोधपरक, विश्लेषात्मक कहानी, खबरें आदि ऑनलाइन नहीं पढ़ी जाती है। जैसे-जैसे नए पाठक वर्ग ऑनलाइन दुनिया से जुड़ रहे हैं, उनकी रूचि, प्राथमिकताओं में भी बदलाव देखा जा रहा है।

सही मायनों में हिंदी अखबारों के वेबसाइट 2010 के बाद अपनी अलग पहचान लेकर आए। उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष 3 जी सेवा ने इंटरनेट, मोबाइल के प्रसार को एक गति दी।[vi] इसी दौरान अरब देशों में जो आंदोलन हुए जिसमें ऑन लाइन की बड़ी भूमिका थी। वर्ष 2011 में भारत में भ्रष्टाचार के विरोध में हुए अन्ना आँदोलन के कारण लोगों की रूचि राजनीति में बढ़ी, फिर 2012 में बलात्कार के खिलाफ दिल्ली में हुए निर्भया आंदोलन ने पूरे देश को उद्वेलित किया। इन आंदोलनों में सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर आदि) का भी खूब इस्तेमाल हुआ। लोकतंत्र में राजनीतिक भागेदारी और राजनीतिक दलों के संचार में मीडिया की प्रमुख भूमिका रही है। वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार की अघोषित नीति मेनस्ट्रीम (प्रिंट और टेलीविजन) के बदले न्यू मीडिया को तरजीह देने की है। ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया की दुनिया में सबसे ज्यादा सक्रिय रहने वाले नेताओं में से एक है। ट्विटर पर उनके 43.4  मिलियन और फेसबुक पर 43.2  मिलियन फॉलोअर हैं।[vii] इस सबने ऑन लाइन वेबसाइटों के प्रति लोगों को आकर्षित किया। सोशल मीडिया के माध्यम से इन वेबसाइटों पर पाठकों की आवाजाही भी बढ़ी।

युरगेन हैबरमास (1989) ने पब्लिक स्फीयर की अवधारणा के प्रसंग में नागरिकों के परस्पर तथा शासक के साथ तर्क और उस पर आधारित खुलापन, विचारों के आदान-प्रदान के जिस क्षेत्र की बात की है, उसमें मीडिया (पत्र-पत्रिका ) और अब न्यू मीडिया का विशेष महत्व है। वे मानते हैं कि आधुनिक यूरोप के आरंभिक दौर में पत्र-पत्रिकाओं के प्रसार ने निरंकुश सत्ता से उदार लोकतांत्रिक समाज की यात्रा में अति महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी तथा मीडिया के माध्यम से आलोचनात्मक लोक विचारों की अभिव्यक्ति आधुनिक लोकतांत्रिक जीवन का अनिवार्य पहलू था।[viii] यह सच है कि भारतीय अर्थव्यस्था में उदारीकरण (1991), निजीकरण की प्रक्रिया के फलस्वरूप आए भूमंडलीकरण के दौर में इंटरनेट, मोबाइल फोन जैसी नई तकनीक के माध्यम से हिंदी अखबारों की पहुँच डायसपोरा (विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के लोग) तक हुई है। जहाँ अखबार के पहुँच की एक सीमा होती है, वहीं इंटरनेट इन बाध्यताओँ से मुक्त है। और इस तरह वेबसाइटों पर मौजूद हिंदी अखबारों ने हिंदी की सार्वजनिक दुनिया (पब्लिक स्फीयर) का विस्तार किया है। 

रॉबिन जैफ्री और अस्सा डोरोन (2013:13-14) ने भारत में सेल फोन के विस्तार से संबंधित अपने अध्ययन में लिखा है: 21वीं सदी में भी सत्ता की संरचना-लिंग, जाति, वर्ग और परिवार- लोगों की कल्पना की क्षमता या खुद को इन संरचनाओं से हट कर अभिव्यक्त करने की राह में रुकावट बन कर खड़े हैं। यहीं पर मोबाइल फोन के माध्यम से नए संबंधों की गुंजाइश महत्वपूर्ण हो जाती। नए औजार के माध्यम से समाज में जो सत्ता संरचनाएँ जड़ जमा कर बैठी है उससे अलग एक राह की संभावना निकल आती है।”[ix] पर सवाल है कि इस संभावना और इंटरनेट के विस्तार के बाद बने पब्लिक स्फीयर का स्वरूप क्या है? 

ऑनलाइन सामग्री और उपभोक्तावाद: डिजिटल फर्स्ट

उदारीकरण के बाद हिंदी अखबारों में बड़ी पूंजी का प्रवेश बढ़ता गया। अखबार एक ‘प्रोडक्ट’ बन गए। अखबारों में संपादकों की जगह ब्रांड मैनेजरों की भूमिका बढ़ती गई। हिंदी अखबारों का मुख्य ध्येय विज्ञापनदाताओँ को आकर्षित करना हो गया। भूमंडलीकरण के बाद समाज में बढी उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों को अखबारों ने भुनाना शुरु किया। हिंदी के अखबारों का मुख्य लक्ष्य उभरते हुए नव मध्यवर्ग पाठकों को सामग्री देना हो गया। वर्तमान में उनके सरोकार बहुसंख्यक हिंदी समाज, हाशिए पर रहने वाले लोग, जिनके पास क्रय शक्ति नहीं है, से नहीं जुड़े हैं। यह सच है कि हिंदी के ऑनलाइन न्यूज वेबसाइट के पाठक और अखबारों के पाठक वर्ग अलग-अलग हैं। जहाँ हिंदी के अखबारों के पाठक सभी उम्र के लोग होते हैं, वहीं वेबसाइट के पाठक अधिकांश युवा वर्ग है। फलत: वेबसाइटों पर जो सामग्री होती है वह प्रिंट संस्करण से अलग होती है। यहाँ क्लिकबेट (हेडिंग में भड़काऊ शब्दों का इस्तेमाल ताकि अधिकाधिक हिट मिले) और सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर आदि) पर खबरों के शेयर करने की योग्यता (शेयरेबलिटी) पर ज्यादा जोर रहता है। यहाँ अखबारों की तरह सब्सक्रीप्शन या स्थानीय हॉकर/स्टैंड से अखबार खरीदने की बात नहीं है। इस बात उल्लेख जरूरी है कि हिंदी में पेड वेबसाइटों का चलन नहीं है, अखबारों के सारे वेबासइट फ्री हैं। साथ ही, चूंकि स्मार्टफोन के उपभोक्ता युवा हैं, तो इन वर्षों में इन उपभोक्ताओं को ध्यान में रख कर सामग्री परोसने का चलन जोर पकड़ा है। इन वेबसाइटों का टारगेट आडिएंश शहरी मध्यम वर्ग हैं। यह बात महज भारतीय ऑनलाइन न्यूज वेबसाइट तक ही सीमित नहीं है बल्कि बीबीसी (ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन), जिसकी भारत में काफी प्रतिष्ठा रही है, वहाँ भी देखने को मिलता है।

यदि इन अखबारों के ऑनलाइन सामग्री का अध्ययन करें तो खबरों के परोसने का रंग-ढंग हिंदी के खबरिया चैनलों से ही प्रेरित दिखते हैं, अखबारों से नहीं। टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार करण थापर कहते हैं कि “हमारे यहाँ करीब 400 खबरिया चैनल हैं, पर क्या कोई ऐसा चैनल है जिस पर हम भारतीय उसी तरह से गर्व कर सकें जैसा कि एक ब्रिटिश बीबीसी को लेकर या एक अमेरिकी सीएनएन को लेकर होता है।”[x] टेलीविजन के हिंदी खबरिया चैनलों पर जोर टीआरपी बटोरने और सनसनी फैलाने पर रहता है कि ना कि खबरों के प्रसार, विवेचन-विश्लेषण पर। ठीक इसी तरह हिंदी के वेबसाइटों पर बुलेटिन की तरह हेडलाइन, वीडियो और फोटो गैलरी देने पर जोर है, खबरों के विवेचन-विश्लेषण, इनवेस्टिगेशन पर कम। इस बात से इंकार नहीं कि नया माध्यम नए तरह के सामग्री के उत्पादन और प्रसार की अपेक्षा रखता है, पर विश्वसनीय खबरों को आम-फहम भाषा में लोगों तक पहुँचाना, सत्ता से सवाल करना और बहस-मुबाहिसे का एक मंच मुहैया करना, सच की तह तक पहुँचना इन वेबसाइटों के लिए भी उसी तरह मायने रखता है जितना अखबार या टीवी के लिए। अन्ना आंदोलन या निर्भया आंदोलन के दौरान राजनीतिक लामबंदी में इनकी भूमिका रेखांकित करने योग्य रही। पर इन अपवादों को छोड़ दें तो करीब दो दशकों की अपनी इस यात्रा  में हिंदी अखबारों की वेबसाइटों ने सार्वजनिक दुनिया (पब्लिक स्फीयर) का विस्तार भले किया हो, इसमें कोई गुणात्मक परिवर्तन या बदलाव करता हुआ नहीं दिखता। अपनी बात को और स्पष्ट रूप से रखने के लिए मैं यहाँ एक उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ। 

फरवरी 2018 में हिंदी सिनेमा की चर्चित कलाकार श्रीदेवी की मौत को जिस तरह सनसनीखेज भाषा में हिंदी अखबारों के वेबसाइटों ने कवर किया, कयास लगाए इस बात की ताकीद करते हैं। जनसत्ता ने अर्जुन कपूर के श्रीदेवी और उनकी बेटी से अलगाव को हेडलाइन बनाया तो नवभारत टाइम्स ने दुबई के होटल के श्रीदेवी और बोनी कपूर के आखिरी लम्हों के वीडियो को वेबसाइट पर लगाया। ऐसा लग रहा था कि श्रीदेवी की मौत की खबर को लोगों तक पहुँचाने से ज्यादा इनकी रूचि इसे ‘सेलिब्रेट’ करने में रही। कई हेडलाइंस तो स्त्री-विरोधी भी थे। दैनिक भाष्कर वेबसाइट का एक हेडलाइन कह रहा था: 50 पार भी नहीं ढली थी श्रीदेवी की खूबसूरती, इन एक्ट्रेसेस पर भी नहीं हुआ उम्र का असर।” यहाँ तक कि बीबीसी हिंदी ऑनलाइन वेबसाइट का रवैया भी वही था, जो टीवी चैनलों का रहा। 26 फरवरी 2018 को एक समय वेबसाइट के मेन पेज कम से कम श्रीदेवी से जुड़ी चौदह स्टोरी, रिपोर्ट, वीडियो, ब्लॉग आदि की शक्ल में थी। यह हिंदी ऑनलाइन मीडिया की दिशा और दशा का भी सूचक है। यहाँ खबरों का मतलब मनोरंजन है और मनोरंजन का मतलब बॉलीवुड। भूमंडलीकरण के बाद हिंदी के अखबारों में खुश खबर परोसने का चलन जोर पकड़ा है, हिंदी अखबारों के वेबसाइट भी इसे बढ़ावा दे रहे हैं।[xi] इस मायने अखबार और वेबसाइट एक-दूसरे के पूरक नजर आते हैं। 

बीबीसी हिंदी वेबसाइट ने संवाददाता के हवाले से एक और ख़बर चलाई थी-क्या श्रीदेवी को पहले से ख़तरा था?[xii] इस ख़बर के मुताबिक: श्रीदेवी की मौत के बाद अब उनके परिवार में भी हृदय रोग फ़ैमली हिस्ट्री का हिस्सा होगी। इसलिए उनकी दोनों बेटियां जाह्नवी और खुशी को ज़्यादा सजग रहने की ज़रूरत है।" हालांकि खबर को अपडेट करने के बाद इन पंक्तियों को हटा दिया गया लेकिन ऐसा लगता है कि खबरों का चुनाव ही नहीं, उसे बरतने की नीति, विश्वसनीयता का पैमाना भी बीबीसी के अंग्रेजी और हिंदी पाठकों के लिए अलग-अलग है। हिंदी की जो स्टोरी ऑनलाइन दी जाती है और यदि फिर उसमें फेर-बदल किया जाता है तो पाठकों को इस बात की जानकारी नहीं दी जाती जो कि बीबीसी के गाइडलांइस के विपरीत है। हिंदी के खबरिया वेबसाइट ‘सॉफ्ट पोर्न’ और ‘क्लिकबेट’ (पाठकों को आकर्षित करने के लिए भड़काऊ शब्दों का हेडलाइन में इस्तेमाल) की नीति पर चल रहे हैं।

श्रीदेवी की दुखद मौत बॉलीवुड और उनके फैन्स के लिए सदमे से कम नहीं था। उनकी मौत  होटल के बाथटब में दुर्घटनावश डूबने के कारण हुई, लेकिन टेलीविजन न्यूज चैनल ने जिस तरह से इस दुखद घटना को कवर किया उसकी ख़ूब आलोचना हुई। लोगों ने इसे ‘बाथटब जर्नलिज्म’ कहा। हालांकि इस तरह की सनसनी टीवी न्यूज ने पहली बार नहीं फैलाई थी। अब तो टीवी चैनल के कई वरिष्ठ एंकर भी टीवी न्यूज से दूर रहने की सलाह देने लगे हैं। पर जिस तरह से हिंदी ऑन लाइन न्यूज वेबसाइटों पर श्रीदेवी को लेकर खबर परोसी गई वह ऑनलाइन पत्रकारिता की दशा और दिशा का सूचक है। खबरें इनके लिए उपभोग की वस्तु हैं, ना की सूचना का साधन।

निष्कर्ष: भारत में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों में पाँच हिंदी के अखबार हैं, जबकि अन्य स्थान मलयालम, तमिल और मराठी के अखबारों को प्राप्त है। द टाइम्स ऑफ इंडिया अंग्रेजी का एक मात्र अखबार है जिसकी पहुँच इस सूची में है। आने वाले निकट भविष्य में हिंदी क्षेत्र में शिक्षा के प्रसार और आय में बढ़ोतरी से अखबारों का प्रसार बढ़ेगा, साथ ही इन अखबारों के वेबसाइटों की पहुँच भी छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों में रहने वाले पाठकों तक बढ़ेगी। पिछले करीब दो दशक की हिंदी ऑनलाइन समाचार जगत को देखते हुए यह कहना उचित है कि हिंदी की सार्वजनिक दुनिया का विस्तार भले हुआ हो, उसमें गुणात्मक रूप से कोई बदलाव लाने ये वेबसाइट असफल रहे हैं।

(संवाद पथ, जुलाई-सितंबर 2018 प्रकाशित)


संदर्भ
[iii] रविकांत (2003), भविष्य का इतिहास, अभय कुमार दुबे (सं), ‘भारत का भूमंडलीकरण’ में संग्रहित, दिल्ली: वाणी प्रकाशन।
[iv] निजी इंटरव्यू: 17 फरवरी 2018 
[v] निजी इंटरव्यू: 18 फरवरी 2018
[vi] देखें, सुनेत्रा सेन नारायण और शालिनी नारायणन (2016), इंडिया कनेक्टेड, सेज पब्लिकेशंस: नयी दिल्ली।
[vii] https://www.livemint.com/Politics/d9msMK13chc6bwTFyWkMNO/PM-Narendra-Modi-is-world-No-3-on-Twitter-No1-on-Facebook.html
[viii]  युरगेन हैबरमास (1989), ‘द स्ट्रक्चरल ट्रांसफारमेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर’, केंब्रिज: पॉलिटि प्रेस।
[ix] देखें, रॉबिन जैफ्री और अस्सा डोरोन (2013), ‘सेलफोन नेशन’, हैचेट इंडिया।
[x] निजी इंटरव्यू: 20 जुलाई 2018
[xi] देखें, अरविंद दास (2013), हिंदी में समाचार, अंतिका प्रकाशन:गाजियाबाद।