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Sunday, May 29, 2022

गोंड कला में गाथाओं का महत्व रहा है: वेंकट रमण सिंह श्याम

 


समकालीन आदिवासी गोंड कला के क्षेत्र में पद्मश्री दुर्गाबाई व्याम, पद्मश्री भज्जू श्याम और वेंकट रमण सिंह श्याम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इन सम्मानित कलाकारों की एक निजी शैली और विशिष्टता है, जो उनकी चित्रों में दिखाई देती है. तीनों ही अपनी कला का प्रेरणास्रोत जनगढ़ सिंह श्याम (1962-2001) को मानते हैं. वेंकट रमण सिंह श्याम से अरविंद दास बातचीत:

 

आज जिसे हम परधान गोंड कला के नाम से जानते हैं, उसकी शुरुआत कब हुई?

 

हमारे यहाँ शादी, त्योहारों के अवसर पर मिट्टी के रंग, फूल-पत्ती से लोग दीवारों पर भित्तिचित्र पारंपरिक रूप से बनाते थे. महिलाएँ, पुरुष दोनों ही इसमें काम करते थे. कोठी में वे डिजाइन बनाते थे, घर की दीवारों पर वे भी वे पेंटिंग करते थे.

 

राष्ट्रीय स्तर पर यह पेंटिंग चर्चित भले नहीं थी, पर एंथ्रोपोलॉजिस्ट वेरियर एल्विन ने गोंड आदिवासियों के बीच काफी काम किया. उन्होंने हमारे गाँव पाटनगढ़ रह कर किताब लिखी जिसके माध्यम से गोंड कला, संगीतकारों के बारे में (जो बाना बजाते हैं) लोगों को पता चला. जब 80 के दशक में जगदीश स्वामीनाथन भोपाल स्थित भारत भवन में काम कर रहे थे तब उन्होंने पाटनगढ़ में जनगढ़ सिंह श्याम के काम को दीवारों पर देखा और उन्हें भारत भवन लेकर आए. तब इस पेंटिंग की बाहर की दुनिया में चर्चा हुई.

 

जनगढ़ श्याम से आपके रिश्ते थे? क्या आपने जनगढ़ श्याम के साथ काम किया था? उनकी कला को आप किस तरह देखते हैं?

 

जनगढ़ सिंह श्याम मेरे चाचा थे. मैंने उनके साथ काम किया है. वे ही मुझे भोपाल लेकर आए थे.

 

भारत भवन में उन्होंने पेपर के ऊपर पेंटिंग की. लिथो, इचिंग के क्षेत्र में भी काम किया. प्रिंटिंग विभाग में उन्होंने गोंड देवी-देवताओं, किस्से-कहानियों, अपनी गाथाओं को चित्रित किया. उन्होंने बहुत सारे प्रयोग किए और इस कला ने एक नया आकार ग्रहण किया. परधान गोंड के यहाँ पारंपरिक रूप से गाथाओं का महत्व रहा है.

 

जनगढ़ श्याम की 60वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है. वर्ष 2001 में जब वे मिथिला म्यूजियम (जापान) में थे वहीं आत्महत्या कर ली थी. क्या परेशानी थी उन्हें?

 

जितना मैं जानता हूँ, उनमें कला की प्रतिभा थी. भारत भवन आने से पहले वे मध्य प्रदेश सरकार के टीसीपीसी (ट्रेंनिग कम प्रोडक्शन सेंटर) में अलग ढंग के डिजाइन का काम करते थे. काम करते हुए उनमें शार्पनेस आया. उनके माध्यम से कला बाहर की दुनिया में पहुँची.

 

मैं सच कहूँ तो इस कला की दुनिया में जिस तरह से उनका नाम था उस तरह का सम्मान उन्हें नहीं मिला. शिखर सम्मान (1986) के बाद उन्हें लगता था कि वे सिमट गए हैं. सरकार या कहीं से से उन्हें सहयोग नहीं मिला. वे बहुत दुखी और निराश थे. वे कहते थे कि बेटा जो नाम है वह मुझे नहीं मिल रहा है. उनके ही सामने एक नए कलाकार को ललित कला का पुरस्कार मिला, पर उन्हें नहीं मिला. पर जनगढ़ की मौत के बाद ही मैंने कलाकार बनने की ठानी. हममें से कइयों ने सोचा कि हम जनगढ़ का स्थान ले सकते हैं.

 

समकालीन गोंड कला को आप किस रूप में देखते हैं?

 

इस समय पूरी दुनिया में गोंड कला अपना परचम लहरा रही है. हम तीन लोगों (भज्जू, दुर्गाबाई और मैं) ने जैसे काम किया है उसकी चर्चा है. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा लेकर हम इस कला को गए हैं. हमारा पूरा परिवार पेंटिंग करता है. लोग जनगढ़ की पेंटिंग के छोटे टुकड़े के पीछे भी भागते हैं. हम तीनों की पेंटिंग की एक अलग पहचान है. हमारा रेखांकन का तरीका- लाइन, ड्राइंग, स्केच या आकृति बनाने का तरीका सबका अलग है. साथ ही हमारा पैटर्न अलग है.

 

युवा कलाकारों के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? उनकी कला में क्या विशेषता दिखाई दे रही है?

नाम होने के बाद एक और जो पैटर्न उभरा है सेमी सर्कल और डॉट का उसे सब ग्रहण करना चाहते हैं. युवा कलाकार पर इंटरनेट से कॉपी करने पर जोर बढ़ा हैं. मिथिला पेंटिंग के प्रसिद्ध कलाकारों की तरह ही गोंड कलाकारों को अपना रूपाकार गढ़ने पर जोर देना चाहिए. कला तभी आगे बढ़ती है जब उसमें परिवर्तन आए. हम इसके लिए युवा कलाकारों के साथ वर्कशॉप करते हैं.

 

आपकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ हुई?

 

मैं ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूँ, मुझे कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं है. जंगल, खेत, किस्से-कहानी ही मेरी पेंटिंग में आई है. चाचा जी के साथ काफी वक्त मैंने गुजारा, उनसे बहुत कुछ सीखने-समझने को मिला. मुझे जगदीश स्वामीनाथन, मकबूल फिदा हुसैन, मंजीत बावा को भी देखने-सुनने का मौका मिला. उनकी चर्चा से मुझे लाभ हुआ.

 

Wednesday, May 25, 2022

गोंड कला के समकालीन रंग मार्फत जनगढ़ सिंह श्याम


समकालीन गोंड कला के क्षेत्र में पद्मश्री दुर्गाबाई व्यामपद्मश्री भज्जू श्याम और वेंकट रमण सिंह श्याम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इन सम्मानित कलाकारों की एक निजी शैली और विशिष्टता हैजो उनकी चित्रों में दिखाई देती है. व्यक्तिगत संघर्षमेहनत-मजदूरी और पारिवारिक रिश्तों से ये तीनों जुड़े हैं, पर एक तार और है जो इन्हें आपस में जोड़ती है. यह तार गोंड कला के प्रमुख कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम हैंजिन्होंने इस कला को भारतीय  आधुनिक कलाओं के बीच स्थापित किया. तीनों ही जनगढ़ सिंह श्याम को प्रेरणास्रोत मानते हैं.

वर्ष 1962 में मध्यप्रदेश के पाटनगढ़ गाँव में परधान गोंड जनजाति में जन्मे जनगढ़ सिंह श्याम ने वर्ष 2001 में जापान के मिथिला म्यूजियम में आत्महत्या कर ली थीजहाँ वे संग्रहालय के निदेशक टोकियो हासेगावा के निमंत्रण पर पेंटिंग करने गए थे. इस साल उनकी 60वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है और विभिन्न कला दीर्घाओं में उनके सम्मान में गोंड कला की प्रदर्शनी चल रही है.

जिसे हम आज परधान गोंड कला के नाम से जानते हैं वह वर्षों से भित्तिचित्रों के माध्यम से गोंड आदिवासी घरों में प्रचलन में थीपर पिछली सदी के 80 के दशक में जनगढ़ सिंह श्याम कागजी चित्रों और भित्तिचित्रों द्वारा अपने इलाके से बाहर लेकर गए और देश-दुनिया में पहुँचाया. रेखा, बिंदु और चटख रंगों ने जनगढ़ सिंह श्याम की कूची का सहारा पाकर एक नया आयाम ग्रहण किया. गोंड सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में रहने वाले लोक देवतामिथकगाथाजीव-जंतुपेड़-पौधे उनके यहाँ परंपरा और आधुनिकता के मिश्रित रंग में आते हैं. वे अपनी आदिवासी कला लेकर दिल्ली, कोलकाता और पेरिस भी गए थे.

जनगढ़ सिंह श्याम के भतीजे वेंकट रमण सिंह श्याम कहते हैं कि वे बचपन से ही प्रतिभाशाली थे. गोंड कला में उन्होंने काफी प्रयोग किए. उनके प्रयोग से इस चित्रकला में एक नया रूपनया आकार उभरा.’  वे कहते हैं कि भोपाल के भारत भवन में आकर चाचा ने पेपर के ऊपर पेंटिंग की, लिथो, इचिंग के क्षेत्र में भी काम किया. प्रिंटिंग विभाग में उन्होंने गोंड देवी-देवताओंकिस्से-कहानियोंअपनी गाथाओं को चित्रित किया. परधान गोंड के यहाँ पारंपरिक रूप से गाथाओं का महत्व रहा है.

उल्लेखनीय है कि उन्हें भारत भवन लाने का श्रेय आधुनिक चित्रकार और भारत भवन में रूपंकर म्यूजियम के निदेशक जगदीश स्वामीनाथन को जाता है. वे 19 साल के जनगढ़ को गाँव से भारत भवन (भोपाल) लेकर आए. वर्ष 1986 में जनगढ़ को मध्यप्रदेश सरकार ने शिखर सम्मान दिया था. 

प्रसंगवशभील कला के क्षेत्र में पिछले वर्ष पद्मश्री से सम्मानित भूरीबाई को भी स्वामीनाथन ही भारत भवन लेकर आए थे. उन्हें भी शिखर सम्मान मिला था. पद्मश्री मिलने के बाद भूरीबाई ने भी मुझे एक बातचीत के दौरान बताया थाऊपर जाने के बाद भी वे मुझे कला बाँट रहे हैं. वे मेरे गुरु भी थे और देव के रूप में भी मैं उनको मानती हूँ. वर्ष 1990 में स्वामीनाथन ने भारत भवन छोड़ दिया था और वर्ष 1994 में उनकी मृत्यु हो गई. जनगढ़ कहते थे कि स्वामीनाथन की मौत के बाद मैं अनाथ हो गया!’.

यह पूछने पर कि जनगढ़ श्याम ने क्यों आत्महत्या कीवेंकट कहते हैं कि जनगढ़ के मन में निराशा थी कि उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे. वेंकट ने एस आनंद के साथ मिल कर फाइंडिंग माय वे’  नाम से एक किताब लिखी हैजिसमें उन्होंने वाजिब सवाल उठाया है: ‘किसी ने भी नहीं सोचा कि जनगढ़ जैसा काबिल कलाकार क्यों 12 हजार महीने (300 डॉलर) पगार पर विदेश की धरती पर काम कर रहा थासाथ ही उन्होंने करार कर रखा था कि वहाँ पर की गई चित्रकारी म्यूजियम की संपत्ति होगी.  हालांकि वेंकट लिखते हैं कि जनगढ़ की मौत से गोंड कला जी उठी.

वेंकट कहते हैं कि जनगढ़ की मौत के बाद ही मैंने कलाकार बनने की ठानी. हममें से कइयों ने सोचा कि हम जनगढ़ का स्थान ले सकते हैं.’ इस कला को शुरुआत में क्राफ्ट कह कर खारिज किया गया पर जनगढ़ की कला के साथ इसे समकालीन भारतीय कला की श्रेणी में गिना जाने लगा. आज इस कला की कलाकृतियों को ऊंचे दामों पर खरीदा जा रहा है और इससे कई युवा कलाकार जुड़ें हैं.

इस कला की कई चित्रात्मक किताबें भी आज प्रकाशित है. खास कर भज्जू श्याम की किताबें काफी चर्चित हुई हैं.

समकालीन गोंड कला में रेखांकन का तरीका सब कलाकारों का अलग है. चित्रों में जो पैटर्न और स्ट्रोक है वह अलग दिखता है. इसमें आदिवासी जीवन प्रसंगों के साथ निजी जीवन प्रसंगों की झलक भी दिखती है. हालांकि वेंकट कहते हैं कि आज युवा कलाकार सेमिसर्किल और बिंदी को अपनाने में लगे हैं. वे कहते हैं कि युवा पीढ़ी में इंटरनेट से कॉपी करने पर जोर बढ़ा हैं.

वेंकट कहते हैं कि मिथिला पेंटिंग के प्रसिद्ध कलाकारों की तरह ही गोंड कलाकारों को अपना रूपाकार गढ़ने पर जोर देना चाहिए. सही मायनों में गोंड कला के प्रणेता जनगढ़ श्याम और जनगढ़ कलम के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)