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Saturday, March 14, 2026

त्रिवेणी कला संगम के 75 साल

 मशहूर कलाकार मकबूल फिदा हुसैन की एक पेंटिंग है जिसमें एक घोड़ा नृत्य कर रहा है, दूसरा सितार बजा रहा है और तीसरा पेंटिंग कर रहा है. कला की यह त्रिवेणी हुसैन ने नृत्यांगना सुंदरी श्रीधरानी के लिए बनाई थी, जब वे 70 के दशक में मंडी हाउस स्थित ‘त्रिवेणी’ में अड्डा जमाते थे.आजाद भारत की सांस्कृतिक गतिविधियों, शिक्षण-प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण केंद्र रहा त्रिवेणी कला संगम के 75 साल पूरे हुए हैं.

नृत्यांगना सुंदरी श्रीधरानी ने महज दो कमरो से ‘त्रिवेणी’ की यात्रा कनॉट प्लेस से शुरु की थी, फिर वर्ष 1962 में मंडी हाउस का बेसमेंट इसका ठिकाना बना. देश की आजादी के समय
विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-संवारा.
खास कर हिंदी थिएटर के विकास की कथा ‘त्रिवेणी’ के बिना अधूरी है. पुराने जमाने के लोग आज भी बी वी कारंत, हबीब तनवीर, शीला भट्ट (दिल्ली आर्ट थिएटर), ओम शिवपुरी (दिशांतर) के नाटकों को याद करते हैं. इब्राहिम अल्काजी और बैरी जॉन ने यहाँ पर अपनी प्रोडक्शन की प्रस्तुतियाँ दी.
साथ ही वर्ष 1972 में स्थापित फैसल अल्काजी के ‘रुचिका थिएटर ग्रुप’ के कई नाटकों ने यहीं पर रूप ग्रहण किया था. चर्चित वास्तुशिल्पी जोसेफ स्टेन का बनाया तानसेन मार्ग पर स्थित मौजूदा केंद्र देश के नाट्यकर्मियों, नर्तकों, कला प्रेमियों का आज भी एक महत्वपूर्ण ठौर बना हुआ है. साथ किंवदंती बन चुके ‘त्रिवेणी कैफे’ युवा कलाकारों, छात्रों, पत्रकारों, नाट्यकर्मियों को लुभाता है. जब हम शाम में एक मित्र के साथ त्रिवेणी कैफे में बैठे थे, खूबसूरत खुले सभागार में ‘छऊ’ नाट्य शैली में एक प्रस्तुति की तैयारी चल रही थी.
इतिहास के झरोखों से कलाप्रेमियों को रू-ब-रू करवाने के लिए एक प्रदर्शनी समेत अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है. त्रिवेणी से जुड़ी अपनी स्मृतियों को फैसल अल्काजी इस हफ्ते एक संवाद में साझा करेंगे.
न सिर्फ मकबूल फ़िदा हुसैन बल्कि ओडिसी नृत्य के प्रसिद्ध नर्तक केलु चरण महापात्र, फोटोग्राफर ओ पी शर्मा का त्रिवेणी से गहरा जुड़ाव रहा. शुरुआती दौर में मणिपुरी नृत्य के सिद्ध कलाकार एवं गुरु नबा कुमार इससे जुड़ गए थे. नबा कुमार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में मणिपुरी नृत्य के शिक्षक थे, जहाँ पर सुंदरी श्रीधरानी छात्र थी. बाद में उदय शंकर के अल्मोड़ा स्थित ‘इंडिया कल्चर सेंटर’ में उन्होंने नृत्य की शिक्षा ग्रहण की थी. गुरुदत्त और जोहरा सहगल उनके सहपाठी थे.
75 साल पूरे होने के अवसर पर नर्तकों के लिए लिखी श्रीधरानी की पुस्तक ‘अ डांसर प्रिपेयर्स’ का पुनर्प्रकाशन किया गया है. इस किताब की शुरुआती पंक्ति है: 'डांस करने से पहले हम चलना सीखें. चलने से पहले हम किस तरह खड़े हों यह सीखें’. डांस सीख रहे युवाओं को संबोधित करती यह पतली-सी किताब महत्वपूर्ण है.

Sunday, May 29, 2022

गोंड कला में गाथाओं का महत्व रहा है: वेंकट रमण सिंह श्याम

 


समकालीन आदिवासी गोंड कला के क्षेत्र में पद्मश्री दुर्गाबाई व्याम, पद्मश्री भज्जू श्याम और वेंकट रमण सिंह श्याम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इन सम्मानित कलाकारों की एक निजी शैली और विशिष्टता है, जो उनकी चित्रों में दिखाई देती है. तीनों ही अपनी कला का प्रेरणास्रोत जनगढ़ सिंह श्याम (1962-2001) को मानते हैं. वेंकट रमण सिंह श्याम से अरविंद दास बातचीत:

 

आज जिसे हम परधान गोंड कला के नाम से जानते हैं, उसकी शुरुआत कब हुई?

 

हमारे यहाँ शादी, त्योहारों के अवसर पर मिट्टी के रंग, फूल-पत्ती से लोग दीवारों पर भित्तिचित्र पारंपरिक रूप से बनाते थे. महिलाएँ, पुरुष दोनों ही इसमें काम करते थे. कोठी में वे डिजाइन बनाते थे, घर की दीवारों पर वे भी वे पेंटिंग करते थे.

 

राष्ट्रीय स्तर पर यह पेंटिंग चर्चित भले नहीं थी, पर एंथ्रोपोलॉजिस्ट वेरियर एल्विन ने गोंड आदिवासियों के बीच काफी काम किया. उन्होंने हमारे गाँव पाटनगढ़ रह कर किताब लिखी जिसके माध्यम से गोंड कला, संगीतकारों के बारे में (जो बाना बजाते हैं) लोगों को पता चला. जब 80 के दशक में जगदीश स्वामीनाथन भोपाल स्थित भारत भवन में काम कर रहे थे तब उन्होंने पाटनगढ़ में जनगढ़ सिंह श्याम के काम को दीवारों पर देखा और उन्हें भारत भवन लेकर आए. तब इस पेंटिंग की बाहर की दुनिया में चर्चा हुई.

 

जनगढ़ श्याम से आपके रिश्ते थे? क्या आपने जनगढ़ श्याम के साथ काम किया था? उनकी कला को आप किस तरह देखते हैं?

 

जनगढ़ सिंह श्याम मेरे चाचा थे. मैंने उनके साथ काम किया है. वे ही मुझे भोपाल लेकर आए थे.

 

भारत भवन में उन्होंने पेपर के ऊपर पेंटिंग की. लिथो, इचिंग के क्षेत्र में भी काम किया. प्रिंटिंग विभाग में उन्होंने गोंड देवी-देवताओं, किस्से-कहानियों, अपनी गाथाओं को चित्रित किया. उन्होंने बहुत सारे प्रयोग किए और इस कला ने एक नया आकार ग्रहण किया. परधान गोंड के यहाँ पारंपरिक रूप से गाथाओं का महत्व रहा है.

 

जनगढ़ श्याम की 60वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है. वर्ष 2001 में जब वे मिथिला म्यूजियम (जापान) में थे वहीं आत्महत्या कर ली थी. क्या परेशानी थी उन्हें?

 

जितना मैं जानता हूँ, उनमें कला की प्रतिभा थी. भारत भवन आने से पहले वे मध्य प्रदेश सरकार के टीसीपीसी (ट्रेंनिग कम प्रोडक्शन सेंटर) में अलग ढंग के डिजाइन का काम करते थे. काम करते हुए उनमें शार्पनेस आया. उनके माध्यम से कला बाहर की दुनिया में पहुँची.

 

मैं सच कहूँ तो इस कला की दुनिया में जिस तरह से उनका नाम था उस तरह का सम्मान उन्हें नहीं मिला. शिखर सम्मान (1986) के बाद उन्हें लगता था कि वे सिमट गए हैं. सरकार या कहीं से से उन्हें सहयोग नहीं मिला. वे बहुत दुखी और निराश थे. वे कहते थे कि बेटा जो नाम है वह मुझे नहीं मिल रहा है. उनके ही सामने एक नए कलाकार को ललित कला का पुरस्कार मिला, पर उन्हें नहीं मिला. पर जनगढ़ की मौत के बाद ही मैंने कलाकार बनने की ठानी. हममें से कइयों ने सोचा कि हम जनगढ़ का स्थान ले सकते हैं.

 

समकालीन गोंड कला को आप किस रूप में देखते हैं?

 

इस समय पूरी दुनिया में गोंड कला अपना परचम लहरा रही है. हम तीन लोगों (भज्जू, दुर्गाबाई और मैं) ने जैसे काम किया है उसकी चर्चा है. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा लेकर हम इस कला को गए हैं. हमारा पूरा परिवार पेंटिंग करता है. लोग जनगढ़ की पेंटिंग के छोटे टुकड़े के पीछे भी भागते हैं. हम तीनों की पेंटिंग की एक अलग पहचान है. हमारा रेखांकन का तरीका- लाइन, ड्राइंग, स्केच या आकृति बनाने का तरीका सबका अलग है. साथ ही हमारा पैटर्न अलग है.

 

युवा कलाकारों के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? उनकी कला में क्या विशेषता दिखाई दे रही है?

नाम होने के बाद एक और जो पैटर्न उभरा है सेमी सर्कल और डॉट का उसे सब ग्रहण करना चाहते हैं. युवा कलाकार पर इंटरनेट से कॉपी करने पर जोर बढ़ा हैं. मिथिला पेंटिंग के प्रसिद्ध कलाकारों की तरह ही गोंड कलाकारों को अपना रूपाकार गढ़ने पर जोर देना चाहिए. कला तभी आगे बढ़ती है जब उसमें परिवर्तन आए. हम इसके लिए युवा कलाकारों के साथ वर्कशॉप करते हैं.

 

आपकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ हुई?

 

मैं ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूँ, मुझे कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं है. जंगल, खेत, किस्से-कहानी ही मेरी पेंटिंग में आई है. चाचा जी के साथ काफी वक्त मैंने गुजारा, उनसे बहुत कुछ सीखने-समझने को मिला. मुझे जगदीश स्वामीनाथन, मकबूल फिदा हुसैन, मंजीत बावा को भी देखने-सुनने का मौका मिला. उनकी चर्चा से मुझे लाभ हुआ.

 

Wednesday, May 25, 2022

गोंड कला के समकालीन रंग मार्फत जनगढ़ सिंह श्याम


समकालीन गोंड कला के क्षेत्र में पद्मश्री दुर्गाबाई व्यामपद्मश्री भज्जू श्याम और वेंकट रमण सिंह श्याम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इन सम्मानित कलाकारों की एक निजी शैली और विशिष्टता हैजो उनकी चित्रों में दिखाई देती है. व्यक्तिगत संघर्षमेहनत-मजदूरी और पारिवारिक रिश्तों से ये तीनों जुड़े हैं, पर एक तार और है जो इन्हें आपस में जोड़ती है. यह तार गोंड कला के प्रमुख कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम हैंजिन्होंने इस कला को भारतीय  आधुनिक कलाओं के बीच स्थापित किया. तीनों ही जनगढ़ सिंह श्याम को प्रेरणास्रोत मानते हैं.

वर्ष 1962 में मध्यप्रदेश के पाटनगढ़ गाँव में परधान गोंड जनजाति में जन्मे जनगढ़ सिंह श्याम ने वर्ष 2001 में जापान के मिथिला म्यूजियम में आत्महत्या कर ली थीजहाँ वे संग्रहालय के निदेशक टोकियो हासेगावा के निमंत्रण पर पेंटिंग करने गए थे. इस साल उनकी 60वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है और विभिन्न कला दीर्घाओं में उनके सम्मान में गोंड कला की प्रदर्शनी चल रही है.

जिसे हम आज परधान गोंड कला के नाम से जानते हैं वह वर्षों से भित्तिचित्रों के माध्यम से गोंड आदिवासी घरों में प्रचलन में थीपर पिछली सदी के 80 के दशक में जनगढ़ सिंह श्याम कागजी चित्रों और भित्तिचित्रों द्वारा अपने इलाके से बाहर लेकर गए और देश-दुनिया में पहुँचाया. रेखा, बिंदु और चटख रंगों ने जनगढ़ सिंह श्याम की कूची का सहारा पाकर एक नया आयाम ग्रहण किया. गोंड सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में रहने वाले लोक देवतामिथकगाथाजीव-जंतुपेड़-पौधे उनके यहाँ परंपरा और आधुनिकता के मिश्रित रंग में आते हैं. वे अपनी आदिवासी कला लेकर दिल्ली, कोलकाता और पेरिस भी गए थे.

जनगढ़ सिंह श्याम के भतीजे वेंकट रमण सिंह श्याम कहते हैं कि वे बचपन से ही प्रतिभाशाली थे. गोंड कला में उन्होंने काफी प्रयोग किए. उनके प्रयोग से इस चित्रकला में एक नया रूपनया आकार उभरा.’  वे कहते हैं कि भोपाल के भारत भवन में आकर चाचा ने पेपर के ऊपर पेंटिंग की, लिथो, इचिंग के क्षेत्र में भी काम किया. प्रिंटिंग विभाग में उन्होंने गोंड देवी-देवताओंकिस्से-कहानियोंअपनी गाथाओं को चित्रित किया. परधान गोंड के यहाँ पारंपरिक रूप से गाथाओं का महत्व रहा है.

उल्लेखनीय है कि उन्हें भारत भवन लाने का श्रेय आधुनिक चित्रकार और भारत भवन में रूपंकर म्यूजियम के निदेशक जगदीश स्वामीनाथन को जाता है. वे 19 साल के जनगढ़ को गाँव से भारत भवन (भोपाल) लेकर आए. वर्ष 1986 में जनगढ़ को मध्यप्रदेश सरकार ने शिखर सम्मान दिया था. 

प्रसंगवशभील कला के क्षेत्र में पिछले वर्ष पद्मश्री से सम्मानित भूरीबाई को भी स्वामीनाथन ही भारत भवन लेकर आए थे. उन्हें भी शिखर सम्मान मिला था. पद्मश्री मिलने के बाद भूरीबाई ने भी मुझे एक बातचीत के दौरान बताया थाऊपर जाने के बाद भी वे मुझे कला बाँट रहे हैं. वे मेरे गुरु भी थे और देव के रूप में भी मैं उनको मानती हूँ. वर्ष 1990 में स्वामीनाथन ने भारत भवन छोड़ दिया था और वर्ष 1994 में उनकी मृत्यु हो गई. जनगढ़ कहते थे कि स्वामीनाथन की मौत के बाद मैं अनाथ हो गया!’.

यह पूछने पर कि जनगढ़ श्याम ने क्यों आत्महत्या कीवेंकट कहते हैं कि जनगढ़ के मन में निराशा थी कि उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे. वेंकट ने एस आनंद के साथ मिल कर फाइंडिंग माय वे’  नाम से एक किताब लिखी हैजिसमें उन्होंने वाजिब सवाल उठाया है: ‘किसी ने भी नहीं सोचा कि जनगढ़ जैसा काबिल कलाकार क्यों 12 हजार महीने (300 डॉलर) पगार पर विदेश की धरती पर काम कर रहा थासाथ ही उन्होंने करार कर रखा था कि वहाँ पर की गई चित्रकारी म्यूजियम की संपत्ति होगी.  हालांकि वेंकट लिखते हैं कि जनगढ़ की मौत से गोंड कला जी उठी.

वेंकट कहते हैं कि जनगढ़ की मौत के बाद ही मैंने कलाकार बनने की ठानी. हममें से कइयों ने सोचा कि हम जनगढ़ का स्थान ले सकते हैं.’ इस कला को शुरुआत में क्राफ्ट कह कर खारिज किया गया पर जनगढ़ की कला के साथ इसे समकालीन भारतीय कला की श्रेणी में गिना जाने लगा. आज इस कला की कलाकृतियों को ऊंचे दामों पर खरीदा जा रहा है और इससे कई युवा कलाकार जुड़ें हैं.

इस कला की कई चित्रात्मक किताबें भी आज प्रकाशित है. खास कर भज्जू श्याम की किताबें काफी चर्चित हुई हैं.

समकालीन गोंड कला में रेखांकन का तरीका सब कलाकारों का अलग है. चित्रों में जो पैटर्न और स्ट्रोक है वह अलग दिखता है. इसमें आदिवासी जीवन प्रसंगों के साथ निजी जीवन प्रसंगों की झलक भी दिखती है. हालांकि वेंकट कहते हैं कि आज युवा कलाकार सेमिसर्किल और बिंदी को अपनाने में लगे हैं. वे कहते हैं कि युवा पीढ़ी में इंटरनेट से कॉपी करने पर जोर बढ़ा हैं.

वेंकट कहते हैं कि मिथिला पेंटिंग के प्रसिद्ध कलाकारों की तरह ही गोंड कलाकारों को अपना रूपाकार गढ़ने पर जोर देना चाहिए. सही मायनों में गोंड कला के प्रणेता जनगढ़ श्याम और जनगढ़ कलम के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Sunday, November 21, 2021

लोक कला में समकालीन विषयों का चित्रण हो: अविनाश कर्ण

 


पिछले हफ्ते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मिथिला पेंटिंग में योगदान के लिए रांटी गांव (मधुबनी) की दुलारी देवी को पद्मश्री से सम्मानित किया. यह गाँव मधुबनी पेंटिंग का गढ़ रहा है. इससे पहले इस गाँव की महासुदंरी देवी और गोदावरी दत्त को भी मिथिला पेंटिंग के लिए पद्मश्री मिल चुका है. मिथिला कला में पारंपरिक रूप से कायस्थ और ब्राह्मण परिवार की महिलाओं का वर्चस्व रहा है, हालांकि पिछली सदी के सत्तर-अस्सी के दशक से समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों की महिलाओं का दखल बढ़ा है. दुलारी देवी खुद अति पिछड़े समुदाय (मल्लाह) से ताल्लुक रखती हैं. बीएचयू से फाइन आर्टस में प्रशिक्षित, रांटी के ही युवा चित्रकार अविनाश कर्ण इन दिनों आर्टरीच इंडिया के सहयोग से एक कम्यूनिटी प्रोजेक्ट के तहत मुस्लिम लड़कियों को मिथिला पेंटिंग सीखा रहे हैं. इससे पहले मुस्लिम समुदाय मधुबनी पेंटिंग से नहीं जुड़ा. इस प्रोजेक्ट और मिथिला कला में आ रहे बदलाव को लेकर अरविंद दास ने उनसे रांटी स्थित स्टूडियो में बातचीत की, एक अंश:

अपने स्टूडियो और कम्यूनिटी आर्ट परियोजना के बारे में आप हमें बताइए?

आर्ट बोले स्टूडियो शुरु करने की योजना मेरे मन में बहुत पहले से थी. हमारे समुदाय में जो लोग पेंटिंग नहीं सीख पाते हैं, वजह चाहे आर्थिक हो या सामाजिक, मेरी यह इच्छा है कि वे इसे सीखे. मिथिला पेंटिंग में समकालीन कला विषयों को लेकर मैं पेंटिंग करता रहा हूँ. मुझे कुछ ऐसे लोग चाहिए थे जो इन विषयों को लेकर काम करें. मैंने बीएचयू से फाइन आर्ट्स में ट्रेंनिंग ली है, मेरी इच्छा है कि मिथिला कला में अपनी ट्रेनिंग का इस्तेमाल करुँ. यहाँ कलाकारों के बीच में समन्वय नहीं है. आर्ट बोले के माध्यम से मैं इसे बढ़ावा देना चाहता हूँ.

कुछ मुस्लिम लड़कियों की पेंटिंग मुझे स्टूडियो में दिखी है. पहले मुस्लिम समुदाय इससे कभी नहीं जुड़ा, ऐसा क्यों?

इनके अंदर ख्वाहिशें थी, पर इन्हें मौका नहीं मिल रहा था. मधुबनी के नजदीक के गाँव-शेख टोली, गोशाला चौक की लड़कियां इससे जुड़ी है. इन्हें अपने परिवार से भी प्रोत्साहन मिल रहा है. ये नए विषय लेकर आ रही हैं. जैसे मुस्लिम समुदाय में जो दहेज की समस्या है, सामाजिक सौहार्द, स्त्री सशक्तिकरण, सामाजिक मुद्दें इनकी पेंटिंग में दिखता है. हम आपस में बातचीत करके विषय तय करते हैं. कोहबरराम-सीता से अलग ये नया प्रयोग कर रही हैं.

हाल के दिनों में युवा कलाकारों का जोर समकालीन विषयों की ओर बढ़ा है. पहले पारंपरिक विषयों के चित्रण पर जोर था. आप इसके बारे में क्या कहेंगे?

समकालीन विषयों, सामाजिक मुद्दों को पहले भी मिथिला पेंटिंग में चित्रित किया जाता रहा है. गंगा देवी (1928-1991) ने इसकी शुरुआत की थी. उनकी शैली बहुत ही खूबसूरत थी और भी कुछ कलाकारों ने मिथकों, पारंपरिक विषयों से अलग विषय को उठाया था. बाद में बाजार में मिथिला पेंटिंग की विशिष्टता खोने लगी थी. कला तो यह पहले से ही थी, अब फिर से क्राफ्ट से इसे कला की ओर मोड़ा जा रहा है.

आप बनारस शहर से रांटी गाँव आए. क्या अनुभव रहा है आपका?

कोरोना लॉकडाउन के दौरान मैं गाँव लौट आया. यहाँ संसाधनों की कमी भले हो पर अब मैं रांटी रह कर ही आर्ट बोले के माध्यम से सामुदायिक स्तर पर इस कला को आगे ले जाना चाहता हूँ. मैं चाहता हूँ कि यहाँ के कलाकार आर्थिक रूप से मजबूत बने. यहाँ कई लोग सवाल उठाते हैं कि मधुबनी कला में फाइन आर्टस के तत्वों की क्या जरूरत हैलेकिन मेरा कहना है कि मधुबनी कला को समकालीन कला से जोड़ने, इसमें बदलाव की जरूरत है.

दुलारी देवी की पेंटिंग की शैली के बारे में आप क्या कहेंगें?

दुलारी देवी पारंपरिक शैली में पेंटिंग करती रही हैं. सीता स्वयंवर में जो शैली उनकी रही है, वह कायम है. आपने देखा होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्होंने जो पेंटिंग भेंट की और जिसे उन्होंने ट्विट किया वह पारंपरिक शैली में समकालीन विषय के चित्रण का बढ़िया उदाहरण है. मछली और हवाई जहाज का इसमें चित्रण है. उनकी शैली कचनी-भरनी ही है.

मधुबनी पेंटिंग का क्या भविष्य आप देखते हैं?

समकालीन कला के बाजार पर जो संकट है उसका फायदा लोक कला को मिल रहा है. न सिर्फ मधुबनी बल्कि अन्य पारंपरिक, लोक कला के लिए भी यह सच है. लेकिन लोक कला का भविष्य बहुत बढ़िया तब तक हम नहीं देख रहे जब तक इसमें समकालीन विषय-वस्तु नहीं जुड़े. मधुबनी पेंटिंग को मुख्यधारा में लाने के लिए नए विषय वस्तु तलाशने होंगे.

 

Monday, August 16, 2021

सांस्कृतिक विविधता की विरासत

 


देश के विभिन्न इलाकों में कला और सांस्कृतिक रूपों की आवाजाही होती रही है. कला विदुषी कपिला वात्स्यायन ने ठीक ही नोट किया है कि ‘भारत की सांस्कृतिक परंपराओं की यह विशेषता है कि इतिहास के किसी विशेष युग में देश के किसी भाग में जन्मे आंदोलन, कलारूप और शैली को देश के किसी सर्वथा दूरस्थ प्रदेश में फलने फूलने का अवसर मिलता है.’ आजादी के बाद सांस्कृतिक विविधता के बीच एकता और देश के विकास के लिए कला और संस्कृति की महत्ती भूमिका को आधुनिक भारत के निर्माताओं ने स्वीकारा था. पं. नेहरू ने भले ‘आधुनिक भारत के मंदिरों’ पर जोर दिया, पर वे कला और सांस्कृतिक संस्थानों के निर्माण को लेकर भी उतने ही तत्पर थे.

इसी का परिणाम था कि आजादी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर संगीत नाटक अकादमी (1953), साहित्य अकादमी (1954), ललित कला अकादमी (1954), राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय (1964) जैसे संस्थानों की स्थापना हुई. प्रदर्शनकारी, दृश्य, पारंपरिक और आधुनिक कला रूपों, साहित्य, सिनेमा के पोषण और संरक्षण में इन संस्थानों का ऐतिहासिक योगदान है. जहाँ संगीत नाटक अकादमी के हिस्से संगीत, नृत्य और नाटक कला को बढ़ावा देने और विविध संस्कृतियों की विरासत को सहेजन की जिम्मेदारी रही, वहीं ललित कला अकादमी के जिम्मे मूर्तिकला, चित्रकला आदि रहे. आधुनिक और समकालीन के साथ साथ लोक, जनजातीय कला और कलाकारों का संरक्षण भी इसमें शामिल है. साहित्य अकादमी विभिन्न भाषाओँ में लिखे गए साहित्य का प्रचार-प्रसार और अनुवाद का काम करता रहा है. देश में साहित्यिक गतिविधियों की देख-रेख में भी इसकी भूमिका रेखांकित करने योग्य है. ये संस्थान देश के प्रमुख कला-सांस्कृतिक संस्थानों के साथ ही साथ विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार और अकादमियों के साथ समन्वय और मेल-जोल भी करती रही है.

देश की आजादी के समय विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-सवाँरा.

बाद के दशकों में अन्य संस्थानों में आए गिरावट के साथ ही इन संस्थानों में भी भाई-भतीजावाद, अंदरुनी राजनीति और खींचतान के स्वर सुनाई पड़ने लगे. स्वायत्तता होने के बावजूद परोक्ष रूप से सत्ताधारी राजनीतिक दलों का दखल पुरस्कारों, छात्रवृत्तियों से लेकर प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों में देखने को मिला. कई संस्थानों में ऐसे लोग शीर्ष पर पहुँचे जिन्हें कला-संस्कृति से कोई सरोकार नहीं रहा. ऐसे में हर क्षेत्र में प्रतिभाशाली कलाकारों की पहचान मुश्किल हो गई और उनमें कुंठा जन्म लेने लगी. हाल के वर्षों में ऐसा कम ही देखने को मिला है जब साहित्य अकादमी पुरस्कारों की घोषणा के समय वाद-विवाद न हो. फिर भी जहाँ राष्ट्रीय स्तर के इन संस्थानों में कम से कम पारदर्शिता और जवाबदेही की गुंजाइश दिखती है, वहीं हिंदी क्षेत्र में राज्य स्तरों पर कला और संस्कृति के संवर्धन के लिए जो संस्थान अस्तित्व में आए उनमें ज्यातादर पतनशील हैं, उनमें किसी तरह के नवाचार की गुंजाइश नहीं दिखती.

उदाहरण के लिए यह नोट करना उचित होगा कि मिथिला (मधुबनी) पेंटिंग के क्षेत्र में विभिन्न कलाकारों का सम्मान हुआ है और देश-विदेश में इस कला की प्रतिष्ठा हुई है, लेकिन पेंटिंग के गढ़ दरभंगा-मधुबनी में एक भी कला-दीर्घा नहीं है जहां पेंटिंग का प्रदर्शन हो सके. यही बात अन्य लोक कलाओं और कलाकारों के बारे में भी सच है. लोक कलाकारों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है. भोपाल में स्थित जनजातीय संग्रहालय अपवाद ही कहे जाएँगे. इसी तरह भारत भवन, भोपाल (1982) ने भी कला के विभिन्न रूपों के संरक्षण और संवर्धन में योगदान दिया है. प्रसंगवश, अस्सी के दशक में मशहूर कलाकार जगदीश स्वामीनाथन जब भारत भवन के निदेशक थे, तब भूरीबाई की प्रतिभा को पहचाना था और उन्हें चित्र बनाने को प्रेरित किया. इस वर्ष भीली चित्रकला के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया.

इसी तरह सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सिनेमा को संरक्षित करने के उद्देश्य से पुणे में फिल्म संस्थान की स्थापना के कुछ ही वर्ष बाद 1964 में संस्थान में ही राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय की स्थापना की गई. अपने आप में देश में यह एक मात्र ऐसा संस्थान है जो फिल्मों के संग्रहण, प्रसार और संरक्षण में जुटा है. भारत में हर साल करीब पंद्रह सौ से ज्यादा फीचर फिल्में बनती है, इस लिहाज से यहां पर जो संग्रहण हो रहे हैं वह बेहद कम है. देश को एक सूत्र में जोड़ने में बॉलीवुड प्रभावी है, पर भारत में पचास भाषाओं में फिल्मों का निर्माण होता है. करीब पचासी प्रतिशत फिल्में बॉलीवुड के बाहर बनती हैं. राज्य स्तरों पर भी फिल्म संग्रहालय की व्यवस्था होनी चाहिए जहाँ विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्में संग्रहीत की जा सके.

विभिन्न राष्ट्रीय अकादमियों से जुड़े कलाकारों, अधिकारियों से बात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान में ये संस्थान संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, ऐसे में किसी भी तरह की योजनाओं और नई गतिविधियों के लिए बजट का हर वक्त टोटा लगा रहता है. वर्तमान वित्तीय वर्ष (2021-22) के बजट में संस्कृति मंत्रालय के लिए 2687.99 करोड़ रुपए का प्रावधान है जो भारत सरकार के कुल बजट का करीब 0.08 प्रतिशत है जबकि वर्ष 2020-21 में यह 3149.96 करोड़ रुपए था जो कि कुल बजट का लगभग 0.1 प्रतिशत था. इस तरह इस साल बजट में पिछले साल के अनुमानित बजट से करीब 15 प्रतिशत की कटौती की गई.

पिछले दशकों में अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ‘सॉफ्ट पावर’ पर जोर बढ़ा है. जरूरत है भारतीय कला और संस्कृति की विविधता का अतंरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार हो. लोकतांत्रिक भारत की पहचान को कला-संस्कृति के रूपों की बहुलता और विविधता पुख्ता करते हैं. साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर आम नागरिकों, स्कूल-कॉलेज के छात्रों का जुड़ाव इन अकादमियों से बढ़े. डिजिटल तकनीक इसमें सहायक हो सकती है. बदलते वैश्विक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए कला और सांस्कृतिक अकादमियों को आजादी के पचहत्तरवें वर्ष में नए सिरे से अपनी भूमिका को परिभाषित करने की जरूरत है. इन संस्थानों की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज्यादा है

(15 अगस्त 2021, प्रभात खबर)

Thursday, June 18, 2015

‘युद्धिष्ठिर’ को लेकर एफटीआईआई में महाभारत

देश के प्रतिष्ठित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) के चेयरमैन की नियुक्ति को लेकर पिछले एक हफ्ते से मीडिया और कला जगत में घमासान मचा है. संस्थान के छात्रों ने इस नियुक्ति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और वे हड़ताल कर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने अपने एक कार्यकर्ता गजेंद्र चौहान को चेयरमैन बनाया है. चौहान ने टेलीविजन सीरियल महाभारत में युद्धिष्ठिर की भूमिका निभाई थी और उनके नाम कुछ बेनाम सी फिल्में और सीरियल भी हैं!  ख़बरों के मुताबिक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, जिससे यह संस्थान संबद्ध है, के सामने श्याम बेनेगल, गुलजार और अडूर गोपालकृष्णन जैसे फिल्मकार के भी नाम थे पर उसने गजेंद्र चौहान पर अपनी मुहर लगाई. ज़ाहिर है नियुक्ति में राष्ट्रवादी विचारधारा को तरजीह दी गई. कला, सौंदर्य बोध और एफटीआईआई के इतिहास और भारतीय फिल्म के इतिहास में इसकी महती भूमिका को नज़रअंदाज किया गया.

भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के बाद देश में अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों पर बिठा रही है ताकि देश में हिंदूत्ववादी सांस्कृतिक प्रभुत्व स्थापित हो सके. भारत जैसे बहुलतावादी समाज और संस्कृति के लिए यह खतरे की घंटी है. गजेंद्र चौहान की नियुक्ति को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

गौरतलब है कि इससे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वाई सुदर्शन राव को इंडियन कौंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) का मुखिया नियुक्ति किया. एक अजाने से इतिहासकार की नियुक्ति पर देश के जाने माने इतिहासकार हतप्रभ थे. राव का मानना है कि भारतीय इतिहास की सारी समझ वेद और महाभारत में हैं! इसी तरह गुजरात के एक कारोबारी और प्रधानमंत्री के करीबी जफर सरेशवाला को मौलाना आजाद नेशनल यूनिवर्सिटी का कुलपति बनाया गया.  इन नियुक्तियों को लेकर अखबारों और सोशल मीडिया में भले ही छिटपुट विरोध दर्ज हुए हो, पर कोई व्यापक आंदोलन नहीं हुआ. इस बार एफटीआईआई में हुई इस नियुक्ति के विरोध की आवाज़ मुंबई से लेकर कोलकाता और दिल्ली तक सुनाई दे रही है.

पुणे स्थित फिल्म संस्थान की आबोहवा में रचनात्मकता और अराजकता साथ-साथ चलती रही है. यदि आप इस संस्थान में कदम रखें तो सिनेमा ऑर नथिंग’, ‘सिनेमा इज ट्रुथजैसे नारे (ग्रैफिटी) दीवारों में अंकित दिखेंगे. घटक, हिचकॉक और जॉन अब्राहम की तस्वीरें यहाँ-वहाँ उकेरी हुई मिलेगी. विजडम ट्री के आप-पास देर रात तक बहस करते छात्र और बीयर की टूटी बोतलें मिलेंगी. संस्थान के छात्रों-अध्यापकों के लिए सिनेमा एक जुनून से कम नहीं. और इसी जुनून की वजह से सरकार के इस फैसले के खिलाफ फिल्म इज ए बैटलग्राउंड’, ‘स्ट्राइक डॉउन फासिज्मसे नारों के साथ छात्र सड़क पर उतरे हैं.


एफटीआईआई
ऋत्विक घटक, अडूर गोपालकृष्णन, मणि कौल, कुमार साहनी, सईद मिर्जा, जानू बरुआ, गिरिश कसारावली, जॉन अब्राहम, कमल स्वरूप, प्रकाश झा, शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, संतोष शिवन, रेसुल पोकुट्टी, राजकुमार हिरानी....और युवा फिल्मकारों में अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह, उमेश कुलकर्णी जैसे नाम इस संस्थान से जुड़े रहे हैं. छात्रों का कहना है कि एफटीआईआई के चैयरमैन रह चुके श्याम बेनेगल, मृणाल  सेन, अडूर गोपालकृष्णन, यू आर अनंतमूर्ति, गिरिश कर्नाड, सईद मिर्जा जैसों की तुलना में गजेंद्र चौहान का फिल्मों से परिचय, अनुभव और सिनेमाई समझ संदिग्ध है. वे इसे केंद्र सरकार के एक गहरे साजिश के रूप में देखते हैं. उनका कहना है कि सरकार अपनी सांस्कृतिक समझ हम पर थोपना चाहती हैं, जो कि फिल्म संस्थान की बनावट और बुनावट के विपरीत है.


असल में पिछले कुछ वर्षों से एफटीआईआई के निजीकरण को लेकर सरकार योजना बनाती रही है पर छात्रों के विरोध के कारण इसे स्थगित करना पड़ा है. बॉलीवुड की मायावी चमक से दूर एफटीआईआई पिछले साठ वर्षों से सिनेमा के अर्थ और इसकी अर्थच्छवियों से छात्रों को रू-ब-रू करवाता रहा है. इसने देश-विदेश में भारतीय सिनेमा को एक नई पहचान दी है. आजाद भारत में ऐसे शैक्षणिक संस्थान गिनती के हैं जिनकी उत्कृष्ठता सर्वमान्य हो. एफटीआईआई को ऐसे चैयरमैन की जरूरत है जिनकी पहचान राजनीतिक विचारधारा विशेष से ना होकर सिनेमा से बनी हो!   


(जनसत्ता के समांतर स्तंभ में, 'मनमानी के पद' शीर्षक से 2 जुलाई 2015 को प्रकाशित)