विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-संवारा.
Saturday, March 14, 2026
त्रिवेणी कला संगम के 75 साल
विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-संवारा.
Sunday, May 29, 2022
गोंड कला में गाथाओं का महत्व रहा है: वेंकट रमण सिंह श्याम
समकालीन आदिवासी गोंड कला के क्षेत्र में पद्मश्री
दुर्गाबाई व्याम, पद्मश्री भज्जू
श्याम और वेंकट रमण सिंह श्याम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इन सम्मानित
कलाकारों की एक निजी शैली और विशिष्टता है, जो उनकी चित्रों में दिखाई देती है. तीनों ही अपनी
कला का प्रेरणास्रोत जनगढ़ सिंह श्याम (1962-2001) को मानते हैं. वेंकट रमण सिंह श्याम से अरविंद दास बातचीत:
आज जिसे हम परधान गोंड कला के नाम से जानते हैं, उसकी शुरुआत कब हुई?
हमारे यहाँ शादी, त्योहारों के अवसर पर मिट्टी के रंग, फूल-पत्ती से लोग दीवारों पर भित्तिचित्र पारंपरिक रूप
से बनाते थे. महिलाएँ, पुरुष दोनों ही
इसमें काम करते थे. कोठी में वे डिजाइन बनाते थे, घर की दीवारों पर वे भी वे पेंटिंग करते थे.
राष्ट्रीय स्तर पर यह पेंटिंग चर्चित भले नहीं थी, पर एंथ्रोपोलॉजिस्ट वेरियर एल्विन ने गोंड आदिवासियों
के बीच काफी काम किया. उन्होंने हमारे गाँव पाटनगढ़ रह कर किताब लिखी जिसके माध्यम
से गोंड कला, संगीतकारों के
बारे में (जो बाना बजाते हैं) लोगों को पता चला. जब 80 के दशक में जगदीश स्वामीनाथन भोपाल स्थित भारत भवन
में काम कर रहे थे तब उन्होंने पाटनगढ़ में जनगढ़ सिंह श्याम के काम को दीवारों पर
देखा और उन्हें भारत भवन लेकर आए. तब इस पेंटिंग की बाहर की दुनिया में चर्चा हुई.
जनगढ़ श्याम से आपके रिश्ते थे? क्या आपने जनगढ़ श्याम के साथ काम किया था? उनकी कला को आप किस तरह देखते हैं?
जनगढ़ सिंह श्याम मेरे चाचा थे. मैंने उनके साथ काम
किया है. वे ही मुझे भोपाल लेकर आए थे.
भारत भवन में उन्होंने पेपर के ऊपर पेंटिंग की. लिथो, इचिंग के क्षेत्र में भी काम किया. प्रिंटिंग विभाग
में उन्होंने गोंड देवी-देवताओं, किस्से-कहानियों, अपनी गाथाओं को चित्रित किया. उन्होंने बहुत सारे
प्रयोग किए और इस कला ने एक नया आकार ग्रहण किया. परधान गोंड के यहाँ पारंपरिक रूप
से गाथाओं का महत्व रहा है.
जनगढ़ श्याम की 60वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है. वर्ष 2001 में जब वे मिथिला म्यूजियम (जापान) में थे वहीं
आत्महत्या कर ली थी. क्या परेशानी थी
उन्हें?
जितना मैं जानता हूँ, उनमें कला की प्रतिभा थी. भारत भवन आने से पहले वे
मध्य प्रदेश सरकार के टीसीपीसी (ट्रेंनिग कम प्रोडक्शन सेंटर) में अलग ढंग के
डिजाइन का काम करते थे. काम करते हुए उनमें शार्पनेस आया. उनके माध्यम से कला बाहर
की दुनिया में पहुँची.
मैं सच कहूँ तो इस कला की दुनिया में जिस तरह से उनका
नाम था उस तरह का सम्मान उन्हें नहीं मिला. शिखर सम्मान (1986) के बाद उन्हें लगता था कि वे सिमट गए हैं. सरकार या
कहीं से से उन्हें सहयोग नहीं मिला. वे बहुत दुखी और निराश थे. वे कहते थे कि बेटा
जो नाम है वह मुझे नहीं मिल रहा है. उनके ही सामने एक नए कलाकार को ललित कला का
पुरस्कार मिला, पर उन्हें नहीं
मिला. पर जनगढ़ की मौत के बाद ही मैंने कलाकार बनने की ठानी. हममें से कइयों ने
सोचा कि हम जनगढ़ का स्थान ले सकते हैं.
समकालीन गोंड कला को आप किस रूप में देखते हैं?
इस समय पूरी दुनिया में गोंड कला अपना परचम लहरा रही
है. हम तीन लोगों (भज्जू, दुर्गाबाई और
मैं) ने जैसे काम किया है उसकी चर्चा है. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा लेकर हम इस कला को गए हैं. हमारा पूरा परिवार
पेंटिंग करता है. लोग जनगढ़ की पेंटिंग के छोटे टुकड़े के पीछे भी भागते हैं. हम
तीनों की पेंटिंग की एक अलग पहचान है. हमारा रेखांकन का तरीका- लाइन, ड्राइंग, स्केच या आकृति बनाने का तरीका सबका अलग है. साथ ही
हमारा पैटर्न अलग है.
युवा कलाकारों के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? उनकी कला में क्या विशेषता दिखाई दे रही है?
नाम होने के बाद एक और जो पैटर्न उभरा है सेमी सर्कल
और डॉट का उसे सब ग्रहण करना चाहते हैं. युवा कलाकार पर इंटरनेट से कॉपी करने पर
जोर बढ़ा हैं. मिथिला पेंटिंग के प्रसिद्ध कलाकारों की तरह ही गोंड कलाकारों को
अपना रूपाकार गढ़ने पर जोर देना चाहिए. कला तभी आगे बढ़ती है जब उसमें परिवर्तन आए. हम इसके लिए
युवा कलाकारों के साथ वर्कशॉप करते हैं.
आपकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ हुई?
मैं ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूँ, मुझे कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं है. जंगल, खेत, किस्से-कहानी ही
मेरी पेंटिंग में आई है. चाचा जी के साथ काफी वक्त मैंने गुजारा, उनसे बहुत कुछ सीखने-समझने को मिला. मुझे जगदीश
स्वामीनाथन, मकबूल फिदा हुसैन, मंजीत बावा को भी देखने-सुनने का मौका मिला. उनकी
चर्चा से मुझे लाभ हुआ.
Wednesday, May 25, 2022
गोंड कला के समकालीन रंग मार्फत जनगढ़ सिंह श्याम
समकालीन गोंड कला के क्षेत्र में पद्मश्री दुर्गाबाई व्याम, पद्मश्री भज्जू श्याम और वेंकट रमण सिंह श्याम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इन सम्मानित कलाकारों की एक निजी शैली और विशिष्टता है, जो उनकी चित्रों में दिखाई देती है. व्यक्तिगत संघर्ष, मेहनत-मजदूरी और पारिवारिक रिश्तों से ये तीनों जुड़े हैं, पर एक तार और है जो इन्हें आपस में जोड़ती है. यह तार गोंड कला के प्रमुख कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम हैं, जिन्होंने इस कला को भारतीय आधुनिक कलाओं के बीच स्थापित किया. तीनों ही जनगढ़ सिंह श्याम को प्रेरणास्रोत मानते हैं.
वर्ष 1962 में मध्यप्रदेश के पाटनगढ़ गाँव में परधान गोंड जनजाति में जन्मे जनगढ़ सिंह श्याम ने वर्ष 2001 में जापान के ‘मिथिला म्यूजियम’ में आत्महत्या कर ली थी, जहाँ वे संग्रहालय के निदेशक टोकियो हासेगावा के निमंत्रण पर पेंटिंग करने गए थे. इस साल उनकी 60वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है और विभिन्न कला दीर्घाओं में उनके सम्मान में गोंड कला की प्रदर्शनी चल रही है.
जिसे हम आज ‘परधान गोंड कला’ के नाम से जानते हैं वह वर्षों से भित्तिचित्रों के माध्यम से गोंड आदिवासी घरों में प्रचलन में थी, पर पिछली सदी के 80 के दशक में जनगढ़ सिंह श्याम कागजी चित्रों और भित्तिचित्रों द्वारा अपने इलाके से बाहर लेकर गए और देश-दुनिया में पहुँचाया. रेखा, बिंदु और चटख रंगों ने जनगढ़ सिंह श्याम की कूची का सहारा पाकर एक नया आयाम ग्रहण किया. गोंड सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में रहने वाले लोक देवता, मिथक, गाथा, जीव-जंतु, पेड़-पौधे उनके यहाँ परंपरा और आधुनिकता के मिश्रित रंग में आते हैं. वे अपनी आदिवासी कला लेकर दिल्ली, कोलकाता और पेरिस भी गए थे.
जनगढ़ सिंह श्याम के भतीजे वेंकट रमण सिंह श्याम कहते हैं कि ‘वे बचपन से ही प्रतिभाशाली थे. गोंड कला में उन्होंने काफी प्रयोग किए. उनके प्रयोग से इस चित्रकला में एक नया रूप, नया आकार उभरा.’ वे कहते हैं कि भोपाल के भारत भवन में आकर चाचा ने पेपर के ऊपर पेंटिंग की, लिथो, इचिंग के क्षेत्र में भी काम किया. प्रिंटिंग विभाग में उन्होंने गोंड देवी-देवताओं, किस्से-कहानियों, अपनी गाथाओं को चित्रित किया. परधान गोंड के यहाँ पारंपरिक रूप से गाथाओं का महत्व रहा है.
उल्लेखनीय है कि उन्हें भारत भवन लाने का श्रेय आधुनिक चित्रकार और भारत भवन में रूपंकर म्यूजियम के निदेशक जगदीश स्वामीनाथन को जाता है. वे 19 साल के जनगढ़ को गाँव से भारत भवन (भोपाल) लेकर आए. वर्ष 1986 में जनगढ़ को मध्यप्रदेश सरकार ने ‘शिखर सम्मान’ दिया था.
प्रसंगवश, भील कला के क्षेत्र में पिछले वर्ष पद्मश्री से सम्मानित भूरीबाई को भी स्वामीनाथन ही भारत भवन लेकर आए थे. उन्हें भी शिखर सम्मान मिला था. पद्मश्री मिलने के बाद भूरीबाई ने भी मुझे एक बातचीत के दौरान बताया था, ‘ऊपर जाने के बाद भी वे मुझे कला बाँट रहे हैं. वे मेरे गुरु भी थे और देव के रूप में भी मैं उनको मानती हूँ.’ वर्ष 1990 में स्वामीनाथन ने भारत भवन छोड़ दिया था और वर्ष 1994 में उनकी मृत्यु हो गई. जनगढ़ कहते थे कि ‘स्वामीनाथन की मौत के बाद मैं अनाथ हो गया!’.
यह पूछने पर कि जनगढ़ श्याम ने क्यों आत्महत्या की, वेंकट कहते हैं कि जनगढ़ के मन में निराशा थी कि उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे. वेंकट ने एस आनंद के साथ मिल कर ‘फाइंडिंग माय वे’ नाम से एक किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने वाजिब सवाल उठाया है: ‘किसी ने भी नहीं सोचा कि जनगढ़ जैसा काबिल कलाकार क्यों 12 हजार महीने (300 डॉलर) पगार पर विदेश की धरती पर काम कर रहा था. साथ ही उन्होंने करार कर रखा था कि वहाँ पर की गई चित्रकारी म्यूजियम की संपत्ति होगी.’ हालांकि वेंकट लिखते हैं कि जनगढ़ की मौत से गोंड कला जी उठी.
वेंकट कहते हैं कि ‘जनगढ़ की मौत के बाद ही मैंने कलाकार बनने की ठानी. हममें से कइयों ने सोचा कि हम जनगढ़ का स्थान ले सकते हैं.’ इस कला को शुरुआत में ‘क्राफ्ट’ कह कर खारिज किया गया पर जनगढ़ की कला के साथ इसे समकालीन भारतीय कला की श्रेणी में गिना जाने लगा. आज इस कला की कलाकृतियों को ऊंचे दामों पर खरीदा जा रहा है और इससे कई युवा कलाकार जुड़ें हैं.
इस कला की कई चित्रात्मक किताबें भी आज प्रकाशित है. खास कर भज्जू श्याम की किताबें काफी चर्चित हुई हैं.
समकालीन गोंड कला में रेखांकन का तरीका सब कलाकारों का अलग है. चित्रों में जो ‘पैटर्न’ और ‘स्ट्रोक’ है वह अलग दिखता है. इसमें आदिवासी जीवन प्रसंगों के साथ निजी जीवन प्रसंगों की झलक भी दिखती है. हालांकि वेंकट कहते हैं कि आज युवा कलाकार ‘सेमिसर्किल’ और ‘बिंदी’
वेंकट कहते हैं कि ‘मिथिला पेंटिंग के प्रसिद्ध कलाकारों की तरह ही गोंड कलाकारों को अपना रूपाकार गढ़ने पर जोर देना चाहिए.’ सही मायनों में गोंड कला के प्रणेता जनगढ़ श्याम और ‘जनगढ़ कलम’ के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)
Sunday, November 21, 2021
लोक कला में समकालीन विषयों का चित्रण हो: अविनाश कर्ण
पिछले हफ्ते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मिथिला पेंटिंग में योगदान के लिए रांटी गांव (मधुबनी) की दुलारी देवी को पद्मश्री से सम्मानित किया. यह गाँव मधुबनी पेंटिंग का गढ़ रहा है. इससे पहले इस गाँव की महासुदंरी देवी और गोदावरी दत्त को भी मिथिला पेंटिंग के लिए पद्मश्री मिल चुका है. मिथिला कला में पारंपरिक रूप से कायस्थ और ब्राह्मण परिवार की महिलाओं का वर्चस्व रहा है, हालांकि पिछली सदी के सत्तर-अस्सी के दशक से समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों की महिलाओं का दखल बढ़ा है. दुलारी देवी खुद अति पिछड़े समुदाय (मल्लाह) से ताल्लुक रखती हैं. बीएचयू से फाइन आर्टस में प्रशिक्षित, रांटी के ही युवा चित्रकार अविनाश कर्ण इन दिनों ‘आर्टरीच इंडिया’ के सहयोग से एक कम्यूनिटी प्रोजेक्ट के तहत मुस्लिम लड़कियों को मिथिला पेंटिंग सीखा रहे हैं. इससे पहले मुस्लिम समुदाय मधुबनी पेंटिंग से नहीं जुड़ा. इस प्रोजेक्ट और मिथिला कला में आ रहे बदलाव को लेकर अरविंद दास ने उनसे रांटी स्थित स्टूडियो में बातचीत की, एक अंश:
अपने स्टूडियो और कम्यूनिटी आर्ट परियोजना के बारे में आप हमें बताइए?
आर्ट बोले स्टूडियो शुरु करने की योजना मेरे मन में बहुत पहले से थी. हमारे समुदाय में जो लोग पेंटिंग नहीं सीख पाते हैं, वजह चाहे आर्थिक हो या सामाजिक, मेरी यह इच्छा है कि वे इसे सीखे. मिथिला पेंटिंग में समकालीन कला विषयों को लेकर मैं पेंटिंग करता रहा हूँ. मुझे कुछ ऐसे लोग चाहिए थे जो इन विषयों को लेकर काम करें. मैंने बीएचयू से फाइन आर्ट्स में ट्रेंनिंग ली है, मेरी इच्छा है कि मिथिला कला में अपनी ट्रेनिंग का इस्तेमाल करुँ. यहाँ कलाकारों के बीच में समन्वय नहीं है. आर्ट बोले के माध्यम से मैं इसे बढ़ावा देना चाहता हूँ.
कुछ मुस्लिम लड़कियों की पेंटिंग मुझे स्टूडियो में दिखी है. पहले मुस्लिम समुदाय इससे कभी नहीं जुड़ा, ऐसा क्यों?
इनके अंदर ख्वाहिशें थी, पर इन्हें मौका नहीं मिल रहा था. मधुबनी के नजदीक के गाँव-शेख टोली, गोशाला चौक की लड़कियां इससे जुड़ी है. इन्हें अपने परिवार से भी प्रोत्साहन मिल रहा है. ये नए विषय लेकर आ रही हैं. जैसे मुस्लिम समुदाय में जो दहेज की समस्या है, सामाजिक सौहार्द, स्त्री सशक्तिकरण, सामाजिक मुद्दें इनकी पेंटिंग में दिखता है. हम आपस में बातचीत करके विषय तय करते हैं. कोहबर, राम-सीता से अलग ये नया प्रयोग कर रही हैं.
हाल के दिनों में युवा कलाकारों का जोर समकालीन विषयों की ओर बढ़ा है. पहले पारंपरिक विषयों के चित्रण पर जोर था. आप इसके बारे में क्या कहेंगे?
समकालीन विषयों, सामाजिक मुद्दों को पहले भी मिथिला पेंटिंग में चित्रित किया जाता रहा है. गंगा देवी (1928-1991) ने इसकी शुरुआत की थी. उनकी शैली बहुत ही खूबसूरत थी और भी कुछ कलाकारों ने मिथकों, पारंपरिक विषयों से अलग विषय को उठाया था. बाद में बाजार में मिथिला पेंटिंग की विशिष्टता खोने लगी थी. कला तो यह पहले से ही थी, अब फिर से क्राफ्ट से इसे कला की ओर मोड़ा जा रहा है.
आप बनारस शहर से रांटी गाँव आए. क्या अनुभव रहा है आपका?
कोरोना लॉकडाउन के दौरान मैं गाँव लौट आया. यहाँ संसाधनों की कमी भले हो पर अब मैं रांटी रह कर ही आर्ट बोले के माध्यम से सामुदायिक स्तर पर इस कला को आगे ले जाना चाहता हूँ. मैं चाहता हूँ कि यहाँ के कलाकार आर्थिक रूप से मजबूत बने. यहाँ कई लोग सवाल उठाते हैं कि मधुबनी कला में फाइन आर्टस के तत्वों की क्या जरूरत है? लेकिन मेरा कहना है कि मधुबनी कला को समकालीन कला से जोड़ने, इसमें बदलाव की जरूरत है.
दुलारी देवी की पेंटिंग की शैली के बारे में आप क्या कहेंगें?
दुलारी देवी पारंपरिक शैली में पेंटिंग करती रही हैं. सीता स्वयंवर में जो शैली उनकी रही है, वह कायम है. आपने देखा होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्होंने जो पेंटिंग भेंट की और जिसे उन्होंने ट्विट किया वह पारंपरिक शैली में समकालीन विषय के चित्रण का बढ़िया उदाहरण है. मछली और हवाई जहाज का इसमें चित्रण है. उनकी शैली कचनी-भरनी ही है.
मधुबनी पेंटिंग का क्या भविष्य आप देखते हैं?
समकालीन कला के बाजार पर जो संकट है उसका फायदा लोक कला को मिल रहा है. न सिर्फ मधुबनी बल्कि अन्य पारंपरिक, लोक कला के लिए भी यह सच है. लेकिन लोक कला का भविष्य बहुत बढ़िया तब तक हम नहीं देख रहे जब तक इसमें समकालीन विषय-वस्तु नहीं जुड़े. मधुबनी पेंटिंग को मुख्यधारा में लाने के लिए नए विषय वस्तु तलाशने होंगे.
Monday, August 16, 2021
सांस्कृतिक विविधता की विरासत
देश के विभिन्न इलाकों में कला और सांस्कृतिक रूपों की आवाजाही होती रही है. कला विदुषी कपिला वात्स्यायन ने ठीक ही नोट किया है कि ‘भारत की सांस्कृतिक परंपराओं की यह विशेषता है कि इतिहास के किसी विशेष युग में देश के किसी भाग में जन्मे आंदोलन, कलारूप और शैली को देश के किसी सर्वथा दूरस्थ प्रदेश में फलने फूलने का अवसर मिलता है.’ आजादी के बाद सांस्कृतिक विविधता के बीच एकता और देश के विकास के लिए कला और संस्कृति की महत्ती भूमिका को आधुनिक भारत के निर्माताओं ने स्वीकारा था. पं. नेहरू ने भले ‘आधुनिक भारत के मंदिरों’ पर जोर दिया, पर वे कला और सांस्कृतिक संस्थानों के निर्माण को लेकर भी उतने ही तत्पर थे.
Thursday, June 18, 2015
‘युद्धिष्ठिर’ को लेकर एफटीआईआई में महाभारत
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